True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

बाबे तहरीरात

32-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

तुमने लोगों की एक बड़ी जमाअत को हलाक कर दिया है के उन्हें अपनी गुमराही से धोके में रखा है और अपने समन्दर की मौजों के हवाले कर दिया है जहां तारीकियां उन्हें ढांपे हुए हैं और शुबहात के थपेड़े उन्हें तहो बाला कर रहे हैं नतीजा यह हुआ के वह राहे हक़ से हट गए और उलटे पांव पलट गए और पीठ फेरकर चलते बने और अपने हसब व नसब पर भरोसा कर बैठे अलावा उन चन्द अहले बसीरत के जो वापस आ गए और उन्होंने तुम्हें पहचानने के बाद छोड़ दिया और तुम्हारी हिमायत से भाग कर अल्लाह की तरफ़ आ गए जबके तुमने उन्हें दुश्वारियों में  मुब्तिला कर दिया था और राहे एतदाल से हटा दिया था, लेहाज़ा ऐ माविया, अपने बारे में ख़ुदा से डरो और शैतान से जान छुड़ाओ के यह दुनिया बहरहाल तुमसे अलग होने वाली है और आखि़रत बहुत क़रीब है- वस्सलाम

33- आपका मकतूबे गिरामी(मक्के के आमिल कसम बिन अब्बास के  नाम)

अम्माबाद! मेरे मग़रिबी इलाक़े के जासूस ने मुझे लिख कर इत्तेला दी है के मौसमे हज के लिये शाम की तरफ़ से कुछ ऐसे लोगों को भेजा गया है जो दिलों के अन्धे, कानों के बहरे और आंखों के महरूमे ज़िया हैं, यह हक़ को बातिल से मुश्तबा करनेे वाले हैं और ख़ालिक़ की नाफ़रमानी करके मख़लूक़ को ख़ुश करने वाले हैं इनका काम दीन के ज़रिये दुनिया को दोहना है और यह नेक किरदार, परहेज़गार अफ़राद की आखि़रत को दुनिया के ज़रिये ख़रीदने वाले हैं जबके ख़ैर उसका हिस्सा है जो खैर का काम करे और शर उसके हिस्से में आता है जो शर का अमल करता है। देखो अपने मनसबी फ़राएज़ के सिलसिले में एक तजुर्बेकार, पुख़्ताकार, मुख़लिस, होशियार इन्सान की तरह क़याम करना जो अपने हाकिम का ताबेअ और अपने इमाम का इताअतगुज़ार हो और ख़बरदार कोई ऐसा काम न करना जिसकी माज़ेरत करना पड़े और राहत व आराम में मग़रूर न हो जाना और न शिद्दत के मवाक़े पर कमज़ोरी का मुज़ाहेरा करना, वस्सलाम

34-आपका मकतूबे गिरामी (मोहम्मद बिन अबीबकर के नाम, जब यह इत्तेलाअ मिली

के वह अपनी माज़ूली और मालिके अश्तर के तक़र्रूर से रंजीदा हैं और फिर मालिके अश्तर मिस्र पहुंचने से पहले इन्तेक़ाल भी कर गए)

अम्माबाद! मुझे मालिके अश्तर के मिस्र की तरफ़ भेजने के बारे में तुम्हारी बदली की इत्तेलाअ मिली है। (((-तबरी का बयान है के हत्तात मजाशई एक जमाअत के साथ माविया के दरबार में वारिद हुआ माविया ने सबको एक एक लाख इनाम दिया और हत्तात को सत्तर हज़ार तो उसने एतराज़ किया, माविया ने कहा के मैंने इनसे इनका दीन ख़रीदा है, हत्तात ने कहा के तो मुझसे भी ख़रीद लीजिये? यह सुनना था के माविया ने एक लाख पूरा कर दिया। अब्दुल्लाह बिन अब्बास के भाई थे और मक्के पर हज़रत के आमिल थे जो हज़रत की शहादत तक अपने ओहदे पर फ़ाएज़ रहे और उसके बाद माविया के दौर में समरक़न्द में क़त्ल कर दिये गए। मोहम्मद बिन अबीबकर जनाबे असमा बिन्ते उमैस के फ़रज़न्द थे जिन्होंने पहले हज़रत जाफ़रे तय्यार से अक़्द किया और उनसे जनाबे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र पैदा हुए। इसके बाद अबूबक्र से अक़्द किया जिससे मोहम्मद की विलादत हुई और आखि़र में मौलाए कायनात (अ0) से अक़्द किया जिससे यहया पैदा हुए और इस तरह मोहम्मद अबूबक्र के फ़रज़न्द और हज़रत के परवरदा थे। उन्हें मिस्र का गवर्नर बनाया, इसके बाद माविया और अम्र व आस के ख़तरे के पेशे नज़र उनकी जगह मालिके अश्तर का तक़रूर किया लेकिन माविया ने उन्हें रास्ते ही में ज़हर दिलवा दिया और इस तरह मोहम्मद अपने ओहदे पर बाक़ी रह गए लेकिन उन्हें माज़ूली से जो सदमा हुआ था उसके तदारूक में हज़रत ने यह ख़त इरसाल फ़रमाया।-)))

हालांके मैंने यह काम इसलिये नहीं किया के तुम्हें काम में कमज़ोर पाया था या तुमसे ज़्यादा मेहनत का मुतालेबा करना चाहा था बल्कि अगर मैंने तुमसे तुम्हारे ज़ेरे असर इ़क़्तेदार को लिया भी था तो तुम्हें ऐसा काम देना चाहता था जो तुम्हारे लिये मशक़्क़त के एतबार से आसान हो और तुम्हें पसन्द भी हो। 
जिस शख़्स को मैंने मिस्र का आमिल क़रार दिया था वह मेरा मर्दे मुख़लिस और मेरे दुश्मन के लिये सख़्त क़िस्म का दुश्मन था। ख़ुदा उस पर रहमत नाज़िल करे जिसने अपने दिन पूरे कर लिये और अपनी मौत से मुलाक़ात कर ली। हम उससे बहरहाल राज़ी हैं, अल्लाह उसे अपनी रिज़ा इनायत फ़रमाए और उसके सवाब को मुज़ाएफ़ कर दे। अब तुम दुश्मन के मुक़ाबले में निकल पड़ो और अपनी बसीरत पर चल पड़ो जो तुमसे जंग करे उससे जंग करने के लिये कमर को कस लो और दुश्मन राहे ख़ुदा की दावत दे दो। इसके बाद अल्लाह से मुसलसल मदद मांगते रहो के वही तुम्हारे लिये हर मुहिम में काफ़ी है और वही हर नाज़िल होने वाली मुसीबत में मदद करने वाला है। इन्शाअल्लाह।

35-आपका मकतूबे गिरामी (अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम - मोहम्मद बिन अबीबक्र की शहादत के बाद)

अम्माबाद! देखो मिस्र पर दुश्मन का क़ब्ज़ा हो गया है और मोहम्मद बिन अबीबक्र शहीद हो गए हैं (ख़ुदा उन पर रहमत नाज़िल करे) मैं उनकी मुसीबत का अज्र ख़ुदा से चाहता हूँ के वह मेरे मुख़लिस फ़रज़न्द और मेहनतकश आमिल थे। मेरी तेग़े बर्रान और मेरे दिफ़ाई सुतून, मैंने लोगों को उनसे मुलहक़ हो जाने पर आमादा किया था और उन्हें हुक्म दिया था के जंग से पहले उनकी मदद को पहुंच जाएं और उन्हें ख़ु़िया और एलानिया हर तरह दावते अमल दी थी और बार-बार आवाज़ दी थी लेकिन बाज़ अफ़राद बादिले नख़्वास्ता आए और बाज़ ने झूटे बहाने कर दिये, कुछ तो मेरे हुक्म को नज़र अन्दाज़ करके घर ही में बैठे रह गए, अब मैं परवरदिगार से दुआ करता हूं के मुझे उनकी तरफ़ से जल्द कशाइशे अम्र इनायत फ़रमा दे के ख़ुदा की क़सम अगर मुझे दुश्मन से मुलाक़ात करके वक़्ते शहादत की आरज़ू न होती और मैंने अपने नफ़्स को मौत के लिये आमादा न कर लिया होता तो मैं हरगिज़ यह पसन्द न करता के उन लोगों के साथ एक दिन भी दुश्मन से मुक़ाबला करूं या ख़ुद उन लोगों से मुलाक़ात करूं।

36- आपका मकतूबे गिरामी(अपने भाई अक़ील के नाम जिसमें अपने बाज़ लश्करों का ज़िक्र फ़रमाया है

और यह दर हक़ीक़त अक़ील के मकतूब का जवाब है)

पस मैंने उसकी तरफ़ मुसलमानों का एक लश्करे अज़ीम रवाना कर दिया और जब उसे इस अम्र की इत्तेलाअ मिली तो उसने दामन समेट कर फ़रार इख़्तेयार किया और पशेमान होकर पीछे हट गया तो हमारे लश्कर ने उसे रास्ते मे जा लिया जबके सूरज डूबने के क़रीब था, नतीजा यह हुआ के दोनों में एक मुख़्तसर झड़प हुई और एक साअत न गुज़रने पाई थी के उसने भाग कर निजात हासिल कर ली जबके उसे गले से पकड़ा जा चुका था और चन्द सांसों के अलावा कुछ बाक़ी न रह गया था। (((-मसऊदी ने मेरूजुल ज़हब में सन 35 हिजरी के हवादिस में इस वाक़ेए को नक़ल किया है के ‘‘माविया ने अम्र व इब्नुलआस की सरकर्दगी में 4 हज़ार का लश्कर मिस्र की तरफ़ रवाना किया और इसमें माविया बिन ख़दीज जैसे और दीगर अफ़राद को भी शामिल कर दिया, मुक़ामे मसनात पर मोहम्मद बिन अबीबक्र ने इस लश्कर का मुक़ाबला किया लेकिन असहाब की बेवफ़ाई की बिना पर मैदान छोड़ना पड़ा। इसके बाद दोबारा मिस्र के इलाक़े में रन पड़ा और आखि़र में मोहम्मद बिन अबीबक्र गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जीते जी एक गधे की खाल में रखकर नज़रे आतिश कर दिया गया, जिसका हज़रत को बेहद सदमा हुआ और आपने इस वाक़ेए की इत्तेलाअ बसरा के आमिल अब्दुल्लाह बिन अब्बास को की और अपने मुकम्मल जज़्बात का इज़हार फ़रमा दिया यहां तक के अहले इराक़ की बेवफ़ाई की बुनियाद पर आरज़ूए मौत तक का तज़किरा फ़रमा दिया के गोया ऐसे अफ़राद की शक्ल भी नहीं देखना चाहते हैं जो राहे ख़ुदा में जेहाद करना न जानते  हों और यह मौलाए कायनात का दर्से अमल हर दौर के लिये है के जिस क़ौम में जज़्बए क़ुरबानी नहीं है, अली अ0 न उन्हें देखना पसन्द करते हैं और न उन्हें अपने शियों में शामिल करना चाहते हैं।-)))

इस तरह बड़ी मुश्किल से उसने जान बचाई लेहाज़ा अब क़ुरैश और गुमराही में इनकी तेज़रफ़्तारी और तफ़रिक़े में इनकी गर्दिश और ज़लालत मेंे इनकी मुंहज़ोरी का ज़िक्र छोड़ दो के इन लोगों ने मुझसे जंग पर वैसे ही इत्तेफ़ाक़ कर लिया है जिस तरह रसूले अकरम (स0) से जंग पर इत्तेफ़ाक़ किया था, अब अल्लाह ही क़ुरैश को इनके किये का बदला दे के इन्होंने मेरी क़राबत का रिश्ता तोड़ दिया और मुझसे मेरे मांजाए की हुकूमत सल्ब कर ली।

और यह जो तुमने जंग के बारे में मेरी राय दरयाफ़्त की है तो मेरी राय यही है के जिन लोगों ने जंग को हलाल बना रखा है उनसे जंग करता रहूं यहां तक के मालिक की बारगाह में हाज़िर हो जाऊँ। मेरे गिर्द लोगों का इजतेमाअ मेरी इज़्ज़त में इज़ाफ़ा नहीं कर सकता है और न उनका मुतफ़र्रिक़ हो जाना मेरी वहशत में इज़ाफ़ा कर सकता है और मेरे बरादर अगर तमाम लोग भी मेरा साथ छोड़ दे ंतो आप मुझे कमज़ोर और ख़ौफ़ज़दा न पाएंगे और न ज़ुल्म का इक़रार करने वाला, कमज़ोर और किसी क़ाएद के हाथ में आसानी से ज़माम पकड़ा देने वाला और किसी सवार के लिये सवारी की सहूलत देने वाला पाएंगे बल्कि मेरी वही सूरतेहाल होगी जिसके बारे में क़बीलए बनी सलीम वाले ने कहा है ‘‘अगर तू मेरी हाल के बारे में दरयाफ़्त कर रही है तो समझ ले के मैं ज़माने के मुश्किलात में सब्र करने वाला और मुस्तहकम इरादे वाला हूँ, मेरे लिये नाक़ाबिले बरदाश्त है के मुझे परेशान हाल देखा जाए और दुश्मन ताने दे या दोस्त इस सूरते हाल से रंजीदा हो जाए।’’

37- आपका मकतूबे गिरामी(माविया के नाम)

ऐ सुबहान अल्लाह! तू नई नई ख़्वाहिशात और ज़हमत में डालने वाली हैरत व सरगर्दानी से किस क़द्र चिपका हुआ है जबके तूने हक़ाएक़ को बरबाद कर दिया है और दलाएल को ठुकरा दिया है जो अल्लाह को मतलूब और बन्दों पर उसकी हुज्जत हैं। (((-मौलाए कायनात (अ0) ने सरकारे दो आलम (स0) को ‘‘इब्ने उम्मी’’ के लफ़्ज़ से याद फ़रमाया है इसलिये केसरकारे दो आलम (स0) मुसलसल आपकी वालदा माजिदा जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद को अपनी माँ के लफ़्ज़ से याद फ़रमाया करते थे ‘‘ इस मक़ाम पर आपने अपनी ज़ात को ‘‘इब्ने अबीक’’ कह कर याद किया है और भाई नहीं कहा है ताके जनाबे अक़ील इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो हो जाएं के हम और आप एक ऐसे बाप के फ़रज़न्द हैं जिनकी ज़िन्दगी में ज़िल्लत के क़ुबूल करने और ज़ुल्म व सितम के सामने घुटने टेक देने का कोई तसव्वुर नहीं था तो आज मेरे बारे में क्या सोचना है और जेहादे राहे ख़ुदा के बारे में मेरी राय क्या दरयाफ़्त करता है, जब मेरा बाप उसके बाप के मुक़ाबले में हमेशा जेहाद करता रहा तो मुझे माविया के मुक़ाबले में हमेशा जेहाद करने में क्या तकल्लुफ़ हो सकता है आखि़रकार वह अबूसुफ़ियान का बेटा है और मैं अबूतालिब का फ़रज़न्द हूँ। इसी के साथ आपने इस हक़ीक़त का भी एलान कर दिया के मुक़ाबला करने वाले दो तरह के होते हैं बाज़ का एतमाद लश्करों और सिपाहियों पर होता है और बाज़ का एतमाद ज़ाते परवरदिगार पर होता है, लश्करों पर एतमाद करने वाले पीछे हट सकते हैं लेकिन ज़ाते वाजिब पर एतमाद करने वाले मैदान से क़दम पीछे नहीं हटा सकते हैं न उनका ख़ुदा किसी के मुक़ाबले में कमज़ोर हो सकता है और न वह किसी क़िल्लत व कसरत से मरऊब हो सकते हैं।-))) रह गया तुम्हारा उस्मान और उनके क़ातिलों के बारे में झगड़ना तो इसका मुख़्तसर जवाब यह है के तुमने उस्मान की मदद उस वक़्त की है जब मदद में तुम्हारा फ़ायदा था और उस वक़्त लावारिस छोड़ दिया जब मदद में इनका फ़ायदा था- वस्सलाम

38-आपका मकतूबे गिरामी (मालिके अश्तर की विलायत के मौक़े पर अहले मिस्र के नाम)

बन्दए ख़ुदा! अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से उस क़ौम के नाम जिसने ख़ुदा के लिये अपने ग़ज़ब का इज़हार किया जब उसकी ज़मीन में इसकी मासियत की गई और उसके हक़ को बरबाद किया गया। ज़ुल्म ने हर नेक व बदकार और मुक़ीम व मुसाफ़िर पर अपने शामियाने तान दिये और न कोई नेकी रह गई जिसके ज़ेरे साया आराम लिया जा सके और न कोई ऐसी बुराई रह गई जिससे लोग परहेज़ करते।

अम्माबाद! मैंने तुम्हारी तरफ़ बन्दगाने ख़ुदा में से एक ऐसे बन्दे को भेजा है जो ख़ौफ़ के दिनों में  सोता नहीं है और दहशत के औक़ात में दुश्मनों से ख़ौफ़ज़दा नहीं होताा है और फ़ाजिरों के लिये आग की गर्मी से ज़्यादा शदीदतर है और इसका नाम मालिक बिन अश्तर मज़हजी है लेहाज़ा तुम लाोग उसकी बात सुनो और उसके अना व अम्र की इताअत करो जो मुताबिक़े हक़ हैं के वह अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार है जिसकी तलवार कुन्द नहीं होती है और जिसका वार उचट नहीं सकता है, वह अगर कूच करने का हुक्म दे तो निकल खड़े हो और अगर ठहरने के लिये कहे तो फ़ौरन ठहर जाओ इसलिये के वह मेरे अम्र के बग़ैर न आगे बढ़ सकता है और न पीछे हट सकता है। न हमला कर सकता है और न पीछे हट सकता है। मैंने उसके मामले में तुम्हें अपने ऊपर मुक़द्दम कर दिया है और अपने पास से जुदा कर दिया है के वह तुम्हारा मुख़लिस साबित होगा और तुम्हारे दुश्मन के मुक़ाबले में इन्तेहाई सख़्तगीर होगा।

39-आपका मकतूबे गिरामी (अम्र वब्नुल आस के नाम)

तूने अपने दीन को एक ऐसे शख़्स की दुनिया का ताबे बना दिया है जिसकी गुमराही वाज़ेह है और उसका परदाए उयूब चाक हो चुका है, वह शरीफ़ इन्सान को अपनी बज़्म में बिठाकर ऐबदार और अक़्लमन्द को अपनी मसाहेबत से अहमक़ बना देता है, तूने उसके नक़्शे क़दम पर क़दम जमाए हैं (((-इब्ने अबेल हदीद ने बिलाज़री के हवाले से नक़्ल किया है के उस्मान के मुहासरे के दौर में माविया ने शाम से एक फ़ौज यज़ीद बिन असद क़सरी की सरकर्दगी में रवाना की और उसे हिदायत देदी के मदीने के बाहर मुक़ाम ज़ी ख़शब में मुक़ीम रहें और किसी भी सूरत में मेरे हुक्म के बग़ैर मदीने में दाखि़ल न हों चुनांचे फ़ौज उसी मुक़ाम पर हालात का जाएज़ा लेती रही और क़त्ले उस्मान के बाद वापस शाम बुला ली गई, जिसका खुला हुआ मफ़हूम यह था के अगर इन्क़ेलाबी जमाअत कामयाब न हो सके तो इस फ़ौज की मदद से उस्मान का ख़ात्मा करा दिया जाए और उसके बाद ख़ूने उस्मान का हंगामा खड़ा करके अली (अ0) से खि़लाफ़त सल्ब कर ली जाए। हक़ीक़ते अम्र यह है के आज भी दुनिया में उस शामी सियासत का सिक्का चल रहा है और इक़्तेदार की ख़ातिर अपने ही अफ़राद का ख़ात्मा किया जा रहा है ताके अपने जराएम की सफ़ाई दी जा सके और दुश्मन के खि़लाफ़ जंग छेड़ने का जवाज़ पैदा किया जा सके।
अफ़सोस के आलमे इस्लाम ने यह लक़ब ख़ालिद बिन अलवलीद को दे दिया है जिसने जनाबे मालिक बिन नवीरा को बेगुनाह क़त्ल करके उसी रात उनकी ज़ौजा से ताल्लुक़ात क़ायम कर लिये और इस पर हज़रत उमर तक ने अपनी बराहमी का इज़हार किया लेकिन हज़रत अबूबक्र ने सियासी मसालेह के तहत उन्हें ‘‘सैफ़ुल्लाह’’ क़रार देकर इतने संगीन जुर्म से बरी कर दिया- इन्नल्लाह .....)))

और उसके बचे खुचे की जुस्तजू की है जिस तरह के कुत्ता शेर के पीछे लग जाता है के उसके पन्जों की पनाह में रहता है और उस वक़्त का मुन्तज़िर रहता है जब शेर अपने शिकार का बचा खुचा फेंक दे और वह उसे खा ले, तुमने तो अपनी दुनिया और आखि़रत दोनों को गंवा दिया है, हालांके अगर हक़ की राह पर रहे होते जब भी यह मुद्दआ हासिल हो सकता था। बहरहाल अब ख़ुदा ने मुझे तुम पर और अबू सुफ़ियान के बेटे पर क़ाबू दे दिया तो मैं तुम्हारे हरकात का सही बदला दे दूंगा और अगर तुम बच कर निकल गए और मेरे बाद तक बाक़ी रह गए तो तुम्हारा आइन्दा दौर तुम्हारे लिये सख़्त तरीन होगा। वस्सलाम

40-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ अमाल के नाम)

अम्माबाद! मुझे तुम्हारे बारे में एक बात की इत्तेलाअ मिली है, अगर तुमने ऐसा किया है तो अपने परवरदिगार को नाराज़ किया है। अपने इमाम की नाफ़रमानी की है और अपनी अमानतदारी को भी रूसवा किया है। मुझे यह ख़बर मिली है के तुमने बैतुलमाल की ज़मीन को साफ़ कर दिया है और जो कुछ ज़ेरे क़दम था उस पर क़ब्ज़ा कर लिया है और जो कुछ हाथों में था उसे धा गए हो लेहाज़ा फ़ौरन अपना हिसाब भेज दो और यह याद रखो के अल्लाह का हिसाब लोगों के हिसाब से ज़्यादा सख़्त है- वस्सलाम।

41- आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ अमाल (आमिल) के नाम )

अम्माबाद, मैंने तुमको अपनी अमानत में शरीककार बनाया था और ज़ाहिर व बातिन में अपना क़रार दिया था और हमदर्दी और मददगारी और अमानतदारी के एतबार से मेरे घरवालों में तुमसे ज़्यादा मोतबर कोई नहीं था, लेकिन जब तुमने देखा के ज़माना तुम्हारे इब्ने उम पर हमलावर है और दुश्मन आमादाए जंग है और लोगों की अमानत रूसवा हो रही है और उम्मत बेराह आौर लावारिस हो गई है तो तुमने भी अपने इब्ने उम से मुंह मोड़ लिया और जुदा होने वालों के साथ मुझसे जुदा हो गए और साथ छोड़ने वालों के साथ अलग हो गए और ख़यानतकारों के साथ ख़ाइन हो गए, न अपने इब्ने उम का साथ दिया और न अमानतदारी का ख़याल किया, गोया के तुमने अपने जेहाद से ख़ुदा का इरादा भी नहीं किया था।

(((-यह बात तो वाज़ेह है के हज़रत ने यह ख़त अपने किसी चचाज़ाद भाई के नाम लिखा है लेकिन उससे कौन मुराद है? इसमें शदीद इख़्तेलाफ़ पाया जाता है, बाज़ हज़रात का ख़याल है के अब्दुल्लाह बिन अब्बास मुराद हैं वह बसरा के आमिल थे लेकिन जब मिस्र में मोहम्मद बिन अबीबक्र का हश्र देख लिया तो बैतुलमाल का सारा माल लेकर मक्के चले गए और वहीं ज़िन्दगी गुज़ारने लगे जिस पर हज़रत ने अपनी शदीद नाराज़गी का इज़हार फ़रमाया और इब्ने अब्बास के तमाम कारनामों पर ख़ते नस्ख़ खींच दिया और बाज़ हज़रात का कहना है के इब्ने अब्बास जैसे जब्र अलामता और मुफ़स्सिरे क़ुरान के बारे में इस तरह के किरदार का इमकान नहीं है लेहाज़ा इससे मुराद उनके भाई उबैदुल्लाह बिन अब्बास हैं जो यमन में हज़रत के आमिल थे लेकिन बाज़ हज़रात ने इस पर भी एतराज़ किया है के यमन के हालात में इनकी ख़यानतकारी का कोई तज़किरा नहीं है तो एक भाई को बचाने के लिये दूसरे को निशानाए रूस्तम क्यों बनाया जा रहा है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास लाख आालिम व फ़ाज़िल व मुफ़स्सिरे क़ुरान क्यों न हों, इमामे मासूम नहीं हैं और बाज़ मामलात में इमाम या मुकम्मल पैरो इमाम के अलावा कोई साबित क़दम नहीं रह सकता है चाहे मर्दे आमी हो या मुफ़स्सिरे क़ुरान!-))))

और गोया तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई हुज्जत नहीं थी और गोया के तुम इस उम्मत को धोका देकर उसकी दुनिया पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे और तुम्हारी नीयत थी के इनकी ग़फ़लत से फ़ायदा उठाकर उनके अमवाल पर क़ब्ज़ा कर लें। चुनान्चे जैसे ही उम्मत से ख़यानत करने की ताक़त पैदा हो गई तुमने तेज़ी से हमला कर दिया और फ़ौरन कूद पड़े और इनत माम अमवाल को उचक लिया जो यतीमों और बेवाओं के लिये महफ़ूज़ किये गये थे जैसे कोई तेज़ रफ़्तार भेड़िया शिकस्ता या ज़ख़्मी बकरियों पर हमला कर देता है, फिर तुम उन अमवाल को हेजाज़ की तरफ़ उठा ले गए और इस हरकत से बेहद मुमतईन और ख़ुश थे और इसके लेने में किसी गुनाह का एहसास भी न था जैसे (ख़ुदा तुम्हारे दुश्मनों का बुरा करे) अपने घर की तरफ़ अपने मां बाप की मीरास का माल ला रहे हो। ऐ सुबहान अल्लाह, क्या तुम्हारा आखि़रत पर ईमान ही नहीं है और क्या रोज़े क़यामत के शदीद हिसाब का ख़ौफ़ भी ख़त्म हो गया हैं, ऐ वह शख़्स जो कल हमारे नज़दीक साहेबाने अक़्ल में शुमार होता था, तुम्हारे यह खाना पीना किस तरह गवारा होता है जबके तुम्हें मालूम है के तुम माले हराम खा रहे हो और हराम ही पी रहे हो और फिर अयताम (यतीमों) मसाकीन, मोमेनीन और मुजाहेदीन जिन्हें अल्लाह ने यह माल दिया है और जिनके ज़रिये उन शहरों का तहफ़्फ़ुज़ किया है, उनके अमवाल से कनीज़ें ख़रीद रहे हो और शादियां रचा रहे हो।

ख़ुदारा, ख़ुदा से डरो और उन लोगों के अमवाल वापस कर दो के अगर ऐसा न करोगे और ख़ुदा ने कभी तुम पर इख़्तेयार दे दिया तो तुम्हारे बारे में वह फ़ैसला करूंगा जो मुझे माज़ूर बना सके और तुम्हारा ख़ातेमा इसी तलवार से करूंगा जिसके मारे हुए का कोई ठिकाना जहन्नुम के अलावा नहीं है।
ख़ुदा की क़सम, अगर यही काम हसन (अ0) व हुसैन (अ0) ने किया होता तो उनके लिये भी मेरे पास किसी नर्मी का इमकान नहीं था और न वह मेरे इरादे पर क़ाबू पा सकते थे जब तक के उनसे हक़ हासिल न कर लूँ और उनके ज़ुल्म के आसार को मिटा न दूं।

ख़ुदाए रब्बुल आलमीन की क़सम मेरे लिये यह बात हरगिज़ ख़ुशकुन नहीं थी अगर यह सारे अमवाल मेरे लिये हलाल होते और मैं बाद वालों के लिये मीरास बनाकर छोड़ जाता, ज़रा होश में आओ के अब तुम ज़िन्दगी की आखि़री हदों तक पहुंच चुके हो और गोया के ज़ेरे ख़ाक दफ़्न हो चुके हो और तुम पर तुम्हारे आमाल पेश कर दिये गए हैं। इस मन्ज़िल पर जहां ज़ालिम हसरत से आवाज़ देंगे, और ज़िन्दगी बरबाद करने वाले वापसी की आरज़ू कर रहे होंगे और छुटकारे का कोई इमकान न होगा। (((-हज़रत अली (अ0) के मुजाहिदात के इम्तियाज़ात में से एक इम्तियाज़ यह भी है के जिसकी तलवार आप पर चल जाए वह भी जहन्नमी है और जिस पर आपकी तलवार चल जाए वह भी जहन्नमी है इसलिये के आप इमामे मासूम और यदुल्लाह हैं और इमामे मासूम से किसी ग़लती का इमकान नहीं है और अल्लाह का हाथ किसी बेगुनाह और बेख़ता पर नहीं उठ सकता है। काश मौलाए कायनात के मुक़ाबले में आने वाले जमल व सिफ़्फ़ीन के फ़ौजी या सरबराह इस हक़ीक़त से बाख़बर होते और उन्हें इस नुक्ते का होश रह जाता तो कभी नफ़्से पैग़म्बर (स0) से मुक़ाबला करने की हिम्मत न करते। यह किसी ज़ाती इम्तियाज़ का एलान नहीं है, यही बात परवरदिगार ने पैग़म्बर (स0) से कही के तुम शिर्क इख़्तेयार कर लोगे तो तुम्हारे आमाल भी बरबाद कर दिये जाएंगे और यही बात पैग़म्बरे इस्लाम (स0) ने अपनी दुख़्तरे नेक अख़्तर के बारे में फ़रमाई थी और यही बात मौलाए कायनात (अ0) ने इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ0) के बारे में फ़रमाई है, गोया के यह एक सही इस्लामी किरदार है जो सिर्फ़ उन्हीं बन्दगाने ख़ुदा में पाया जाता है जो मशीयते इलाही के तर्जुमान और एहकामे इलाही की तमसील हैं वरना इस तरह के किरदार का पेश करना हर इन्सान के बस का काम नहीं है।-)))

42-आपका मकतूबे गिरामी

(बहरीन के आमिल अम्र बिन अबी सलमा मख़जू़मी के नाम जिन्हें माज़ूल करके नोमान बिन अजलान अज़्ज़रक़ी को मोअय्यन किया था)

अम्माबाद! मैंने नोमान बिन अजलान अज़्ज़र्क़ी को बहरीन का आमिल बना दिया है और तुम्हें उससे बेदख़ल कर दिया है लेकिन न इसमें तुम्हारी कोई बुराई है और न मलामत, तुमने हुकूमत का काम बहुत ठीक तरीक़े से चलाया है और अमानत को अदा कर दिया है लेकिन अब वापस चले आओ न तुम्हारे बारे में कोई बदगुमानी है न मलामत, न इल्ज़ाम है न गुनाह, असल में मेरा इरादा शाम के ज़ालिमों से मुक़ाबला करने का है लेहाज़ा मैं चाहता हूं के तुम मेरे साथ रहो के मैं तुम जैसे अफ़राद से दुश्मन से जंग करने और सुतूने दीम क़ायम करने में मदद लेना चाहता हूँ, इन्शाअल्लाह।

43-आपका मकतूबे गिरामी (मुस्क़ला बिन हबीरा अलशीबानी के नाम जो अर्द शीर ख़ुर्रह में आपके आमिल थे)

मुझे तुम्हारे बारे में एक ख़बर मिली जो अगर वाक़ेअन सही है तो तुमने अपने परवरदिगाार को नाराज़ किया है और अपने इमाम की नाफ़रमानी की है, ख़बर यह है के मुसलमानों के माले ग़नीमत को जिसे उनके नैज़ों और घोड़ों ने जमा किया है और जिसकी राह में इनका ख़ून बहाया गया है, अपनी क़ौम के उन बद्दुओं में तक़सीम कर रहे हो जो तुम्हारे हवाख़्वाह हैं। क़सम उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया है और जानदारों को पैदा किया है। अगर यह बातसही है तो तुम मेरी नज़रों में इन्तेहाई ज़लील हो गए हो और तुम्हारे आमाल का पल्ला हल्का हो जाएगा, लेहाज़ा ख़बरदार अपने रब के हुक़ूक़ को मामूली मत समझना और अपने दीन को बरबाद करके दुनिया आरास्ता करने की फ़िक्र न करना के तुम्हारा शुमार उन लोगों में हो जाए जिनके आमाल में ख़सारे के अलावा कुछ नहीं है।

याद रखो! जो मुसलमान तुम्हारे पास या मेरे पास हैं उन सबका हिस्सा उस माले ग़नीमत एक ही जैसा है और इसी ऐतबार से वह मेरे पास वारिद होते हैं और अपना हक़ लेकर चले जाते हैं।

44-आपका मकतूबे गिरामी (ज़ियाद बिन अबिया के नाम जब आपको ख़बर मिली के माविया उसे अपने नसब में शामिल करके धोका देना चाहता है)

मुझे मालूम हुआ है के माविया ने तुम्हें ख़त लिखकर तुम्हारी अक़्ल को फ़िसलाना चाहा है और तुम्हारी धार को कुन्द बनाने का इरादा कर लिया है, लेहाज़ा ख़बरदार होशियार रहना, यह शैतान है जो इन्सान के पास आगे, पीछे, दाहिने बायें हर तरफ़ से आता है ताके उसे ग़ाफ़िल पाकर उस पर टूट पड़े और ग़फ़लत की हालत में उसकी अक़्ल सल्ब कर ले। (((-अमीरूल मोमेनीन (अ0) का उसूले हूकूमत था के अमाल पर हमेशा कड़ी निगाह रखते थे और उनके तसर्रूफ़ात की निगारानी किया करते थे और जहां किसी ने हुदूदे इस्लामिया से तजावुज़ किया, फ़ौरन तम्बीही ख़त तहरीर फ़रमा दिया करते थे और यही वह तजेऱ् अमल था जिसकी बिना पर बहुत से अफ़राद टूट कर माविया के साथ चले गए और दीन व दुनिया दोनों को बरबाद कर लिया, हबीरह उन्हीं अफ़राद में था और जब हज़रत ने उसके तसर्रूफ़ात पर  तन्क़ीद फ़रमाई तो मुनहरिफ़ होकर शाम चला गया और माविया से मुलहक़ हो गया लेकिन आपका किरदार शाम के अन्धेरे में चमकता रहा और आज तक दुनिया को इस्लाम की रौशनी दिखला रहा है।-)))

वाक़ेया यह है के अबू सुफ़ियान ने अम्र बिन अलख़त्ताब के ज़माने में एक बेसमझी बूझी बात कह दी थी जो शैतानी वसवसों में से एक वसवसे की हैसियत रखती थी जिससे न कोई नसब साबित होता है और न किसी मीरास का इसतेहक़ाक़ पैदा होता है और इससे तमस्सुक करने वाला एक बिन बुलाया शराबी है जिसे धक्के देकर निकाल दिया जाए या प्याला है जो ज़ीने फ़रस में लटका दिया जाए और इधर-उधर ढलकता रहे। सय्यद रज़ी- इस ख़त को पढ़ने के बाद ज़ियाद ने कहा के रब्बे काबा की क़सम अली (अ0) ने उस अम्र की गवाही दे दी और यह बात उसके दिल से लगी रही यहां तक के माविया ने उसके भाई होने का इदआ कर दिया। वाग़ल उस शख़्स को कहा जाता है जो बज़्मे शराब में बिन बुलाए दाखि़़ल हो जाए और धक्के देकर निकाल दिया जाए। और नूत मजबेज़ब  वह प्याला वग़ैरा है जो मुसाफ़िर के सामान से बान्ध कर लटका दिया जाता है और वह मुसलसल इधर उधर ढलकता  रहता है।

45-आपका मकतूबे गिरामी (अपने बसरा के आमिल उस्मान बिन हुनैफ़ के नाम जब आपको इत्तेलाअ मिली के वह एक बड़ी दावत में शरीक हुए हैं)

अम्माबाद! इब्ने हुनैफ़! मुझे यह ख़बर मिली है के बसरा के बाज़ जवानों ने तुमको एक दावत में मदओ किया था जिसमें तरह-तरह के ख़ुशगवार खाने थे और तुम्हारी तरफ़ बड़े-बड़े प्याले बढ़ाए जा रहे थे और तुम तेज़ी से वहां पहुंच गए थे। मुझे तो यह गुमान भी नहीं था के तुम ऐसी क़ौम की दावत में शिरकत करोगे जिसके ग़रीबों पर ज़ुल्म हो रहा हो और जिसके दौलतमन्द मदओ किये जाते हों, देखो जो लुक़मे चबाते हो उसे देख लिया करो और अगर उसकी हक़ीक़त मुश्तबा हो तो उसे फेंक दिया करो और जिसके बारे में यक़ीन हो के पाकीज़ा है उसी को इस्तेमाल किया करो।  याद रखो! के हर मामूम का एक इमाम होता है जिसकी वह इक़्तेदा करता है और उसी को नूरे इल्म से कस्बे ज़िया करता है और तुम्हारे इमाम ने तो इस दुनिया में सिर्फ़ दो बोसीदा कपड़ों और दो रोटियों पर गुज़ारा किया है। मुझे मालूम है के तुम लोग ऐसा नहीं कर सकते हो लेकिन कम से कम अपनी एहतियात, कोशिश, उफ़्फ़त और सलामत रवी से मेरी मदद करो, ख़ुदा की क़सम मैंने तुम्हारी दुनिया से न कोई सोना जमा किया है और न उस माल व मताअ में से कोई ज़ख़ीरा इकट्ठा किया है और न इन बोसीदा कपड़ों के बदले कोई और मामूली कपड़ा मुहय्या किया है। (((-उस्मान बिन हुनैफ़ अनसार के क़बीलए औस की एक नुमायां शख़्िसयत थे और यही वजह है के जब खि़लाफ़ते दोम में ईराक़ के वाली की तलाश हुई तो सबने बिलाइत्तेफ़ाक़ उस्मान बिन हुनैफ़ का नाम लिया और उन्हें अर्ज़े इराक़ की पैमाइश और इसके ख़ेराज की तअय्युन का ज़िम्मेदार बना दिया गया। अमीरूलमोमेनीन (अ0) ने अपने दौरे हुकूमत में उन्हें बसरा का वाली बना दिया था और वह तल्हा व ज़ुबैर के वारिद होने तक बराबर मसरूफ़े अमल रहे और इसके बाद उन लोगों ने सारे हालात ख़राब कर दिये और बाला आखि़र हज़रत की शहादत के बाद कूफ़े मुन्तक़िल हो गए और वहीं इन्तेक़ाल फ़रमाया। उस्मान के किरदार में किसी तरह के शक व शुब्हे की गुन्जाइश नहीं है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) का इस्लामी निज़ामे अमल यह था के हुक्काम को अवाम के हालात को निगाह में रख कर ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिये और किसी हाकिम की ज़िन्दगी को अवाम के हालात से बालातर नहीं होनी चाहिये जिस तरह के हज़रत ने ख़ुद अपनी ज़िन्दगी गुज़ारी है और मामूली लिबास व ग़िज़ा पर पूरा दौरे हुकूमत गुज़ार दिया है।-)))

और न एक बालिश्त पर क़ब्ज़ा किया है और न एक बीमार जानवर से ज़्यादा ग़िज़ा हासिल किया है। यह दुनिया मेरी निगाह में कड़वी छाल से भी ज़्यादा हक़ीर और बेक़ीमत है, हां हमारे हाथों में उस आसमान के नीचे सिर्फ़ एक फ़िदक था मगर उस पर भी एक क़ौम ने अपनी लालच का मुज़ाहिरा किया और दूसरी क़ौम ने उसके जाने की परवाह न की और बहरहाल बेहतरीन फ़ैसला करने वाला परवरदिगार है और वैसे भी मुझे फ़िदक या ग़ैरे फ़िदक से क्या लेना देना है जबके नफ़्स की मन्ज़िल असली कल के दिन क़ब्र है जहां की तारीकी में तमाम आसार मुन्क़ता हो जाएंगे और कोई ख़बर न आअएगी, यह एक ऐसा गढ़ा है जिसकी वुसअत ज़्यादा भी कर दी जाए और खोदने वाला उसे वसीअ भी बना दे तो बाला आखि़र पत्थर और ढेले उसे तंग बना देंगे और तह ब तह मिट्टी उसके शिगाफ़ को बन्द कर देगी। मैं तो अपने नफ़्स को तक़वा की तरबियत दे रहा हूँ ताके अज़ीम तरीन ख़ौफ़ के दिन मुतमइन होकर मैदान में आए और फिसलने के मुक़ामात पर साबित क़दम रहे। मैं अगर चाहता तो इस ख़ालिस शहद, बेहतरीन साफ़ शुदा गन्दुम और रेशमी कपड़ों के रास्ते भी पैदा कर सकता था लेकिन ख़ुदा न करे के मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए और मुझे हिर्स व तमअ अच्छे खानों के इख़्तेयार करने की तरफ़ खींच कर ले जाएं जबके मुमकिन है के हेजाज़ या यमामा में ऐसे अफ़राद भी हों जिनके लिये एक रोटी का सहारा न हुआ और शिकम सेरी का कोई सामान न हो। भला यह कैसे हो सकता है के मैं शिकम सेर होकर सो जाऊं और मेरी इतराफ़ भूके पेट और प्यासे जिगर तड़प् रहे हों। क्या मैं शाएर के शेर का मिस्दाक़ हो सकता हूं—‘‘तेरी बीमारी के लिये यही काफ़ी है के तू पेट भर कर सो जाए और तेरे इतराफ़  वह जिगर भी हों जो सूखे चमड़े को भी तरस रहे हों’’

के न मेरा नफ़्स इस बात से मुतमईन हो सकता है के मुझे ‘‘अमीरूल मोमेनीन’’ कहा जाए और मैं ज़माने के नाख़ुशगवार हालात में मोमेनीन का शरीके हाल न बनूं और मामूली ग़िज़ा के इस्तेमाल में उनके वास्ते नमूना न पेश कर सकूं। मैं इसलिये तो नहीं पैदा किया गया हूं के मुझे बेहतरीन ग़िज़ाओं का खाना मशग़ूल कर ले और मैं जानवरों के मानिन्द हो जाऊं के वह बन्धे होते हैं तो उनका कुल मक़सद चारा होता है और आज़ाद होते हैं तो कुल मशग़ला इधर-उधर चरना होता है जहां घास फूस से अपना पेट भर लेते हैं और उन्हें इस बात की फ़िक्र भी नहीं होती है के उनका मक़सद क्या है, क्या मैं आज़ाद छोड़ दिया गया हूँ, या मुझे बेकार आज़ाद कर दिया गया है या मक़सद यह है के मैं गुमराही की रस्सी में आन्ध कर खींचा जाऊं। (((-आज दुनिया के ज़ोहद व तक़वा का बेशतर हिस्सा मजबूरियों की पैदावार है और इन्सान को जब दुनिया हासिल नहीं होती  है तो वह दीन के ज़ेरे साया पनाह ले लेता है और ज़िक्रे आखि़रतत से अपने नफ़्स को बहलाता है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) का किरदार इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ है, आपके हाथों में दुनिया व आखि़रत का इख़्तेयार था, आपके बाज़ुओं में ज़ोरे ख़ैबर शिकमी और आपकी उंगलियों में क़ूवते रद्दे शम्स थी लेकिन इसके बावजूद फ़ाक़े कर रहे थे ताके इस्लाम में रियासत और हुकूमत ऐश परस्ती का ज़रिया न बन जाए और एहकाम अपनी सहूलियत का एहसास करें और अपनी ज़िन्दगी को ग़ुरबा के मेयार पर गुज़ारें ताके इनका दिल न टूटने पाए और इनके नफ़्स में ग़ुरूर न पैदा होने पाए, मगर अफ़सोस के दुनिया से यह तसव्वुर यकसर ग़ायब हो गया और रियासत व हुकूमत सिर्फ़ राहत व आराम और अय्याशी व ऐश परस्ती का वसीला बन कर रह गई। इन हालात की जुज़ी इस्लाह ग़ुलामाने अली (अ0) के इस्लामी निज़ाम से हो सकती है और कुल इस्लाह फ़रज़न्दग अली (अ0) के ज़ुहूर से हो सकती है। इसके अलावा बनी उमय्या और बनी अब्बास पर नाज़ करने वाले सलातीन इन हालात की इस्लाह नहीं कर सकते हैं। इन्सान और जानवर का नुक़्तए इम्म्तेयाज़ यही है के जानवर के यहाँ खाना और चारा मक़सदे हयात है और इन्सान के यहाँ यह अशया वसीलाए हयात हैं, लेहाज़ा इन्सान जब तक मक़सदे हयात और बन्दगीए परवरदिगार का तहफ़्फ़ुज़ करता रहेगा इन्सान रहेगा और जिस दिन इस नुक्ते से ग़ाफ़िल हो जाएगा उसका शुमार हैवानात में हो जाएगा।-)))

या भटकने की जगह पर मुंह उठाए फिरता रहूँ, गोया मैं देख रहा हूँ के तुम में से बाज़ लोग यह कह रहे हैं के जब अबूतालिब के फ़रज़न्द की ग़िज़ा ऐसी मामूली है तो उन्हें ज़ोफ़ ने दुश्मनों से जंग करने और बहादुरों के साथ मैदान में उतरने से बिठा दिया होगा। तो यह याद रखना के जंगल के दरख़्तों की लकड़ी ज़्यादा मज़बूत होती है और तरो ताज़ा दरख़्तों की छाल कमज़ोर होती है। सहराई झाड़ का ईन्धन ज़्यादा भड़कता भी है और इसके शोले देर में बुझते भी हैं। मेरा रिश्ता रसूले अकरम (स0) से वही है जो नूर का रिश्ता नूर से होता है या हाथ का रिश्ता बाज़ुओं से होता है। ख़ुदा की क़सम अगर तमाम अरब मुझसे जंग करने पर इत्तेफ़ाक़ कर लें तो भी मैं मैदान से मुंह नहीं फेर सकता और अगर मुझे ज़रा भी मौक़ा मिल जाए तो मैं इनकी गर्दनें उड़ा दूंगा और इस बात की कोशिश करूंगा के ज़मीन को इस उलटी खोपड़ी और बेहंगम डील-डौल वाले से पाक कर दूँ ताके खलियान के दानों में से कंकर पत्थर निकल जाएं। (इस ख़ुत्बे का आखि़री हिस्सा) ऐ दुनिया मुझसे दूर हो जा, मैंने तेरी बागडोर तेरे ही कान्धे पर डाल दी है और तेरे चंगुल से बाहर आ चुका हूँ और तेरे जाल से निकल चुका हूं और तेरे फिसलने के मुक़ामात की तरफ़ जाने से भी परहेज़ करता हूँ। कहाँ हैं वह लोग जिनको तूने अपनी हंसी मज़ाक़ की बातों से लुभा लिया था और कहां हैं वह क़ौमें जिनको अपनी ज़ीनत व आराइश से मुब्तिलाए फ़ितना कर दिया था, देखो अब वह सब क़ब्रों में रहन हो चुके हैं और लहद में दुबके पड़े हुए हैं। ख़ुदा की क़सम अगर तू कोई देखने वाली शै और महसूस होने वाला ढांचा होती तो मैं तेरे ऊपर ज़रूर हद जारी करता के तूने अल्लाह के बन्दों को आरज़ूओं के सहारे धोका दिया है और क़ौमों को गुमराही के गढ़े में डाल दिया है, बादशाहों को बरबादी के हवाले कर दिया है और उन्हें बलाओं की मन्ज़िल पर उतार दिया है जहां न कोई वारिद होने वाला है और न सादिर होने वाला। अफ़सोस! जिसने भी तेरी लग़्िज़शगाहों पर क़दम रखा वह फिसल गया और जो तेरी मौजों पर सवार हुआ वह ग़र्क़ हो गया, बस जिसने तेरे फन्दों से किनाराकशी इख़्तेयार की उसको तौफ़ीक़ हासिल हो गई, तुझसे बचने वाला इस बात की परवाह नहीं करता है के मन्ज़िल किस क़द्र तंग हो गई है। इसलिये के दुनिया इसकी निगाह में सिर्फ़ एक दिन के बराबर है जिसके एख़्तेताम का वक़्त हो चुका है। (((-बाज़ अफ़राद का ख़याल है के इन्सानी ज़िन्दगी में ताक़त का सरचश्मा इसकी ग़िज़ा होती है और इन्सान की ग़िज़ा जिस क़द्र लज़ीज़ और ख़ुश ज़ायक़ा होगी इन्सान उसी क़द्र हिम्मत और ताक़त वाला होगा हालांके यह बात बिल्कुल ग़लत और महमिल है। ताक़त का ताल्लुक़ लज़्ज़त व ज़ायक़े से नहीं है, क़ूवते नफ़्स और हिम्मते क़ल्ब से और इससे बालातर ताईदे परवरदिगार से के दस्ते क़ुदरत से सेराब होने वाला सहराई दरख़्त ज़्यादा मज़बूत होता है और इमकानात के अन्दर तरबियत पाने वाले अशजार इन्तेहाई कमज़ोर होते हैं के दस्ते बशर वह ताक़त नहीं पैदा कर सकता है जो दस्ते क़ुदरत से पैदा होती है। लफ़्ज़ों में यह बात बहुत आसान है लेकिन सजी सजाई दुनिया को तीन मरतबा तलाक़ देकर अपने से जुदा कर देना सिर्फ़ नफ़्से पैग़म्बर (स0) का कारनामा है और उम्मत के बस का काम नहीं है। यह काम वही अन्जाम दे सकता है जो नफ़्स के चंगुल से आज़ाद हो, ख़्वाहिशात के फन्दों में गिरफ़्तार न हो और हर तरह की ज़ीनत व आराइश को अपनी निगाहों से गिरा चुका हो।-)))

तू मुझसे दूर हो जा, मैं तेरे क़ब्ज़े में आने वाला नहीं हूँ के तू मुझे ज़लील कर सके और न अपनी ज़माम तेरे हाथ में देने वाला हूँ के जिधर चाहे खींच सके, मैं ख़ुदा की क़सम खाकर कहता हूँ, और इस क़सम में मशीयते ख़ुदा के अलावा किसी सूरत को मुस्तशना नहीं करता। मैं इस नफ़्स को ऐसी तरबीयत दूंगा के एक रोटी पर भी ख़ुश रहे अगर वह बतौरे तआम और नमक बतौरे अदाम मिल जाए और मैं अपनी आंखों के सोने को ऐसा बना दूंगा जैसे वह चश्मा जिसका पानी तक़रीबन ख़ुश्क होे चुका हो और सारे आंसू बह गए हों, क्या यह मुमकिन है जिस तरह जानवर चारा खाकर बैठ जाते हैं और बकरियां घास से सेर होकर अपने बाड़े में लेट जाती हैं उसी तरह अली (अ0) भी अपने पास का खाना खाकर सो जाए, उसकी आंखें फूट जाएं जो एक तवील ज़माना गुज़ारने के बाद आवारा जानवर और चराए हुए हैवानात की पैरवी करने लगे।  खुशा नसीब उस नफ़्स के लिये जो अपने रब के फ़र्ज़ को अदा कर दे और सख़्ितयों के आलम में सब्र से काम ले, रातों को अपनी आंखों को खुला रखे यहां तक के नीन्द का ग़लबा होने लगे तो ज़मीन को बिस्तर बना ले और हाथों को तकिया, इन लोगों के दरम्यान जिनकी आंखों को ख़ौफ़े महशर ने बेदार रखा है और जिन के पहलू बिस्तरों से अलग रहे हैं उनके होंटों पर ज़िक्रे ख़ुदा के ज़मज़मे रहे हैं और उनके तूले अस्तग़फ़ार से गुनाहों के बादल छट गए हैं यही वह लोग हैं जो अल्लाह के गिरोह में हैं और याद रखो के अल्लाह का गिरोह ही कामयाब होने वाला है। इब्ने हनीफ़! अल्लाह से डरो, और तुम्हारी यह रोटियां तुम्हें हिर्स व तमअ से रोके रहें ताके आतिशे जहन्नमसे आज़ादी हासिल कर सको।

(((-कहां दुनिया में ऐसा कोई इन्सान है जो साहबे जाहो जलाल, इक़्तेदार व बैतुलमाल हो, दुनिया में उसका सिक्का चल रहा हो और आलमे इस्लाम के ज़ेरे नगीं हो और इसके बाद या तो रातों को बेदारी और इबादते इलाही में गुज़ार दे या सोने का इरादा करे तो ख़ाक का बिस्तर और हाथ का तकिया बना ले, सलातीने ज़माना और हुक्कामे मुस्लेमीन तो इस सूरते हाल का तसव्वुर भी नहीं कर सकते हैं। इस किरदार के पैदा करने का क्या सवाल पैदा होता है। 
वाज़ेह रहे के यह मौलाए कायनात की शख़्सी ज़िन्दगी का नक़्शा नहीं है, यह हाकिमे इस्लामी और ख़लीफ़तुल्लाह का मन्सबी किरदार है जिसे अवामी मफ़ादात आौर इस्लामी मुक़द्देरात का ज़िम्मेदार बनाया जाता है। इसके किरदार को ऐसा होना चाहिये और इसकी ज़िन्दगी में इसी क़िस्म की सादगी दरकार है, इन्सान के नफ़्से क़ुद्सी के पैदा करने का अज़म मोहकम करे वरना न इस्लामी तख़्त व इक़तेदार को छोड़कर ज़ुल्म व सितम की बिसात पर ज़िन्दगी गुज़ार दे और अपने को आलमे इस्लाम का हाकिम कहने और इरादा न करे वमा तौफ़ीक़ी इल्ला बिल्लाह-)))