True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

तेरहवीं दुआ  ख़ुदावन्द आलम से तलबे हाजात के सिलसिले में हज़रत की दुआ

ऐ माबूद! ऐ वह जो तलबे हाजात की मन्ज़िले मुन्तहा है ऐ वह जिसके यहां मुरादों तक रसाई होती है। ऐ वह जो अपनी नेमतें क़ीमतों के एवज़ फ़रोख़्त नहीं करता और न अपने अतियें को एहसान जताकर मुकद्दर करता है, ऐ वह जिसके ज़रिये बेनियाज़ी हासिल होती है और जिससे बेनियाज़ नहीं रहा जा सकता। ऐ वह जिसकी ख़्वाहिश व रग़बत की जाती है और जिससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। ऐ वह जिसके ख़ज़ाने तलब व सवाल से ख़त्म नहीं होते और जिसकी हिकमत व मसलेहत को वसाएल व असबाब के ज़रिये तबदील नहीं किया जा सकता। ऐ वह जिससे हाजतमन्दों का रिश्ताए एहतियाज क़ता नहीं होता और जिसे पुकारने वालों की सदा ख़स्ता व मलोल नहीं करती। तूने ख़ल्क़ से बेनियाज़ होने की सिफ़त का मुज़ाहेरा किया है और तू यक़ीनन इनसे बेनियाज़ है और तूने उनकी तरफ़ फ़क्र व एहतियाज की निस्बत दी है और वह बेशक तेरे मोहताज हैं लेहाज़ा जिसने अपने इफ़लास के रफ़ा करने के लिये तेरा इरादा किया और अपनी एहतियाज के दूर करने के लिये तेरा क़स्द किया उसने अपनी हाजत को उसके महल व मुक़ाम से तलब किया और अपने मक़सद तक पहुंचने का सही रास्ता इख़्तेयार किया। और जो अपनी हाजत को लेकर मख़लूक़ात में से किसी एक की तरफ़ मुतवज्जोह हुआ या तेरे अलावा दूसरे को अपनी हाजत बरआरी का ज़रिया क़रार दिया वह हरमाँनसीबी से दो चार और तेरे एहसान से महरूमी का सज़ावार हुआ। बारे इलाहा। मेरी तुझसे एक हाजत है जिसे पूरा करने से मेरी ताक़त जवाब दे चुकी है और मेरी तदबीर व चाराजोई भी नाकाम होकर रह गई है और मेरे नफ़्स ने मुझे यह बात ख़ुशनुमा सूरत में दिखाई के मैं अपनी हाजत को उसके सामने पेश करूँ जो ख़ुद अपनी हाजतें तेरे सामने पेश करता है और अपने मक़ासिद में तुझसे बेनियाज़ नहीं है। यह सरासर ख़ताकारों की ख़ताओं में से एक ख़ता और गुनाहों की लग़्िज़शों में से एक लग़्िज़श थी लेकिन तेरे याद दिलाने से मैं अपनी ग़फ़लत से होशियार हुआ और तेरी तौफ़ीक़ ने सहारा दिया तो ठोकर खाने से संभल गया और तेरी राहनुमाई की बदौलत ग़लत एक़दाम से बाज़ आया और वापस पलट आया और मैंने कहा वाह सुबहान अल्लाह। किस तरह एक मोहताज दूसरे मोहताज से सवाल कर सकता है, और कहां एक रादार दूसरे नादार से रूजू कर सकता है (जब यह हक़ीक़त वाज़ेह हो गई) तो मैंने ऐ मेरे माबूद। पूरी रग़बत के साथ तेरा इरादा किया और तुझ पर भरोसा करते हुए अपनी उम्मीदें तेरे पास लाया हूँ और मैंने इस अम्र को बख़ूबी जान लिया है के मेरी कसीर हाजतें तेरी वुसअते रहमत के सामने हैच हैं, तेरे दामने करम की वुसअत किसी के सवाल करने से तंग नहीं होती और तेरा दस्ते करम अता व बख़्शिश में हर हाथ से बलन्द है। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने करम से मेरे साथ तफ़ज़्ज़ल व एहसान की रविश इख़्तेयार और अपने अद्ल से काम लेते हुए मेरे इस्तेहक़ाक़ की रू से फ़ैसला न कर क्योंके मैं पहला वह हाजतमन्द नहीं हूँ जो तेरी तरफ़ मुतवज्जोह हुआ और तूने उसे अता किया हो हालांके वह दर किये जाने का मुस्तहेक़ हो और पहला वह साएल नहीं हूं जिसने तुझसे मांगा हो और तूने उस पर अपना फ़ज़्ल किया हो हालांके वह महरूम किये जाने के क़ाबिल हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी दुआ का क़ुबूल करने वाला, मेरी पुकार पर इत्तेफ़ात फ़रमाने वाला, मेरी अज्ज़वज़ारी पर रहम करने वाला और मेरी आवाज़ का सुनने वाला साबित हो और मेरी उम्मीद जो तुझसे वाबस्ता है उसे न तोड़ और मेरा वसीला अपने से क़ता न कर। और मुझे इस मक़सद और दूसरे मक़ासिद में अपने सिवा दूसरे की तरफ़ मुतवज्जोह न होने दे। और इस मक़ाम से अलग होने से पहले मेरी मुश्किल कुशाई और मुआमलात में हुस्ने तक़दीर की कारफ़रमाई से मेरे मक़सद के बर लाने, मेरी हाजत के रवा करने और मेरे सवाल के पूरा करने का ख़ुद ज़िम्मा ले। और मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो दाएमी और रोज़ाफ़्ज़ो हो, जिस का ज़माना ग़ैर मोहतमिम और जिसकी मुद्दत बेपायां हो। और उसे मेरे लिये मुअय्यन और मक़सद बरआरी का ज़रिया क़रार दे। बेशक तू वसीअ रहमत और जूद व करम की सिफ़त का मालिक है। ऐ मेरे परवरदिगार! मेरी कुछ हाजतें यह हैं (इस मक़ाम पर अपनी हाजतें बयान करो, फिर सजदा करो और सजदे की हालत में यह कहो) तेरे फ़ज़्ल व करम ने मेरी दिले जमई और तेरे एहसान ने रहनुमाई की, इस वजह से मैं तुझसे तेरे ही वसीले से मोहम्मद (स0) व आले मोहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़रिये सवाल करता हूं के मुझे (अपने दर से) नाकाम व नामुराद न फेर।

चौदहवीं दुआ—जब आप पर कोई ज़्यादती होती या ज़ालिमों से कोई नागवार बात देखते तो यह दुआ पढ़ते थे

ऐ वह जिससे फ़रियाद करने वालों की फ़रयादें पोशीदा नहीं हैं। ऐ वह जो उनकी सरगुज़िश्तों के सिलसिले में गवाहों की गवाही का मोहताज नहीं है, ऐ वह जिसकी नुसरत मज़लूमों के हम रकाब और जिसकी मदद ज़ालिमों से कोसों दूर है। ऐ मेरे माबूद! तेरे इल्म में हैं वह ईज़ाएं जो मुझे फ़लाँ इब्ने फ़लाँ से उसके तेरी नेमतों पर इतराने और तेरी गिरफ़्त से ग़ाफ़िल होने के बाएस पहुँची हैं। जिन्हें तूने उस पर हराम किया था और मेरी हतके इज़्ज़त का मुरतकिब हुआ, जिससे तूने उसे रोका था। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और अपनी क़ूवत व तवानाई से मुझ पर ज़ुल्म करने वाले और मुझसे दुश्मनी करने वाले को ज़ुल्म व सितम से रोक दे और अपने इक़्तेदार के ज़रिये उसके हरबे कुन्द कर दे और उसे अपने ही कामांे में उलझाए रख और जिससे आमादा दुश्मनी है उसके मुक़ाबले में उसे बेदस्त व पा कर दे। ऐ माबूद! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसे मुझ पर ज़ुल्म करने की खुली छूट न दे और उसके मुक़ाबले में अच्छे असलूब से मेरी मदद फ़रमा और उसके बुरे कामों जैसे कामों से मुझे महफ़ूज़ रख और उसकी हालत ऐसी हालत न होने दे। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उसके मुक़ाबले में ऐसी बरवक़्त मदद फ़रमा जो मेरे ग़ुस्से को ठण्डा कर दे और मेरे ग़ैज़ व ग़ज़ब का बदला चुकाए। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसके ज़ुल्म व सितम के एवज़ अपनी मुआफ़ी और उसकी बदसुलूकी के बदले में अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके हर नागवार चीज़ तेरी नाराज़गी के मुक़ाबले में हैच है और तेरी नाराज़गी न हो तो हर (छोटी बड़ी) मुसीबत आसान है। बारे इलाहा! जिस तरह ज़ुल्म सहना तूने मेरी नज़रों में नापसन्द किया है, यूँ ही ज़ुल्म करने से भी मुझे बचाए रख। ऐ अल्लाह! मैं तेरे सिवा किसी से शिकवा नहीं करता और तेरे अलावा किसी हाकिम से मदद नहीं चाहता। हाशा के मैं ऐसा चाहूँ तो रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी दुआ को क़ुबूलियत से और मेरे शिकवे को सूरते हाल की तबदीली से जल्दी हमकिनार कर और मेरा इस तरह इम्तेहान न करना के तेरे अद्ल व इन्साफ़ से मायूस हो जाऊँ और मेरे दुश्मन को इस तरह न आज़माना के वह तेरी सज़ा से बेख़ौफ़ होकर मुझ पर बराबर ज़ुल्म करता रहे और मेरे हक़ पर छाया रहे और उसे जल्द अज़ जल्द उस अज़ाब से रू शिनास कर जिससे तूने सितमगारों को डराया धमकाया है और मुझे क़ुबूलियते दुआ का वह असर दिखा जिसका तूने बेबसों से वादा किया है। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे तौफ़ीक़ दे के जो सूद-ओ-ज़ियां तूने मेरे लिये मुक़द्दर कर दिया है उसे (बतय्यब ख़ातिर) क़ुबूल करूं और जो कुछ तूने दिया है और जो कुछ लिया है उस पर मुझे राज़ी व ख़ुशनूद रख और मुझे सीधे रास्ते पर लगा और ऐसे काम में मसरूफ़ रख जो आफ़त व ज़ियाँ से बरी हों। ऐ अल्लाह! अगर तेरे नज़दीक मेरे लिये यही बेहतर हो के मेरी दादरसी को ताख़ीर में डाल दे और मुझ पर ज़ुल्म ढाने वाले से इन्तेक़ाम लेने को फ़ैसले के दिन और दावेदारों के महले इजतेमाअ के लिये उठा रखे तो फिर मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर और अपनी जानिब से नीयत की सच्चाई और सब्र की पाएदारी से मेरी मदद फ़रमा और बुरी ख़्वाहिश और हरीसों की बेसब्री से बचाए रख और जो सवाब तूने मेरे लिये ज़ख़ीरा किया है और जो सज़ा व उक़ूबत मेरे दुश्मन के लिये मुहय्या की है उसका नक़्शा मेरे दिल में जमा दे और उसे अपने फ़ैसले क़ज़ा व क़द्र पर राज़ी रहने का ज़रिया और अपनी पसन्दीदा चीज़ों पर इत्मीनान व वसूक़ का सबब क़रार दे। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहान के पालने वाले। बेशक तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है और तेरी क़ुदरत से कोई चीज़ बाहर नहीं है।

पन्द्रहवीं दुआ —जब किसी बीमारी या कर्ब व अज़ीयत में मुब्तिला होते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सपास है इस सेहत व सलामतीए बदन पर जिसमें हमेषा ज़िन्दगी बसर करता रहा और तेरे ही लिये हम्द व सपास है उस मर्ज़ पर जो अब मेरे जिस्म में तेरे हुक्म से रूनुमा हुआ है। ऐ माबूद! मुझे नही मालूम के इन दोनों हालतों में से कौन सी हालत पर तू षुक्रिया का ज़्यादा मुस्तहेक़ है और इन दोनों वक़्तों में से कौन सा वक़्त तेरी हम्द व सताइश के ज़्यादा लाएक़ है। आया सेहत के लम्हे जिनमें तूने अपनी पाकीज़ा रोज़ी को मेरे लिये ख़ुषगवार बनाया और अपनी रज़ा व ख़ुषनूदी और फ़ज़्ल व एहसान के तलब की उमंग मेरे दिल में पैदा की और उसके साथ अपनी इताअत की तौफ़ीक़ देकर उससे ओहदाबरा होने की क़ूवत बख़्षी या यह बीमारी का ज़माना जिसके ज़रिये मेरे गुनाहों को दूर किया और नेमतों के तोहफ़े अता फ़रमाए ताके उन गुनाहों का बोझ हल्का कर दे जो मेरी पीठ को गराँबार बनाए हुए हैं और उन बुराइयों से पाक कर दे जिनमें डूबा हुआ हूँ और तौबा करने पर मुतनब्बे कर दे और गुज़िष्ता नेमत (तन्दरूस्ती) की याददेहानी से (कुफ्राने नेमत के) गुनाह को महो कर दे और इस बीमारी के असना में कातिबाने आमाल मेरे लिये वह पाकीज़ा आमाल भी लिखते रहे जिनका न दिल में तसव्वुर हुआ था न ज़बान पर आए थे और न किसी अज़ो ने उसकी तकलीफ़ गवारा की थी। यह सिर्फ़ तेरा तफ़ज़्ज़ुल व एहसान था जो मुझ पर हुअ। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और जो कुछ तूने मेरे लिये पसन्द किया है वही मेरी नज़रों में पसन्दीदा क़रार दे और जो मुसीबत मुझ पर डाल दी है उसे सहल व आसान कर दे और मुझे गुज़िष्ता गुनाहों की आलाइष से पाक और साबेक़ा बुराइयों को नीस्त व नाबूद कर दे और तन्दरूस्ती की लज़्ज़त से कामरान अैर सेहत की ख़ुषगवारी से बहराअन्दोज़ कर और मुझे इस बीमारी से छुड़ाकर अपने अफ़ो की जानिब ले और इस हालते उफ़तादगी से बख़्षिष व दरगुज़र की तरफ़ फेर दे और इस बेचैनी से निजात देकर अपनी राहत तक और इस षिद्दत व सख़्ती को दूर करके कषाइष व वुसअत की मन्ज़िल तक पहुंचा दे इसलिये के तू बे इस्तेहक़ाक़ एहसान करने वाला और गरांबहा नेमतें बख़्षने वला है और तू ही बख़्षिष व करम का मालिक और अज़मत व बुज़ुर्गी का सरमायादार है।

सोलहवीं दुआ — जब गुनाहों से मुआफ़ी चाहते या अपने ऐबों से दरगुज़र की इल्तेजा करते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ ख़ुदा! ऐ वह जिसे गुनहगार उसकी रहमत के वसीले से फ़रयादरसी के लिये पुकारते हैं। ऐ वह जिसके तफ़ज़्ज़ुल व एहसान की याद का सहारा बेकस व लाचार ढूंढते हैं। ऐ वह जिसके ख़ौफ़ से आसी व ख़ताकार नाला व फ़रयाद करते हैं। ऐ हर वतन आवारा व दिल गिरफ्ता के सरमाया ‘अनस’ हर ग़मज़दा दिल षिकस्ता के ग़मगुसार, हर बेकस व तन्हा के फ़रयदरस और हर रान्दा व मोहताज के दस्तगीर, तू वह है जो अपने इल्म व रहमत से हर चीज़ पर छाया हुआ है और तू वह है जिसने अपनी नेमतों में हर मख़लूक़ का हिस्सा रखा है। तू वह है जिसका अफ़ो व दरगुज़र उसके इन्तेक़ाम पर ग़ालिब है, तू वह है जिसकी रहमत उसके ग़ज़ब से आगे चलती है, तू वह है जिसकी अताएं फ़ैज़ व अता के रोक लेने से ज़्यादा हैं। तू वह है जिसके दामने वुसअत में तमाम कायनाते हस्ती की समाई है, तू वह है के जिस किसी को अता करता है उससे एवज़ की तवक़्क़ो नहीं रखता और तू वह है के जो तेरी नाफ़रमानी करता है उसे हद से बढ़ कर सज़ा नहीं देता। ख़ुदाया! मैं तेरा वह बन्दा हूँ जिसे तूने दुआ का हुक्म दिया तो वह लब्बैक लब्बैक पुकर उठा। हाँ तो वह मैं हूं ऐ मेरे माबूद! जाो तेरे आगे ख़ाके मज़ल्लत पर पड़ा है, मैं वह हूँ जिसकी पुष्त गुनाहों से बोझिल हो गई है, मैं वह हूँ जिसकी उम्र गुनाहों में बीत चुकी है, मैं वह हूँ जिसने अपनी नादानी व जेहालत से तेरी नाफ़रमानी की, हालांके तू मेरी जानिब से नाफ़रमानी का सज़ावार न था। ऐ मेरे माबूद! जो तुझसे दुआ मांगे आया तू उस पर रहम फ़रमाएगा ताके मैं लगातार दुआ मांगूं या जो तेरे आगे रोए उसे बख़्ष देगा ताके मैं रोने पर जल्द आमादा हो जाऊँ। या जो तेरे सामने अज्ज़ व नियाज़ से अपना चेहर ख़ाक पर मले उससे दरगुज़र करेगा, या जो तुझ पर भरोसा करते हुए अपनी तही दस्ती का षिकवा करे उसे बेनियज़ करेगा। बारेइलाहा! जिसका देने वाला तेरे सिवा कोई नहीं है उसे नाउम्मीद न कर और जिसका तेरे अलावा और कोई ज़रियाए बेनियाज़ी नहीं है उसे महरूम न कर। ख़ुदावन्दा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझसे रूगरदानी इख़्तेयार न कर जबके मैं तेरी तरफ़ ख़्वाहिष लेकर आया हूं और मुझे सख़्ती से धुतकार न दे जबके मैं तेरे सामने खड़ा हूं। तू वह है जिसने अपनी तौसीफ़ रहम व करम से की है लेहाज़ा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझ पर रहम फ़रमा और तूने अपन नाम दरगुज़र करने वाला रखा है लेहाज़ा मुझसे दरगुज़र फ़रमा। बारे इलाहा! तू मेरे अष्कों की रवाने को जो तेरे ख़ौफ़ के बाएस है, मेरे दिल की धड़कन को जो तेरे डर की वजह से है और मेरे आज़ा की थरथरी को जो तेरी हैबत के सबब से है देख रहा है। यह सब अपनी बदआमालियों को देखते हुए तुझसे षर्म व हया महसूस करने का नतीजा है यही वजह है के तज़रूअ व ज़ारी के वक़्त मेरी आवाज़ रूक जाती है और मुनाजात के मौक़े पर ज़बान काम नहीं देती। ऐ ख़ुदा तेरे ही लिये हम्द व सपास है के तूने मेरे कितने ही ऐबों पर पर्दा डाला और मुझे रूसवा नहीं होने दिया और कितने ही मेरे गुनाहों को छुपाया और मुझे बदनाम नहीं किया और कितनी ही बुराइयों का मैं मुरतकिब हुआ मगर तूने परदा फ़ाष न किया और न मेरे गले में तंग व आर की ज़िल्लत का तौक़ डाला और न मेरे ऐबों की जुस्तजू में रहने वाले हमसायों और उन नेमतों पर जो मुझे अता की हैं हसद करने वालों पर उन बुराइयों को ज़ाहिर किया। फिर भी तेरी मेहरबानियां मुझे उन बुराइयों के इरतेकाब से जिनका तू मेरे बारे में इल्म रखता है रोक न सकीं। तो ऐ मेरे माबूद! मुझसे बढ़कर कौन अपनी सलाह व बहबूद से बेख़बर अपने हिज़्ज़ व नसीब से ग़ाफ़िल और इस्लाहे नफ़्स से दूर होगा जबके मैं उस रोज़ी को जिसे तूने मेरे लिये क़रार दिया है उन गुनाहों में सर्फ़ करता हूं जिनसे तूने मना किया है और मुझसे ज़्यादा कौन बातिल की गहराई तक उतरने वाला और बुराइयों पर एक़दाम की जराअत करने वाला होगा जबके मैं ऐसे दोराहे पर खड़ा हूं के जहां एक तरफ़ तू दावत दे अैर दूसरी तरफ़ षैतान आवाज़ दे, तो मै। उसकी कारस्तानियों से वाक़िफ़ होते हुए और उसकी षरअंगेज़ियों को ज़ेहन में महफ़ूज़ रखते हुए उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहता हूँ। हालांके मुझे उस वक़्त भी यक़ीन होता है के तेरी दावत का मआल जन्नत और उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहने का अन्जाम दोज़ख़ है। अल्लाहो अकबर! कितनी यह अजीब बात है जिसकी गवाही मैं ख़ुद अपने खि़लाफ़ दे रहा हूँ और अपने छुपे हुए कामों को एक-एक करके गिन रहा हूं और इससे ज़्यादा अजीब तेरा मुझे मोहलत देना और अज़ाब में ताख़ीर करना है। यह इसलिये नही ंके मैं तेरी नज़रों में बावेक़ार हूँ, बल्कि यह मेरे मामले में तेरी बुर्दबारी और मुझ पर लुत्फ़ो एहसान है ताके मैं ततुझे नाराज़ करने वाली नाफ़रमानियों से बाज़ आ जाऊँ और ज़लील व रूसवा करने वाले गुनाहों से दस्तकष हो जाऊं और इसलिये है के मुझसे दरगुज़र करना सज़ा देने से तुझे ज़्यादा पसन्द है, बल्कि मैं तो ऐ मेरे माबूद! बहुत गुनहगार बहुत बदसिफ़ात व बदआमाल और ग़लतकारियों में बेबाक और तेरी इताअत के वक़्त सुस्तगाम और तेरी तहदीद व सरज़न्ष से ग़ाफ़िल और उसकी तरफ़ बहुत कम निगरान हूँ तो किस तरह मैं अपने उयूब तेरे सामने षुमार कर सकता हूं या अपने गुनाहों का ज़िक्र व बयान से एहाता कर सकता हूं और जो इस तरह मैं अपने नफ़्स को मलामत व सरज़न्ष कर रहा हूँ तो तेरी इस षफ़क़्क़त व मरहमत के लालच में जिससे गुनहगारों के हालात इस्लाह पज़ीद होते हैं और तेरी उस रहमत की तवक़्क़ोमें जिसके ज़रिये ख़ताकारों की गरदनें (अज़ाब से) रिहा होती हैं। बारे इलाहा! यह मेरी गरदन है जिसे गुनाहों ने जकड़ रखा है, तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और अपने अफ़ो व दरगुज़र से इसे आज़ाद कर दे। और यह मेरी पुष्त है जिसे गुनाहों ने बोझिल कर दिया है तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और अपने लुत्फ़ो इनआम के ज़रिये इसे हलका कर दे। बारे इलाहा! अगर मैं तेरे सामने इतना रोऊं के मेरी आंखों की पलकें झड़ जाएं और इतना चीख़ चीख़ कर गिरया करूं के आवाज़ बन्द हो जाए और तेरे सामने इतनी देर खड़ा रहूं के दोनों पैरों पर वरम आ जाए और इतने रूकू करूं के रीढ़ की हड्डियां अपनी जगह से उखड़ जाएं और इस क़द्र सजदे करूं के आंखें अन्दर को धंस जाएं और उम्र भर ख़ाक फांकता रहूं और ज़िन्दगी भर गन्दला पानी पीता रहूँ और इस आसना में तेरा ज़िक्र इतना करूं के ज़बान थक कर जवाब दे जाए फिर षर्म व हया की वजह से आसमान की तरफ़ निगाह न उठाऊं तो इसके बावजूद मैं अपने गुनाहों में से एक गुनाह के बख़्षे जाने का भी सज़ावार न होंगा और अगर तू मुझे बख़्ष दे जबके मैं तेरी मग़फ़ेरत के लाएक़ क़रार पाऊं और मुझे माफ़ कर दे जबके मैं तेरी माफ़ी के क़ाबिल समझा जाऊं तो यह मेरा इसतेहक़ाक़ की बिना पर लाज़िम नहीं होगा और न मैं इस्तेहक़ाक़ की बिना पर इसका अहल हूँ क्योंके जब मैंने पहले पहल तेरी मासियत की तो मेरी सज़ा जहन्नम तय थी, लेहाज़ तू मुझ पर अज़ाब करे तो मेरे हक़ में ज़ालिम नहीं होगा। ऐ मेरे माबूद! जबके तूने मेरी पर्दापोषी की और मुझे रूसवा नहीं किया और अपने लुत्फ़ व करम से नर्मी बरती और अज़ाब में जल्दी नहीं की और अपने फ़ज़्ल से मेरे बारे में हिल्म से काम लिया और अपनी नेमतों में तबदीली नहीं की और न अपने एहसान को मुकद्दर किया है तू मेरी इस तवील तज़रूअ व ज़ारी और सख़्त एहतियाज और मौक़ूफ़ की बदहाली पर रहम फ़रमा। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे गुनाहों से महफ़ूज़ और इताअत में सरगर्मे अमल रख और मुझे हुस्ने रूजू की तौफ़ीक़ दे और तौबा के ज़रिये पाक कर दे और अपनी हुस्ने निगहदास्त से नुसरत फ़रमा और तन्दरूस्ती से मेरी हालत साज़गार कर और मग़फ़ेरत की षीरीनी से काम व दहन को लज़्ज़त बख़्ष और मुझे अपने अफ़ोका रेहाषदा और अपनी रहमत का आज़ादकर्दा क़रार दे और अपने अज़ाब से रेहाई का परवाना लिख दे और आख़ेरत से पहले दुनिया ही में निजात की ऐसी ख़ुषख़बरी सुना दे जिसे वाज़ेह तौर से समझ लूँ और उसकी ऐसी अलामत दिखा दे जिसे किसी षाहेबा इबहाम के बग़ैर पहचान लूँ और यह चीज़ तेरे हमहगीर इक़तेदार के सामने मुष्किल और तेरी क़ुदरत के मुक़ाबले में दुष्वार नहीं है, बेषक तेरी क़ुदरत हर चीज़ पर महीत है।

सत्रहवीं दुआ— जब षैतान का ज़िक्र आता तो उससे और उसके मक्रो अदावत से बचने के लिये यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! हम षैतान मरदूद के वसवसों, मक्रों और हीलों से और उसकी झूटी तिफ़्ल तसल्लियों पर एतमाद करने और उसके हथकण्डों से तेरे ज़रिये पनाह मांगते हैं और इस बात से के उसके दिल में यह तमअ व ख़्वाहिष पैदा हो के वह हमें तेरी इताअत से बहकाए और तेरी मासियत के ज़रिये हमारी रूसवाई का सामान करे या यह के जिस चीज़ को वह रंग व रौग़न से आरास्ता करे वह हमारी नज़रों में खुब जाए या जिस चीज़ को वह बदनुमा ज़ाहिर करे वह हमें षाक़ गुज़रे। ऐ अल्लाह! तू अपनी इबादत के ज़रिये उसे हमसे दूर कर दे और तेरी मोहब्बत में मेहनत व जाँफ़िषानी करने के बाएस उसे ठुकरा दे और हमारे और उसके दरमियान एक ऐसा परदा जिसे वह चाक न कर सके, और एक ऐसी ठोस दीवार जिसे वह तोड़ न सके हाएल कर दे। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसे हमारे बजाए अपने किसी दुष्मन के बहकाने में मसरूफ़ रख और हमें अपने हुस्ने निगेहदाष्त के ज़रिये उससे महफ़ूज़ कर दे। उसके मक्रो फ़रेब से बचा ले और हमसे रूगर्दां कर दे और हमारे रास्ते से उसके नक़्षे क़दम मिटा दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें वैसी ही (महफ़ूज़) हिदायत से बहरामन्द फ़रमा जैसी उसकी गुमराही (मुस्तहकम) है और हमें उसकी गुमराही के मुक़ाबले में तक़वा व परहेज़गारी का ज़ादे राह दे और उसकी हलाकत आफ़रीन राह के खि़लाफ़ रष्द और तक़वा के रास्ते पर ले चल। ऐ अल्लाह! हमारे दिलों में उसे अमल व दख़ल का मौक़ा न दे और हमारे पास की चीज़ों में उसके लिये मन्ज़िल मुहय्या न कर। ऐ अल्लाह वह जिस बेहूदा बात को ख़ुषनुमा बनाके हमें दिखाए वह हमें पहचनवा दे और जब पहचनवा दे तो उससे हमारी हिफ़ाज़त भी फ़रमा। और हमें उसको फ़रेब देने के तौर तरीक़ों में बसीरत और उसके मुक़ाबले में सरो सामान की तैयारी की तालीम दे और इस ख़्वाबे ग़फ़लत से जो उसकी तरफ़ झुकाव का बाएस हो, होषियार कर दे और अपनी तौफ़ीक़ से उसके मुक़ाबले में कामिले नुसरत अता फ़रमा। बारे इलाहा! उसके आमाल से नापसन्दीदगी का जज़्बा हमारे दिलों में भर दे और उसके हीलों को तोड़ने की तौफ़ीक़ करामत फ़रमा। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और षैतान (लानतुल्लाह) के तसर्रूत को हमसे हटा दे और इसकी उम्मीदें हमसे क़ता कर दे और हमें गुमराह करने की हिरस व आज़ से उसे दूर कर दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे बाप दादाओं, हमारी माओं, हमारी औलादों, हमारे क़बीले वालों, अज़ीज़ों, रिष्तेदारों और हमसाये में रहने वाले मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उसके षर से एक मोहकम जगह हिफ़ाज़त करने वाले क़िला और रोक थाम करने वाली पनाह में रख और उससे बचा ले जाने वाली ज़र हैं उन्हें पहना और उसके मुक़ाबले में तेज़ धार वाले हथियार उन्हें अता कर, बारे इलाहा! इस दुआ में उन लोगों को भी षामिल कर जो तेरी रूबूबियत की गवाही दें और दुई के तसव्वुर के बग़ैर तुझे यकता समझें और हक़ीक़ते उबूदियत की रोषनी में तेरी ख़ातिर उसे दुष्मन रखें और इलाही उलूम के सीखने में उसके बरखि़लाफ़ तुझसे मदद चाहें। ऐ अल्लाह! जो गिरह वह लगाए उसे खोल दे, जो जोड़े उसे तोड़ दे। और जो तदबीर करे उसे नाकाम बना दे, और जब कोई इरादा करे उसे रोक दे और जिसे फ़राहम करे उसे दरहम बरहम कर दे। ख़ुदाया! उसके लष्कर को षिकस्त दे, उसके मक्रो फ़रेब को मलियामेट कर दे, उसकी पनाहगाह को ढा दे और उसकी नाक रगड़ दे।

ऐ अल्लाह। हमें उसके दुष्मनों में षामिल कर और उसके दोस्तों में षुमार होने से अलैहदा कर दे ताके वह हमें बहकाए तो उसकी इताअत न करें और जब हमें पुकारे तो उसकी आवाज़ पर लब्बैक न कहें और जो हमारा हुक्म माने हम उसे इससे दुष्मनी रखने का हुक्म दें और जो हमारे रोकने से बाज़ आए उसे इसकी पैरवी से मना करें। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) पर जो तमाम नबियों के ख़ातम और सब रसूलों के सरताज हैं और उनके अहलेबैत पर जो तय्यब व ताहिर हैं और हमारे अज़ीज़ों, भाइयों और तमाम मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उस चीज़ से पनाह में रख जिससे हमने पनाह मांगी है और जिस चीज़ से ख़ौफ़ खाते हुए हमने तुझसे अमान चाही है उससे अमान दे और जो दरख़्वास्त की है उसे मन्ज़ूर फ़रमा और जिसके तलब करने में ग़फ़लत हो गई है उसे मरहमत फ़रमा और जिसे भूल गए हैं उसे हमारे लिये महफ़ूज़ रख और इस वसीले से हमें नेकोकारों के दरजों और अहले ईमान के मरतबों तक पहुंचा दे। हमारी दुआ क़ुबूल फ़रमा, ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

अठारहवीं दुआ—जब कोई मुसीबत बरतरफ़ होती या कोई हाजत पूरी होती तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! तेरे ही लिये हम्दो सताइश है तेरे बेहतरीन फै़सले पर और इस बात पर के तूने बलाओं का रूख़ मुझसे मोड़ दिया। तू मेरा हिस्सा अपनी रहमत में से सिर्फ़ उस दुनियवी तन्दरूस्ती में मुनहसिर न कर दे के मैं अपनी इस पसन्दीदा चीज़ की वजह से (आख़ेरत की) सआदतों से महरूम रहूँ और दूसरा मेरी नापसन्दीदा चीज़ की वजह से ख़ूशबख़्ती व सआदत हासिल कर ले जाए और अगर यह तन्दरूस्ती के जिसमें दिन गुज़ारा है या रात बसर की है किसी लाज़वाल मुसीबत का पेशख़ेमा और किसी दाएमी वबाल की तम्हीद बन जाए तो जिस (रहमत व अन्दोह) को तूने मोअख़्ख़र किया है उसे मुक़द्दम कर दे और जिस (सेहत व आफ़ियत को मुक़द्दम किया उसे मोअख़्ख़र कर दे क्योंके जिस चीज़ का नतीजा फ़ना हो वह ज़्यादा नहीं और जिसका अन्जाम बक़ा हो वह कम नहीं। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा।

उन्नीसवीं दुआ—क़हतसाली के मौक़े पर तलबे बाराँ की दुआ

बारे इलाहा! अब्रे बारां से हमें सेराब फ़रमा और इन अब्रों के ज़रिये हम पर दामने रहमत फैला जो मूसलाधारा बारिषों के साथ ज़मीन के सब्ज़ाए ख़ुषरंग की रूदीदगी का सरो सामान लिये हुए एतराफ़े आलम में रवाना किये जाते हैं और फलों के पुख़्ता होने से अपने बन्दों पर एहसान फ़रमा और षगूफ़ों के खिलने से अपने षहरों को ज़िन्दगी बख़्ष और अपन मोअजि़्ज़ज़ व बावेक़ार फ़रिष्तों और सफ़ीरों को ऐसी नफ़ा रसां बारिष पर आमादा कर जिसकी फ़रावान दाएम और रवानी हमहगीर हो। और बड़ी बून्दों वाली तेज़ी से आने वाली और जल्द बरसने वाली हो जिससे तू मुर्दा चीज़ों में ज़िन्दगी दौड़ा दे गुज़री हुई बहारें पलटा दे और जो चीज़ें आने वाली हैं उन्हें नमूदार कर दे और सामाने माषियत में वुसअत पैदा कर दे ऐसा अब्र छाए जो तह ब तह ख़ुषआईन्द ख़ुषगवार ज़मीन पर मोहीत और घन गर्ज वाला हो और उसकी बारिष लगातार न बरसे (के खेतों और मकानों को नुक़सान पहुंचे) और न उसकी बिजली धोका देने वाली हो (के चमके, गरजे और बरसे नहीं)। बारे इलाहा! हमें उस बारिष से सेराब कर जो ख़ुष्कसाली को दूर करने वाली (ज़मीन से) सब्ज़ा उगाने वाली (दष्त व सहरा को) सरसब्ज़ करने वाली बड़े फैलाव और बढ़ाव और अनथाह गहराव वाली हो जिससे तू मुरझाई हुई घास की रौनक़ पलटा दे और सूखे पड़े सब्ज़े में जान पैदा कर दे। ख़ुदाया! हमें ऐसी बारिष से सेराब कर जिससे तू टीलों पर से पानी के धारे बहा दे, कुंए छलका दे, नहरें जारी कर दे, दरख़्तों को तरो ताज़ा व षादाब कर दे, षहरों में नरख़ों की अरज़ानी कर दे, चौपायों और इन्सानों में नई रूह फूंक दे, पाकीज़ा रोज़ी का सरो सामान हमारे लिये मुकम्मल कर दे। खेतों को सरसब्ज़ व षादाब कर दे और चौपायों के थनों को दूध से भर दे और उसके ज़रिये हमारी क़ूवत व ताक़त में मज़ीद क़ूवत का इज़ाफ़ा कर दे। बारे इलाहा! इस अब्र की साया अफ़गनी को हमारे लिये झुलसा देने वाला लू का झोंका उसकी ख़नकी को नहूसत का सरचष्मा और उसके बरसने को अज़ाब का पेषख़ेमा और उसके पानी को (हमारे काम व दहन के लिये) षूर न क़रार देना। बारे इलाहा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और हमें आसमान व ज़मीन की बरकतों से बहरामन्द कर इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।