True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

222- आपका इरशादे गिरामी

(जिसे आयते करीम ‘‘योसब्बेह लहू फीहा ..................तेजारता वला यबआ अन ज़िकरिल्लाह’’ (उन घरों में सुबहो शाम तस्बीहे परवरदिगार करने वाले वह अफ़राद हैं जिन्हें तिजारत और कारोबार यादे ख़ुदा से ग़ाफ़िल नहीं बना सकते हैं) की तिलावत के बाद फ़रमाया)

बेशक परवरदिगार (अल्लाह सुबहानहू) ने अपने ज़िक्र को दिलों के लिये सैक़ल क़रार दिया है जिसकी बिना पर वह बहरेपन के बाद सुनने लगते हैं और अन्धेपन के बाद देखने लगते हैं और अनाद और ज़िद (दुश्मनी) के बाद फ़रमाबरदार हो जाते हैं और ख़ुदाए अज़्ज़ व जल (जिसकी नेमतें अज़ीम व जलील हैं) के लिये हर दौर में और हर अहदे फ़ितरत में ऐसे बन्दे रहे हैं जिनसे उसने उनके उफ़कार के ज़रिये राज़दाराना गुफ़्तगू की है और उनकी अक़्लों के वसीले से उनसे कलाम किया है और उन्होंने अपनी बसारत, समाअत और फ़िक्र की बेदारी के नूर की रौशनी हासिल की है। उन्हें अल्लाह के मख़सूस दिनों की याद अता की गई है और वह उसकी अज़मत से ख़ौफ़ज़दा रहते हैं। इनकी मिसाल बियाबानों के राहनुमाओं जैसी है के जो सही रास्ते पर चलता है उसकी रूश की तारीफ़ करते हैं और उसे निजात की बशारत देते हैं और जो दाहिने बाएं चला जाता है उसके रास्ते की मज़म्मत करते हैं और उसे हलाकत से डराते हैं और इसी अन्दाज़ से यह ज़ुल्मतों के चिराग़ और शबाहत के रहनुमा हैं।

बेशक ज़िक्रे ख़ुदा के भी कुछ अहल हैं जिन्होंने इसे सारी दुनिया का बदल क़रार दिया है और अब उन्हें तिजारत या ख़रीद फ़रोख़्त उस ज़िक्र से ग़ाफ़िल नहीं कर सकती है। यह उसके सहारे ज़िन्दगी के दिन काटते हैं और ग़ाफ़िलों के कानों में मोहर्रमात के रोकने वाली आवाज़ें दाखि़ल कर देते हैं। लोगों को नेकियों का हुक्म देते हैं और ख़ुद भी इसी पर अमल करते है। बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद भी बाजज़ रहते हैं गोया उन्होंने दुनिया मेंरहकर आखि़रत तक का फ़ासला तय कर लिया है और पस पर्दाए दुनिया जो कुछ है सब देख लिया है और गोया के उन्होंने बरज़ख़ के तवील व अरीज़ ज़माने के मख़फ़ी हालात पर इत्तेला हासिल कर ली है और गोया के क़यामत ने उनके लिये अपने वादों को पूरा कर दिया है और उन्होंने अहले दुनिया के लिये इस पर्दे को उठा दिया है। के अब वह उन चीज़ों को देख रहे हैं जिन्हें आम लोग नहीं देख सकते हैं और उन आवाज़ों को सुन रहे हैं जिन्हें दूसरे लोग नहीं सुन सकते हैं। अगर तुम अपनी अक़्ल से उनकी इस तसवीर को तैयार करो जो उनके क़ाबिले तारीफ़ मक़ामात और क़ाबिले हुज़ूर मजालिस की है। जहां उन्होंने अपने आमाल के दफ़्तर फैलाए हुए हैं और अपने हर छोटे बड़े अमल का हिसाब देने के लिये तैयार हैं जिनका हुक्म दिया गया था और उनमें कोताही हो गई है या जिनसे रोका गया था और तक़सीर हो गई है और अपनी पुश्त पर तमाम आमाल का बोझ उठाए हुए हैं लेकिन उठाने के क़ाबिल नहीं हैं और अब रोते रोते हिचकियाँ बन्ध गई हैं और एक दूसरे को रो-रो कर उसके सवाल का जवाब दे रहे हैं और निदामत और एतराफ़े गुनाह के साथ परवरदिगार की बारगाह में फ़रयाद कर रहे हैं। तो वह तुम्हें हिदायत के निशान और तारीकी के चिराग़ नज़र आएंगे जिनके गिर्द मलाएका का घेरा होगा और उन पर परवरदिगार की तरफ़ से सुकून व इतमीनान का मुसलसल नुज़ूल होगा और उनके लिये आसमान के दरवाज़े खोल दिये गए होंगे और करामतों की मन्ज़िलें मुहैया कर दी गई होंगी।

(((-इन हक़ाएक़ का सही इज़हार वही कर सकता है जो यक़ीन की इस आखि़री मंज़िल पर फ़ाएज़ हो जिसके बाद खुद यह एलान करता हो के अब अगर पर्दे हटा भी दिये जाएं तो यक़ीन में किसी तरह का इज़ाफ़ा नहीं हो सकता और हक़ीक़ते अम्र यह है के इस्लाम में अहले ज़िक्र सिर्फ़ साहेबाने इल्म व फ़ज़ल का नाम नहीं है बल्कि ज़िक्रे इलाही का अहल बनाकर उन अफ़राद को क़रार दिया गया है जो तक़वा और परहेज़गारी की आखि़री मन्ज़िल पर हों और आखि़रत को अपनी निगाहों से देखकर सारी दुनिया को राह व चाह से आगाह कर रहे हों। मलाएका मुक़र्रबीन में उनके गिर्द घेरे डाले हों लेकिन इसके बाद भी अज़मत व जलाले इलाही के तसव्वुर अपने आमाल को बेक़ीमत समझ कर लरज़ रहे हों और मुसलसल अपनी कोताहियों का इक़रार कर रहे हों। -)))

ऐसे मक़ाम पर जहां मालिक की निगाह उनकी तरफ़ हो और वह उनकी सई से राज़ी हो और उनकी मन्ज़िल की तारीफ़ कर रहा हो। वह मालिक को पुकारने की फ़रहत से बख़्िशश की हवाओं में सांस लेते हों। उसके फ़ज़्ल व करम की एहतियाज के हाथों रेहन (गिरवीं) हों और उसकी अज़मत के सामने ज़िल्लत के असीर हों। ग़म व अन्दोह के तूले ज़मान ने उनके दिलों को मजरूह कर दिया हो और मुसलसल गिरया ने उनकी आंखों को ज़ख़्मी कर दिया हो। मालिक की तरफ़ रग़बत के हर दरवाज़े को खटखटा रहे हों और उससे सवाल कर रहे हों जिसके जूदो करम की वुसअतों में तंगी नहीं आती है और जिसकी तरफ़ रग़बत करने वाले कभी मायूस नहीं होते हैं। देखो अपनी भलाई के लिये ख़ुद अपने नफ़्स का हिसाब करो के दूसरों के नफ़्स का हिसाब करने वाला कोई और है।  

223-आपका इरशादे गिरामी (जिसे आयत शरीफ़ ‘‘ या अय्योहल इन्सान मा ग़ौका बे रब्बेकल करीम...’’ (ऐ इन्सान तुझे ख़ुदाए करीम के बारे में किस शै ने धोके में डाल दिया है?)  के ज़ैल में इरशाद फ़रमाया है) 

देखो यह इन्सान जिससे यह सवाल किया गया है वह अपनी दलील के एतबार से किस क़द्र कमज़ोर है और अपने फ़रेबखोरदा होने के एतबार से किस क़द्र नाक़िस माज़ेरत का हामिल है। यक़ीनन उसने अपने नफ़्स को जेहालत की सख़्ितयों में मुब्तिला कर दिया है। 

ऐ इन्सान! सच बता, तुझे किस शै ने गुनाहों की जराअत दिलाई है और किस चीज़ ने परवरदिगार के बारे में धोके में रखा है और किस अम्र ने नफ़्स की हलाकत पर भी मुतमईन बना दिया है, क्या तेरे इस मर्ज़ का कोई इलाज और तेरे इस ख़्वाब की कोई बेदारी नहीं है और क्या अपने नफ़्सपर इतना भी रहम नहीं करता है जितना दूसरों पर करता है के जब कभी आफ़ताब की हरारत में किसी को तपता देखता है तो साया कर देता है या किसी को दर्द व रन्ज में मुब्तिला देखता है तो उसके हाल पर रोने लगता है तो आखि़र किस शै ने तुझे ख़ुद अपने मर्ज़ पर सब्र दिला दिया है। और अपनी मुसीबत पर सामाने सुकून फ़राहम कर दिया है और अपने नफ़्स पर रोने से रोक दिया है जबके वह तुझे सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है, और क्यों रातों रात अज़ाबे इलाही के नाज़िल हो जाने का तसव्वुर तुझे बेदार नहीं रखता है जबके तू उसकी नाफ़रमानियों की बिना पर उसके क़हर व ग़लबे की राह में पड़ा हुआ है।

अभी ग़नीमत है के अपने दिल की सुस्ती का अज़्म रासिख़ से इलाज कर ले और अपनी आंखों में ग़फ़लत की नीन्द का बेदर्दी से मदावा कर ले अल्लाह का इताअत गुज़ार बन जा। उसकी याद से उन्स हासिल कर और उस अम्र का तसव्वुर कर के किस तरह वह तेरे दूसरों की तरफ़ मुंह मोड़ लेने के बावजूद वह तेरी तरफ़ मुतवज्जेह रहता है। तुझे माफ़ी की दावत देता है। अपने फ़ज़्ल व करम में ढांप लेता है हालांके तू दूसरों की तरफ़ रूख़ किये  हुए है। बलन्द व बाला है वह साहेबे क़ूवत जो इस क़द्र करम करता है और ज़ईफ़ व नातवां है तू इन्सान जो उसकी मासीयत की इस क़द्र जराअत रखता है जबके उसी के ऐबपोशी के हमसाये में मुक़ीम है और उसी के फ़ज़्ल व करम की वुसअतों में करवटें बदल रहा है। वह न अपने फ़ज़्ल व करम को तुझसंे रोकता है और न तेरे परदाएराज़ को फ़ाश करता है।

(((-हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान आखि़रत की तरफ़ से बिलकुल ग़फ़लत का मुजस्समा बन गया है के दुनिया में किसी को तकलीफ़ में नहीं देख पाता है और उसकी दादरसी के लिये तैयार हो जाता है और आखि़रत में पेश आने वाले ख़ुद अपने मसाएब की तरफ़ से भी यकसर ग़ाफ़िल है और एक लम्हे के लिये भी आफ़ताबे महशर के साये और गर्मी क़यामत की तश्नगी का इन्तेज़ाम नहीं करता है। बल्कि बाज़ औक़ात इसका मज़ाक़ भी उड़ाता है ‘‘इन्ना लिल्लाहे .....’’-)))

यह तो पलक झपकने के बराबर भी इसकी मेहरबानियों से ख़ाली नहीं है, कभी नई नई नेमतें अता करता है, कभी बुराइयों की परदापोशी करता है और कभी बलाओं को रद कर देता है जबके तू इसकी मासियत कर रहा है तो सोच अगर तू इताअत करता तो क्या होता?

ख़ुदा गवाह है के अगर यह बरताव दो बराबर की क़ूवत व क़ुदरत वालों के दरम्यान होता और तू दूसरे के साथ ऐसा ही बरताव करता तो ख़ुद ही सबसे पहले अपने नफ़्स  के बदएख़लाक़ और बदअमल होने का फ़ैसला कर देता लेकिन अफ़सोस? 

मैं सच कहता हूं के दुनिया ने तुझे धोका नहीं दिया है तूने दुनिया से धोका खाया है, उसने तो नसीहतों को खोल कर सामने रख दिया है और तुझे हर चीज़ से बराबर आगाह किया है। उसने जिस्म पर जिन नाज़िल होने वाली बलाओं का वादा किया है और क़ूवत में जिस कमज़ोरी की ख़बर दी है उसमें वह बिलकुल सही और वफ़ाए अहद करने वाली है। न झूठ बोलने वाली है और न धोका देने वाली। बल्कि बहुत से उसके बारे में नसीहत करने वाले हैं जो  तेरे नज़दीक नाक़ाबिले एतबार हैं और सच-सच बाोलने वाले हैं जो तेरी निगाह में झूठे हैं।

अगर तूने उसे गिर पड़े मकानात और ग़ैर आबाद मन्ज़िलों में पहचान लिया होता तो देखता के वह अपनी याद देहानी और बलीग़तरीन नसीहत में तुझपर किस  क़द्र मेहरबान है और तेरी तबाही के बारे  में किसी क़द्र बुख़ल से काम लेती है।  यह दुनिया उसके लिये बेहतरीन घर है जो इसको घर बनाने से राज़ी न हो और उसके लिये बेहतरीन वतन है जो इसे वतन बनाने पर आमादा न हो, इस दुनिया के रहने वालों में कल के दिन नेक बख़्त वही होंगे जो आज इससे गुरेज़ करने पर आमादा हों। देखो जब ज़मीन को ज़लज़ला आ जाएगा और क़यामत अपनी अज़ीम मुसीबतों के साथ खड़ी हो जाएगी और हर इबादतगाह के साथ उसके इबादत गुज़ार, हर माबूद के साथ उसके बन्दे और हर क़ाबिले इताअत के साथ उसके मुतीअ व फ़रमाबरदार मुलहक़ कर दिये जाएंगे तो कोई हवा में शिगाफ़ करने वाली निगाह और ज़मीन पर पड़ने वाले क़दम की आहट ऐसी न होगी जिसका अद्ल व इन्साफ़ के साथ पूरा बदला न दे दिया जाए। उस दिन कितनी ही दलीलें होंगी जो बेकार हो जाएंगी और कितने ही माज़ेरत के रिश्ते होंगे जो कट के रह जाएंगे। लेहाज़ा मुनासिब है के अभी से इन चीज़ों को तलाश कर लो जिनसे उज़्र क़ायम हो सके और तुम्हारी हुज्जतें साबित हो सकें। जिस दुनिया में तुमको नहीं रहना है उसमें से वह ले लो जो तुम्हारे लिये हमेशा बाक़ी रहने वाली हैं निजात की रोशनी की चमक देख लो और आमादगी की सवारियों पर सामान बार कर लो।

224- आपका इरशादे गिरामी (जिसमें ज़ुल्म से बराअत व बेज़ारी का इज़हार फ़रमाया गया है।)

ख़ुदा गवाह है के मेरे लिये सादान की ख़ारदार झाड़ी पर जाग कर रात गुज़ार लेना या ज़न्जीरों में क़ैद होकरर खींचा जाना इस अम्र से ज़्यादा अज़ीज़ है के रोज़े क़यामत परवरदिगार से इस आलम में मुलाक़ात करूं के किसी बन्दे पर ज़ुल्म कर चुका हूँ या दुनिया के किसी मामूली माल को ग़स्ब किया हो, भला किसी शख़्स पर भी उस नफ़्स के लिये किस तरह ज़ुल्म करूंगा जो फ़ना की तरफ़ बहुत जल्द पलटने वाला है और ज़मीन के अन्दर बहुत दिनों तक रहने वाला है।

ख़ुदा की क़सम मैंने अक़ील को ख़ुद देखा है के उन्होंने फ़क्ऱ व फ़ाक़े की बिना पर तुम्हाारे  हिस्से गन्दुम में से तीन किलो का मुतालेबा किया था जबके उनके बच्चों के बाल ग़ुरबत की बिना पर परागन्दा हो चुके थे और उनके चेहररों के रंग यूँ बदल चुके थे जैसे उन्हें तेल छिड़क कर सियाह बनाया गया हो और उन्होंने मुझसे बार-बार तक़ाज़ा किया और मगर अपने मुतालबे को दोहराया तो मैंने उनकी तरफ़ कान धर दिये और वह यह समझे के शायद मैं दीन बेचने और अपने रास्ते काो छोड़कर उनके मुतालबे पर चलने के लिये तैयार हो गयाा हूँ। लेकिन मैंने उनके लिये लोहा गरम किया और फिर उनके जिस्म के क़रीब ले गया ताके इससे इबरत हासिल करें। उन्होंने लोहा देखकर यूँ फ़रयाद शुरू कर दी जैसे कोई बीमार अपने दर्द व अलम से फ़रयाद करता हो और क़रीब था के उनका जिस्म इसके दाग़ देने से जल जाए। तो मैंने कहा रोने वालियां आपके ग़म में रोएं ऐ अक़ील! आप इस लोहे से फ़रयाद कर रहे हैं जिसे एक इन्सान ने फ़क़त हंसी मज़ाक़ में तपाया है और मुझे उस आग की तरफ़ खींच रहे हैं जिसे ख़ुदाए जब्बार ने अपने ग़ज़ब की बुनियाद पर भड़काया है। आप अज़ीयत से फ़रयाद करें और मैं जहन्नुम से फ़रयाद न करूं।

इससे ज़्यादा ताज्जुब ख़ेज़ बात यह है के एक रात एक शख़्स (अशअस बिन क़ैस) मेरे पास शहद में गुन्धा हुआ हलवा बर्तन में रखकर लाया जो मुझे इस क़द्र नागवार था जैसे सांप के थूक या क़ै से गून्धा गया हो। मैंने पूछा के यह कोई इनआम है या ज़कात या सदक़ा जो हम अहलेबैत पर हराम है? उसने कहा के यह कुछ नहीं है, यह फ़क़त एक हदिया है! मैंने कहा के पिसरे मुर्दा औरतें तुझको रोएं तू दीने ख़ुदा के रास्ते से आकर मुझे धोका देना चाहता है, तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है या तू पागल हो गया है या हिज़यान का शिकार रहा है, आखि़र है क्या? ख़ुदा गवाह है के अगर मुझे हफ़्ताक़लीम की हुकूमत तमाम ज़ेरे आसमान दौलतों के साथ दे दी जाए और मुझसे यह मुतालबा किया जाए के मैं किसी च्यूंटी पर सिर्फ़ इस क़द्र ज़ुल्म करूँ के उसके मुंह से उस छिलके को छीन लूँ जो वह चबा रही है तो हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकता हूँ। यह तुम्हारी दुनिया मेरी नज़र में उस पत्ती से ज़्यादा बेक़ीमत है जो किसी टिड्डी के मुंह में हो और वह उसे चबा रही हो। भला अली (अ0) को इन नेमतों से क्या वास्ता जो फ़ना हो जाने वाली हैं और उस लज़्ज़त से क्या ताल्लुक़ जो बाक़ी रहने वाली नहीं है। मैं ख़ुदा की पनाह चाहता हूँ, अक़्ल के ख़्वाबे ग़फ़लत मे पड़ जाने और लग़्िज़शों की बुराइयों से और मैं उसी से मदद का तलबगार हूँ।

(((-जनाबे अक़ील आपके बड़े भाई और हक़ीक़ी (सगे) भाई थे लेकिन इसके बावजूद आपने यह आदिलाना बरताव करके वाज़ेह कर दिया के दीने इलाही में रिश्ता व क़राबत का गुज़र नहीं है। दीन का ज़िम्मेदार वही शख़्स हो सकता है जो माले ख़ुदा को माले ख़ुदा तसव्वुर करे और इस मसले में किसी तरह की रिश्तेदारी और ताल्लुक़ को शामिल न करे। अमीरूल मोमेनीन (अ0) के किरदार का वह नुमायां इम्तियाज़ है जिसका अन्दाज़ा दोस्त और दुश्मन दोनों को था और कोई भी इस मारेफ़त से बेगाना न था।-)))

225-आपकी दुआ का एक हिस्सा (जिसमें परवरदिगार से बेनियाज़ी का मुतालबा किया गया है)

ख़ुदाया मेरी आबरू को मालदारी के ज़रिये महफ़ूज़ फ़रमा और मेरी मन्ज़िलत को ग़ुरबत की बिना पर निगाहों से न गिरने देना के मुझे तुझसे रिज़्क़ (रोज़ी) मांगने वालों से से मांगना पड़े या तेरी बदतरीन मख़लूक़ात से रहम की दरख़्वास्त करना पड़े और इसके बाद मैं हर अता करने वाले की तारीफ़ करूं और हर इन्कार करने वाले की मज़म्मत में मुब्तिला हो जाऊ जबके इन सब के पसे पर्दा अता व इनकार दोनों का इख़्तेयार तेरे ही हाथ में है और तू ही हर शै पर क़ुदरत रखने वाला है।

226-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें दुनिया से नफ़रत दिलाई गई है)

यह एक ऐसा घर है जो बलाओं में घिरा हुआ है और अपनी ग़द्दारी में मशहूर है न इसके हालात को दवाम है और न इसमें नाज़िल होने वालों के लिये सलामती है।  इसके हालात मुख़्तलिफ़ और इसके अतवार बदलने वाले हैं। इसमें पुरकैफ़ ज़िन्दगी क़ाबिले मज़म्मत है और इसमें अम्न व अमान का दूर दूर पता नहीं है। इसके बाशिन्दे वह निशाने हैं जिन पर दुनिया अपने तीर चलाती रहती है और अपनी मुद्दत के सहारे उन्हें फ़ना के घाट उतारती रहती है।

बन्दगाने ख़ुदा! याद रखो इस दुनिया में तुम और जो कुछ तुम्हारे पास है सबका वही रास्ता है जिस पर पहले वाले चल चुके हैं जिनकी उम्रें तुमसे ज़्यादा तवील और जिनके इलाक़े तुमसे ज़्यादा आबाद थे। उनके आसार (पाएदार निशानियां) भी दूर दूर तक फैले हुए थे। लेकिन अब उनकी आवाज़ें दब गई हैं उनकी हवाएं उखड़ गई हैं। इनके जिस्म बोसीदा हो गए हैं। इनके मकानात ख़ाली हो गए हैं और इनके आसार मिट गए हैं। वह मुस्तहकम क़िलों और बिछी हुई मसनदों को पत्थरों और चुनी हुई सिलों और ज़मीन के अन्दर लहद वाली क़ब्रों में तबदील कर चुके हैं। उनके सहनों की बुनियाद तबाही पर क़ायम है और जिनकी इमारत मिट्टी से मज़बूत की गई है। इन क़ब्रों की जगहें तो क़रीब-क़रीब हैं लेकिन इनके रहने वाले सब एक-दूसरे से ग़रीब और अजनबी हैं। ऐसे लोगों के दरम्यान हैं जो बौखलाए हुए हैं और यहों के कामों से फ़ारिग़ होकर वहाँ की फ़िक्र में मशग़ूल हो गए हैं। न अपने वतन से कोई उन्स रखते हैं और न अपने हमसायों से कोई राबेता रखते हैं।

(((-यह फ़िक़रात बेऐनेही इसी तरह इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0) की मकारमे इख़लाक़ में भी पाए जाते हैं जो इस बात की अलामत है के अहलेबैत (अ0) का किरदार और उनका पैग़ाम हमेशा एक अन्दाज़ का होता है और इसमें किसी तरह का इख़्तेलाफ़ व इन्तेशार नहीं होता है।
इस ख़ुत्बे में दुनिया के हस्बे ज़ैल ख़ुसूसियात का तज़किरा किया गया हैः 1- यह मकान बलाओं में घिरा हुआ है। 2- इसकी ग़द्दारी मारूफ़ है। 3- इसके हालात हमेशा बदलते रहते हैं। 4- इसकी ज़िन्दगी का अन्जाम मौत है। 5- इसकी ज़िन्दगी क़ाबिले मज़म्मत है। 6- इसमें अम्न व अमान नहीं है। 7- इसके बाशिन्दे बलाओं और मुसीबतों का हदफ़ हैं।-)))

बल्कि बिल्कुल क़रीब व जवार और नज़दीकतरीन दयार में हैं और ज़ाहिर है के अब मुलाक़ात का क्या इमकान है जबके बोसीदगी ने उन्हें अपने सीने से दबाकर पीस डाला है और पत्थरों और मिट्टी ने उन्हें खाकर बराबर कर दिया है और गोया के अब तुम भी वहीं पहुंच गए हो जहां वह पहुंच चुके हैं और तुम्हें भी इसी क़ब्र ने गिर्द रख लिया है और इसी अमानतगाह ने जकड़ लिया है।  सोचो! उस वक़्त क्या होगा जब तुम्हारे तमाम मुआमलात आखि़री हद को पहुंच जाएंगे और दोबारा क़ब्रों से निकाल लिया जाएगा, उस वक़्त हर नफ़्स अपने आमाल का ख़ुद मुहासेबा करेगा और सबको मालिके बरहक़ की तरफ़ पलटा दिया जाएगा और किसी की कोई इफ़तर परवाज़ी काम आने वाली नहीं होगी।

227-आपकी दुआ का एक हिस्सा (जिसमें नेक रास्ते की हिदायत का मुतालेबा किया गया है)

परवरदिगार तू अपने दोस्तों के लिये तमाम उन्स फ़राहम करने वालों से ज़्यादा सबबे उन्स और तमाम अपने ऊपर (तुझ पर) भरोसा करने वालों के लिये सबसे ज़्यादा हाजतरवाई के लिये हाज़िर है। तू उनकी बातिनी कैफ़ियतों को देखता और उनके छिपे हुए भेदों पर निगाह रखता है और उनकी बसीरतों की आखि़री हदों को भी जानता है। उनके इसरार तेरे लिये रौशन और उनके क़ुलूब तेरी बारगाह में फ़रियादी हैं। जब ग़ुरबत उन्हें मुतवहश (घबराहट) करती है तो तेरी याद उन्स का सामान फ़राहम कर देती है और जब मसाएब उन पर उन्डेल दिये जाते हैं तो वह तेरी पनाह तलाश कर लेते हैं इसलिये के उन्हें इस बात का इल्म है के तमाम मामलात की ज़माम  तेरे हाथ में है और तमाम उमूर का फ़ैसला तेरी ही ज़ात से सादर (वाबस्ता) होता है।

ख़ुदाया! अगर मैं अपने सवालात को पेश करने से आजिज़ हूँ और मुझे अपने मुतालेबात की राह नज़र नहीं आती है तो तू मेरे मसालेह की रहनुमाई फ़रमा और मेरे दिल को हिदायत की मन्ज़िलों तक पहुंचा दे के यह बात तेरी हिदायतों के लिये कोई अनोखी नहीं है और तेरी हाजत रवाइयों के सिलसिले में कोई निराली नहीं है। ख़ुदाया मेरे मामलात को अपने अफ़्व व करम पर महमूल (तय) करना और अद्ल व इन्साफ़ पर महमूल (तय) न करना।

228-आपका इरशादे गिरामी (जिसमें अपने बाज़ असहाब का तज़किरा फ़रमाया है)

अल्लाह फ़ुलां शख़्स (1) का भला करे के उसने कजी को सीधा किया और मर्ज़ का इलाज किया, सुन्नत को क़ायम किया और फ़ितनों को छोड़ कर चला गया। दुनिया से इस आलम में गया के उसका लिबास हयाते पाकीज़ा था और उसके ऐब बहुत कम थे।

(((- इब्ने अबिल हदीद ने सातवीं सदी हिजरी में यह इनकेशाफ़ किया के इन फ़िक़रात में फ़लां से मुराद हज़रत उमर हैं और फिर उसकी वज़ाहत में 87 सफ़हे स्याह कर डाले हालांके इसका कोई सबूत नहीं है और न सय्यद रज़ी के दौर के नुस्ख़ों में इसका कोई तज़किरा है और फिर इस्लामी दुनिया के सरबराह की तारीफ़ के लिये लफ़्ज़े फ़ुलां के कोई मानी नहीं हैं। ख़ुतबए शक़शक़िया में लफ़्ज़े फ़ुलां का इमकान है लेकिन मदह में लफ़्ज़े फ़ुलां में अजीब व ग़रीब मालूम होता है। इस लफ़्ज़ से यह अन्दाज़ा होता है के किसी ऐसे सहाबी का तज़किरा है जिसे आम लोग बरदाश्त नहीं कर सकते हैं और अमीरूल मोमेनीन (अ0) उसकी तारीफ़ ज़रूरी तसव्वुर फ़़रमाते हैं)))

उसने दुनिया के ख़ैर को हासिल कर लिया और उसके शर से आगे बढ़ गया। अल्लाह की इताअत का हक़ अदा कर दिया और इससे मुकम्मल तौर पर ख़ौफ़ज़दा होकर वह दुनिया से इस आलम में रूख़सत हुआ के (ख़ुद चला गया और) लोग मुतफ़र्रिक़ (गुमकर्दा) रास्तों पर थे जहां न गुमराह हिदायत पा सकता था और न हिदायत याफ़्ता यक़ीन तक जा सकता था।

229-आपका इरशादे गिरामी (अपनी बैयते खि़लाफ़त के बारे में)

तुमने बैअत के लिये मेरी तरफ़ हाथ फैलाना चाहा तो मैंने रोक लिया और उसे खींचना चाहा तो मैंने समेट लिया, लेकिन इसके बाद तुम इस तरह मुझ पर टूट पड़े जिस तरह पानी पीने के दिन प्यासे ऊंट तालाब पर गिर पड़ते हैं। यहाँ तक के मेरी जूती का तस्मा टूट गया और अबा कान्धे से गिर गई और कमज़ोर अफ़राद कुचल गए। तुम्हारी ख़ुशी का यह आलम था के बच्चों ने ख़ुशियां मनाईं, बूढ़े लड़खड़ाते हुए क़दमों से आगे बढ़े, बीमार उठते-बैठते पहुंच गए और मेरी बैअत के लिये नौजवान लड़कियाँ भी पर्दे से बाहर निकल आईं (दौड़ पड़ीं)।

(((-किस क़द्र फ़र्क़ है इस बैअत में जिसके लिये बूढ़े, बच्चे, औरतें सब घर से निकल आए और कमाले इश्तियाक़ में साहबे मन्सब की बारगाह की तरफ़ दौड़ पड़े और इस बैअत में जिसके लिये बिन्ते रसूल (स0) के दरवाज़े में आग लगाई गई, नफ़्से रसूल (स0) को गले में रस्सी का फनदा डालकर घर से निकाला गया और सहाबाए कराम को ज़दो कोब किया गया। क्या ऐसी बैअत को भी इस्लामी बैअत कहा जा सकता है और ऐसे अन्दाज़ को भी जवाज़े खि़लाफ़त की दलील बनाया जा सकता है? अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने अपनी बैअत का तज़किरा इसीलिये फ़रमाया है के साहेबाने अक़्ल व शऊर और अरबाबे अद्ल व इन्साफ़ बैअत के मानी का इदराक कर सकें और ज़ुल्म व जौर जब्र व इसतबदाद को बैअत का नाम न दे सकें और न उसे जवाज़े हुकूमत की दलील बना सकें-)))

230-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

यक़ीनन तक़वा इलाही हिदायत की कलीद और आखि़रत का ज़ख़ीरा है, हर गिरफ़्तारी से आज़ादी और हर तबाही से निजात का ज़रिया है। उसके वसीले से तलबगार कामयाब होते हैं, अज़ाब से फ़रार करने वाले निजात पाते हैं और बेहतरीन मतालिब हासिल होते हैं।

लेहाज़ा अमल करो के अभी आमाल बलन्द हो रहे हैं और तौबा फ़ायदामन्द है और दुआ सुनी जा रही है, हालात पुरसुकून हैं, क़लमे आमाल चल रहा है। अपने आमाल के ज़रिये आगे बढ़ जाओ जो उलटे पाँव चल रही है और इस मर्ज़ से जो आमाल से रोक देता है और इस मौत से जो अचानक झपट लेती है, इसलिये के मौत तुम्हारी लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली, तुम्हारी ख़्वाहिशात को बदमज़ा कर देने वाली और तुम्हारी मन्ज़िलों को दूर कर देने वाली है। वह ऐसी ज़ाएर है जिसे कोई पसन्द नहीं करता है और ऐसी मुक़ाबिल है जो मग़लूब नहीं होती है और ऐसी क़ातिल है जिससे खँ़ूबहा का मुतालबा नहीं होता है। उसने अपने फन्दे तुम्हारे गलों में डाल रखे हैं और उसकी हलाकतों ने तुम्हें घेरे में ले लिया है और इसके तीरों ने तुम्हें निशाना बना लिया है। इसकी सतवत (ग़लबा व तसलत) तुम्हारे बारे में अज़ीम है और इसकी तादियां मुसलसल हैं और इसका वार उचटता (वार ख़ाली जाने का इमकान) भी नहीं है। क़रीब है के इसके सहाबे मर्ग की तीरगियां, इसके मर्ज़ की सख़्ितयां, इसकी जाँकनी की अज़ीयतें, इसकी दम उखड़ने की बेहोशियाँ, इसके हर तरफ़ छा जाने की तारीकियां और बदमज़गियां, इसकी सख़्ितयों के अन्धेरे तुम्हें अपने घेरे में ले लें। गोया वह अचानक उस वारिद हो गई के तुम्हारे राज़दारों को ख़ामोश कर दिया, साथियों को मुन्तशिर कर दिया, आसार को महो कर दिया, दयार को मोअत्तल कर दिया और वारिसों को आमादा कर दिया, अब वह तुम्हारी मीरास को तक़सीम कर रहे हैं उन ख़ास अज़ीज़ों के दरम्यान जो काम नहीं आए और सन्जीदा रिश्तेदारों के दरम्यान जिन्होंने मौत को रोका नहीं (रोक न सके) और उन ख़ुश होने वालों के दरम्यान जो हरगिज़ बेचैन नहीं हैं। अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के सई करो, कोशिश करो, तैयारी करो, आमादा हो जाओ, उस ज़ादे राह की जगह से ज़ादे सफ़र ले लो और ख़बरदार दुनिया मुम्हें उस तरह धोका न दे सके जैसे पहले वालों को दिया है जो उम्मतें गुज़र गईं और जो नस्लें तबाह हो गईं, जिन्होंने इसका दूध दोहा था, उसकी ग़फ़लत से फ़ायदा उठाया था, उसके बाक़ीमान्दा दिनों को गुज़ारा था और इसकी ताज़गियों को मुर्दा बना दिया था अब उनके मकानात क़ब्र बन गए हैं और उनके अमवाल मीरास क़रार पा गए हैं। न उन्हें अपने पास आने वालों की फ़िक्र है और न रोने वालों की परवाह है और न पुकारने वालों की आवाज़ पर लब्बैक कहते हैं। इस दुनिया से बचो के यह बड़ी धोकेबाज़, फ़रेबकार, ग़द्दार, देने वाली और छीनने वाली और लिबास पिन्हाकर उतार लेने वाली है। न इसकी आसाइशें रहने वाली हैं और न इसकी तकलीफ़ें ख़त्म होने वाली हैं और न इसकी बलाएं थमने वाली हैं।

कुछ ज़ाहिदों के बारे में

यह उन्हीं दुनियावालों में मकीन अहले दुनिया नहीं थे, ऐसे थे जैसे इस दुनिया के न हों। देख भाल कर अमल किया और ख़तरात से आगे निकल गए। गोया इनके बदन अहले आखि़रत के दरम्यान करवटें बदल रहे हैं और वह यह देख रहे हैं के अहले दुनिया इनकी मौत को बड़ी अहमियत दे रहे हैं हालांके वह ख़ुद इन ज़िन्दों के दिलों की मौत को ज़्यादा बड़ा हादसा क़रार दे रहे हैं (जो ज़िन्दा हैं मगर उनके दिल मुर्दा हैं)।

(((-मौत का अजीबो ग़रीब कारोबार है के मालिक को दुनिया से उठा ले जाती है और उसका माल ऐसे अफ़राद के हवाले कर देती है जो ज़िन्दगी में काम आए और न मरहले ही में साथ दे सके। क्या इससे ज़्यादा इबरत का कोई मक़ाम हो सकता है के इन्सान ऐसी मौत से ग़ाफ़िल रहे और चन्द रोज़ा ज़िन्दगी की लज़्ज़तों में मुब्तिला होकर मौत के जुमला ख़तरात से बेख़बर हो जाए। दुनिया की इससे बेहतर कोई तारीफ़ नहीं हो सकती है के यह एक दिन बेहतरीन लिबास से इन्सान को आरास्ता करती है और दूसरे दिन उसे उतार कर सरे राह बरहना कर देती है। यही हाल ज़ाहिरी लिबास का भी होता है और यही हाल मानवी लिबास का भी होता है। हुस्न देकर बदशक्ल बना देती है। जवानी देकर बूढ़ा कर देती है, ज़िन्दगी देकर मुर्दा बना देती है तख़्त व ताज देकर कुन्ज व क़ब्र के हवाले कर देती है और साहेबे दरबार व बारगाह बनाकर क़ब्रिस्तान के वहशतकदे में छोड़ आती है।-)))

231-आपका इरशादे गिरामी

(अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने बसरा की तरफ़ जाते हुए मक़ामे ज़ीक़ार में यह ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया, इसका वाक़दी ने किताबुल जमल में ज़िक्र किया है)

रसूले अकरम (स0) को जो हुक्म था उसे आप (स0) ने खोल कर बयान कर दिया और अल्लाह के पैग़ामात पहुंचा दिये, अल्लाह ने आप (अ0) के ज़रिये बिखरे हुए अफ़राद की शीराज़ाबन्दी की, सीनों में भरी हुई सख़्त अदावतों और दिलों में भड़क उठने वाले कीनों के बाद ख़विश व अक़ारब को आपस में शीरो शकर कर दिया।

232-आपका इरशादे गिरामी
(अब्दुल्लाह इब्ने ज़मा जो आपकी जमाअत में महसूब होता था आप (अ0) के ज़मानए खि़लाफ़त में
कुछ माल तलब करने के लिये हज़रत (अ0) के पास आया तो आप (अ0) ने इरशाद फ़रमाया)

यह माल न मेरा है न तुम्हारा बल्कि मुसलमानों का हक़्क़े मुश्तरका और उनकी तलवारों का जमा किया हुआ सरमाया है। अगर तुम उनके साथ जंग में शरीक हुए होते तो तुम्हारा हिस्सा भी उनके बराबर होता, वरना उनके हाथों की कमाई दूसरों के मुंह का निवाला बनने के लिये नहीं है।

233-आपका इरशादे गिरामी

मालूम होना चाहिये के ज़बान इन्सान (के बदन का) एक टुकड़ा है जब इन्सान (का ज़ेहन) रूक जाए तो फिर कलाम उनका साथ नहीं दिया करता और जब उसके (मालूमात में) वुसअत हो तो फ़िर कलाम ज़बान को रूकने की मोहलत नहीं दिया करता और हम (अहलेबैत) अक़लीम सुख़न के फ़रमान रवा हैं। वह हमारे रगो पै में समाया हुआ है और उसकी शाख़ें हम पर झुकी हुई हैं। ख़ुदा तुम पर रहम करे इस बात को जान लो के तुम ऐसे दौर में हो जिसमें हक़ गो (हक़ बोलने वाले) कम, ज़बानें सिद्क़ बयानी से कुन्द और हक़ वाले ज़लील व ख़्वार हैं। यह लोग गुनाह व नाफ़रमानी पर जमे हुए हैं और ज़ाहिरदारी व निफ़ाक़ की बिना पर एक-दूसरे से सुलह व सफ़ाई रखते हैं। इनके जवान बदख़ू, इनके बूढ़े गुनहगार, इनके आलिम मुनाफ़िक़ और उनके वाएज़ चापलूस हैं, न छोटे बड़ों की ताज़ीम करते हैं और न मालदार फ़क़ीर व बेनवा की दस्तगीरी करते हैं।

234- आपका इरशादे गिरामी

ज़ालब यमानी ने इब्ने क़तीबा से और उसने अब्दुल्लाह इब्ने यज़ीद से उन्होंने मालिक इब्ने वहीह से रिवायत की है के उन्होंने कहा के हम अमीरूल मोमेनीन (अ0) की खि़दमत में हाज़िर थे के लोगों के इख़्तेलाफ़ (सूरत व सीरत) का ज़िक्र छिड़ा तो आप (अ0) ने फ़रमाया- इनके मबदातीनत ने इनमें तफ़रीक़ पैदा कर दी है और यह इस तरह के वह शूरा ज़ार व शीरीं ज़मीन और सख़्त व नर्म मिट्टी से पैदा हुए हैं लेहाज़ा वह ज़मीन के कुर्ब के एतबार से मुत्तफ़िक़ होते और इख़्तेलाफ़ के तनासुब से मुख़्तलिफ़ होते हैं (इस पर कभी ऐसा होता है के) पूरा ख़ुश शक्ल इन्सान अक़्ल में नाक़िस और बलन्द क़ामत आदमी पस्त हिम्मत हो जाता है और नेकोकार, बदसूरत और कोताह क़ामत दूरअन्देश होता है और तबअन नेक सरष्त कसी बुरी आदत को पीछे लगा लेता है, और परेशान दिन वाला परागान्दा अक़्ल और चलती हुई ज़बान वाला होशमन्द दिल रखता है।

235-आपका इरशादे गिरामी (रसूलल्लाह (स0) को ग़ुस्ल कफ़न देते वक़्त फ़रमाया )

या रसूलल्लाह (स0)! मेरे माँ बाप आप (स0) पर क़ुरबान हों। आप (स0) के रेहलत फ़रमा जाने से नबूवत, ख़ुदाई एहकाम और आसमानी ख़बरों का सिलसिला क़ता हो गया जो किसी और (नबी) के इन्तेक़ाल से क़ता नहीं हुआ था (आप (स0) ने) इस मुसीबत में अपने अहलेबैत (अ0) को मख़सूस किया यहाँ तक के आप (अ0) ने दूसरों के ग़मों से तसल्ली दे दी और (इस ग़म को) आम भी कर दिया के सब लोग आप (अ0) के (सोग में) बराबर के शरीक हैं। अगर आप (अ0) ने सब्र का हुक्म और नाला व फ़रियाद से रोका न होता तो हम आप (अ0) के ग़म में आंसुओं का ज़ख़ीरा ख़त्म कर देते और यह दर्द मन्नत पज़ीद दरमाँ न होता और यह ग़म व हुज़्न साथ न छोड़ता। (फिर भी यह) गिरया व बुका और अन्दोह व हुज़्न आपकी मुसीबत के मुक़ाबले में कम होता, लेकिन मौत ऐसी चीज़ है के जिसका पलटाना इख़्तेयार में नहीं है और न इसका दूर करना बस में है, मेरे माँ-बाप आप (अ0) पर निसार हों हमें भी अपने परवरदिगार के पास याद कीजियेगा और हमारा ख़याल रखियेगा।

236-आपका इरशादे गिरामी (इसमें पैग़म्बर (स0) की हिजरत के बाद अपनी कैफ़ियत और फिर उन तक पहुंचने तक की हालत का तज़किरा किया है)

मैं रसूलल्लाह (स0) के रास्ते पर रवाना हुआ और आपके ज़िक्र के ख़ुतूत पर क़दम रखता हुआ मक़ामे अर्ज तक पहुंच गया। 

सय्यद रज़ी - यह टुकड़ा एक तवील कलाम का जुज़ है और (फाता ज़िक्रा) ऐसा कलाम है जिसमें मुन्तहा दरजे का इख़्तेसार और फ़साहत मलहूज़ रखी गई है। इससे मुराद यह है के इब्तेदाए सफ़र से लेकर यहाँ तक के मैं इस मुक़ामे अरज तक पहुंचा बराबर आप (अ0) की इत्तेलाआत मुझे पहुंच रही थीं। आप (अ0) ने इस मतलब को इस अजीब व ग़रीब कनाया में अदा किया है।

आपका इरशादे गिरामी - 237

आमाल बजा लाओ, अभी जबके तुम ज़िन्दगी की फ़िराख़ी व वुसअत में हो आमाल नामे खुले हुए हैं और तौबा का दामन फैला हुआ है। अल्लाह से रूख़ फ़ेर लेने वाले को पुकारा जा रहा है और गुनहगारों को उम्मीद दिलाई जा रही है क़ब्ल इसके के अमल की रोशनी गुल हो जाए और मोहलत हाथ से जाती रहे और मुद्दत ख़त्म हो जाए और तौबा का दरवाज़ा बन्द हो जाए और मलाएका आसमान पर चढ़ जाएं चाहिये के इन्सान ख़ुद अपने से (ख़ुद से) अपने वास्ते और ज़िन्दा से मुर्दा के लिये और फ़ानी से बाक़ी की ख़ातिर और जाने वाली ज़िन्दगी से हयाते जावेदानी के लिये नफ़ा व बहबूद हासिल करे वह इन्सान जिसे एक मुद्दत तक उम्र दी गई है और अमल की अन्जाम दही के लिये मोहलत भी मिली है उसे अल्लाह से डरना चाहिये मर्द वह है जो अपने नफ़्स को लगाम दे के उसकी बागें चढ़ाकर अपने क़ाबू में रखे और लगाम के ज़रिये उसे अल्लाह की नाफ़रमानियों से रोके और उसकी बागें थाम कर अल्लाह की इताअत की तरफ़ खींच ले जाए।

238-आपका इरशादे गिरामी (दोनों सालेसों (अबू मूसा व अम्रो इब्ने आस) के बारे में और अहले शाम की मज़म्मत में फ़रमाया)

वह तून्द ख़ू औ बाश और कमीने बदक़माश हैं के जो हर तरफ़ से इकट्ठा कर लिये गये हैं और मख़लूतुलनसब लोगों में से चुन लिये गए हैं, वह उन लोगों में से हैं जो जेहालत की बिना पर इस क़ाबिल हैं के उन्हें (अभी इस्लाम के मुताल्लिक़) कुछ बताया जाए और शाइस्तगी सिखाई जाए (अच्छाई और बुराई की तालीम) दी जाए और (अमल की) मशक़ कराई जाए और उन पर किसी निगरान को छोड़ा जाए और उनके हाथ पकड़कर चलाया जाए, न तो वह मुहाजिर हैं न अन्सार और न इन लोगों में से हैं जो मदीने में फरोकश थे। देखो! अहले शाम ने तो अपने लिये ऐसे शख़्स को मुन्तख़ब किया है जो उनके पसन्दीदा मक़सद के बहुत क़रीब है और तुमने ऐसे शख़्स को चुना है जो तुम्हारे नापसन्दीदा मक़सद से इन्तेहाई नज़दीक है। तुमको अब्दुल्लाह इब्ने क़ैस (अबू मूसा) का कल वाला वक़्त याद होगा (के वह कहता फिरता था) के ‘‘यह जंग एक फ़ित्ना है लेहाज़ा अपनी कमानों के चिल्लों को तोड़ दो और तलवारों को न्यामों में रख लो’’ अगर वह अपने इस क़ौल में सच्चा था तो (हमारे साथ) चल खड़ा होने में ख़ताकार है के जबके इस पर कोई जब्र भी नहीं और अगर झूठा था तो इस पर (तुम्हें) बे एतमादी होना चाहिये लेहाज़ा अम्रो इब्ने आस के धकेलने के लिये अब्दुल्लाह इब्ने आस को मुन्तख़ब करो, इन दोनों की मोहलत ग़नीमत जानो और इसलामी (शहरों की) सरहदों को घेर लो क्या तुम अपने शहरों को नहीं देखते के उन पर हमले हो रहे हैं और तुम्हारी क़ूवत व ताक़त को निशाना बनाया जा रहा है।

239- आपका इरशादे गिरामी (इसमें आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया गया है)

यह लोग इल्म की ज़िन्दगी और जेहालत की मौत हैं। इनका हिल्म उनके इल्म से और इनका ज़ाहिर इनके बातिन से और इनकी ख़मोशी उनके कलाम से बाख़बर करती है। यह न हक़ की मुख़ालेफ़त करते हैं और न हक़ के बारे में कोई इख़्तेलाफ़ करते हैं। यह इस्लाम के सुतून और हिफ़ाज़त के मराकज़ हैं। उन्हीं के ज़रिये हक़ अपने मरकज़ की तरफ़ वापस आया है और बातिल अपनी जगह से उखड़ गया है और इसकी ज़बान जड़ से कट गई है। उन्होंने दीन को इस तरह पहचाना है जो समझो और निगरानी का नतीजा है। सिर्फ़ सुनने और रिवायत का नतीजा नहीं है। इसलिये के (यू ंतो) इल्म की रिवायत करने वाले बहुत हैं और (मगर) इसका ख़याल रखने वाले बहुत कम हैं।

(((-इब्ने अबी अलहदीद ने इ समक़ाम पर ख़ुद अबू मूसा अशअरी की ज़बान से यह हदीस नक़ल की है के सरकारे दो आलम (स0) ने फ़रमाया के जिस तरह बनी इसराईल में दो गुमराह हकम थे उसी तरह इस उम्मत में भी होंगे। तो लोगों ने अबू मूसा से कहा के कहीं आप ऐसे न हो जाएं, उसने कहा यह नामुमकिन है,, और इसके बाद जब वक़्त आया तो तमए दुनिया ने ऐसा ही बना दिया जिसकी ख़बर सरकारे दो आल (स0) ने दी थी।
हैरत की बात है के हकमीन के बारे में रिवायत ख़ुद अबू मूसा ने बयान की है और जो आपके सिलसिले में रिवायत ख़ुद उम्मुल मोमेनीन आइशा ने नक़्ल की है, लेकिन इसके बावजूद न उस रिवायत का कोई असर अबू मूसा पर हुआ और न इस रिवायत का कोई असर हज़रत आइशा पर।
इस सूरतेहाल को क्या कहा जाए और उसे क्या नाम दिया जाए, इन्सान का ज़ेहन सही ताबीर से आजिज़ है, और ‘‘नातक़ा सर ब गरीबां है इसे क्या कहिये।’’ सरकारे दो आलम (स0) ने एक तरफ़ नमाज़ को इस्लाम का सुतून क़रार दिया है और दूसरी तरफ़ अहलेबैत (अ0) के बारे में फ़रमाया है के जो मुझ पर और इन पर सलवात न पढ़े उसकी नमाज़ बातिल और बेकार है, जिसका खुला हुआ मतलब यह है के नमाज़ इस्लाम का सुतून है और मोहब्बते अहलेबैत (अ0) नमाज़ का सुतूने अकबर है। नमाज़ नहीं है तो इस्लाम नहीं है और अहलेबैत (अ0) नहीं हैं तो नमाज़ नहीं है-)))

 

240-आपका इरशादे गिरामी

(जिन दिनों में उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान मुहासेरे में थे तो अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास उनकी एक तहरीर लेकर अमीरूल मोमेनीन (अ0) के पास आए जिसमें आपसे ख़्वाहिश की थी के आप अपनी जागीरी नबा की तरफ़ चले जाएं ताके खि़लाफ़त के लिये जो हज़रत का नाम पुकारा जा रहा है उसमें कुछ कमी आ जाए और वह ऐसी दरख़्वास्त पहले भी कर चुके थे जिस पर हज़रत ने इब्ने अब्बास से फ़रमाया) -

ऐ इब्ने अब्बास! उस्मान तो बस यह चाहते हैं के वह मुझे अपना शतरआब कश बना लें जो डोल के साथ कभी आगे बढ़ता है और कभी पीछे हटता है, उन्होंने पहले भी यही पैग़ाम भेजा था के मैं (मदीने) से बाहर निकल जाऊं और इसके बाद यह कहलवा भेजा के मैं पलट आऊं, अब फिर वह पैग़ाम भेजते हैं के मैं यहां से चला जाऊँ (जहां तक मुनासिब था) मैंने उनको बचाया, अब तो मुझे डर है के मैं (उनको मदद देने से) कहीं गुनहगार न हो जाऊं।

241- आपका इरशादे गिरामी

ख़ुदा वन्दे आलम तुमसे अदाए शुक्र का तलबगार है और तुम्हें अपने इक़तेदार का मालिक बनाया है और तुम्हें इस (ज़िन्दगी के) महदूद मैदान में मोहलत दे रखी है ताके सबक़त का इनआम हासिल करने में एक-दूसरे से बढ़ने की कोशिश करो, कमरें मज़बूती से कस लो, और दामन गरदान लो, बलन्द हिम्मती और दावतों की ख़्वाहिश एक साथ नहीं चल सकती। रात की गहरी नीन्द दिन की महूमों में बड़ी कमज़ोरी पैदा करने वाली है और (इसकी) अन्धयारियां हिम्मत व जुरात की याद को बहुत मिटा देने वाली हैं।