True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

बीसवीं दुआ — पसन्दीदा एख़लाक़ व शाइस्ता किरदार के सिलसिले में हज़रत अ0 की दुआ

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे ईमान को कामिल तरीन ईमान की हद तक पहुंचा दे और मेरे यक़ीन को बेहतरीन यक़ीन क़रार दे और मेरी नीयत को पसन्दीदातरीन नीयत और मेरे आमाल को बेहतरीन आमाल के पाया तक बलन्द कर दे। ख़ुदावन्द! अपने लुत्फ़ से मेरी नीयत को ख़ालिस व बेरिया और अपनी रहमत से मेरे यक़ीन को इस्तवार और अपनी क़ुदरत से मेरी ख़राबियों की इस्लाह कर दे।

बारे इलाहा। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन मसरूफ़ीन से जो इबादत में मानेअ हैं बेनियाज़ कर दे और उन्हीं चीज़़ों पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे जिनके बारे में मुझसे कल के दिन सवाल करेगा और मेरे अय्यामे ज़िन्दगी को ग़रज़े खि़लक़त की अन्जामदेही के लिये मख़सूस कर दे और मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ कर दे और मेरे रिज़्क़ में कषाइष व वुसअत फ़रमा। एहतियाज व दस्तंगरी में मुब्तिला न कर। इज़्ज़त व तौक़ीर दे, किब्र व ग़ुरूर से दो चार न होने दे। मेरे नफ़्स को बन्दगी व इबादत के लिये राम कर और ख़ुदपसन्दी से मेरी इबादत को फ़ासिद न होने दे और मेरे हाथों से लोगों को फ़ैज़ पहुंचा दे और उसे एहसान जताने से राएगाना न होने दे। मुझे बलन्दपाया एख़लाक़ मरहमत फ़रमा और ग़ुरूर और तफ़ाख़ुर से महफ़ूज़ रख।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लोगों में मेरा दरजा जितना बलन्द करे उतना ही मुझे ख़ुद अपनी नज़रों में पस्त कर दे और जितनी ज़ाहेरी इज़्ज़त मुझे दे उतना ही मेरे नफ़्स में बातिनी बेवक़अती का एहसास पैदा कर दे।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी नेक हिदायत से बहरामन्द फ़रमा के जिसे दूसरी चीज़ से तबदील न करू और ऐसे सही रास्ते पर लगा जिससे कभी मुंह न मोड़ूं, और ऐसी पुख़्ता नीयत दे जिसमें ज़रा षुबह न करूं और जब तक मेरी ज़िन्दगी तेरी इताअत व फ़रमाबरदारी के काम आये मुझे ज़िन्दा रख और जब वह षैतान की चरागाह बन जाए तो इससे पहले के तेरी नाराज़गी से साबक़ा पड़े या तेरा ग़ज़ब मुझ पर यक़ीनी हो जाए, मुझे अपनी तरफ़ उठा ले, ऐ माबूद! कोई ऐसी ख़सलत जो मेरे लिये मोईब समझी जाती हो उसकी इस्लाह किये बग़़ैर न छोड़ और कोई ऐसी बुरी आदत जिस पर मेरी सरज़न्ष की जा सके उसे दुरूस्त किये बग़ैर न रहने दे और जो पाकीज़ा ख़सलत अभी मुझमें नातमाम हो उसे तकमील तक पहुंचा दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी निसबत कीनातोज़ दुष्मनों की दुष्मनी को उलफ़त से, सरकषों के हसद को मोहब्बत से, नेकियों से बेएतमादी को एतमाद से, क़रीबों की अदावत को दोस्ती से, अज़ीज़ों की क़तअ ताल्लुक़ी को सिलए रहमी से, क़राबतदारों की बेएतनाई को नुसरत व तआवुन से, ख़ुषामदियों की ज़ाहेरी मोहब्बत को सच्ची मोहब्बत से और साथियों के एहानत आमेज़ बरताव को हुस्ने मआषेरत से और ज़ालिमों के ख़ौफ़ की तल्ख़ी को अमन की षीरीनी से बदल दे।

ख़ुदावन्दा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और जो मुझ पर ज़ुल्म करे उस पर मुझे ग़लबा दे, जो मुझसे झगड़ा करे उसके मुक़ाबले में ज़बान (हुज्जत षिकन) दे, जो मुझ से दुष्मनी करे उस पर मुझे फ़तेह व कामरानी बख़्ष। जो मुझसे मक्र करे उसके मक्र का तोड़ अता कर, जो मुझे दबाए उस पर क़ाबू दे। जो मेरी बदगोई करे उसे झुटलाने की ताक़त दे और जो डराए धमकाए, उससे मुझे महफ़ूज़ रख। जो मेरी इस्लह करे उसकी इताअत और जो राहे रास्त दिखाए उसकी पैरवी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उस अम्र की तौफ़ीक़ दे के जो मुझसे ग़ष व फ़रेब करे मैं उसकी ख़ैरख़्वाही करूं, जो मुझे छोड़ दे उससे हुस्ने सुलूक से पेष आऊं, जो मुझे महरूम करे उसे अता व बख़्षिष के साथ एवज़ दूँ और जो क़तए रहमी करे उसे सिलए रहमी के साथ बदला दूँ और जो पसे पुश्त मेरी बुराई करे मैं उसके बरखि़लाफ़ उसका ज़िक्रे ख़ैर करूं और हुस्ने सुलूक पर षुक्रिया बजा लाऊं और बदी से चष्मपोषी करूं।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अद्ल के नश्र, ग़ुस्से के ज़ब्त और फ़ितने के फ़रो करने, मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा लोगों को मिलाने, आपस में सुलह व सफ़ाई कराने, नेकी के ज़ाहिर करने, ऐब पर पर्दा डालने, नर्म जोई व फ़रवतनी और हुस्ने सीरत के इख़्तेयार करने, रख रखाव रखने हुस्ने एख़लाक़ से पेष आने, फ़ज़ीलत की तरफ़ पेषक़दमी करने, तफ़ज़्ज़ल व एहसान को तरजीह देने, ख़ोरदागीरी से किनारा करने और मुस्तहक़ के साथ हुस्ने सुलूक के तर्क करने और हक़ बात के कहने में अगरचे वह गराँ गुज़रे, और अपनी गुफ़्तार व किरदार की भलाई को कम समझने में अगरचे वह ज़्यादा हो और अपनी क़ौल और अमल की बुराई को ज़्यादा समझने में अगरचे वह कम हो। मुझे नेकोकारों के ज़ेवर और परहेज़गारों की सज व धज से आरास्ता कर और उन तमाम चीज़ों को दाएमी इताअत और जमाअत से वाबस्तगी और अहले बिदअत और ईजाद करदा राइयों पर अमल करने वालों से अलाहेदगी के ज़रिये पायाए तकमील तक पहुंचा दे।   बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब मैं बूढ़ा हो तो अपनी वसीअ रोज़ी मेरे लिये क़रार दे और जब आजिज़ व दरमान्दा हो जाऊं तो अपनी क़वी ताक़त से मुझे सहारा दे और मुझे इस बात में मुब्तिला न कर के तेरी इबादत में सुस्ती व कोताही करूं तेरी राह की तषख़ीस में भटक जाऊं, तेरी मोहब्बत के तक़ाज़ों की खि़लाफ़वर्ज़ी करूं और जो तुझसे मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा हों उनसे मेलजोल रखूं और जो तेरी जानिब बढ़ने वाले हैं उनसे अलाहीदा रहूं।

ख़ुदावन्द! मुझे ऐसा क़रार दे के ज़रूरत के वक़्त तेरे ज़रिये हमला करूं, हाजत के वक़्त तुझसे सवाल करूं और फ़क्ऱ व एहतियाज के मौक़े पर तेरे सामने गिड़गिड़ाऊं और इस तरह मुझे न आज़माना के इज़तेरार में तेरे ग़ैर से मदद मांगूं और फ़क्ऱ व नादारी के वक़्त तेरे ग़ैर के आगे आजिज़ाना दरख़्वास्त करूं और ख़ौफ़ के मौक़े पर तेरे सिवा किसी दूसरे के सामने गिड़गिड़ाऊं के तेरी तरफ़ से महरूमी, नाकामी और बे एतनाई का मुस्तहक़ क़रार पाऊं। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

ख़ुदाया! जो हिरस, बदगुमानी और हसद के जज़्बात षैतान मेरे दिल में पैदा करे उन्हें अपनी अज़मत की याद अपनी क़ुदरत में तफ़क्कुर और दुष्मन के मुक़ाबले में तदबीर व चारासाज़ी के तसव्वुरात से बदल दे और फ़हष कलामी या बेहूदा गोई, या दुषनाम तराज़ी या झूटी गवाही या ग़ाएब मोमिन की ग़ीबत या मौजूद से बदज़बानी और उस क़बील की जो बातें मेरी ज़बान पर लाना चाहे उन्हें अपनी हम्द सराई मदह में कोषिष व इन्हेमाक, तमजीद व बुज़ुर्गी के बयान, षुक्रे नेमत व एतराफ़े एहसान और अपनी नेमतों के षुमार से तबदील कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझ पर ज़ुल्म न होने पाए जबके तू उसके दफ़ा करने पर क़ादिर है, और किसी पर ज़ुल्म न करूं जबके तू मुझे ज़ुल्म से रोक देने की ताक़त रखता है और गुमराह न हो जाऊं जब के मेरी राहनुमाई तेरे लिये आसान है और मोहताज न हूँ  जबके मेरी फ़ारिग़ुल बाली तेरी तरफ़ से है। और सरकष न हो जाऊँ जबके मेरी ख़ुषहाली तेरी जानिब से है।

बारे इलाहा! मैं तेरी मग़फ़ेरत की जानिब आया हूं और तेरी मुआफ़ी का तलबगार और तेरी बख़्षिष का मुष्ताक़ हूं। मैं सिर्फ़ तेरे फ़ज़्ल पर भरोसा रखता हूं और मेरे पास कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो मेरे लिये मग़फ़ेरत का बाएस बन सके और न मेरे अमल में कुछ है के तेरे अफ़ो का सज़वार क़रार पाऊं और अब इसके बाद के मैं ख़ुद ही अपने खि़लाफ़ फ़ैसला कर चुका हूं तेरे फ़ज़्ल के सिवा मेरा सरमायाए उम्मीद क्या हो सकता है। लेहाज़ा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर और मुझ पर तफ़ज़्ज़ुल फ़रमा, ख़ुदाया मुझे हिदायत के साथ गोया कर, मेरे दिल में तक़वा व परहेज़गारी का अलक़ा फ़रमा, पाकीज़ा अमल की तौफ़ीक़ दे, पसन्दीदा काम में मषग़ूल रख। ख़ुदाया मुझे बेहतरीन रास्ते पर चला और ऐसा कर के तेरे दीन व आईन पर मरूं और उसी पर ज़िन्दा रहूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे (गुफ़तार व किरदार में) मयानारवी से बहरामन्द फ़रमा और दुरूस्तकारों और हिदायत के रहनुमाओं और नेक बन्दों में से क़रार दे और आख़ेरत की कामयाबी और जहन्नम से सलामती अता कर ख़ुदाया मेरे नफ़्स का एक हिस्सा अपनी (इबतेलाओ आज़माइष के) लिये मख़सूस कर दे ताके उसे (अज़ाब से) रेहाई दिला सके और एक हिस्सा के जिससे उसकी (दुनयवी) इस्लाह व दुरूस्ती वाबस्ता है, मेरे लिये रहने दे क्योंके मेरा नफ़्स तो हलाक होने वाला है मगर यह के तू उसे बचा ले जाए।

ऐ अल्लाह! अगर मैं ग़मगीन हूं तो मेरा साज़ व सामाने (तसकीन) तू है, और अगर (हर जगह से) महरूम रहूं तो मेरी उम्मीदगाह तू है, और अगर मुझ पर ग़मों का हुजूम हो तो तुझ ही से दादफ़रयाद है। जो चीज़ जा चुकी, उसका एवज़ और जो षै तबाह हो गई उसकी दुरूस्ती और जो तू नापसन्द करे उसकी तबदीली तेरे हाथ में है। लेहाज़ा बला के नाज़िल होने से पहले आफ़ियत, मांगने से पहले ख़ुषहाली और गुमराही से पहले हिदायत से मुझ पर एहसान फ़रमा और लोगों की सख़्त व दुरषत बातों के रंज से महफ़ूज़ रख और क़यामत के दिन अम्न व इतमीनान अता फ़रमा और हुस्ने हिदायत व इरषाद की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने लुत्फ़ से (बुराइयों को) मुझसे दूर कर दे और अपनी नेमत से मेरी परवरिष और अपने करम से मेरी इस्लाह फ़रमा और अपने फ़ज़्ल व एहसान से (जिस्मानी व नफ़्सानी अमराज़ से) मेरा मदावा कर। मुझे अपनी रहमत के साये में जगह दे, और अपनी रज़ामन्दी में ढांप ले और जब उमूर मुष्तबा हो जाएं तो जो उनमें ज़्यादा क़रीने सवाब हो और जब आमाल में इष्तेबाह वाक़ेअ हो जाए तो जो उनमें पाकीज़ातर हो और जब जब मज़ाहिब में इख़्तेलाफ़ पड़ जाए तो जो उनमें पसन्दीदातर हो उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे बेनियाज़ी का ताज पहना और मुतअल्लुक़ा कामों और अहसन तरीक़ से अन्जाम देने पर मामूर फ़रमा और ऐसी हिदायत से सरफ़राज़ फ़रमा जो दवाम व साबित लिये हुए हो और ग़ना व ख़ुषहाली से मुझे बेराह न होने दे और आसूदगी व आसाइष अता फ़रमा, और ज़िन्दगी को सख़्त दुष्वार न बना दे।  मेरी दुआ को रद्द न कर क्योंके मैं किसी को तेरा मद्दे मुक़ाबिल नहीं क़रार देता और न तेरे साथ किसी को तेरा हमसर समझते हुए पुकारता हूँ।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे फ़ुज़ूलख़र्ची से बाज़ रख और मेरी रोज़ी को तबाह होने से बचा और मेरे माल में बरकत देकर इसमें इज़ाफ़ा कर और मुझे इसमें से उमूरे ख़ैर में ख़र्च करने की वजह से राहे हक़ व सवाब तक पहुंचा।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे कस्बे माषियत के रंज व ग़म से बेनियाज़ कर दे और बेहिसाब रोज़ी अता फ़रमा ताके तलाषे मआष में उलझ कर तेरी इबादत से रूगर्दान न हो जाऊं और (ग़लत व नामषरूअ) कार व कस्ब का ख़मयाज़ा न भुगतूं।

ऐ अल्लाह! मैं जो कुछ तलब करता हूं उसे अपनी क़ुदरत से मुहय्या कर दे और जिस चीज़ से ख़ाएफ़ हूं उससे अपनी इज़्ज़त व जलाल के ज़रिये पनाह दे।

ख़ुदाया! मेरी आबरू को ग़ना व तवंगरी के साथ महफ़ूज़ रख और फ़क्ऱ व तंगदस्ती से मेरी मन्ज़ेलत को नज़रों से न गिरा के तुझसे रिज़्क़ पाने वालों से रिज़्क़ मांगने लगूं और तेरे पस्त बन्दों की निगाहे लुत्फ़ व करम को अपनी तरफ़ मोड़ने की तमन्ना करूं और जो मुझे दे उसकी मदह व सना और जो न दे उसकी बुराई करने में मुब्तिला हो जाऊं। और तू ही अता करने और रोक लेने का इख़्तेयार रखता है न के वह।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी सेहत दे जो इबादत में काम आए और ऐसी फ़ुरसत जो दुनिया से बेताअल्लुक़ी में सर्फ़ हो और ऐसा इल्म जो अमल के साथ हो और ऐसी परहेज़गारी जो हद्दे एतदाल में हो (के वसवास में मुब्तिला न हो जाऊं)

ऐ अल्लाह! मेरी मुद्दते हयात को अपने अफ़ो व दरगुज़र के साथ ख़त्म कर और मेरी आरज़ू को रहमत की उम्मीद में कामयाब फ़रमा और अपनी ख़ुषनूदी तक पहुंचने के लिये राह आसान कर और हर हालत में मेरे अमल को बेहतर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ग़फ़लत के लम्हात में अपने ज़िक्र   के लिये होषियार कर और मोहलत के दिनों में अपनी इताअत में मसरूफ़ रख और अपनी मोहब्बत की सहल व आसान राह मेरे लिये खोल दे और उसके ज़रिये मेरे लिये दुनिया व आख़ेरत की भलाई को कामिल कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी औलाद पर बेहतरीन रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो उससे पहले तूने मख़लूक़ात में से किसी एक पर नाज़िल की हो और उसके बाद किसी पर नाज़िल नाज़िल करने वाला हो और हमें दुनिया में भी नेकी अता कर और आख़ेरत में भी और अपनी रहमत से हमें दोज़ख़ के अज़ाब से महफ़ूज़ रख।

इक्कीसवीं दुआ —जब किसी बात से ग़मगीन या गुनाहों की वजह से परेषान होते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! ऐ यक व तन्हा और कमज़ोर व नातवान की किफ़ायत करने वाले और ख़तरनाक मरहलों से बचा ले जाने वाले! गुनाहों ने मुझे  बे यार व मददगार छोड़ दिया है। अब कोई साथी नहीं है और तेरे ग़ज़ब के बरदाष्त करने से आजिज़ हूँ अब कोई सहारा देने वाला नहीं है। तेरी तरफ़ बाज़गष्त का ख़तरा दरपेष है। अब इस दहषत से कोई तस्कीन देने वाला नहीं है। और जबके तूने मुझे ख़ौफ़ज़दा किया है तो कौन है जो मुझे तुझसे मुतमईन करे और जबके तूने मुझे तन्हा छोड़ दिया है तो कौन है जो मेरी दस्तगीरी करे, और जबके तूने मुझे नातवां कर दिया है तो कौन है जो मुझे क़ूवत दे। ऐ मेरे माबूद! परवरदा को कोई पनाह नहीं दे सकता सिवाए उसके परवरदिगार के और षिकस्त ख़ोरदा को कोई अमान नहीं दे सकता सिवाए उस पर ग़लबा पाने वाले के। और तलबकरदा की कोई मदद नहीं कर सकता सिवाए उसके तालिब के। यह तमाम वसाएल ऐ मेरे माबूद तेरे ही हाथ में हैं और तेरी ही तरफ़ राहे फ़रार व गुरेज़ है। लेहाज़ा तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे गुरेज़ को अपने दामन में पनाह दे और मेरी हाजत बर ला। ऐ अल्लाह! अगर तूने अपना पाकीज़ा रूख़ मुझसे मोड़ लिया और अपने एहसाने अज़ीम से दरीग़ किया या अपने रिज़्क़ को बन्द कर दिया, या अपने रिष्तए रहमत को मुझसे क़ता कर लिया तो मैं अपनी आरज़ूओं तक पहुंचने का वसीला तेरे सिवा कोई पा नहीं सकता और तेरे हाँ की चीज़ों पर तेरी मदद के सिवा दस्तेरस हासिल नहीं कर सकता। क्योंके मैं तेरा बन्दा और तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में हूँ और तेरे ही हाथ में मेरी बागडोर है। तेरे हुक्म के आगे मेरा हुक्म नहीं चल सकता, मेरे मेरे बारे में तेरा फ़रमान जारी और मेरे हक़ में तेरा फ़ैसला अद्ल व इन्साफ पर मबनी है। तेरे क़लम व सलतनत से निकल जाने का मुझे यारा नहीं और तेरे अहाताए क़ुदरत से क़दम बाहर रखने की ताक़त नहीं और न तेरी मोहब्बत को हासिल कर सकता हूं। न तेरी रज़ामन्दी तक पहुंच सकता हूं और न तेरे हां की नेमतें पा सकता हूँ मगर तेरी इताअत और तेरी रहमते ज़ाववाल के वसीले से। ऐ अल्लाह! मैं हर हाल में तेरा ज़लील बन्दा हूं, तेरी मदद के बग़ैर मैं अपने सूद व ज़ेयाँ का मालिक नहीं। मैं इस अज्ज़ व बेबज़ाअती की अपने बारे में गवाही देता हूँ और अपनी कमज़ोरी व बेचारगी का एतराफ़ करता हूँ। लेहाज़ा जो वादा तूने मुझसे किया है उसे पूरा कर और जो दिया है उसे तकमील तक पहुंचा दे इसलिये के मैं तेरा वह बन्दा हूं जो बेनवा, आजिज़, कमज़ोर, बे सरोसामान, हक़ीर, ज़लील, नादार, ख़ौफ़ज़दा और पनाह का ख़्वास्तगार है।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझे उन अतियों में जो तूने बख़्षे हैं फ़रामोष कार और उन नेमतों में जो तूने अता की हैं एहसान नाषिनास न बना दे और मुझे दुआ की क़ुबूलियत से ना उम्मीद न कर अगरचे उसमें ताख़ीर हो जाए। आसाइष में हूं या तकलीफ़ में तंगी में हूं या फ़ारिग़ुलबाली में तन्दरूस्ती की हालत में हूँ या बीमारी की। बदहाली में हूँ या ख़ुषहाली में, तवंगरी में हूं या उसरत में। फ़क्ऱ में हूं या दौलतमन्दी में।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे हर हालत में मदह व सताइष व सपास में मसरूफ़ रख यहां तक के दुनिया में से जो कुछ तू दे उस पर ख़ुष न होने लगूँ और जो रोक ले उस पर रन्जीदा न हों। और परहेज़गारी को मेरे दिल का षुआर बना और मेरे जिस्म से वही काम ले जिसे तू क़ुबूल फ़रमा और अपनी इताअत में इन्हेमाक के ज़रिये तमाम दुनियवी इलाएक़ से फ़ारिग़ कर दे ताके उस चीज़ को जो तेरी नाराज़ी का सबब है दोस्त न रखूं और जो चीज़ तेरी ख़ुषनूदी का बाएस है उसे नापसन्द न करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और ज़िन्दगी भर मेरे दिल को अपनी मोहब्बत के लिये फ़ारिग़ कर दे। अपनी याद में उसे मषग़ूल रख। अपने ख़ौफ़ व हेरास के ज़रिये (गुनाहों की) तलाफ़ी का मौक़ा दे, अपपनी तरफ़ रूजू होने से उसको क़ूवत व तवानाई बख़्ष। अपनी इताअत की तरफ़ से माएल और अपने पसन्दीदातरीन रास्ते पर चला और अपनी नेमतों की तलब पर उसे तैयार कर आौर परहेज़गारी को मेरा तोषह, अपनी रहमत की जानिब मेरा सफ़र अपनी ख़ुषनूदी में मेरा गुज़र और अपनी जन्नत में मेरी मन्ज़िल क़रार दे और मुझे ऐसी क़ूवत अता फ़रमा जिससे तेरी रज़ामन्दियों का बोझ उठाऊं और मेरे गुरेज़ को अपनी जानिब और मेरी ख़्वाहिष को अपने हाँ की नेमतों की तरफ़ क़रार दे और बुरे लोगों से मेरे दिल को मतोहिष और अपने और अपने दोस्तों और फ़रमाबरदारों से मानूस कर दे और किसी बदकार और काफ़िर का मुझ पर एहसान न हो। न इसकी निगाहे करम मुझ पर हो और न उसकी मुझे कोई एहतियाज हो बल्कि मेरे दिली सुकून, क़ल्बी लगाव और मेरी बे नियाज़ी व कारगुज़ारी को अपने और अपने बरगुज़ीदा बन्दों से वाबस्ता कर।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनका हमनषीन व मददगार क़रार दे और अपने षौक़ व वारफ़्तगी और उन आमाल के ज़रिये जिन्हें तू पसन्द करता और जिनसे ख़ुष होता है। मुझ पर एहसान फ़रमा इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है और यह काम तेरे लिये आसान है।

बाईसवीं  दुआ ——षदाएद (षिद्दत) व मुष्किलात के मौक़े पर यह दुआ पढ़ते थे

ऐ मेरे माबूद! तूने (इस्लाह व तहज़ीबे नफ़्स के बारे में) जो तकलीफ़ मुझ पर आयद की है उस पर तू मुझसे ज़्यादा क़ुदरत रखता है और तेरी क़ूवत व तवनाई उस अम्र पर और ख़ुद मुझ पर मेरी क़ूवत व ताक़त से फ़ज़ोंतर है लेहाज़ा मुझे उन आमाल की तौफ़ीक़ दे जो  तेरी ख़ुषनूदी का बाएस हों। और सेहत व सलामती की हालत में अपनी रज़ामन्दी के तक़ाज़े मुझसे पूरे कर ले।

बारे इलाहा! मुझमें मषक़्क़त के मुक़ाबले में हिम्मत, मुसीबत के मुक़ाबले में सब्र और फ़क्ऱ व एहतियाज के मुक़ाबले में क़ूवत नहीं है। लेहाज़ा मेरी रोज़ी को रोक न ले अैर मुझे अपनी मख़लूक़ के हवाले न कर। बल्कि बिला वास्तामेरी हाजत बर ला और ख़ुद ही मेरा कारसाज़ बन और मुझ पर नज़रे षफ़क़्क़त फ़रमा और तमाम कामों के सिलसिले में मुझ पर नज़रे करम रख। इसलिये के अगर तूने मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया तो मैं अपने उमूर की अन्जामदेही से आजिज़ रहूंगा। और जिन कामों में मेरी बहबूदी है उन्हें अन्जाम न दे सकूंगा। और अगर तूने मुझे लोगों के हवाले कर दिया तो वह त्येवरियों पर बल डालकर मुझे देखेंगे। और अगर अज़ीज़ों की तरफ़ धकेल दिय तो वह मुझे नाउम्मीद रखेंगे। और अगर कुछ देंगे तो क़लील व नाख़ुषगवार, और उसके मुक़ाबले में एहसान ज़्यादा रखेंगे। और बुराई भी हद से बढ़ कर करेंगे। लेहाज़ा ऐ मेरे माबूद। तू अपने फ़ज़्ल व करम के ज़रिये मुझे बेनियाज़ कर और अपनी बुज़ुर्गी व अज़मत के वसीले से मेरी एहतियाज को बरतरफ़ फ़रमा और अपनी तवंगरी व वुसअत से मेरा हाथ कुषादा कर दे और अपने हाँ की नेमतों के ज़रिये मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ बना दे। 

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर मुझे हसद से निजात दे और गुनाहों के इरतेकाब से रोक दे और हराम कामों से बचने की तौफ़ीक़ दे और गुनाहों पर जुरअत पैदा न होने दे और मेरी ख़्वाहिष व रग़बत अपने से वाबस्ता रख और मेरी रज़ामन्दी उन्हीं चीज़ों में क़रार दे जो तेरी तरफ़ से मुझ  पर वारिद हों, और रिज़्क़ व बख़्षिष व इनआम में  मेरे लिये अफ़ज़ाइष फ़रमा और मुझे हर हाल में अपने हिफ़्ज़ व निगेहदाष्त, हिजाब व निगरानी और पनाह व अमान में रख,

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझे हर क़िस्म की इताअत के बजा लाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा जो तूने अपने लिये या मख़लूक़ात में से किसी के लिये मुझ पर लाज़िम व वाजिब की हो। अगरचे उसे अन्जाम देने की सकत मेरे जिस्म में न हो, और मेरी क़ूवत उसके मुक़ाबले में कमज़ोर साबित हो और मेरी मुक़दरत से बाहर  हो और मेरा माल व असास उसकी गुन्जाइष न रखता हो। वह मुझे याद हो या भूल गया हूँ। वह तो ऐ मेरे परवरदिगार! उन चीज़ों में से है जिन्हें तूने मेरे ज़िम्मे षुमार किया है और मैं अपनी सहल अंगारी की वजह से उसे बजा न लाया। लेहाज़ा अपनी वसीअ बख़्षिष और कसीर रहमत के पेषे नज़र इस (कमी) को पूरा कर दे। इसलिये के तू तवंगर व करीम है। ताके ऐ मेरे परवरदिगार! जिस दिन मैं तेरी मुलाक़ात करूं उसमें से कोई ऐसी बात मेरे ज़िम्मे बाक़ी न रहे के तू उसके मुक़ाबले में यह चाहे के मेरी नेकियों में कमी या मेरी बदियों में इज़ाफ़ा कर दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और आख़ेरत के पेषे नज़र सिर्फ़ अपने लिये अमल की रग़बत अता कर यहां तक के मैं अपने दिल में उसकी सेहत का एहसास कर लूं और दुनिया में ज़ोहद व बे रग़बती का जज़्बा मुझ पर ग़ालिब आ जाए और नेक काम षौक़ से करूं और ख़ौफ़ व हेरास की वजह से बुरे कामों से महफ़ूज़ रहूं। और मुझे ऐसा नूर (इल्म व दानिष) अता कर जिसके परतो में लोगों के दरमियान (बेखटके) चलूं फिरूं और उसके ज़रिये तारीकियों में हिदायत पाऊं और षुकूक व षुबहात के धुन्धलकों में रोषनी हासिल करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अन्दोह अज़ाब का ख़ौफ़ और सवाबे आख़ेरत का षौक़ मेरे अन्दर पैदा कर दे ताके जिस चीज़ का तुझसे तालिब हूँ उसकी लज़्ज़त और जिससे पनाह मांगता हूं उसकी तल्ख़ी महसूस कर सकूँ। बारे इलाहा! जिन चीज़ों से मेरे दीनी और दुनियवी उमूर की बहबूदी वाबस्ता है तू उन्हें ख़ूब जानता है। लेहाज़ा मेरी हाजतों की तरफ़ ख़ास तवज्जो फ़रमा।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और ख़ुषहाली व तंगदस्ती और सेहत व बीमारी में जो नेमतें तूने बख़्षी हैं उन पर अदाए षुक्र में कोताही के वक़्त मुझे एतराफ़े हक़ की तौफ़ीक़ अता कर ताके मैं ख़ौफ़ व अमन, रिज़ा व ग़ज़ब और नफ़ा व नुक़सान के मौक़े पर तेरे हुक़ूक़ व वज़ाएफ़ के अन्जाम देने में मसर्रत क़ल्बी व इत्मीनाने नफ़्स महसूस करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे सीने को हसद से पाक कर दे ताके मैं मख़लूक़ात में से किसी एक पर इस चीज़ की वजह से जो तूने अपने फ़ज़्ल व करम से अता की है, हसद न करूं यहां तक के मैं तेरी नेमतें में से कोई नेमत, वह दीन से मुताल्लिक़ हो या दुनिया से, आफ़ियत से मुताल्लिक़ हो या तक़वा से, वुसअते रिज़्क़ से मुताल्लिक़ हे या आसाइष से। मख़लूक़ात में से किसी एक के पास न देखूं मगर यह के तेरे वसीले से। और तुझसे, और तुझसे ऐ ख़ुदाए यगाना व लाषरीक इससे बेहतर की अपने लिये आरज़ू करूं। 

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और दुनिया व आख़ेरत के उमूर में ख़्वाह ख़ुषनूदी की हालत हो या ग़ज़ब की, मुझे ख़ताओं से तहफ़्फ़ुज़ और लग़्िज़षों से इजतेनाब की  तौफ़ीक़ अता फ़रमा यहां तक के ग़ज़ब व रिज़ा की जो हालत पेष आए मेरी हालत यकसां रहे और तेरी इताअत पर अमल पैरा रहूं। और दोस्त व दुष्मनी के बारे में तेरी रेज़ा और इताअत को दूसरी चीज़ों पर मुक़द्दम करूं यहां तक के दुष्मन को मेरे ज़ुल्म व जोर का कोई अन्देषा न रहे और मेरे दोस्त को भी जन्बादरी और दोस्ती की रू में बह जाने से मायूसी हो जाए और मुझे उन लोगों में क़रार दे जो राहत व आसाइष के ज़माने में पूरे इख़लास के साथ उन मुख़लेसीन की तरह दुआ मांगते हैं जो इज़तेरार व बेचारगी के आलम में -