True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अट्ठाइसवीं दुआ अल्लाह तआला से तलब व फ़रियाद के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ

ऐ अल्लाह! मैं पूरे ख़ुलूस के साथ दूसरों से मुंह मोड़कर तुझसे लौ लगाए हूं और हमह तन तेरी तरफ़ मुतवज्जोह हूं, और उस षख़्स से जो ख़ुद तेरी अता व बख़्षिष का मोहताज है, मुंह फेल लिया है। और उस षख़्स से जो तेरे फ़ज़्ल व एहसान से बेनियाज़ नहीं है, सवाल का रूख़ मोड़ लिया है। और इस नतीजे पर पहुंचा हूं के मोहताज का मोहताज से मांगना सरासर समझ बूझ की कुबकी और अक़्ल की गुमराही है, क्योंके ऐ मेरे अल्लाह! मैंने बहुत से ऐसे लोगों को देखा है जो तुझे छोड़कर दूसरों के ज़रिये इज़्ज़त के तलबगार हुए। तो वह ज़लील व रूसवा हुए। और दूसरों से नेमत व दौलत के ख़्वाहिषमन्द हुए तो फ़क़ीर व नादार ही रहे और बलन्दी का क़स्द किया तो पस्ती पर जा गिरे। लेहाज़ा उन जैसों को देखने से एक दूरअन्देष की दूरअन्देषी बिलकुल बर महल है के इबरत के नतीजे में उसे तौफ़ीक़ हासिल हुई और उसके (सही) इन्तेख़ाब ने उसे सीधा रास्ता दिखाया। जब हक़ीक़त यही है। तो फिर ऐ मेरे मालिक! तू ही मेरे सवाल का मरजअ है न वह जिससे सवाल किया जाता है, और तू ही मेरा हाजत रवा है न वह जिनसे हाजत तलब की जाती है और तमाम लोगों से पहले जिन्हें पुकारा जाता है तू मेरी दुआ के लिये मख़सूस है और मेरी उम्मीद में तेरा कोई षरीक नहीं है और मेरी दुआ में तेरा कोई हमपाया नहीं है। और मेरी आवाज़ तेरे साथ किसी और को षरीक नहीं करती।

ऐ अल्लाह! अदद की यकताई, क़ुदरते कामेला की कारफ़रमाई और कमाले क़ूवत व तवानाई और मक़ामे रिफ़अत व बलन्दी तेरे लिये है और तेरे अलावा जो है वह अपनी ज़िन्दगी में तेरे रहम व करम का मोहताज, अपने उमूर में दरमान्दा और अपने मक़ाम पर बेबस व लाचार है, जिसके हालात गूनागूँ हैं और एक हालत से दूसरी हालत की तरफ़ पलटता रहता है। तू मानिन्द व हमसर से बलन्दतर और मिस्ल व नज़ीर से बालातर है, तू पाक है, तेरे अलावा कोई माबूद नहीं है।

तीसवीं दुआ अदाए क़र्ज़ के सिलसिले में अल्लाह तआला से तलबे एआनत की दुआ

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसे क़र्ज़ से निजात दे जिससे तू मेरी आबरू पर हर्फ़ आने दे और मेरा ज़ेहन परेशान और फ़िक्र परागन्दा रहे और उसकी फ़िक्र व तदबीर में हमहवक़्त मशग़ूल रहूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैं तुझसे पनाह मांगता हूं क़र्ज़ के फ़िक्र व अन्देशे से और उसके झमेलों से और उसके बाएस बेख़्वाबी से तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे इससे पनाह दे। परवरदिगार! मैं तुझसे ज़िन्दगी में उसकी ज़िल्लत और मरने के बाद उसके वबाल से पनाह मांगता हूँ। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे माल व दौलत की फ़रावानी और पैहम रिज़्क़ रसानी के ज़रिये इससे छुटकारा दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे फ़ुज़ूल ख़र्ची और मसारेफ़ की ज़ियादती से रोक दे और अता व मेयानारवी के साथ नुक़्तए एतदाल पर क़ायम रख और मेरे लिये हलाल तरीक़ों से रोज़ी का सामान कर और मेरे माल का मसरफ़ उमूरे ख़ैर में क़रार दे और उस माल को मुझसे दूर ही रख जो मेरे अन्दर ग़ुरूर व तमकनत पैदा करे या ज़ुल्म की राह पर डाल दे या उसका नतीजा तुग़यान व सरकषी हो। ऐ अल्लाह दरवेषों की हम नषीनी मेरी नज़रों में पसन्दीदा बना दे और इतमीनान अफ़ज़ा सब्र के साथ उनकी रिफ़ाक़त इख़्तियार करने में मेरी मदद फ़रमा। दुनियाए फानी के माल में से जो तूने मुझसे रोक लिया है उसे अपने बाक़ी रहने वाले ख़ज़ानों में मेरे लिये ज़ख़ीरा कर दे और इससके साज़ व बर्ग में से जो तूने दिया है और उसके सर्द सामान में से जो बहम पहुंचाया है उसे अपने जवार (रहमत) तक पहुंचने का ज़ादे राह, हुसूले तक़रीब का वसीला और जन्नत तक रसाई का ज़रिया क़रार दे इसलिये के तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक और सख़ी व करीम है।

इकत्तीसवीं दुआ दुआए तौबा

ऐ माबूद! ऐ वह जिसकी तौसीफ़ से वस्फ़ करने वालों के तौसीफ़ी अल्फ़ाज़ क़ासिर हैं। ऐ वह जो उम्मीदवारों की उम्मीदों का मरकज़ है। ऐ वह जिसके हाँ नेकोकारों का अज्र ज़ाया नहीं होता। ऐ वह जो इबादतगुज़ारों के ख़ौफ़ की मन्ज़िले मुन्तहा है। ऐ वह जो परहेज़गारों के बीम व हेरास की हद्दे आखि़र है यह उस षख़्स का मौक़ुफ़ है जो गुनाहों के हाथों में खेलता है और ख़ताओं की बागों ने जिसे खींच लिया है और जिस पर ग़ालिब आ गया है। इसलिये तेरे हुक्म से लापरवही करते हुए उसने (अदाए फ़र्ज़) में कोताही की और फ़रेबख़ोर्दगी की वजह से तेरे मुनहेयात का मुरतकब होता है। गोया वह अपने को तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में समझता ही नहीं है और तेरे फ़ज़्ल व एहसान को जो तूने उस पर किये हैं मानता ही नहीं है मगर जब उसकी चष्मे बसीरत वा हुई और उस कोरी व बे बसरी के बादल उसके सामने से छटे तो उसने अपने नफ़्स पर किये हुए ज़ुल्में का जाएज़ा लिया अैर जिन जिन मवारिद पर अपने परवरदिगार की मुख़ालफ़तें की थी उन पर नज़र दौड़ाई तो अपने बड़े गुनाहों को (वाक़ेअन) बड़ा और अपनी अज़ीम मुख़ालफ़तों को (हक़ीक़तन) अज़ीम पाया तो वह इस हालत में के तुझसे उम्मीदवार भी है और षर्मसार भी, तेरी जानिब मुतवज्जो हुआ और तुझ पर एतमाद करते हुए तेरी तरफ़ राग़िब हुआ और यक़ीन व इतमीनान के साथ अपनी ख़्वहिश व आरज़ू को लेकर तेरा क़स्द किया और (दिल में) तेरा ख़ौफ़ लिये हुए ख़ुलूस के साथ तेरी बारगाह का इरादा किया इस हालत में के तेरे अलावा उसे किसी से ग़रज़ न थी और तेरे सिवा उसे किसी का ख़ौफ़ न था। चुनांचे वह आजिज़ाना सूरत में तेरे सामने आ खड़ा हुअ और फ़रवतनी से अपनी आंखें ज़मीन में गााड़ लीं और तज़ल्लुल व इन्केसा र से तेरी अज़मत के आगे सर झुका लिया अैर अज्ज़ व नियाज़मन्दी से अपने राज़ हाए दरदने परदा जिन्हें तू उससे बेहतर जनता है तेरे आगे खोल दिये और आजिज़ी से अपने वह गुनाह जिनका तू उससे ज़्यादा हिसाब रखताहै एक एक करके शुमार किये और इन बड़े गुनाहों से जो तेरे इल्म में उसके लिये मोहलक और बदआमालियोंसे जो तेरे फ़ैसले के मुताबिक़ उसके लिये रूसवाकुन हैं, दाद व फ़रयाद करता है। वह गुनाह के जिनकी लज़्ज़त जाती रही है और उनका वबाल हमेषा के लिये बाक़ी रह गया है।

ऐ मेरे माबूद! अगर तू उस पर अज़ाब करे तो वह तेरे अद्ल का मुनकिर नहीं होगा। और अगर उससे दरगुज़र करे और तरस खाए तो वह तेरे अफ़ो को कोई अजीब और बड़ी बात नहीं समझेगा। इसलिये के तू वह परवरदिगारे करीम है जिसके नज़दीक बड़े से बड़े गुनाह को भी बख़्ष देना कोई बड़ी बात नहीं है। अच्छा तो ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी बारगाह में हाज़िर हूं तेरे हुक्मे दुआ की इताअत करते हुए और तेरे वादे का ईफ़ा चाहते हुए जो क़ुबूलियते दुआ के मुताल्लिक़ तूने अपने उस इरषाद में किया है- ‘‘मुझसे दुआ मांगो तो मैं तुम्हारी दुआ क़ुबूल करूंगा।’’ ख़ुदावन्दा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी मग़फ़ेरत मेरे षामिले हाल कर, जिस तरह मैं (अपने गुनाहों का) इक़रार करते हुए तेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुआ हूं और उन मक़ामात से जहां गुनाहों से मग़लूब होना पड़ता है मुझे (सहारा देकर) ऊपर उठा ले जिस तरह मैंने अपने नफ़्स को तेरे आगे (ख़ाके मज़िल्लत) पर डाल दिया है और अपने दामने रहमत से मेरी परदापोशी फ़रमा जिस तरह मुझसे इन्तेक़ाम लेने में सब्र व हिल्म से काम लिया है।

ऐ अल्लाह! अपनी इताअत में मेरी नीयत को इसतेवार और अपनी इबादत में मेरी बसीरत को क़वी कर और मुझे उन आमाल के बजा लाने की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये तू मेरे गुनाहों के मैल को धो डाले और जब मुझे दुनिया से उठाए तो अपने दीन और अपनी नबी मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के आईन पर उठा। ऐ माबूद! मैं इस मक़ाम पर अपने छोटे बड़े गुनाहों, पोषीदा व आषकारा मासियतों और गुज़िष्ता व मौजूदा लग़्िज़षों से तौबा करता हूँ उस षख़्स की सी तौबा जो दिल में  मासियत क ख़याल भी न लाए और गुनाह की तरफ़ पलटने का तसव्वुर भी न करे। ख़ुदावन्दा! तने अपनी मोहकम किताब में फ़रमाया है के तू बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है और तौबा करने वालों को दोस्त रखता है। लेहाज़ा तू मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा जैसा के तूने वादा किया है, और मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे जैसा के तूने ज़िम्मा लिया है। और हस्बे क़रारदाद अपनी मोहब्बत को मेरे  लिये ज़रूरी क़रार दे और मैं तुझसे ऐ मेरे परवरदिगार यह इक़रार करता हूँ के तेरी नापसन्दीदा बातों की तरफ़ रूख़ नहीं करूंगा और यह क़ौल व क़रार करता हूँ के क़ाबिले मज़म्मत चीज़ों की तरफ़ रूजू न करूंगा और यह अहद करता हूँ के तेरी तमाम नाफ़रमानियों को यकसर छोड़ दूंगा।

बारे इलाहा! तू मेरे अमल व किरदार से  ख़ूब आगाह है, अब जो भी तू जानता है उसे  बख़्श दे और अपनी क़ुदरते कामेला से पसन्दीदा चीज़ों की तरफ़ मुझे मोड़ दे। ऐ अल्लाह! मेरे ज़िम्मे कितने ऐसे हुक़ूक़ हैं जो मुझे याद हैं, और कितने ऐसे मज़लिमे हैं जिन पर निसयान का पर्दा पड़ा हुआ है। लेकिन वह सब के सब तेरी आांखोंके सामने हैं। ऐसी आंखें जो ख़्वाब आालूदा नहीं होतीं और तेरे इल्म में हैं ऐसा इल्म जिसमें फ़रोगज़ाष्त नहीं होती। लेहाज़ा जिन लोगों का मुझ पर कोई हक़ है उसका उन्हें एवज़ देकर इसका बोझ मुझसे बरतरफ़ और इसका बार हल्का कर दे, और मुझे फिर वैसे गुनाहों के इरतेकाब से महफ़ूज़ रख। ऐ अल्लाह! मैं तौबा पर क़ायम नहीं रह सकता मगर तेरी ही निगरानी से, और गुनाहों से बाज़ नहीं आ सकता मगर तेरी ही क़ूवत व तवानाई से, लेहाज़ा मुझे बेनियाज़ करने वाली क़ूवत से तक़वीयत दे और (गुनाहों से) रोकने वाली निगरानी का ज़िम्मा ले।

ऐ अल्लाह! वह बन्दा जो तुझसे  तौबा करे और तेरे इल्मे ग़ैब में वह तौबा शिकनी करने वालों और गुनाह व मासियत की तरफ़ दोबारा पलटने वाला हो तो मैं तुझसे पनाह माांगता हूं के उस जैसा हूं। मेरी तौबा को ऐसी तौबा क़रार दे के उसके बाद फ़िर तौबा की एहतियाज न रहे जिससे गुज़िष्ता गुनाह महो हो जाएं अैर ज़िन्दगी के बाक़ी दिनों में (गुनाहों से) सलामती का सामान हो। ऐ अल्लाह! मैं अपनी जेहालतों से उज़्ा्र ख़्वाह और अपनी बदआमालियों से बख़्षिष का तलबगार हूँ। लेहाज़ा अपने लुत्फ़ व एहसान से  मुझे  पनाहगाह रहमत में जगह दे और अपने तफ़ज़्ज़ुल से अपनी आफ़ियत के परदे में छुपा ले। ऐ अल्लाह! मैं दिल में गुज़रने वाले ख़यालात और आंख के इषारों और ज़बान की गुफ़्तगुओं, ग़रज़ हर उस चीज़ से जो तेरे इरादे व रेज़ा के खि़लाफ़ हो और तेरी मोहब्बत के हुदूद से बाहर हे, तेरी बारगाह में तौबा करता हूं। ऐसी तौबा जिससे मेरा हर हर अज़ो अपनी जगह पर तेरी अक़ूबतों से बचा रहे और उन तकलीफ़ देह अज़ाबों से जिनसे सरकष लोग ख़ाएफ़ रहते हैं महफ़ूज़ रहे। ऐ माबूद! यह तेरे सामने मेरा आलमे तन्हाई, तेरे ख़ौफ़ से मेरे दिल की धड़कन, तेरी हैबत से मेरे आज़ा की थरथरी, इन हालतों पर रहम फ़रमा। परवरदिगारा मुझे गुनाहों ने तेरी बारगाह में रूसवाई की मन्ज़िल पर ला खड़ा किया है। अब अगर चुप रहूं तो मेरी तरफ़ से कोई बोलने वाला नहीं है और कोई वसीला लाऊं तो शिफ़ाअत का सज़ावार नहीं हूं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाा और अपने करम व बख़्षिष को मेरी ख़ताओं का शफ़ीअ क़रार दे और अने फ़ज़्ल से मेरे गुनाहों को बख़्ष दे और जिस सज़ा काा मैं सज़ावार हूं वह सज़ा न दे और अपना दामने करम मुझ पर फैला दे और अपने परदए अफ़ो व रहमत में मुझे ढांप ले और मुझसे  इस ज़ी इक़्तेदार षख़्स का सा बरताव कर जिसके आगे कोई बन्दाए ज़लील गिड़गिड़ाए तो वह उस पर तरस खाए या इस दौलत मन्द का सा जिससे कोई बन्दाए मोहताज लिपटे तो वह उसे सहारा देकर उठा ले।

बारे इलाहा! मुझे तेरे (अज़ाब) से कोई पनाह देने वाला नहीं है। अब तेरी क़ूवत व तवानाई ही पनाह दे तो दे। और तेरे यहाँ कोई मेरी सिफ़ारिश करने वाला नहीं अब तेरा फ़ज़्ल ही सिफ़ारिश करे तो करे। और मेरे गुनाहों ने मुझे हरासां  कर दिया है। अब तेरा अफ़ो व दरगुज़र ही मुझे मुतमईन करे तो करे। यह जो कुछ मैं कह रहा हूँ इसलिये नही ंके मैं अपनी बद आमालियों से नावाक़िफ़ और अपनी गुज़िश्ता बदकिरदारियों को फ़रामोश कर चुका हूं बल्कि इसलिये के तेरा आसमान और जो उसमें रहते सहते हैं और तेरी ज़मीन और जो उस पर आबाद हैं। मेरी निदामत को जिसका मैंने तेरे सामने इज़हार किया है, और मेरी तौबा को जिसके ज़रिये तुझसे पनाह मांगी है सुन लें। ताके तेरी रहमत की कारफ़रमाई की वजह से किसी को मेरे हाले ज़ार पर रहम आ जाए या मेरी परेशाँहाली पर उसका दिल पसीजे तो मेरे हक़ में दुआ करे जिसकी तेरे हाँ  मेरी दुआ से ज़्यादा सुनवाई हो। या केई ऐसी सिफ़ारिश हासिल कर लूं जो तेरे हाँ मेरी दरख़्वास्त से ज़्यादा मोअस्सर हो और इस तरह तेरे ग़ज़ब से निजात की दस्तावेज़ और तेरी ख़ुशनूदी का परवाना हासिल कर सकूं।

ऐ अल्लाह! अगर तेरी बारगाह में निदामत व पशेमानी ही तौबा है तो मैं पशेमान हूंँ। और अगर तर्के मासियत ही तौबा व अनाबत है तो मैं तौबा करने वालों में अव्वल दर्जा पर हूँ। और अगर तलबे मग़फ़ेरत गुनाहों को ज़ाएल करने का सबब है तो मग़फ़ेरत करने वालों में से एक मैं भी हूं। ख़ुदाया जबके तूने तौबा का हुक्म दिया है और क़ुबूल करने का ज़िम्मा लिया है और दुआ पर आमादा किया है और क़ुबूलियत का वादा फ़रमाया है तो रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी तौबा को क़ुबूल फ़रमा और मुझे अपनी रहमत से नाउम्मीदी के साथ न पलटा क्योंके तू गुनहगारों की तौबा क़ुबूल करने वाला और रूजू होने वाले ख़ताकारों पर रहम करने वाला है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह तूने उनके वसीले से हमारी हिदायत फ़रमाई है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर, जिस  तरह उनके ज़रिये हमें (गुमराही के भंवर से) निकाला है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर, ऐसी रहमत जो क़यामत के रोज़ और तुझसे एहतियाज के दिन हमारी सिफ़ारिश करे इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है और यह अम्र तेरे लिये सहल व आसान है।

बत्तीसवीं दुआ एतराफ़े गुनाह के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ जिसे नमाज़े शब के बाद पढ़ते

ऐ अल्लाह! ऐ दाएमी व अबदी बादशाही वाले और लश्कर व ऐवना के बग़ैर मज़बूत फ़रमानरवाई वाले और ऐसी इज़्ज़त व रिफ़अत वाले जो सदियों, सालों, ज़मानों और दिनों के बीतने, गुज़रने के बावजूद पाइन्दा व बरक़रार है। तेरी बादशाही ऐसी ग़ालिब है जिसकी इब्तिदा की कोई हद है और न इन्तेहा का कोई आखि़री किनारा है। और तेरी जहानदारी का पाया इतना बलन्द है के तमाम चीज़ें उसकी बलन्दी को छूने से क़ासिर हैं और तारीफ़ करने वालों की इन्तेहाई तारीफ़ तेरी उस बलन्दी के पस्ततरीन दरजे तक भी नहीं पहुंच सकती। जिसे तूने अपने लिये मखा़सूस किया है। सिफ़तों के कारवाँ तेरे बारे में सरगर्दां हैं। और तौसीफ़ी अलफ़ाज़ तेरे लाएक़े हाल मदह तक पहुंचने से आजिज़ हैं और नाज़ुक तससव्वुरात तेरे मक़ामे किबरियाई में शशदर व हैरान हैं। तू वह ख़ुदाए अज़ली है जो अज़ल ही से ऐसा है और हमेशा बग़ैर ज़वाल के ऐसा ही रहेगा। मैं तेरा वह बन्दा हूं जिसका अमल कमज़ोर और सरमायाए उम्मीद ज़्यादा है, मेरे हाथ से ताल्लुक़ व वाबस्तगी के रिष्ते जाते रहे हैं, मगर वह रिष्ता जिसे तेरी रहमत ने जोड़ दिया है और उम्मीदों के वसीले भी एक-एक करके टूट गए हैं। मगर तेरे अफ़ो व दरगुज़र का वसीला जिस पर सहारा किये हुए हूं, तेरी इताअत जिसे किसी षुमार में ला सकूं,  न होने के बराबर है और वह मासियत जिसमें गिरफ्तार हूं बहुत ज़्यादा है। तुझे अपने किसी बन्दे को माफ़ कर देना अगरचे वह कितना ही बुरा क्यों न हो, दुश्वार नहीं है। तो फिर मुझे भी माफ़ कर दे। ऐ अल्लाह! तेरा इल्म तमाम पोशीदा आमाल पर मोहीत है और तेरे इल्म व इत्तेलाअ के आगे हर मख़फ़ी चीज़ ज़ाहिर व आशकारा है और बारीक से बारीक चीज़ें भी तेरी नज़र से पोशीदा नहीं हैं और न राज़हाए दरवने पर्दा तुझसे मख़फ़ी हैं तेरा वह दुश्मन जिसने मेरे बे राहरौ होने के सिलसिले में तुझसे मोहलत मांगी और तूने उसे मोहलत दी, और मुझे गुमराह करने के लिये रोज़े क़यामत तक फ़ुरसत तलब की और तूने उसे फ़ुरसत दी, मुझ पर ग़ालिब आ गया है। और जबके मैं हलाक करने वाले सग़ीरा गुनाहों और तबाह करने वाले कबीरा गुनाहों से तेरे दामन में पनाह लेने के लिये बढ़ रहा था उसने मुझे आ गिराया। और जब मैं गुनाह का मुरतकिब हुआ और अपनी बदआमाली की वजह से तेरी नाराज़ी का मुस्तहक़ बना तो उसने अपने हीला व फ़रेब की बाग मुझसे मोड़ ली। और अपने कलमए कुफ्र के साथ मेरे सामने आ गया और मुझसे बेज़ारी का इज़हार किया और मेरी जानिब से पीठ फिराकर चल दिया और मुझे खुले मैदान में तेरे ग़ज़ब के सामने अकेला छोड़ दिया। और तेरे इन्तेक़ाम की मन्ज़िल में मुझे खींच तान कर ले आया। इस हालत में के न कोई सिफ़ारिश करने वाला था जो तुझसे मेरी सिफ़ारिश करे और न कोई पनाह देने वाला था जो मुझे तेरे अज़ाब से ढारस दे और न कोई चार दीवारी थी जो मुझे तेरी निगाहों से छिपा सके और न कोई पनाहगाह थी जहां तेरे ख़ौफ़ से पनाह ले सकूं। अब यह मन्ज़िल मेरे पनाह मांगने और यह मक़ाम मेरे गुनाहों का एतराफ़ करने का, लेहाज़ा ऐसा न हो के तेरे दामने फ़ज़्ल (की वुसअतें) मेरे लिये तंग हो जाएं और अफ़ो व दरगुज़र मुझ तक पहुंचने ही न पाए और न तौबागुज़ार बन्दों में सब से ज़्यादा नाकाम साबित हूं और न तेरे पास उम्मीदें लेकर आने वालों में सबसे ज़्यादा नाउम्मीद रहूं (बारे इलाहा!) मुझे बख़्श दे इसलिये के तू बख्शने वालों में सबसे बेहतर है।

ऐ अल्लाह! तूने मुझे (इताअत का) हुक्म दिया मगर मैं उसे बजा न लाया और (बुरे आमाल से) मुझे रोका मगर उनका मुरतकिब होता रहा। और बुरे ख़यालात ने जब गुनाह को ख़ुषनुमा करके दिखाया तो (तेरे एहकाम में) कोताही की। मैं न रोज़ा रखने की वजह से दिन को गवाह बना सकता हूं। और न नमाज़े शब की वजह से रात को अपनी सिपर बना सकता हूं और न किसी सुन्नत को मैंने ज़िन्दा किया है के उससे तहसीन व सना की तवक़्क़ो करूं सिवाए तेरे वाजेबात के के जो उन्हें ज़ाया करे वह बहरहाल हलाक व तबाह होगा और नवाफ़िल के फ़ज़्ल व शरफ़ की वजह से भी तुझसे तवस्सुल नहीं कर सकता दरसूरतीके तेरे वाजिबात के बहुत से शराएत से ग़फ़लत करता रहा और तेरे एहकाम के हुदूद से तजावुज़ करता हुआ महारम शरीयत का दामन चाक करता रहा, और कबीरा गुनाहों का मुरतकब होता रहा जिनकी रूसवाइयों से सिर्फ़ तेरा दामने अफ़ो व रहमत परदापोश रहा। यह (मेरा मौक़फ़) उस शख़्स का मौक़फ़ है जो तुझसे षर्म व हया करते हुए अपने नफ्स को बुराइयों से रोकता हो, और उसपर नाराज़ हो और तुझसे राज़ी हो, और तेरे सामने ख़ौफ़ज़दा दिल, ख़मीदा गर्दन और गुनाहों से बोझल पीठ के साथ उम्मीद व बीम की हालत में इसतादा हो और तू उन सबसे ज़्यादा सज़ावार है जिनसे उसने आस लगाई और उन सबसे ज़्यादा हक़दार है जिनसे वह हरासां व ख़ाएफ़ हुआ।

ऐ मेरे परवरदिगार! जब यही हालत मेरी है तो मुझे भी वह चीज़ मरहमत फ़रमा, जिसका मैं उम्मीदवार हूं। और उस चीज़ से मुतमईन कर जिससे ख़ाएफ़ हूं और अपनी रहमत के इनआम से मुझ पर एहसान फ़रमा। इसलिये के तू उन तमाम लोगों से जिनसे सवाल किया जाता है ज़्यादा सख़ी व करीम है।

ऐ अल्लाह जबके तूने मुझे अपने दामने अफ़ो में छिपा लिया है और हमसरों के सामने इस दारे फ़ना में फ़ज़्ल व करम का जामा पहनाया है। तो दारे बक़ा की रूसवाईयों से भी पनाह दे। इस मक़ाम पर के जहां मुक़र्रब फ़रिश्ते, मोअजि़्ज़ज़ व बावेक़ार पैग़म्बर, षहीद व सालेह अफ़राद सब हाज़िर होंगे, कुछ तो हमसाये होंगे जिनसे मैं अपनी बुराइयों को छिपाता रहा हूं, और कुछ ख़वीश व अक़ारिब होंगे जिनसे मैं अपने पोशीदा कामों में शर्म व हया करता रहा हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैंने अपनी परदापोशी में उन पर भरोसा नहीं किया और मग़फ़ेरत के बारे में परवरदिगारा तुझ पर एतमाद किया है और तू उन तमाम लोगों से जिन पर एतमाद किया जाता है। ज़्यादा सज़ावार एतमाद है और उन सबसे ज़्यादा अता करने वाला है जिनकी तरफ़ रूजू हो जाता है और उन सबसे ज़्यादा मेहरबान है जिनसे रहम की इल्तेजा की जाती है। लेहाज़ा मुझ पर रहम फ़रमा।

ऐ अल्लाह तूने मुझे बाहम पोशीदा हड्डियों और तंग राहों वाली सल्ब से तंग नाए रह्म में के जिसे तूने पर्दों में छिपा रखा है एक ज़लील पानी (नुत्फ़े) की सूरत में उतारा जहां तू मुझे एक हालत से दूसरी हालत की तरफ़ मुन्तक़िल करता रहा यहां तक के तूने मुझे इस हद तक पहुंचा दिया। जहां मेरी सूरत की तकमील हो गयी। फिर मुझमें आज़ाए व जवारेह व दीअत किये। जैसा के तूने अपनी किताब में ज़िक्र किया है। के (मैं) पहले नुत्फ़ा था। फ़िर मुन्जमिद ख़ून हुआ फिर गोश्त का एक लोथड़ा, फिर हड्डियों का एक ढांचा फिर उन हड्डियों पर गोश्त की तहें चढ़ा दीं। फिर जैसा तूने चाहा एक दूसरी तरह की मख़लूक़ बना दिया और जब मैं तेरी रोज़ी का मोहताज हुआ और लुत्फ़ व एहसान की दस्तगीरी से बेनियाज़ न रह सका, तो तूने उस बचे हुए खाने पानी में से जिसे तूने उस कनीज़ के लिये जारी किया था जिसके शिकम में तूने मुझे ठहरा दिया और जिसके रह्म में मुझे वदीअत किया था। मेरी रोज़ी का सरो सामान कर दिया। ऐ मेरे परवरदिगार उन हालात में अगर तू ख़ुद मेरी तदबीर पर मुझे छोड़ देता या मेरी ही क़ूवत के हवाले कर देता तो तदबीर मुझसे किनाराकश और क़ूवतम ुझसे देर रहती, मगर तूने अपने फ़ज़्ल व एहसान से एक शफ़ीक़ व मेहरबान की तरह मेरी परवरिश का एहतेमाम किया जिसका तेरे फ़ज़्ले बेपायां की बदौलत इस वक़्त तक सिलसिला जारी है के न तेरे हुस्ने सुलूक से कभी महरूम रहा और न तेरे एहसानात में कभी ताख़ीर हुई। लेकिन इसके बावजूद यक़ीन व एतमाद क़वी न हुआ के मैं सिर्फ़ उसी काम के लिये वक़्फ़ हो जाता जो तेरे नज़दीक मेरे लिये ज़्यादा सूदमन्द है (इस बेयक़ीनी का सबब यह है के) बदगुमानी और कमज़ोरी यक़ीन के सिलसिले में मेरी बाग शैतान के हाथ में है। इसलिये मैं उसकी बद हमसायगी और अपने नफ़्स की फ़रमाबरदारी का शिकवा करता हूँ और उसके तसल्लुत से तेरे दामन में तहफ़्फ़ुज़ व निगेहदाश्त का तालिब हूँ और तुझसे आजिज़ी के साथ इल्तिजा करता हूँ के इसके मक्र व फ़रेब का रूख़ मुझसे मोड़ दे और तुझसे सवाल करता हूँ के मेरी रोज़ी की आसान सबील पैदा कर दे। तेरे ही लिये हम्द व सताइश है के तूने अज़ख़ुद बलन्दपाया नेमतें अता कीं और एहसान व इनआम पर (दिल में) शुक्र का अलक़ा किया। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे लिये रोज़ी को सहल व आसान कर दे और जो अन्दाज़ा मेरे लिये मुक़र्रर किया है, उस पर क़नाअत की तौफ़ीक़ दे और जो हिस्सा मेरे लिये मुअय्यन किया है उस पर मुझे राज़ी कर दे और जो जिस्म काम में आ चुका और जो उम्र गुज़र चुकी है उसे अपनी इताअत की राह में महसूब फ़रमा, बिलाशुबह तू असबाबे रिज़्क़ मुहय्या करने वालों में सबसे बेहतरीन है, बारे इलाहा मैं उस आग से पनाह मांगता हूं जिसके ज़रिये तूने अपने नाफ़रमानों की सख़्त गिरफ़्त की है और जिससे तूने उन लोगों को जिन्होंने तेरी रज़ा व ख़ुशनूदी से रूख़ मोड़ लिया, डराया और धमकाया है और उस आतिशे जहन्नम से पनाह मांगता हूं जिसमें रोशनी के बजाए अन्धेरा जिसका ख़फ़ीफ़ लपका भी इन्तेहाई तकलीफ़देह और जो कोसों दूर होने के बावजूद (गर्मी व तपिश के लिहाज़ से) क़रीब है और उस आग से पनाह मांगता हूं जो आपस में एक दूसरे को खा लेती है और एक दूसरे पर हमलावर होती है और उस आग से पनाह मांगता हूं जो हड्डियों को ख़ाकसर कर देगी और दोज़खि़यों को खौलता हुआ पानी पिलाएगी। और उस आग से के जो उसके आगे गिड़गिड़ाएगा, उस पर तरस नहीं खाएगी और जो उससे रहम की इल्तेजा करेगा, उस पर रहम नहीं करेगी और जो उसके सामने फ़रवतनी करेगा और ख़ुदको उसके हवाले कर देगा उस पर किसी तरह की तख़फ़ीफ़ का उसे इख़्तेयार नहीं होगा। वह दर्दनाक अज़ाब और शदीद एक़ाब की शोला सामानियों के साथ अपने रहने वालों का सामान करेगी। (बारे इलाहा!) मैं तुझसे पनाह मांगता हूं जहन्नम के बिच्छुओं से जिनके मुंह खुले होंगे और उन सांपों से जो दांतों को पीस पीस कर फुंकार रहे होंगे और उसके खौलते हुए पानी से जो अन्तड़ियों और दिलों को टुकड़े-टुकड़े कर देगा और (सीनों को चीरकर) दिलों को निकाल लेगा।

ख़ुदाया! मैं तुझसे तौफ़ीक़ मांगता हूं उन बातों की जो उस आग से दूर करें, और उसे पीछे हटा दें, ख़ुदावन्दा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपनी रहमते फ़रावां के ज़रिये उस आग से पनाह दे और हुस्ने दरगुज़र से काम लेते हुए मेरी लग़्िज़शों को माफ़ कर दे और मुझे महरूम व नाकाम न कर। ऐ पनाह देने वालों में सबसे बेहतर पनाह देने वाले। ख़ुदाया तू सख़्ती व मुसीबत से बचाता और अच्छी नेमतें अता करता और जो चाहे वह करता है और तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

ऐ अल्लाह! जब भी नेकोकारों का ज़िक्र आए तो मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब तक शब व रोज़ के आने जाने का सिलसिला क़ायम रहे। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जिसका ज़ख़ीरा ख़त्म न हो और जिसकी गिनती शुमार न हो सके। ऐसी रहमत जो फ़िज़ाए आलम को पुर कर दे और ज़मीन व आसमान को भर दे। ख़ुदा उन पर रहमत नाज़िल करे इस हद तक के वह ख़ुशनूद हो जाए और ख़ुशनूदी के बाद भी उन पर और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल करता रहे। ऐसी रहमत जिसकी न कोई हद हो और न कोई इन्तेहा, ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।