True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

तेईसवीं दुआ जब तलबे आफ़ियत करते और उस पर शुक्र अदा करते तो यह दुआ पढ़ते।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझे अपनी आफ़ियत का लिबास पहना, अपनी आफ़ियत की रिदा ओढ़ा, अपनी आफ़ियत के ज़रिये महफ़ूज़ा रख, अपनी आफ़ियत के ज़रिये इज़्ज़त व वेक़ार दे, अपनी आफ़ियत के ज़रिये बेनियाज़ कर दे। अपनी आफ़ियत की भीक मेरी झोली में डाल दे, अपनी आफ़ियत मुझे मरहमत फ़रमा। अपनी आफ़ियत को मेरा ओढ़ना बिछोना क़रार दे। अपनी आफ़ियत की मेरे लिये इस्लाह व दुरूस्ती फ़रमा और दुनिया व आख़ेरत में मेरे और अपनी आफ़ियत के दरम्यान जुदाई न डाल।

ऐ मेरे माबूद! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझे ऐसी आफ़ियत दे जो बेनियाज़ करने वाली, शिफ़ा बख़्शने वाली (इमराज़ के दस्तरस से) बाला और रोज़े अफ़ज़ों हो। ऐसी आफ़ियत जो मेरे जिस्म में दुनिया व आख़ेरत की आफ़ियत को जनम दे। और सेहत, अमन, जिस्म व ईमान की सलामती, क़ल्बी बसीरत, निफ़ाज़े उमूर की सलाहियत, हम व ख़ौफ़ का जज़्बा और जिस इताअत का हुक्म दिया है उसके बजा लाने की क़ूवत और जिन गुनाहों से मना किया है उनसे इजतेनाब की तौफ़ीक़ बख़्श कर मुझ पर एहसान फ़रमा।

बारे इलाहा! मुझ पर यह एहसान भी फ़रमा के जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे हमेषा इस साल भी और हर साल हज व उमरा और क़ब्रे रसूल सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम और क़ुबूरे आले रसूल (स0) समामुल्लाहे अलैहिम की ज़ियारत करता रहूँ और उन इबादतों को मक़बूल व पसन्दीदा क़ाबिले इलतेफ़ात और अपने हाँ ज़ख़ीरा क़रार दे, और हम्द व शुक्र व ज़िक्र और सनाए जीमल के नग़मों से मेरी ज़बान को गोया रख और दीनी हिदायतों के लिये मेरे दिल की गिरहें खोल दे और मुझे और मेरी औलाद को षैतान मरदूद और ज़हरीले जानवरों, हलाक करने वाले हैवानों और दूसरे जानवरों के गज़न्द और चश्मेब द से पनाह दे और हर सरकश शैतान, हर ज़ालिम हुकमरान, हर जमा जत्थे वाले मग़रूर, हर कमज़ोर और ताक़तवर, हर आला व अदना, हर छोटे बड़े और हर नज़दीक और दूर वाले और जिन्न व इन्स में से तेरे पैग़म्बर और उनके अहलेबैत से बरसरे पैकार होने वाले और हर हैवान के शर से जिन पर तुझे तसल्लत हासिल है, महफ़ूज़ रख। इसलिये के तू हक़ व अद्ल की राह पर है।

ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जो मुझसे बुराई करना चाहे उसे मुझसे रूगर्दा कर दे, उसका मक्र मुझसे दूर, उसका असर मुझसे दफ़ा कर दे और उसके मक्र व फ़रेब (के तीर) उसी के सीने की तरफ़ पलटा दे और उसके सामने एक दीवार खड़ी कर दे यहाँ तक के उसकी आंखों को मुझे देखने से नाबीना और उसके कानों को मेरा ज़िक्र सुनने से बहरा कर दे और उसके दिल पर क़फ़्ल चढ़ा दे ताके मेरा उसे ख़याल न आए। और मेरे बारे में कुछ कहने सुनने से उसकी ज़बान को गंग कर दे, उसका सर कुचल दे, उसकी इज़्ज़त पामाल कर दे, उसकी तमकनत को तोड़ दे। उसकी गर्दन में ज़िल्लत का तौक़ डाल दे उसका तकब्बुर ख़त्म कर दे और मुझे उसकी ज़रर रसानी, शर पसन्दी, तानाज़नी, ग़ीबत, ऐबजोई, हसद, दुश्मनी और उसके फन्दों, हथकण्डों, प्यादों और सवारों से अपने हिफ़्ज़ व अमान में रख। यक़ीनन तू ग़लबा व इक़तेदार का मालिक है।

चौबीसवीं दुआ अपने वालेदैन (अलैहिस्सलाम) के हक़ में हज़रत (अ0) की दुआ

ऐ अल्लाह! अपने अब्दे ख़ास और रसूल मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और उनके पाक व पाकीज़ा अहलेबैत (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उन्हें बेहतरीन रहमत व बरकत और दुरूद व सलाम के साथ ख़ुसूसी इम्तियाज़ बख़्श, और ऐ माबूद! मेरे मँा बाप को भी अपने नज़दीक इज़्ज़त व करामत और अपनी रहमत से मख़सूस फ़रमा। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। उनके जो हुक़ूक़ मुझ पर वाजिब हैं उनका इल्म बज़रिये इलहाम अता कर और उन तमाम वाजेबात का इल्म बे कम व कास्त मेरे लिये मुहयया फ़रमा दे। फिर जो मुझे बज़रिये इलहाम बताए उस पर कारबन्द रख और इस सिलसिले में जो बसीरत इल्मी अता करे उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे ताके उन बातों में से जो तूने मुझे तालीम की हैं कोई बात अमल में आए बग़ैर न रह जाए और उस खि़दमतगुज़ारी से जो तूने मुझे बतलाई है, मेरे हाथ पैर थकन महसूस न करें।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी तरफ़ इन्तेसाब से हमें शरफ़ बख़्शा है। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी वजह से हमारा हक़ मख़लूक़ात पर क़ायम किया है।

ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना दे के मैं इन दोनों से इस तरह डरूं जिस तरह किसी जाबिर बादषाह से डरा जाता है और इस तरह उनके हाल पर शफ़ीक़ व मेहरबान रहूँ जिस तरह शफ़ीक़ मां (अपनी औलाद पर) शफ़क़्क़त करती है और उनकी फ़रमाबरदारी और उनसे हुस्ने सुलूक के साथ पेश आने को मेरी आंखों के लिये इससे ज़्यादा कैफ़ अफ़ज़ा क़रार दे जितना चश्मे ख़्वाब आलूद में नीन्द का ख़ुमार और मेरे क़ल्ब व रूह के लिये इससे बढ़ कर मसर्रत अंगेज़ क़रार दे जितना प्यासे के लिये जरअए आब। ताके मैं अपनी ख़्वाहिश पर उनकी ख़्वाहिश को तरजीह दूँ और अपनी ख़ुशी पर उनकी ख़ुशी को मुक़द्दम रखूँ और उनके थोड़े एहसान को भी जो मुझ पर करें, ज़्यादा समझूं। और मैं जो नेकी उनके साथ करूं वह ज़्यादा भी हो तो उसे कम तसव्वुर करूं।

ऐ अल्लाह! मेरी आवाज़ को उनके सामने आहिस्ता मेरे कलाम को उनके लिये ख़ुशगवार, मेरी तबीयत को नरम और मेरे दिल को मेहरबान बना दे और मुझे उनके साथ नर्मी व शफ़क़्क़त से पेश आने वाला क़रार दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी परवरिश की जज़ाए ख़ैर दे और मेरे हुस्ने निगेहदाश्त पर अज्र व सवाब अता कर और कमसिनी में मेरी ख़बरगीरी का उन्हें सिला दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी तरफ़ से कोई तकलीफ़ पहुंची हो या मेरी जानिब से कोई नागवार सूरत पेश आई हो या उनकी हक़तलफ़ी हुई हो तो उसे उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा, दरजात की बलन्दी और नेकियों में इज़ाफ़े का सबब क़रार दे।

ऐ बुराइयों को कई गुना नेकियों से बदल देने वाले, बारे इलाहा! अगर उन्होंने मेरे साथ गुफ़्तगू में सख़्ती या किसी काम में ज़्यादती या मेरे किसी हक़ में फ़रोगुज़ाश्त या अपने फ़र्ज़े मन्सबी में कोताही की हो तो मैं उनको बख़्शता हूं और उसे नेकी व एहसान का वसीला क़रार देता हूं, और पालने वाले! तुझसे ख़्वाहिश करता हूँ के इसका मोआख़ेज़ा उनसे न करना। इसमें अपनी निस्बत उनसे कोई बदगुमानी नहीं रखता और न तरबीयत के सिलसिले में उन्हें सहल अंगार समझता हूँ और न उनकी देखभाल को नापसन्द करता हूँ इसलिये के उनके हुक़ूक़ मुझपर लाज़िम व वाजिब, उनके एहसानात देरीना और उनके इनआमात अज़ीम हैं। वह इससे बालातर हैं के मैं उनको बराबर का बदला या वैसा ही एवज़ दे सकूँ। अगर ऐसा कर सकूं तो ऐ मेरे माबूद! वह उनका हमहवक़्त मेरी तरबीयत में मशग़ूल रहना, मेरी ख़बरगीरी में रन्ज व ताब उठाना और ख़ुद असरत व तंगी में रहकर मेरी आसूदगी का सामान करना कहाँ जाएगा भला कहां हो सकता है के वह अपने हुक़ूक़ का सिला मुझसे पा सकें और न मैं ख़ुद ही उनके हुक़ूक़ से सुबुकदोश हो सकता हूँ और न उनकी खि़दमत का फ़रीज़ा अन्जाम दे सकता हूँ। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी मदद फ़रमा ऐ बेहतर उनसे जिनसे मदद मांगी जाती है और मुझे तौफ़ीक़ दे ऐ ज़्यादा रहनुमाई करने वाले उन सबसे जिनकी तरफ़ (हिदायत के लिये) तवज्जो की जाती है। और मुझे उस दिन जबके हर शख़्स को उसके आमाल का बदला दिया जाएगा और किसी पर ज़्यादती न होगी उन लोगों में से क़रार न देना जो माँ-बाप के आक़ व नाफ़रमाबरदार हों।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) व औलाद (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे माँ-बाप को उससे बढ़कर इम्तियाज़ दे जो मोमिन बन्दों के माँ-बाप को तूने बख़्शा है। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले। ऐ अल्लाह! उनकी याद को नमाज़ों के बाद रात की साअतों और दिन के तमाम लम्हों में किसी वक़्त फ़रामोश न होने दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनके हक़ में दुआ करने की वजह से और उन्हें मेरे साथ नेकी करने की वजह से लाज़मी तौर पर बख़्श दे और मेरी सिफ़ारिश की वजह से उनसे क़तई तौर पर राज़ी व ख़ुशनूद हो और उन्हें इज़्ज़त व आबरू के साथ सलामती की मन्ज़िलों तक पहुंचा दे।

ऐ अल्लाह! अगर तूने उन्हें मुझसे पहले बख़्श दिया तो उन्हें मेरा शफ़ीअ बना। और अगर मुझे पहले बख़्श दिया तो मुझे उनका शफ़ीअ क़रार दे ताके हमस ब तेरे लुत्फ़ व करम की बदौलत तेरे बुज़ुर्गी के घर और बख़्शिश व रहमत की मन्ज़िल में एक साथ जमा हो सकें। यक़ीनन तू बड़े फ़ज़्ल वाला क़दीम एहसान वाला और सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है।

पच्चीसवीं दुआ औलाद के हक़ में हज़रत (अ0) की दुआ

ऐ मेरे माबूद! मेरी औलाद की बक़ा और उनकी इस्लाह और उनसे मेहरामन्दी के सामान मुहय्या करके मुझे ममनूने एहसान फ़रमा और मेरे सहारे के लिये उनकी उम्रों में बरकत और उनकी ज़िन्दगियों में तूल दे और उनमें से छोटों की परवरिश फ़रमा और कमज़ोरों को तवानाई दे और उनकी जिस्मानी, ईमानी और एख़लाक़ी हालत को दुरूस्त फ़रमा और उनके जिस्म व जान और उनके दूसरे मुआमलात में जिनमें मुझे एहतेमाम करना पड़े उन्हें आफ़ियत से हमकिनार रख, और मेरे लिये और मेरे ज़रिये उनके लिये रिज़्क़े फ़रावाँ जारी कर और उन्हें नेकोकार उन्हें नेकोकार, परहेज़गार, रौशन दिल, हक़ शिनास और अपना फ़रमाबरदार और अपने दोस्तों का दोस्त व ख़ैरख़्वाह और अपने तमाम दुश्मनों का दुश्मन व बदख़्वाह क़रार दे- आमीन।

ऐ अल्लाह! उनके ज़रिये मेरे बाज़ुओं को क़वी और मेरी परेशांहाली की इस्लाह और उनकी वजह से मेरी जमीअत में इज़ाफ़ा और मेरी मजलिस की रौनक़ दोबाला फ़रमा और उनकी बदौलत मेरा नाम ज़िन्दा रख और मेरी अदम मौजूदगी में उन्हें मेरा क़ायम मुक़ाम क़रार दे और उनके वसीले से मेरी हाजतों में मेरी मदद फ़रमा और उन्हें मेरे लिये दोस्त, मेहरबान, हमहतन, मुतवज्जेह, साबित क़दम और फ़रमाबरदार क़रार दे। वह नाफ़रमान, सरकश, मुख़ालेफ़त व ख़ताकार न हों और उनकी तरबीयत व तादीब और उनसे अच्छे बरताव में मेरी मदद फ़रमा और उनके अलावा भी मुझे अपने ख़ज़ानए रहमत से नरीनए औलाद अता कर और उन्हें मेरे लिये सरापा ख़ैर व बरकत क़रार दे और उन्हें उन चीज़ों में जिनका मैं तलबगार हूँ। मेरा मददगार बना और मुझे और मेरी ज़ुर्रियत को शैतान मरदूद से पनाह दे। इसलिये के तूने हमें पैदा किया और अम्र व नहीं की और जो हुक्म दिया उसके सवाब की तरफ़ राग़िब किया और जिससे मना किया उसके अज़ाब से डराया और हमारा एक दुश्मन बनाया जो हमसे मक्र करता है और जितना हमारी चीज़ों पर उसे तसल्लत देता है उतना हमें उसकी किसी चीज़ पर तसल्लत नहीं दिया। इस तरह के उसे हमारे सीनों में ठहरा दिया और हमारे रग व पै में दौड़ा दिया। हम ग़ाफ़िल हो जाएं मग रवह ग़ाफ़िल नहीं होता, हम भूल जाएं मगर वह नहीं भूलता, वह हमें तेरे अज़ाब से मुतमईन करता और तेरे अलावा दूसरों से डराता है। अगर हम किसी बुराई का इरादा करते हैं तो वह हमारी हिम्मत बन्धाता है और अगर किसी अमले ख़ैर का इरादा करते हैं तो हमें उससे बाज़ रखता है और गुनाहों की दावत देता और हमारे सामने शुबहे खड़े कर देता है अगर वादा करता है तो झूटा और उम्मीद दिलाता है तो खि़लाफ़वर्ज़ी करता है अगर तू उसके मक्र को न हटाए तो वह हमें गुमराह करके छोड़ेगा और उसके फ़ित्नों से न बचाए तो वह हमें डगमगा देगा।

ख़ुदाया! उस लईन के तसल्लुत को अपनी क़ूवत व तवानाई के ज़रिये हमसे दफ़ा कर दे और कसरते दुआ के वसीले से उसे हमारी राह ही से हटा दे ताके हम उसकी मक्कारियों से महफ़ूज़ हो जाएं। 

ऐ अल्लाह! मेरी हर दरख़्वास्त को क़ुबूल फ़रमा और मेरी हाजतें बर ला जबके तूने इस्तेजाबते दुआ का ज़िम्मा लिया है तू मेरी दुआ को रद न कर और जबके तूने मुझे दुआ का हुक्म दिया है तो मेरी दुआ को अपनी बारगाह से रोक न दे। और जिन चीज़ों से मेरा दीनी व दुनियवी मफ़ाद वाबस्ता है उनकी तकमील से मुझ पर एहसान फ़रमा। जो याद हों और जो भूल गया हूँ ज़ाहिर की हों या पोशीदा रहने दी हों, एलानिया तलब की हों या दरपरदा इनत माम सूरतों में इस वजह से के तुझसे सवाल किया है (नीयत व अमल की) इस्लाह करने वालों और इस बिना पर के तुझसे तलब किया है कामयाब होने वालों और इस सबब से के तुझ पर भरोसा किया है ग़ैर मुस्तर्द होने वालों में से क़रार दे और (उन लोगों में शुमार कर) जो तेरे दामन में पनाह लेने के ख़ूगर, तुझसे ब्योपार में फ़ायदा उठाने वाले और तेरे दामने इज़्ज़त में पनाह गुज़ीं हैं। जिन्हें तेरे हमहगीर फ़ज़ल और जूद व करम से रिज़्क़े हलाल में फ़रावानी हासिल हुई है और तेरी वजह से ज़िल्लत से इज़्ज़त तक पहुंचे हैं और तेरे अद्ल व इन्साफ़ के दामन में ज़ुल्म से पनाह ली है और रहमत के ज़रिये बला व मुसीबत से महफ़ूज़ हैं और तेरी बेनियाज़ी की वजह से फ़क़ीर से ग़नी हो चुके हैं और तेरे तक़वा की वजह से गुनाहों, लग़्िज़शों और ख़ताओं से मासूम हैं और तेरी इताअत की वजह से ख़ैर व रश्द व सवाब की तौफ़ीक़ उन्हें हासिल है और तेरी क़ुदरत से उनके और गुनाहों के दरम्यान पर्दा हाएल है और जो तमाम गुनाहों से दस्त बरदार और तेरे जवारे रहमत में मुक़ीम हैं। बारे इलाहा! अपनी तौफ़ीक़ व रहमत से यह तमाम चीज़ें हमें अता फ़रमा और दोज़ख़ के आज़ार से पनाह दे और जिन चीज़ों का मैंने अपने लिये और अपनी औलाद के लिये सवाल किया है ऐसी ही चीज़ें तमाम मुसलेमीन व मुसलेमात और मोमेनीन और मोमेनात को दुनिया व आख़ेरत में मरहमत फ़रमा। इसलिये के तू नज़दीक और दुआ का क़ुबूल करने वाला है, सुनने वाला और जानने वाला है, माफ़ करने वाला और बख़्शने वाला और शफ़ीक़ व मेहरबान है। और हमें दुनिया में नेकी (तौफ़ीक़े इबादत) और आख़ेरत में नेकी (बेहिश्ते जावेद) अता कर, और दोज़ख़ के अज़ाब से बचाए रख।

छब्बीसवीं  दुआ जब हमसायों और दोस्तों को याद करते तो उनके लिये यह दुआ फ़रमाते

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी इस सिलसिले में बेहतर नुसरत फ़रमा के मैं अपने हमसायों और उन दोस्तों के हुक़ूक़ का लेहाज़ रखूं जो हमारे हक़ के पहचानने वाले और हमारे दुष्मनों के मुख़ालिफ़ हैं और उन्हें अपने तरीक़ों के क़ाएम करने और उमदा इख़लाक़ व आदाब से आरास्ता होने की तौफ़ीक़ दे इस तरह के वह कमज़ोरों के साथ नरम रवैया रखें और उनके फ़क्ऱ का मदावा करें, मरीज़ों की बीमार पुर्सी, तालिबाने हिदायत की हिदायत, मषविरा करने वालों की ख़ैर ख़्वाही और ताज़ा वारिद से मुलाक़ात करें। राज़ों को छिपाएं, ऐबों पर पर्दा डालें, मज़लूम की नुसरत और घरेलू ज़रूरियात के ज़रिये हुस्ने मवासात करें और बख़्शिश व इनआम से फ़ायदा पहुंचाएं और सवाल से पहले उनके ज़ुरूरियात मुहैया करें।

ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना के मैं उनमें से बुरे के साथ भलाई से पेष आऊं और ज़ालिम से चष्मपोषी करके दरगुज़र करूं और इन सबके बारे में हुस्ने ज़न से काम लूँ और नेकी व एहसान के साथ सबकी ख़बरगीरी करूं और परहेज़गारी व इफ़्फत की बिना पर उन (के उयूब) से आंखें बन्द रखूं। तवाज़ोह व फ़रवतनी की रू से उनसे नरम रवय्या इख़्तेयार करूं और षफ़क़्क़त की बिना पर मुसीबतज़दा की दिलजोई करूं। उनकी ग़ैबत में भी उनकी मोहब्बत को दिल में लिये रहूं और ख़ुलूस की बिना पर उनके पास सदा नेमतों का रहना पसन्द करूं और जो चीज़ें अपने ख़ास क़रीबियों के लिये ज़रूरी समझूं उनके लिये भी ज़रूरी समझूं, और जो मुराहात अपने मख़सूसीन से करूं वोही मुराहात उनसे भी करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे भी उनसे वैसे ही सुलूक का रवादार क़रार दे और जो चीज़ें उनके पास हैं उनमें मेरा हिस्सा वाफ़िर क़रार दे। और उन्हें मेरे हक़ की बसीरत और मेरे फ़ज़्ल व बरतरी की मारेफ़त में अफ़ज़ाइष व तरक़्क़ी दे ताके वह मेरी वजह से सआदतमन्द और मैं उनकी वजह से मसाब व माजूर क़रार पाऊं। आमीन ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

सत्ताईसवीं दुआ सरहदों की निगेहबानी करने वालों के लिये हज़रत (अ0) की दुआ

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने ग़लबे व इक़तेदार से मुसलमानों की सरहदों को महफ़ूज़ रख, और अपनी क़ूवत व तवानाई से उनकी हिफ़ाज़त करने वालों को तक़वीयत दे और अपने ख़ज़ाने बेपायां से उन्हें मालामाल कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनकी तादाद बढ़ा दे। उनके हथियारों को तेज़ कर दे, उनके हुदूद व इतराफ़ और मरकज़ी मक़ामात की हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त कर। उनकी जमइयत में उन्स व यकजहती पैदा कर, उनके उमूर की दुरूस्ती फ़रमा, रसद रसानी के ज़राए मुसलसल क़ायम रख। उनकी मुश्किलात के हल करने का ख़ुद ज़िम्मा फ़रमा। उनके बाज़ू क़वी कर। सब्र के ज़रिये उनकी एआनत फ़रमा। और दुष्मन से छिपी तदबीरों में उन्हें बारीक निगाही अता कर।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जिस षै को वह नहीं पहचानते वह उन्हें पहचनवा दे और जिस बात का इल्म नीं रखते वह उन्हें बता दे। और जिस चीज़ की बसीरत उन्हें नहीं है वह उन्हें सुझा दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और दुष्मन से मद्दे मुक़ाबिल होते वक़्त ग़द्दार व फ़रेबकार दुनिया की याद उनके ज़ेहनों से मिटा दे। और गुमराह करने वाले माल के अन्देषे उनके दिलों से निकाल दे और जन्नत को उनकी निगाहों के सामने कर दे। और जो दाएमी क़यामगा हमें इज़्ज़त व षरफ़ की मन्ज़िलें और (पानी, दूध) शराब और साफ़ व शफ़्फाफ़ शहद की) बहती हुई नहरें और तरह तरह के फलों (के बार) से झुके हुए अशजार वहां फ़राहेम किये है।ं उन्हें दिखा दे ताके उनमें से कोई पीठ फिराने का इरादा और अपने हरीफ़ के सामने से भागने का ख़याल न करे।

ऐ अल्लाह! इस ज़रिये से उनके दुश्मनों के हरबे कुन्द और उन्हें बे दस्त व पा कर दे और उनमें और उनके हथियारों में तफ़रिक़ा डाल दे, (यानी हथियार छोड़कर भाग जाएं) और उनके रगे दिल की तनाबें तोड़ दे और उनमें और उनके आज़ोक़ा में दूरी पैदा कर दे और उनकी राहों में उन्हें भटकने के लिये छोड़ दे और उनके मक़सद से उन्हें बे राह कर दे। उनकी कमक का सिलसिला मकक का सिलसिला क़ता कर दे उनकी गिनती कम कर दे, उनके दिलों में दहशत भर दे, उनकी दराज़ दस्तियों को कोताह कर दे, उनकी ज़बानों में गिरह लगा दे के बोल न सकें, और उन्हें सज़ा देकर उनके साथ साथ उन लोगों को भी तितर बितर कर दे जो उनके पसे पुश्त, हैं और पसे पुश्त वालों को ऐसी शिकस्त दे के जो उनके पुश्त पर हैं उन्हें इबरत हासिल हो और उनकी हज़ीमत व रूसवाई से उनके पीछे वालों के हौसले तोड़ दे।

ऐ अल्लाह! उनकी औरतों के शिकम बांझ, उनके मर्दों के सल्ब ख़ुश्क और उनके घोड़ों, ऊंटों, गायों, बकरियों की नस्ल क़ता कर दे और उनके आसमान को बरसने की और ज़मीन को रवीदगी की इजाज़त न दे। बारे इलाहा। इस ज़रिये से अहले इस्लाम की तदबीरों को मज़बूत, उनके शहरों को महफ़ूज़ और उनकी दौलत व सरवत को ज़्यादा कर दे और उन्हें इबादत व ख़लवत गज़ीनी के लिये जंग व जेदाल और लड़ाई झगड़े से फ़ारिग़ कर दे ताके रूए ज़मीन पर तेरे अलावा किसी की परस्तिश न हो और तेरे सिवा किसी के आगे ख़ाक पर पेशानी न रखी जाए।

ऐ अल्लाह! तू मुसलमानों को उनके हर हर इलाक़े में बरसरे पैकार होने वाले मशरिकों पर ग़लबा दे और सफ़ दर सफ़ फ़रिश्तों के ज़रिये इनकी इमदाद फ़रमा। ताके इस खि़त्तए ज़मीन में उन्हें क़त्ल व असीर करते हुए उसके आखि़री हुदूद तक पस्पा कर दें या के वह इक़रार करें के तू वह ख़ुदा है जिसके अलावा कोई माबूद नहीं और यकता व लाशरीक है। ख़ुदाया! मुख़्तलिफ़ एतराफ़ व जवानिब के दुश्मनाने दीन को भी इस क़त्ल व ग़ारत की लपेट में ले ले। वह हिन्दी हों या रूमी, तुर्की हों या खि़ज़्री, हबशी हों या नूबी, रंगी हों या सक़लबी व दलीमी, नीज़ उन मुषरिक जमाअतों को जिनके नाम और सिफ़ात हमें मालूम नहीं और तू अपने इल्म से उन पर मोहीत और अपनी क़ुदरत से उन पर मुतलअ है।

ऐ अल्लाह! मुषरिकों को मुषरिकों से उलझा कर मुसलमानों के हुदूदे ममलेकत पर दस्त दराज़ी से बाज़ रख और उनमें कमी वाक़ेअ करके मुसलमानों में कमी करने से रोक दे और उनमें फूट डलवा कर अहले इस्लाम के मुक़ाबले में सफ़आराई से बिठा दे। ऐ अल्लाह! उनके दिलों को तस्कीन व बेख़ौफ़ी से, उनके जिस्मों को क़ूवत व तवानाई से ख़ाली कर दे। उनकी फ़िक्रों को तदबीर व चाराजोई से ग़ाफ़िल और मरदान कारज़ार के मुक़ाबले में उनके दस्त व बाज़ू को कमज़ोर कर दे और दिलेराने इस्लाम से टक्कर लेने में उन्हें बुज़दिल बना दे और अपने अज़ाबों में से एक अज़ाब के साथ उन पर फ़रिष्तों की सिपाह भेज। जैसा के तूने बद्र के दिन किया था। उसी तरह तू उनकी जड़े बुनियादें काट दे, उनकी षान व षौकत मिटा दे और उनकी जमीअत को परागन्दा कर दे। ऐ अल्लाह! उनके पानी में वबा और उनके खानों में इमराज़ (के जरासीम) की आमेज़िष कर दे, उनके षहरों को ज़मीन में धंसा दे, उन्हें हमेषा पत्थरों का निषाना बना और क़हतसाली उन पर मुसल्लत कर दे। उनकी रोज़ी ऐसी सरज़मीन में क़रार दे जो बन्जर और उनसे कोसों दूर हो। ज़मीन के महफ़ूज़ क़िले उनके लिये बन्द कर दे। और उन्हें हमेषा की भूक और तकलीफ़देह बीमारियों में मुब्तिला रख। बारे इलाहा! तेरे दीन व मिल्लत वालों में से जो ग़ाज़ी उनसे आमादाए जंग हो या तेरे तरीक़े की पैरवी करने वालों में से जो मुजाहिद क़स्दे जेहाद करे इस ग़रज़ से के तेरा दीन बलन्द, तेरा गिरोह क़वी और तेरा हिस्सा व नसीब कामिलतर हो तो उसके लिये आसानियां पैदा कर। तकमीलकार के सामान फ़राहेम कर, उसकी कामयाबी का ज़िम्मा ले, उसके लिये बेहतरीन हमराही इन्तेख़ाब फ़रमा। क़वी व मज़बूत सवारी का बन्दोबस्त कर, ज़रूरियात पूरा करने के लिये वुसअत व फ़राख़ी दे। दिलजमई व निषाते ख़ातिर से बहरामन्द फ़रमा। इसके इष्तेयाक़े (वतन) का वलवला ठण्डा कर दे तन्हाई के ग़म का उसे एहसास न होने दे, ज़न व फ़रज़न्द की याद उसे भुला दे। क़स्दे ख़ैर की तरफ़ रहनुमाई फ़रमा उसकी आफ़ियत का ज़िम्मा ले। सलामती को उसका साथी क़रार दे। बुज़दिली को उसके पास न फटकने दे। उसके दिल में जराएत पैदा कर, ज़ोर व क़ूवत उसे अता फ़रमा। अपनी मददगारी से उसे तवानाई बख़्श, राह व रविश (जेहाद) की तालीम दे और हुक्म में सही तरीक़ेकार की हिदायत फ़रमा। रिया व नमूद को उससे दूर रख। हवस, शोहरत का कोई शाएबा उसमें न रहने दे, उसके ज़िक्र व फ़िक्र और सफ़र व क़याम को अपनी राह में और अपने लिये क़रार दे और जब वह तेरे दुष्मनों और अपने दुश्मनों से मद्दे मुक़ाबिल हो तो उसकी नज़रों में उनकी तादाद थोड़ी करके दिखा। उसके दिल में उनके मक़ाम व मन्ज़िलत को पस्त कर दे। ऐ उसे उन पर ग़लबा दे और उनको उस पर ग़ालिब न होने दे। अगर तूने उस मर्दे मुजाहिद के ख़ातमे बिल ख़ैर और शहादत का फ़ैसला कर दिया है तो यह षहादत उस वक़्त वाक़ेअ हो जब वह तेरे दुश्मनों को क़त्ल करके कैफ़र किरदार तक पहुंचा दे। या असीरी उन्हें बे हाल कर दे और मुसलमानों के एतराफ़े ममलेकत में अमन बरक़रार हो जाए और दुश्मन पीठ फिराकर चल दे। बारे इलाहा! वह मुसलमान जो किसी मुजाहिद या निगेहबान सरहद के घर का निगरान हो या उसके अहल व अयाल की ख़बरगीरी करे या थोड़ी बहुत माली एआनत करे या आलाते जंग से मदद दे। या जेहाद पर उभारे या उसके मक़सद के सिलसिले में दुआए ख़ैर करे या उसके पसे पुश्त उसकी इज़्ज़त व नामूस का ख़याल रखे तो उसे भी उसके अज्र के बराबर बे कम व कास्त अज्र और उसके अमल का हाथों हाथ बदला दे जिससे वह अपने पेश किये हुए अमल का नफ़ा और अपने बजा लाए हुए काम की मसर्रत दुनिया में फ़ौरी तौर से हासिल कर ले यहां तक के ज़िन्दगी की साअतें उसे तेरे फ़ज़्ल व एहसान की उस नेमत तक जो तूने उसके लिये जारी की है और इस इज़्ज़त व करामत तक जो तूने उसके लिये मुहय्या की है पहुंचा दें। परवरदिगार! जिस मुसलमान को इस्लाम की फ़िक्रे परेशान और मुसलमानों के खि़लाफ़ मुशरिकों की जत्थाबन्दी ग़मगीन करे इस हद तक के वह जंग की नीयत और जेहाद का इरादा करे मगर कमज़ोरी उसे बिठा दे या बेसरो सामानी उसे क़दम न उठाने दे या कोई हादसा इस मक़सद से या ख़ैर में डाल दे या कोई मानेअ उसके इरादे में हाएल हो जाए तो उसका नाम इबादत गुज़ारों में लिख और उसे मुजाहिदों का सवाब अता कर और उसे शहीदों और नेकोकारों के ज़मरह में शुमार फ़रमा। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) पर जो तेरे अब्दे ख़ास और रसूल हैं और उनकी औलाद (अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जो शरफ़ व रूतबे में तमाम रहमतों से बलन्दतर और तमाम दूरूदों से बालातर हो। ऐसी रहमत जिसकी मुद्दत एख़तेतामपज़ीद न हो, जिसकी गिनती का सिलसिला कहीं क़ता न हो। ऐसी कामिल व अकमल रहमत जो तेरे दोस्तों में से किसी एक पर नाज़िल हुई हो इसलिये के तू अता व बख़्शिश करने वाला, हर हाल में क़ाबिले सताइश पहली दफ़ा पैदा करने वाला, और दोबारा ज़िन्दा करने वाला और जो चाहे वह करने वाला है।