True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के मुन्तख़ब हुक्म व मवाएज़ का बाब (अक़वाल)

76- ज़र्रार बिन हमज़ा अलज़बाई माविया के दरबार में हाज़िर हुए तो उसने अमीरूल मोमेनीन (अ0) के बारे में दरयाफ़्त किया?

(((बाज़ हज़रात ने इनका नाम ज़रार बिन ज़मरह लिखा है और यह इनका कमाले किरदार है के माविया जैसे दुश्मने अली (अ0) के दरबार में हक़ाएक़ का एलान कर दिया और इस मशहूर हदीस के मानी को मुजस्सम बना दिया के बेहतरीन जेहाद बादशाहे ज़ालिम के सामने कलमए हक़ का इज़हार व ऐलान है)))

ज़र्रार ने कहा के मैंने ख़ुद अपनी आंखों से देखा है के रात की तारीकी में मेहराब में खड़े हुए रेशे मुबारक को हाथों में लिये हुए ऐसे तड़पते थे जिस तरह सांप  का काटा हुआ तड़पता है और कोई ग़म रसीदा गिरया करता है, और फ़रमाया करते थे-

‘‘ऐ दुनिया, ऐ दुनिया! मुझसे दूर हो जा, तू मेरे सामने बन संवर कर आई है या मेरी वाक़ेअन मुश्ताक़ बन कर आई है? ख़ुदा वह साअत न लाए  के तू मुझे धोका दे सके, जा मेरे अलावा किसी और को धोका दे,  मुझे तेरी ज़रूरत नहीं है,  मैं तुझे तीन मरतबा तलाक़ दे चुका हूँ जिसके बाद रूजूअ का कोई इमकान नहीं है,  तेरी ज़िन्दगी बहुत थोड़ी है और तेरी हैसियत बहुत मामूली है और तेरी उम्मीद बहुत हक़ीर शै है’’ आह ज़ादे सफ़र किस क़द्र कम  है , रास्ता किस क़द्र तूलानी है, मन्ज़िल किस क़द्र दूर है और वारिद होने की जगह किस क़द्र ख़तरनाक है।

((( खुली हुई बात है के जब कोई शख़्स किसी औरत को तलाक़ दे देता है तो वह औरत भी नाराज़ होती है और उसके घरवाले भी नाराज़ रहते हैं। अमीरूल मोमेनीन (अ0) से दुनिया का इन्हेराफ़ और अहले दुनिया की दुश्मनी का राज़ यही है के आपने उसे तीन मरतबा तलाक़ दे दी थी तो इसका कोई इमकान नहीं था के अहले दुनिया आपसे किसी क़ीमत पर राज़ी हो जाते और यही वजह है के पहले अबनाए दुनिया ने तीन खि़लाफ़तों के मौक़े पर अपनी बेज़ारी का इज़हार किया और उसके बाद तीन जंगों के मौक़े पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया लेकिन आप किसी क़ीमत पर दुनिया से सुलह करने पर आमादा न हुए और हर मरहले पर दीने इलाही और उसके तालीमात को कलेजे से लगाए रहे।)))

77- एक मर्दे शामी ने सवाल किया के क्या हमारा शाम की तरफ़ जाना क़ज़ा व क़द्रे इलाही की बिना पर था (अगर ऐसा था तो गोया कोई अज्र व सवाब न होगा) तो आपने फ़रमाया के ‘‘शायद तेरा ख़याल यह है के इससे मुराद क़ज़ाए लाज़िम और क़द्रे हतमी है के जिसके बाद अज़ाब व सवाब बेकार हो जाता है और वादा व वईद का निज़ाम मोअत्तल हो जाता है, ऐसा हरगिज़ नहीं है, परवरदिगार ने अपने बन्दों को हुक्म दिया है तो उनके इख़्तेयार के साथ और नहीं की है तो उन्हें डराते हुए। उसने आसान सी तकलीफ़ दी है और किसी ज़हमत में मुब्तिला नहीं किया है। थोड़े अमल पर बहुत सा अज्र दिया है और उसकी नाफ़रमानी इसलिये नहीं होती है के वह मग़लूब हो गया है और न इताअत इसलिये होती है के उसने मजबूर कर दिया है। उसने न अम्बिया को खेल करने के लिये भेजाा है और न किताब को अबस नाज़िल किया है और न ज़मीन व आसमान पर उनकी दरम्यानी मख़लूक़ात को बेकार पैदा किया है। यह सिर्फ़ काफ़िरों का ख़याल है और काफ़िरों के लिये जहन्नम में वील है।’’ (आखि़र में वज़ाहत फ़रमाई के क़ज़ा अम्र के मानी में है और हम उसके हुक्म से गए थे न के जब्र व इकराह से)  

78- हर्फ़े हिकमत जहां भी मिल जाए ले लो के ऐसी बात अगर मुनाफ़िक़ के सीने में दबी होती है तो वह उस वक़्त तक बेचैन रहता है जब तक वह निकल न जाए और मोमिन के सीने में जाकर दूसरी हिकमतों से मिलकर बहल जाती है।

79- हिकमत मोमिन की गुमशुदा दौलत है लेहाज़ा जहाँ मिले ले लेना चाहिये, चाहे वह हक़ाएक़ से ही क्यों न हासिल हो।

80- हर इन्सान की क़द्र व क़ीमत वही नेकियां हैं जो उसमें पाई जाती हैं।

सय्यद रज़ी-यह वह कलमए क़ुम्मिया है जिसकी कोई क़ीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसके हमपल्ला कोई दूसरी हिकमत भी नहीं है और कोई कलम इसके हम पाया भी नहीं हो सकता है। 

((( यह अमीरूल मोमेनीन (अ0) का फ़लसफ़ाए हयात है के इन्सान की क़द्र व क़ीमत का ताअय्युन न उसके हसब व नसब से होता है और न क़ौम व क़बीले से, न डिग्रियाँ उसके मरतबे को बढ़ा सकती हैं और न ख़ज़ाने उसको शरीफ़ बना सकते हैं, न कुर्सी उसके मेयार को बलन्द कर सकती हैं और न इक़्तेदार उसके कमालात का ताअय्युन कर सकता है, इन्सानी कमाल का मेयार सिर्फ़ वह कमाल है जो उसके अन्दर पाया जाता है। अगर उसके नफ़्स में पाकीज़गी और किरदार में हुस्न है तो यक़ीनन अज़ीम मरतबे का हामिल है वरना उसकी कोई क़द्र व क़ीमत नहीं है।)))

81- मैं तुम्हें ऐसी पांच बातों की नसीहत कर रहा हूँ के जिनके हुसूल के लिये ऊंटों को एड़ लगाकर दौड़ाया जाए तो भी वह उसकी अहल हैं।

ख़बरदार! तुममें से कोई शख़्स अल्लाह के अलावा किसी से उम्मीद न रखे और अपने गुनाहों के अलावा किसी से न डरे और जब किसी चीज़ के बारे में सवाल किया जाए और न जानता हो तो लाइल्मी के एतराफ़ में न शरमाए और जब नहीं जानता है तो सीखने में न शरमाए और सब्र व ‘िाकेबाई इख़्तेयार करे के सब्र ईमान के लिये वैसा ही है जैसा बदन के लिये सर और ज़ाहिर है के उस बदन में कोई ख़ैर नहीं होता है जिसमें सर न हो।

(((सब्र इन्सानी ज़िन्दगी का वह जौहर है जिसकी वाक़ेई अज़मत का इदराक भी मुश्किल है। तारीख़े बशरीयत में उसके मज़ाहिर का हर क़दम पर मुशाहेदा किया जा सकता है। हज़रत आदम (अ0) जन्नत में थे, परवरदिगार ने हर तरह का आराम दे रखा था, सिर्फ एक दरख़्त से रोक दिया था लेकिन उन्होंने मुकम्मल क़ूवते सब्र का मुज़ाहिरा न किया जिसका नतीजा यह हुआ के जन्नत से बाहर आ गए और लम्हों में ‘‘ग़ुलामी’’ से ‘‘शाही’’ का फासला तय कर लिया।
सब्र और जन्न्नत के इसी रिश्ते की तरफ़ क़ुरआने मजीद ने सूरए दहर में इशारा किया है ‘‘जज़ाहुम बेमा सबरू जन्नतंव व हरीरन’’ अल्लाह ने उनके सब्र के बदले में उन्हें जन्नत और हरीरे जन्नत से नवाज़ दिया। )))

82- आपने उस शख़्स से फ़रमाया जो आपका अक़ीदतमन्द तो न था लेकिन आपकी बेहद तारीफ़ कर रहा था ‘‘मैं तुम्हारे बयान से कमतर हूँ लेकिन तुम्हारे ख़याल से बालातर हूँ’’ (यानी जो तुमने मेरे बारे में कहा है वह मुबालेग़ा है लेकिन जो मेरे बारे में अक़ीदा रखते हो वह मेरी हैसियत से बहुत कम है)

(((यही वजह है के रसूले अकरम (स0) के बाद मौलाए कायनात के अलावा जिसने भी ‘‘सलूनी’’ का दावा किया उसे ज़िल्लत से दो-चार होना पड़ा और सारी इज़्ज़त ख़ाक में मिल गई।)))

83- तलवार के बचे हुए लोग ज़्यादा बाक़ी रहते हैं और उनकी औलाद भी ज़्यादा होती है।

84-जिसने नावाक़फ़ीयत का इक़रार छोड़ दिया वह कहीं न कहीं ज़रूर मारा जाएगा।

85- बूढ़े की राय, जवान की हिम्मत से ज़्यादा महबूब होती है, या बूढ़े की राय जवान के ख़तरेे में डटे रहने से ज्यादा पसन्दीदा होती है।

(((इसमें कोई शक नहीं है के ज़िन्दगी के हर मरहलए अमल पर जवान की हिम्मत ही काम आती है काश्तकारी, सनअतकारी से लेकर मुल्की दिफ़ाअ तक सारा काम जवान ही अन्जाम देते हैं और चमनाते ज़िन्दगी की सारी बहार जवानों की हिम्म्मत ही से वाबस्ता है लेकिन इसके बावजूद निशाते अमल के लिये सही ख़ुतूत का तअय्युन बहरहाल ज़रूरी है और यह काम बुज़ुर्ग लोगों के तजुर्बात ही से अन्जाम पा सकता है, लेहाज़ा बुनियाद हैसियत बुज़ुर्गों के तजुर्बात की है और सानवी हैसियत नौजवानों की हिम्मते मर्दाना की है, अगरचे ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिये यह दोनों पहिये ज़रूरी हैं।)))

86- मुझे उस शख़्स के हाल पर ताज्जुब होता है जो अस्तग़फ़ार की ताक़त रखता है और फ़िर भी रहमते ख़ुदा से मायूस हो जाता है।

87- इमाम मोहम्मद बाक़र (अ0) ने आपका यह इरशादे गिरामी नक़्ल किया है के ‘‘रूए ज़मीन पपर अज़ाबे इलाही से बचाने के दो ज़राए थे, एक को परवरदिगार ने उठा लिया है (पैग़म्बरे इस्लाम स0) लेहाज़ा दूसरे से तमस्सुक इख़्तेयार करो। यानी अस्तग़फ़ार- के मालिके कायनात ने फ़रमाया है के ‘‘ख़ुदा उस वक़्त तक उन पर अज़ाब नहीं कर सकता है जब तक आप मौजूद हैं, और उस वक़्त तक अज़ाब करने वाला नहीं है जब तक यह अस्तग़फ़ार कर रहे हैं’’
सय्यद रज़ी- यह आयते करीमा से बेहतरीन इसतेख़राज और लतीफ़तरीन इस्तनबात है।

88- जिसने अपने और अल्लाह के दरम्यान के मामलात की इस्लाह कर ली, अल्लाह उसके और लोगों के दरम्यान के मामलात की इस्लाह कर देगा और जो आख़ेरत के उमूर की इस्लाह कर लेगा अल्लाह उसकी दुनिया के उमूर की इस्लाह कर देगा। और जो अपने नफ़्स को नसीहत करेगा अल्लाह उसकी हिफ़ाज़त का इन्तेज़ाम कर देगा।

(((उमूरे आख़ेरत की इस्लाह का दायरा सिर्फ़ इबादात व रियाज़ात में महदूद नहीं है बल्कि इसमें ववह तमाम उमूरे दुनिया शामिल हैं जो आखि़रत के लिये अन्जाम दिये जाते हैं के दुनिया आख़ेरत की खेती है और आख़ेरत की इस्लाह दुनिया की इस्लाह के बग़ैर मुमकिन नहीं है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह होता है के आख़ेरत वाले दुनिया को बराए आखि़रत इख़्तेयार करते हैं और दुनियादार इसी को अपना हदफ़ और मक़सद क़रार दे लेते हैं और इस तरह आखि़रत से यकसर ग़ाफ़िल हो जाते हैं।))) 

89- मुकम्मल आलिमे दीन वही है जो लोगों को रहमते ख़ुदा से मायूस न बनाए और उसकी मेहरबानियों से ना उम्मीद न करे और उसके अज़ाब की तरफ़ मुतमईन न बना दे।

90- यह दिल उसी तरह उकता जाते हैं जिस तरह बदन उकता जाते हैं लेहाज़ा उनके लिये नई-नई लतीफ़ हिकमतें तलाश करो।

91- सबसे हक़ीर इल्म वह है जो सिर्फ़ ज़बान पर रह जाए और सबसे ज़्यादा क़ीमती इल्म वह है जिसका इज़हार आज़ा व जवारेह से हो जाए।

(((अफ़सोस के दौरे हाज़िर में इल्म का चर्चा सिर्फ़ ज़बानों पर रह गया है और क़ूवते गोयाई ही को कमाले इल्म को तसव्वुर कर लिया गया है और इसका नतीजा यह है के अमल व किरदार का फ़िकदान होता जा रहा है और अवामुन्नास अपनी ज़ाती जेहालत से ज़्यादा दानिशवरों की दानिशवरी और अहले इल्म के इल्म की बदौलत तबाह व बरबाद हो रहे हैं।)))

92- ख़बरदार, तुममें से कोई शख़्स यह न कहे के ख़ुदाया मैं फ़ित्ने से तेरी पनाह मांगता हूँ। के कोई शख़्स भी फ़ित्ने से अलग नहीं हो सकता है। अगर पनाह मांगना है तो फ़ित्नों की गुमराहियों से पनाह मांगो इसलिये के परवरदिगार ने अमवाल और औलाद को भी फ़ित्ना क़रार दिया है और इसके मानी यह हैं के अमवाल और औलाद के ज़रिये इम्तेहान लेना चाहता है ताके इस तरह रोज़ी से नाराज़ होने वाला क़िस्मत पर राज़ी रहने वाले से अलग हो जाए जबके वह उनके बारे में ख़ुद उनसे बहेतर जानता है लेकिन चाहता है के इन आमाल का इज़हार हो जाए जिनसे इन्सान सवाब या अज़ाब का हक़दार होता है के बाज़ लोग लड़का चाहते हैं लड़की नहीं चाहते हैं और बाज़ माल के बढ़ाने को दोस्त रखते हैं और शिकस्ताहाली को बुरा समझते हैं।

सय्यद रज़ी - यह वह नादिर बात है जांे आयत ‘‘इन्नमा अमवालोकुम’’ की तफ़सीर में आपसे नक़्ल की गई है।

(((यह उस आयते करीमा की तरफ़ इशारा है के परवरदिगार सिर्फ़ मुत्तक़ीन के आमाल को क़ुबूल करता है, और उसका मक़सद यह है के अगर इन्सान तक़वा के बग़ैर आमाल अन्जाम दे तो आमाल देखने में बहुत नज़र आएंगे लेकिन वाक़ेअन कसीर कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं। और इसके बरखि़लाफ़ अगर तक़वा के साथ अमल अन्जाम दे तो देखने में शायद वह अमल क़लील दिखाई दे लेकिन वाक़ेएन क़लील न होगा के दरजए क़ुबूलियत पर फ़ाएज़ हो जाने वाला अमल किसी क़ीमत पर क़लील नहीं कहा जा सकता है।)))

93-आपसे ख़ैर के बारे में सवाल किया गया? तो फ़रमाया के ख़ैर, माल और औलाद की कसरत नहीं है, ख़ैर इल्म की कसरत और हिल्म की अज़मत है और यह है के लोगों पर इबादते परवरदिगार से नाज़ करो, लेहाज़ा अगर नेक काम करो तो अल्लाह का शुक्र बजा लाओ और बुरा काम करो तो अस्तग़फ़ार करो, और याद रखो के दुनिया में ख़ैर सिर्फ़ दो तरह के लोगों के लिये है, वह इन्सान जो गुनाह करे तो तौबा से उसकी तलाफ़ी कर ले और वह इन्सान जो नेकियों में आगे बढ़ता जाए।

94- तक़वा के साथ कोई अमल क़लील नहीं कहा जा सकता है, के जो अमल भी क़ुबूल हो जाए उसे क़लील किस तरह कहा जा सकता है।

(((यह उस आयते करीमा की तरफ़ इशारा है के परवरदिगार सिर्फ़ मुत्तक़ीन के आमाल को क़ुबूल करता है, और इसका मक़सद यह है के अगर इन्सान तक़वा के बग़ैर आमाल अन्जाम दे तो यह आमाल देखने में बहुत नज़र आएंगे लेकिन वाक़ेअन कसीर कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं, और इसके बरखि़लाफ़ अगर तक़वा के साथ अमल अन्जाम दे तो देखने में शायद वह अमल क़लील दिखाई दे लेकिन वाक़ेअन क़लील न होगा के दरजए क़ुबूलियत पर फ़ाएज़ हो जाने वाला अमल किसी क़ीमत पर क़लील नहीं कहा जा सकता है।)))

95- लोगों में अम्बिया से सबसे ज़्यादा क़रीब वह लोग होते हैं जो सबसे ज़्यादा उनके तालीमात से बाख़बर हों, यह कहकर आपने आयत शरीफ़ की तिलावत फ़रमाई ‘‘इब्राहीम (अ0) से क़रीबतर वह लोग हैं जो उनकी पैरवी करें, और यह पैग़म्बर (स0) है और साहेबाने ईमान हैं।’’ इसके बाद फ़रमाया के पैग़म्बर (स0) का दोस्त वही है जो उनकी इताअत करे, चाहे नसब के एतबार से किसी क़द्र दूर क्यों न हो और आपका दुश्मन वही है जो आपकी नाफ़रमानी करे चाहे क़राबत के ऐतबार से कितना ही क़रीब क्यों न हो।’’ 

96- आपने सुना के ख़ारेजी शख़्स नमाज़े शब पढ़ रहा है और तिलावते क़ुरान कर रहा है तो फ़रमाया के यक़ीन के साथ सो जाना शक के साथ नमाज़ पढ़ने से बेहतर है।

(((यह इस्लाहे अक़ीदा की तरफ़ इशारा है के जिस शख़्स को हक़ाएक़ का यक़ीन नहीं है और वह शक की ज़िन्दगी गुज़ार रहा है उसके आमाल की क़द्र व क़ीमत ही क्या है, आमाल की क़द्र व क़ीमत का ताअय्युन इन्सान के इल्म व यक़ीन और उसकी मारेफ़त से होता है, लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है के जितने अहले यक़ीन हैं सबको सो जाना चाहिये और नमाज़े शब का पाबन्द नहीं होना चाहिये के यक़ीन की नीन्द शक के अमल से बेहतर है।
ऐसा मुमकिन होता तो सबसे पहले मासूमीन (अ0) इन आमाल को नज़रअन्दाज़ कर देते जिनके यक़ीन की शान यह थी के अगर परदे उठा दिये जाते जब भी यक़ीन में इज़ाफ़े की गुन्जाइश नहीं थी।)))

97- जब किसी ख़बर को सुनो तो अक़्ल के मेयार पर परख लो और सिर्फ़ नक़्ल पर भरोसा न करो के इल्म के नक़्ल करने वाले बहुत होते हैं और समझने वाले बहुत कम होते हैं।

(((आलमे इस्लाम की एक कमज़ोरी यह भी है के मुसलमान रिवायात के मज़ामीन से यकसर ग़ाफ़िल है और सिर्फ़ रावियों के एतमाद पर रिवायात पर अमल कर रहा है जबके बेशुमार रिवायात के मज़ामीन खि़लाफ़े अक़्ल व मन्तिक़ और मुख़ालिफ़े उसूल व अक़ाएद हैं औश्र मुसलमान को इस गुमराही का एहसास भी नहीं है।)))

98- आपने एक शख़्स को कलमा इन्ना लिल्लाह ज़बान पर जारी करते हुए सुना तो फ़रमाया के इन्नालिल्लाह इक़रार है के हम किसी की मिल्कियत हैं और इन्नल्लाहा राजेऊन एतराफ़ है के एक दिन फ़ना हो जाने वाले हैं।

99- एक क़ौम ने आपके सामने आपकी तारीफ़ कर दी तो आपने दुआ के लिये हाथ उठा दिये, ख़ुदाया तू मुझे मुझसे बेहतर जानता है और मैं अपने को इनसे बेहतर पहचानता हूँ लेहाज़ा मुझे इनके ख़याल से बेहतर क़रार दे देना और यह जिन कोताहियों को नहीं जानते हैं उन्हें माफ़ कर देना।

(((ऐ काश हर इन्सान इस किरदार को अपना लेता और तारीफ़ों से धोका खाने के बजाए अपने उमूर की इस्लाह की फ़िक्र करता और मालिक की बारगाह में इसी तरह अर्ज़ मुद्दआ करता जिस तरह मौलाए कायनात ने सिखाया है मगर अफ़सोस के ऐसा कुछ नहीं है और जेहालत इस मन्ज़िल पर आ गई है के साहेबाने इल्म अवामुन्नास की तारीफ़ से धोका खा जाते हैं और अपने को बाकमाल तसव्वुर करने लगते हैं जिसका मुशाहेदा ख़ोतबा की ज़िन्दगी में भी हो सकता है और शोअरा की महफ़िलों में भी जहां इज़हारे इल्म करने वाले बाकमाल होते हैं और तारीफ़ करने वालों की अकसरीयत उनके मुक़ाबले में बेकमाल, मगर इसके बाद भी इन्सान तारीफ़ से ख़ुश होता है और मग़रूर हो जाता है।)))

100- हाजत रवाई तीन चीज़ों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होती है  1. अमल को छोटा समझे ताके वह बड़ा क़रार पा जाए 2. उसे पोशीदा तौर पर अन्जाम दे ताके वह ख़ुद अपना इज़हार करे 3. उसे जल्दी पूरा कर दे ताके ख़ुशगवार मालूम हो। 

(((ज़ाहिर है के हाजत बरआरी का अमल जल्द हो जाता है तो इन्सान को बेपनाह मसर्रत होती है वरना इसके बाद काम तो हो जाता है लेकिन मसर्रत का फ़िक़दान रहता है और वह रूहानी इम्बेसात हासिल नहीं होता है जो मुद्दआ पेश करने के फ़ौरन बाद पूरा हो जाने में हासिल होता है)))

101- लोगों पर एक ज़माना आने वाला है जब सिर्फ़ लोगों के उयूब बयान करने वाला मुक़र्रबे बारगाह हुआ करेगा और सिर्फ़ फ़ाजिर को ख़ुश मिज़ाज समझा जाएगा और सिर्फ़ मुन्सिफ़ को कमज़ोर क़रार दिया जाएगा, लोग सदक़े को ख़सारा, सिलए रहम को एहसान और इबादत को लोगों पर बरतरी का ज़रिया क़रारे देंगे, ऐसे वक़्त में हुकूमत औरतों के मशविरे, बच्चों के इक़्तेदार और ख़्वाजा सराओं की तदबीर के सहारे रह जाएगी।

(((अफ़सोस के अहले दुनिया ने इस इबादत को भी अपनी बरतरी का ज़रिया बना लिया है जिसकी तशरीह इन्सान के ख़ुज़ूअ व ख़ुशूअ और जज़्बए बन्दगी के इज़हार के लिये हुई थी और जिसका मक़सद यह था के इन्सान की ज़िन्दगी से ग़ुरूर और शैतनत निकल जाए और तवाज़ोअ व इन्केसार उस पर मुसल्लत हो जाए।)))

(((बज़ाहिर किसी दौर में भी ख़्वाजा सराओं को मुशीरे ममलेकत की हैसियत हासिल नहीं रही है और न उनके किसी मख़सूस तदब्बुर की निशानदेही की गई है, इसलिये बहुत मुमकिन है के इस लफ़्ज़ से मुराद वह तमाम अफ़राद हों जिनमें इन लोगों की ख़सलतें पाई जाती हैं और जो हुक्काम की हर हाँ में हाँ मिला देते हैं और उनकी हर रग़बत व ख़्वाहिश के सामने सरे तस्लीम ख़म कर देते हैं और उन्हें ज़िन्दगी के अन्दर व बाहर हर शोबे में बराबर का दख़ल रहता है।)))

102-लोगों ने आपकी चादर को बोसीदा देखकर गुज़ारिश कर दी तो आपने फ़रमाया के इससे दिल में ख़ुशू और नफ़्स में एहसासे कमतरी पैदा होता है और मोमेनीन इसकी इक़्तेदा भी कर सकते हैं, याद रखो दुनिया और आख़ेरत आपस में दो नासाज़गार दुश्मन हैं और दो मुख़्तलिफ़ रास्ते, लेहाज़ा जो दुनिया से मोहब्बत और ताल्लुक़ ख़ातिर रखता है वह आख़ेरत का दुश्मन हो जाता है और जो राहेरौ एक से क़रीबतर होता है वह दूसरे से दूरतर हो जाता है, फिर यह दोनों आपस में एक-दूसरे की सौत जैसी हैं।

103- नौफ़ बकाली कहते हैं के मैंने एक शब अमीरूल मोमेनीन (अ0) को देखा के आपने बिस्तर से उठकर सितारों पर निगाह की और फ़रमाया के नौफ़! सो रहे हो या बेदार हो? मैंने अर्ज़ की के हुज़ूर जाग रहा हूँ, फ़रमाया के नौफ़! ख़ुशाबहाल इनके जो दुनिया से किनाराकश हों तो आख़ेरत की तरफ़ रग़बत रखते हों, यही वह लोग हैं जिन्होंने ज़मीन को बिस्तर बनाया है और ख़ाक को फ़र्श, पानी को शर्बत क़रार दिया है और क़ुरान व दुआ को अपने ज़ाहिर व बातिन का मुहाफ़िज़, इसके बाद दुनिया से यूँ अलग हो गए जिस तरह हज़रत मसीह (अ0)।

((( इस मक़ाम पर लफ़्जे़ क़र्ज़ इशारा है के निहायत मुख़्तसर हिस्सा हासिल किया है जिस तरह दांत से रोटी काट ली जाती है और सारी रोटी को मुंह में नहीं भर लिया जाता है के इस कैफ़ियत को ख़ज़म कहते हैं, क़र्ज़ नहीं कहते हैं)))

नौफ़! देखो दाऊद (अ0) रात के वक़्त ऐसे ही मौक़े पर क़याम किया करते थे और फ़रमाते थे के यह वह साअत है जिसमें जो बन्दा भी दुआ करता है परवरदिगार उसकी दुआ को क़ुबूल कर लेता है, मगर यह के सरकारी टैक्स वसूल करने वाला, लोगों की बुराई करने वाला, ज़ालिम हुकूमत की पोलिस वाला या सारंगी और ढोल ताशे वाला हो।

सय्यद रज़ी - इरतेबत ः सारंगी को कहते हैं और कोबत के मानी ढोल के हैं और बाज़ हज़रात के नज़दीक इरतबा ढोल है और कोबा सारंगी।

((( अफ़सोस की बात है के बाज़ अलातों में बाज़ मोमिन अक़वाम की पहचान ही ढोल ताशा और सारंगी बन गई है जबके मौलाए कायनात (अ) ने इस कारोबार को इस क़द्र मज़मूम क़रार दिया है के इस अमल के अन्जाम देने वालों की दुआ भी क़ुबूल नहीं होती है। इस हिकमत में दीगर अफ़राद का तज़किरा ज़ालिमों के ज़ैल में किया गया है और खुली हुई बात है के ज़ालिम हुकूमत के लिये किसी तरह का काम करने वाला पेशे परवरदिगार मुस्तजाबुद् दावात नहीं हो सकता है, जब वह अपने ज़रूरियाते हयात को ज़ालिमों की अआनत से वाबस्ता कर देता है तो परवरदिगार अपना करम उठा लेता है।)))

104-परवरदिगार ने तुम्हारे ज़िम्मे कुछ फ़राएज़ क़रार दिये हैं लेहाज़ा ख़बरदार उन्हें ज़ाया न करना और उसने कुछ हुदूद भी मुक़र्रर कर दिये हैं लेहाज़ा उनसे तजावुज़ न करना। उसने जिन चीज़ों से मना किया है उनकी खि़लाफ़वर्ज़ी न करना और जिन चीज़ों से सुकूत इख़्तेयार फ़रमाया है ज़बरदस्ती उन्हें जानने की कोशिश न करना के वह भूला नहीं है।

105-जब भी लोग दुनिया संवारने के लिये दीन की किसी बात को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं तो परवरदिगार उससे ज़्यादा नुक़सानदेह रास्ते खोल देता है।

106- बहुत से आलिम हैं जिन्हें दीन से नावाक़फ़ीयत ने मार डाला है और फ़िर उनके इल्म ने भी कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाया है।

(((यह दानिश्वराने मिल्लत हैं जिनके पास डिग्रियों का ग़ुरूर तो है लेकिन दीन की बसीरत नहीं है, ज़ाहिर है के ऐसे अफ़राद का इल्म तबाह कर सकता है आबाद नहीं कर सकता है)))

107- इस इन्सान के वजूद में सबसे ज़्यादा ताज्जुबख़ेज़ वह गोश्त का टुकड़ा है जो एक रग से आवेज़ां कर दिया गया है और जिसका नाम क़ल्ब है के इसमें हिकमत के सरचश्मे भी हैं और इसकी ज़िदें भी हैं के जब उसे उम्मीद की झलक नज़र आती है तो तमअ ज़लील बना देती है और जब तमअ में हैजान पैदा होता है तो हिरस बरबाद कर देती है 

(((इन्सानी क़ल्ब को दो तरह की सलाहियतों से नवाज़ा गया है, इसमें एक पहलू अक़्ल व मन्तिक़ का है और दूसरा जज़्बात व अवातिफ़ का, इस इरशादे गिरामी में दो पहलू की तरफ़ इशारा किया गया है और इसके मुतज़ाद ख़ुसूसियात की तफ़सील बयान की गई है।)))

और जब मायूसी का क़ब्ज़ा हो जाता है तो हसरत मार डालती है और जब ग़ज़ब तारी होता है तो ग़म व ग़ुस्सा शिद्दत इख़्तेयार कर लेता है और जब ख़ुशहाल हो जाता है तो हिफ़्ज़ मा तक़द्दुम को भूल जाता है और जब ख़ौफ़ तारी होता है तो एहतियात दूसरी चीज़ों से ग़ाफ़िल कर देती है और जब हालात में वुसअत पैदा होती है तो ग़फ़लत क़ब्ज़ा कर लेती है, और जब माल हासिल कर लेता है तो बेनियाज़ी सरकश बना देती है और जब कोई मुसीबत नाज़िल हो जाती है तो फ़रयाद रूसवा कर देती है और जब फ़ाक़ा काट खाता है तो बलाए गिरफ़्तार कर लेती है और जब भूक थका देती है तो कमज़ोरी बिठा देती है और जब ज़रूरत से ज़्यादा पेट भर जाता है तो शिकमपुरी की अज़ीयत में मुब्तिला हो जाता है, मुख़्तसर यह है के हर कोताही नुक़सानदेह होती है और हर ज़्यादती तबाहकुन।
108-हम अहलेबैत (अ0) वह नुक़्तए एतदाल हैं जिनसे पीछे रह जाने वाला आगे बढ़कर उनसे मिल जाता है और आगे बढ़ जाने वाला पलट कर मुलहक़ हो जाता है।

(((शेख़ मोहम्मद अब्दहू ने इस फ़िक़रे की यह तशरीह की है के अहलेबैत अलै0 इस मसनद से मुशाबेहत रखते हैं जिसके सहारे इन्सान की पुश्त मज़बूत होती है और उसे सुकूने ज़िन्दगी हासिल होता है, वसता के लफ़्ज़ से इस अम्र की तरफ़ इशारा किया गया है के तमाम मसनदें इसी से इत्तेसाल रखती हैं और सबका सहारा वही है, अहलेबैत (अ0) उस सिराते मुस्तक़ीम पर हैं जिनसे आगे बढ़ जाने वालों को भी उनसे मिलना पड़ता है और पीछे रह जाने वालों को भी। )))

109- हुक्मे इलाही का निफ़ाज़ वही कर सकता है जो हक़ के मामले में मुरव्वत न करता हो और आजिज़ी व कमज़ोरी का इज़हार न करता हो और लालच के पीछे न दौड़ता हो।

110-जब सिफ़्फ़ीन से वापसी पर सहल बिन हनीफ़ अन्सारी का कूफ़े में इन्तेक़ाल हो गया जो हज़रत के महबूब सहाबी थे तो आपने फ़रमाया के ‘‘मुझसे कोई पहाड़ भी मोहब्बत करेगा तो टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। मक़सद यह है के मेरी मोहब्बत की आज़माइश सख़्त है और इसमें मसाएब की यूरिश हो जाती है जो शरफ़ सिर्फ़ मुत्तक़ी और नेक किरदार लोगों को हासिल होता है जैसा के आपने दूसरे मौक़े पर इरशाद फ़रमाया है।

111-जो हम अहलेबैत (अ0) से मोहब्बत करे उसे जामाए फ़क्ऱ पहनने के लिये तैयार हो जाना चाहिये। 

सय्यद रज़ी- ‘‘बाज़ हज़रात ने इस इरशाद की एक दूसरी तफ़सीर की है जिसके बयान का यह मौक़ा नहीं है’’

(((मक़सद यह है के अहलेबैत (अ0) का कुल सरमायाए हयात दीन व मज़हब और हक़ व हक़्क़ानियत है और उसके बरदाश्त करने वाले हमेशा कम होते हैं लेहाज़ा इस राह पर चलने वालों को हमेशा मसाएब का सामना करना पड़ता है और इसके लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये।)))

112- अक़्ल से ज़्यादा फ़ायदेमन्द कोई दौलत नहीं है और ख़ुदपसन्दी से ज़्यादा वहशतनाक कोई तन्हाई नहीं है, तदबीर जैसी कोई अक़्ल नहीं है और तक़वा जैसी कोई बुज़ुर्गी नहीं है हुस्ने एख़लाक़ जैसा कोई साथी नहीं है और अदब जैसी कोई मीरास नहीं है, तौफ़ीक़ जैसा कोई पेशरौ नहीं है और अमले स्वालेह जैसी कोइ तिजारत नहीं है, सवाब जैसा कोई फ़ायदा नहीं है और शहादत में एहतियात जैसी कोई परहेज़गारी नहीं है, हराम की तरफ़ से बेरग़बती जैसा कोई ज़ोहद नहीं है और तफ़क्कुर जैसा कोई इल्म नहीं है और अदाए फ़राएज़ जैसी कोई इबादत नहीं है और हया व सब्र जैसा कोई ईमान नहीं है, तवाज़ोह जैसा कोई हसब नहीं है और इल्म जैसा कोई शरफ़ नहीं है, हिल्म जैसी कोई इज्ज़त नहीं है और मशविरे से ज़्यादा मज़बूत कोई पुश्त पनाह नहीं है।

113- जब ज़माना और अहले ज़माना पर नेकियों का ग़लबा हो और कोई शख़्स किसी शख़्स से कोई बुराई देखे बग़ैर बदज़नी पैदा करे तो उसने उस शख़्स पर ज़ुल्म किया है और जब ज़माना और अहले ज़माना पर फ़साद का ग़लबा हो और कोई शख़्स किसी से हुस्ने ज़न क़ायम करे तो गोया उसने अपने ही को धोका दिया है।

114-एक शख़्स ने आपसे मिज़ाजपुरसी कर ली तो फ़रमाया के इसका हाल क्या होगा जिसकी बक़ा ही फ़ना की तरफ़ ले जा रही है और सेहत ही बीमारी का पेशख़ेमा है और वह अपनी पनाहगाह से एक दिन गिरफ़्त में ले लिया जाएगा।

115- कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें नेकियां देकर गिरफ़्त में लिया जाता है और वह पर्दापोशी ही से धोके में रहते हैं और अपने बारे में अच्छी बात सुनकर धोका खा जाते हैं और देखो अल्लाह ने मोहलत से बेहतर कोई आज़माइश का ज़रिया नहीं क़रार दिया है।

116- मेरे बारे में दो तरह के लोग हलाक हो गए हैं- वह दोस्त जो दोस्ती में ग़ुलू से काम लेते हैं और वह दुश्मन जो दुश्मनी में मुबालेग़ा करते हैं।

117- फ़ुरसत का सानेअ कर देन रन्ज व अन्दोह का बाएस होता है। ((((((इन्सानी ज़िन्दगी में ऐसे मक़ामात बहुत कम आते हैं जब किसी काम का मुनासिब मौक़ा हाथ आ जाता है लेहाज़ा इन्सान का फ़र्ज़ है के इस मौक़े से फ़ायदा उठा ले और उसे ज़ाया न होने दे के फ़ुर्सत का निकल जाना इन्तेहाई रन्ज व अन्दोह का बाएस हो जाता है)))

118- दुनिया की मिसाल सांप जैसी है जो छूने में इन्तेहाई नर्म होता है और इसके अन्दर ज़हरे क़ातिल होता है। फ़रेब ख़ोरदा जाहिल इसकी तरफ़ माएल हो जाता है और साहेबे अक़्ल व होश इससे होशियार रहता है। (((अक़्ल का काम यह है के वह अशया के बातिन पर निगाह रखे और सिर्फ़ ज़ाहिर के फ़रेब में न आए वरना सांप का ज़ाहिर भी इन्तेहाई नर्म व नाज़ुक होता है जबके उसके अन्दर का ज़हर इन्तेहाई क़ातिल और तबाहकुन होता है)))

119- आपसे क़ुरैश के बारे में दरयाफ़्त किया गया तो आपने फ़रमाया के बनी मख़ज़ूम क़ुरैश का महकता हुआ फ़ूल हैं, उनसे गुफ़्तगू भी अच्छी लगती है और उनकी औरतों से रिश्तेदारी भी महबूब है और बनी अब्द शम्स बहुत दूर तक सोचने वाले और अपने पीछे की बातों की रोक थाम करने वाले हैं। लेकिन हम बनी हाशिम अपने हाथ की दौलत के लुटाने और मौत के मैदान में जान देने वाले हैं, वह लोग अदद में ज़्यादा मक्रो फ़रेब में आगे और बदसूरत हैं और हम लोग फ़सीह व बलीग़, मुख़लिस और रौशन चेहरा हैं।

120-इन दो तरह के आमाल में किस क़द्र फ़ासला पाया जाता है, वह अमल जिसकी लज़्ज़त ख़त्म हो जाए और उसका वबाल बाक़ी रह जाए और वह अमल जिसकी ज़हमत ख़त्म हो जाए और अज्र बाक़ी रह जाए। (((दुनिया व आखि़रत के आमाल का बुनियादी फ़र्क़ यही है के दुनिया के आमाल की लज़्ज़त ख़त्म हो जाती है और आखि़रत में इसका हिसाब बाक़ी रह जाता है और आख़ेरत के आमाल की ज़हमत ख़त्म हो जाती है और इसका अज्र व सवाब बाक़ी रह जाता है)))

121-आपने एक जनाज़े में शिरकत फ़रमाई और एक शख़्स को हंसते हुए देख लिया तो फ़रमाया ‘‘ऐसा मालूम होता है के मौत किसी और के लिये लिखी गई है और यह हक़ किसी दूसरे पर लाज़िम क़रार दिया गया है और गोया के जिन मरने वालों को हम देख रहे हैं वह ऐसे मुसाफ़िर हैं जो अनक़रीब वापस आने वाले हैं के इधर हम उन्हें ठिकाने लगाते हैं और उधर उनका तरका खाने लगते हैं जैसे हम हमेशा रहने वाले हैं, इसके बाद हमने हर नसीहत करने वाले मर्द और औरत को भुला दिया है और हर आफ़त व मुसीबत का निशाना बन गए हैं।’’ (((इन्सान की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है के वह किसी मरहले पर इबरत हासिल करने के लिये तैयार नहीं होता है और हर मन्ज़िल पर इस क़द्र ग़ाफ़िल हो जाता है जैसे न इसके पास देखने वाली आंख है और न समझने वाली अक़्ल, वरना इसके मानी क्या हैं के आगे-आगे जनाज़ा जा रहा है और पीछे लोग हंसी मज़ाक़ कर रहे हैं या सामने मय्यत को क़ब्र में उतारा जा रहा है और हाज़िरीने कराम दुनिया के सियासी मसाएल हल कर रहे हैं, यह सूरते हाल इस बात की अलामत है के इन्सान बिल्कुल ग़ाफ़िल हो चुका है और उसे किसी तरह का होश नहीं रह गया है।)))

122-ख़ुशाबहाल उसका जिसने अपने अन्दर तवाज़ोह की अदा पैदा की, अपने कस्ब को पाकीज़ा बना लिया, अपने बातिन को नेक कर लिया, अपने एख़लाक़ को हसीन बना लिया, अपने माल के ज़्यादा हिस्से को राहे ख़ुदा में ख़र्च कर दिया और अपनी ज़बानदराज़ी पर क़ाबू पा लिया। अपने शर को लोगों से दूर रखा और सुन्नत को अपनी ज़िन्दगी में जगह दी और बिदअत से कोई निस्बत नहीं रखी। सय्यद रज़ी- बाज़ लोगों ने इस कलाम को रसूले अकरम (स0) के हवाले से भी बयान किया है जिस तरह के इससे पहले वाला कलामे हिकमत है।

123- औरत का ग़ैरत करना कुफ्ऱ है और मर्द का ग़ुयूर होना ऐने ईमान है। (((इस्लाम ने अपने मख़सूस मसालेह के तहत मर्द को चार शादियों की इजाज़त दी है और इसी को आलमी मसाएल का हल क़रार दिया है लेहाज़ा किसी औरत को यह हक़ नहीं है के वह मर्द की दूसरी शादी पर एतराज़ करे या दूसरी औरत से हसद और बेज़ारी का इज़हार करे के यह बेज़ारी दरहक़ीक़त उस दूसरी औरत से नहीं है इस्लाम के क़ानूने अज़वाज से है और क़ानूने इलाही से बेज़ारी और नफ़रत का एकसास करना कुफ्ऱ है इस्लाम नहीं है। इसके बरखि़लाफ़ औरत को दूसरी शादी की इजाज़त नहीं दी गई है लेहाज़ा शौहर का हक़ है के अपने होते हुए दूसरे शौहर के तसव्वुर से बेज़ारी का इज़हार करे और यही उसके कमाले हया व ग़ैरत और कमाले इस्लाम व ईमान के मुरादिफ़ है।)))

124-मैं इस्लाम की वह तारीफ़ कर रहा हूँ जो मुझसे पहले कोई नहीं कर सका है, इस्लाम सुपुर्दगी है और सुपुर्दगी यक़ीन, यक़ीन तस्दीक़ है और तस्दीक़ इक़रार, इक़रार अदाए फ़र्ज़ है और अदाए फ़र्ज़ अमल।

125- मुझे बख़ील के हाल पर ताज्जुब होता है के उसी फ़क्ऱ में मुब्तिला हो जाता है जिससे भाग रहा है और फिर उस दौलतमन्दी से महरूम हो जाता है जिसको हासिल करना चाहता है, दुनिया में फ़क़ीरों जैसी ज़िन्दगी गुज़ारता है और आख़ेरत में मालदारों जैसा हिसाब देना पड़ता है, इसी तरह मुझे मग़रूर आदमी पर ताज्जुब होता है के जो कल नुत्फ़ा था और कल मुरदार हो जाएगा और फ़िर अकड़ रहा है, मुझे उस शख़्स के बारे में भी हैरत होती है जो वजूदे ख़ुदा में शक करता है हालांके मख़लूक़ाते ख़ुदा को देख रहा है और उसका हाल भी हैरतअंगेज़ है जो मौत को भूला हुआ है हालोके मरने वालों को बराबर देख रहा है, मुझे उसके हाल पर भी ताज्जुब होता है जो आख़ेरत के इमकान का इन्कार कर देता है हालांके पहले वजूद का मुशाहेदा कर रहा है, और उसके हाल पर भी हैरत है जो फ़ना हो जाने वाले घर को आबाद कर रहा है और बाक़ी रह जाने वाले घर को छोड़े हुए है।