True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

तैंतीसवीं दुआ दुआए इस्तेख़ारह

बारे इलाहा! मैं तेरे इल्म के ज़रिये तुझसे ख़ैर व बहबूद चाहता हूँ। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे लिये अच्छाई का फ़ैसला सादर फ़रमा, और हमारे दिल में अपने फ़ैसले (की हिकमत व मसलेहत) का अलक़ा कर और उसे एक ज़रिया क़रार दे के हम तेरे फ़ैसले पर राज़ी रहें और तेरे हुक्म के आगे सरे तस्लीम ख़म करें, इस तरह हमसे शक की ख़लिश दूर कर दे और मुख़लेसीन का यक़ीन हमारे अन्दर पैदा करके हमें तक़वीयत दे और हमें ख़ुद हमारे हवाले न कर दे के जो तूने फ़ैसला किया है उसकी मग़फ़ेरत से आजिज़ रहें और तेरी क़ुदरत व मन्ज़िलत को सुबुक समझें और जिस चीज़ से तेरी रज़ा वाबस्ता है उसे नापसन्द करें और जो चीज़ अन्जाम की ख़ूबी से दूर और आफ़ियत की ज़द से क़रीब हो उसकी तरफ़ माएल हो जाएं। तेरे जिस फ़ैसले को हम नापसन्द करें वह हमारी नज़रों में पसन्दीदा बना दे और जिसे हम दुश्वार समझें उसे हमारे लिये सहल व आसान कर दे और जिस मशीयत व इरादे को हमसे मुताल्लुक़ किया है उसकी इताअत हमारे दिल में अलक़ा कर। यहां तक के जिस चीज़ में तूने ताजील की है उसमें ताख़ीर और जिसमें ताख़ीर की है उसमें ताजील न चाहें और जिसे तूने पसन्द किया है उसे नापसन्द और जिसे नागवार समझा है उसे इख़्तेयार न करें। और हमारे कामों का उस चीज़ पर ख़ातेमा कर जो अन्जाम के लेहाज़ से पसन्दीदा और मआल के एतबार से बेहतर हो। इसलिये के तू नफ़ीस व पाकीज़ा चीज़ें अता करता और बड़ी नेमतें बख़्शता है और जो चाहता है वही करता है और तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

चौंतीसवीं दुआ जब ख़ुद मुब्तिला होते या किसी को गुनाहों की रूसवाई में मुब्तिला देखते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ माबूद! तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ है इस बात पर के तूने (गुनाहों के) जानने के बाद पर्दापोशी की और (हालात पर) इत्तेलाअ के बाद आफ़ियत व सलामती बख़्शी। यू ंतो हम में से हर एक ही उयूब व नक़ाएस के दरपै हुआ मगर तूने उसे मुशतहिर न किया, और अफ़आले बद का का मुरतकिब हुआ मगर तूने उसको रूसवा न होने दिया और पर्दाए ख़फ़ा में बुराईयों से आलूदा रहा मगर तूने उसकी निशानदेही न की, कितने ही तेरे मनहियात थे जिनके हम मुरतकिब हुए और कितने ही तेरे एहकाम थे जिन पर तूने कारबन्द रहने का हुक्म दिया था। मगर हमने उनसे तजावुज़ किया और कितनी ही बुराइयां थीं जो हमसे सरज़द हुईं। और कितनी ही ख़ताएं थीं जिनका हमने इरतेकाब किया दरआँहालियाके दूसरे देखने वालों के बजाये तू उन पर आगाह था और दूसरे (गुनाहों की तशहीर पर) क़ुदरत रखने वालों से तू ज़्यादा उनके अफ़शा पर क़ादिर था, मगर उसके बावजूद हमारे बारे में तेरी हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त उनकी आंखों के सामने पर्दा और उनके कानों के बिलमुक़ाबिल दीवार बन गई तो फिर उस पर्दादारी व ऐबपोशी को हमारे लिये एक नसीहत करने वाला और बदजोई व इरतेकाबे गुनाह से रोकने वाला और (गुनाहों को) मिटाने वाली राहे तौबा और तरीक़ पसन्दीदा पर गामज़नी का वसीला क़रार दे और इस राह पैमाई के लम्हे (हमसे) फ़रेब कर, और हमारे लिये ऐसे असबाब मुहय्या न कर जो तुझसे हमें ग़ाफ़िल कर दें। इसलिये के हम तेरी तरफ़ रूजू होने वाले और गुनाहों से तौबा करने वाले हैं। बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) पर जो मख़लूक़ात में तेरे बरगुज़ीदा और उनकी पाकीज़ा इतरत (अ0) पर जो कायनात में तेरी मुन्तख़बकर्दा है रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने फ़रमान के मुताबिक़ उनकी बात पर कान धरने वाला और उनके एहकाम की तामील करने वाला क़रार दे।

पैंतीसवीं दुआ जब अहले दुनिया को देखते तो राज़ी ब रिज़ा रहने के लिये यह दुआ पढ़ते

अल्लाह तआला के हुक्म पर रज़ा व ख़ुशनूदी की बिना पर अल्लाह तआला के लिये हम्द व सताइश है, मैं गवाही देता हूं के उसने अपने बन्दों की रोज़ियां आईने अद्ल के मुताबिक़ तक़सीम की हैं और तमाम मख़लूक़ात से फ़ज़्ल व एहसान का रवय्या इख़्तेयार किया है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन चीज़ों से जो दूसरों की दी हैं आशफ़्ता व परेशान न होने दे के मैं तेरी मख़लूक़ पर हसद करूं और तेरे फ़ैसले को हक़ीर समझूं और जिन चीज़ों से मुझे महरूम रखा है उन्हें देसरों के लिये फ़ित्ना व आज़माइश न बना दे (के वह अज़ रूए ग़ुरूर मुझे ब नज़रे हिक़ारत से देखें) ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपने फ़ैसलाए क़ज़ा व क़द्र पर शादमाँ रख और अपने मुक़द्देरात की पज़ीराई के लिये मेरे सीने में वुसअत पैदा कर दे और मेरे अन्दर वह रूहे एतमाद फूंक दे के मैं यह इक़रार करूं के तेरा फ़ैसला क़ज़ा व क़द्र, ख़ैर व बहबूदी के साथ नाफ़िज़ हुआ है और इन नेमतों पर अदाए शुक्र की बनिस्बत जो मुझे अता की हैं उन चीज़ों पर मेरे शुक्रिया को कामिल व फ़ज़ोंतर क़रार दे, जो मुझसे रोक ली हैं और मुझे उससे महफ़ूज़ रख के मैं किसी नादार को ज़िल्लत व हिक़ारत की नज़र से देखूं या किसी साहेबे सरवत के बारे में मैं (उसकी सरवत की बिना पर) फ़ज़ीलत व बरतरी का गुमान करूँ। इसलिये के साहबे शरफ़ व फ़ज़ीलत वह है जिसे तेरी इताअत ने शरफ़ बख़्शा हो और साहेबे इज़्ज़त वह है जिसे तेरी इबादत ने इज़्ज़त व सरबलन्दी दी हो।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें ऐसी सरवत व दौलत से बहराअन्दोज़ कर जो ख़त्म होने वाली नहीं और ऐसी इज़्ज़त व बुज़ुर्गी से हमारी ताईद फ़रमा जो ज़ाएल होने वाली नहीं और हमें मुल्के जावेदाँ की तरफ़ रवाँ दवाँ कर, बेशक तू यकता व यगाना और ऐसा बेनियाज़ है के न तेरी कोई औलाद है और न तू किसी की औलाद है और न तेरा कोई मिस्ल व हमसर है।

छत्तीसवीं दुआ जब बादल और बिजली को देखते और रअद की आवाज़ सुनते तो यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! यह (अब्र व बर्क़) तेरी निशानियों में से दो निशानियाँ और तेरी खि़दमतगुज़ारों में से दो खि़दमतगुज़ार हैं जो नफ़ारसाँ रहमत या ज़रर रसाँ उक़ूबत के साथ तेरे हुक्म की बजाआवरी के लिये रवाँ दवाँ हैं। तो अब इनके ज़रिये ऐसी बारिश न बरसा जो ज़रर व ज़ेयाँ का बाएस हो और न उनकी वजह से हमें बला व मुसीबत का लिबास पहना। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इन बादलों की मनफ़अत व बरकत हम पर नाज़िल कर और उनके ज़रर व आज़ार का रूख़ हमसे मोड़ दे और उनसे हमें कोई गज़न्द न पहुंचाना और न हमारे सामाने माशियत पर तबाही वारिद करना।

बारे इलाहा! अगर इन घटाओं को तूने बतौरे अज़ाब भेजा है और बसूरते ग़ज़ब रवाना किया है तो फिर हम तेरे ग़ज़ब से तेरे ही दामन में पनाह के ख़्वास्तगार हैं और अफ़ो व दरगुज़र के लिये तेरे सामने गिड़गिड़ाकर सवाल करते हैं। तू मुशरिकों की जानिब अपने ग़ज़ब का रूख़ मोड़ दे और काफ़िरों पर आसियाए अज़ाब को गर्दिश दे।

ऐ अल्लाह! हमारे शहरों की ख़ुश्कसाली को सेराबी के ज़रिये दूर कर दे और हमारे दिल के वसवसों को रिज़्क़ के वसीले से बरतरफ़ कर दे और अपनी बारगाह से हमारा रूख़ मोड़कर हमें दूसरों की तरफ़ मुतवज्जोह न फ़रमा और हम सबसे अपने एहसानात का सरचश्मा क़ता न कर। क्योंके बेनियाज़ वही है जिसे तू बेनियाज़ करे और सालिम व महफ़ूज़ वही है जिसकी तू निगेहदाश्त करे। इसलिये के तेरे अलावा किसी के पास (मुसीबतों का) दफ़िया और किसी के हाँ तेरी सुतूत व हैबत से बचाव का सामान नहीं है। तू जिसकी निस्बत जो चाहता है हुक्म फ़रमाता है और जिसके बारे में जो फ़ैसला करता है वह सादर कर देता है। तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ें हैं के तूने हमें मुसीबतों से महफ़ूज़ रखा और तेरे ही लिये शुक्र है के तूने हमें नेमतें अता कीं। ऐसी हम्द जो तमाम हम्दगुज़ारों की हम्द को पीछे छोड़ दे। ऐसी हम्द जो ख़ुदा के आसमान व ज़मीन की फ़िज़ाओं को छलका दे। इसलिये के तू बड़ी से बड़ी नेमतों का अता करने वाला और बड़े से बड़े इनामात का बख़्शने वाला है मुख़्तसर सी हम्द को भी क़ुबूल करने वाला और थोड़े से शुक्रिये की भी क़दर करने वाला है और एहसान करने वाला और बहुत नेकी करने वाला और साहबे करम व बख़्शिश है। तेरे अलावा कोई माबूद नहीं है और तेरी ही तरफ़ (हमारी) बाज़गश्त है।

सैंतीसवीं दुआ जब अदाए शुक्र में कोताही का एतराफ़ करते तो यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! कोई शख़्स तेरे शुक्र की किसी मन्ज़िल तक नहीं पहुंचा मगर यह के तेरे इतने एहसानात मुजतमअ हो जाते हैं के वह इस पर मज़ीद शुक्रिया लाज़िम व वाजिब कर देते हैं और कोई शख़्स तेरी इताअत के किसी दरजे पर चाहे वह कितनी ही सरगर्मी दिखाए, नहीं पहुंच सकता और तेरे इस इस्तेहक़ाक़ के मुक़ाबले में जो बरबिनाए फ़ज़्ल व एहसान है, क़ासिर ही रहता है, जब यह सूरत है तो तेरे सबसे ज़्यादा शुक्रगुज़ार बन्दे भी अदाए शुक्र से आजिज़ और सबसे ज़्यादा इबादतगुज़ार भी दरमान्दा साबित होंगे। कोई इस्तेहक़ाक़ ही नहीं रखता के तू उसके इस्तेहक़ाक़ की बिना पर, बख़्श दे या उसके हक़ की वजह से उससे ख़ुश हो, जिसे तूने बख़्श दिया तो यह तेरा इनआम है, और जिससे तू राज़ी हो गया तो यह तेरा फ़ज़्ल है। जिस अमले क़लील को तू क़ुबूल फ़रमाता है उसकी जज़ा फ़रावां देता है और मुख़्तसर इबादत पर भी सवाब मरहमत फ़रमाता है यहां तक के गोया बन्दों का वह शुक्र बजा लाना जिसके मुक़ाबले में तूने अज्र व सवाब को ज़रूरी क़रार दिया और जिसके एवज़ उनको अज्र अज़ीम अता किया एक ऐसी बात थी के इस शुक्र से दस्ता बरदार होना उनके इख़्तियार में था तो इस लेहाज़ से तूने अज्र दिया (के उन्होंने बइख़्तेयार ख़ुद शुक्र अदा किया) या यह के अदाए शुक्र के असबाब तेरे क़बज़ए क़ुदरत में न थे (और उन्होंने ख़ुद असबाबे शुक्र मुहय्या किये) जिस पर तूने उन्हें जज़ा मरहमत फ़रमाई (ऐसा तो नहीं है) बल्के ऐ मेरे माबूद! तू उनके जुमला उमूर का मालिक था, क़ब्ल इसके के वह तेरी इबादत पर क़ादिर व तवाना हों और तूने उनके लिये अज्र व सवाब को मुहय्या कर दिया था क़ब्ल इसके के वह तेरी इताअत में दाखि़ल हों और यह इसलिये के तेरा तरीक़ाए इनआम व इकराम तेरी आदते तफ़ज़्ज़ुल व एहसान और तेरी रौशन अफ़ो व दरगुज़र है। चुनांचे तमाम कायनात उसकी मारेफ़त है के तू जिस पर अज़ाब करे उस पर कोई ज़ुल्म नहीं करता और गवाह है इस बात की के जिसको तू मुआफ़ कर दे उस पर तफ़ज़्ज़ुल व एहसान करता है। और हर षख़्स इक़रार करेगा, अपने नफ्स की कोताही का उस (इताअत) के बजा लाने में जिसका तू मुस्तहेक़ है। अगर शैतान उन्हें तेरी इबादत से न बहकाता तो फिर कोई शख़्स तेरी नाफ़रमानी न करता और अगर बातिल को हक़ के लिबास में उनके सामने पेश न करता तो तेरे रास्ते से कोई गुमराह न होता। पाक है तेरी ज़ात, तेरा लुत्फ़ व करम, फ़रमाबरदार हो या गुनहगार हर एक के मामले में किस क़द्र आशकारा है। यूं के इताअत गुज़ार को उस अमले ख़ैर पर जिस के असबाब तूने ख़ुद फ़राहम किये हैं जज़ा देता है और गुनहगार को फ़ौरी सज़ा देने का इख़्तेयार रखते हुए फिर मोहलत देता है। तूने फ़रमाबरदार व नाफ़रमान दोनों को वह चीज़ेंदी हैं जिनका उन्हें इस्तेहक़ाक़ न था। और इनमें से हर एक पर तूने वह फ़ज़्ल व एहसान किया है जिसके मुक़ाबले में उनका अमल बहुत कम था। और अगर तू इताअत गुज़ार को सिर्फ़ उन आमाल पर जिनका सरो सामान तूने मुहय्या किया है जज़ा देता तो क़रीब था के वह सवाब को अपने हाथ से खो देता और तेरी नेमतें उससे ज़ायल हो जातीं लेकिन तूने अपने जूद व करम से फ़ानी व कोताह मुद्दत के आमाल के एवज़ तूलानी व जावेदानी मुद्दत का अज्र्र व सवाब बख़्शा और क़लील व ज़वाल पज़ीद आमाल के मुक़ाबले में दाएमी व सरी जज़ा मरहमत फ़रमाई, फिर यह के तेरे ख़्वाने नेमत से जो रिज़्क़ खाकर उसने तेरी इताअत पर क़ूवत हासिल की उसका कोई एवज़ तूने नहीं चाहा और जिन आज़ा व जवारेह से काम लेकर तेरी मग़फ़ेरत तक राह पैदा की उसका सख़्ती से कोई मुहासेबा नहीं किया। और अगर तू ऐसा करता तो इसकी तमाम मेहनतों का हासिल और सब कोशिशों का नतीजा तेरी नेमतों और एहसानों में से एक अदना व मामूली क़िस्म की नेमत के मुक़ाबले में ख़त्म हो जाता और बक़िया नेमतों के लिये तेरी बारगाह में गिरवी होकर रह जाता (यानी उसके पास कुछ न होता के अपने को छुड़ाता) तो ऐसी सूरत में वह कहां तेरे किसी सवाब का मुस्तहेक़ हो सकता था? नहीं! वह कब मुस्तहक़ हो सकता था।

ऐ मेरे माबूद! यह तो तेरी इताअत करने वाले का हाल और तेरी इबादत करने वाले की सरगुज़श्त है और वह जिसने तेरे एहकाम की खि़लाफ़वर्ज़ी की और तेरे मुनहेयात का मुरतकिब हुआ उसे भी सज़ा देने में तूने जल्दी नहीं की ताके वह मासियत व नाफ़रमानी की हालत को छोड़कर तेरी इताअत की तरफ़ रूजु हो सके। सच तो यह है के जब पहले पहल उसने तेरी नाफ़रमानी का क़स्द किया था जब ही वह हर उस सज़ा का जिसे तूने तमाम ख़ल्क़ के लिये मुहय्या किया है मुस्तहेक़ हो चुका था तो हर वह अज़ाब जिसे तूने उससे रोक लिया सज़ा व उक़ूबत का हर वह जुमला जो उससे ताख़ीर में डाल दिया, यह तेरा अपने हक़ से चश्मपोशी करना और इस्तेहक़ाक़ से कम पर राज़ी होना है।

ऐ मेरे माबूद! ऐसी हालत में तुझसे बढ़कर कौन करीम हो सकता है और उससे बढ़कर के जो तेरी मर्ज़ी के खि़लाफ़ तबाह व बरबाद हो कौन बदबख़्त हो सकता है? नहीं! कौन है जो उससे ज़्यादा बदबख़्त हो। तू मुबारक है के तेरी तौसीफ़ लुत्फ़ व एहसान ही के साथ हो सकती है। और तू बुलन्दतर है इससे के तुझसे अद्ल व इन्साफ़ के खि़लाफ़ का अन्देशा हो जो शख़्स तेरी नाफ़रमानी करे तुझसे यह अन्देशा हो ही नहीं सकता के तू उस पर ज़ुल्म व जौर करेगा और न उस शख़्स के बारे में जो तेरी रिज़ा व ख़ुशनूदी को मलहूज़ रखे तुझसे हक़तलफ़ी का ख़ौफ़ हो सकता है, तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी आरज़ूओं को बर ला और मेरे लिये हिदायत और रहनुमाई में इतना इज़ाफ़ा फ़रमा के मैं अपने कामों में तौफ़ीक़ से हमकिनार हूँ इसलिये के तू नेमतों का बख़्शने वाला और लुत्फ़ व करम करने वाला है।

अढ़तीसवीं दुआ
बन्दों की हक़तलफ़ी और उनके हुक़ूक़ में कोताही से माज़ेरत तलबी और दोज़ख़ से गुलू ख़लासी के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! मैं उस मज़लूम की निस्बत जिस पर मेरे सामने ज़ुल्म किया गया हो और मैंने उसकी मदद न की हो और मेरे साथ कोई नेकी की गई हो और मैंने उसका शुक्रिया अदा न किया हो और उस बदसुलूकी करने वाले की बाबत जिसने मुझसे माज़ेरत की हो और मैंने उसके उज़्र को न माना हो, और फ़ाक़ाकश के बारे में जिसने मुझसे मांगा हो और मैंने उसे तरजीह न दी हो और उस हक़दार मोमिन के हक़ के मुताल्लिक़ जो मेरे ज़िम्मे हो और मैंने अदा न किया हो और उस मर्दे मोमिन के बारे में जिसका कोई ऐब मुझ पर ज़ाहिर हुआ हो और मैंने उस पर पर्दा न डाला हो। और हर उस गुनाह से जिससे मुझे वास्ता पड़ा हो और मैंने उससे किनाराकशी न की हो, तुझसे उज़्रख़्वाह हूं। 

बारे इलाहा! मैं उन तमाम बातों से और उन जैसी दूसरी बातों से शर्मसारी व निदामत के साथ ऐसी माज़ेरत करता हूं जो मेरे लिये उन जैसी पेश आईन्द चीज़ों के लिये पन्द व नसीहत करने वाली हो। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लग़्िज़शों से जिनसे मैं दो-चार हुआ हूं मेरी पशेमानी को और पेश आने वाली बुराईयों से दस्तबरदार होने के इरादे को ऐसी तौबा क़रार दे जो मेरे लिये तेरी मोहब्बत का बाएस हो। ऐ तौबा करने वालों को दोस्त रखने वाले।

उन्तालीसवीं दुआ तलबे अफ़ो व रहमत के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हर अम्रे हराम से मेरी ख़्वाहिश (का ज़ोर) तोड़ दे और हर गुनाह से मेरी हिरस का रूख़ मोड़ दे और हर मोमिन और मोमिना, मुस्लिम और मुस्लिमा की ईज़ारसानी से मुझे बाज़ रख। 

ऐ मेरे माबूद! जो बन्दा भी मेरे बारे में ऐसे अम्र का मुरतकिब हो जिसे तूने उस पर हराम किया था और मेरी इज़्ज़त पर हमलावर हुआ हो जिससे तूने उसे मना किया था। मेरा मज़लेमा लेकर दुनिया से उठ गया हो या हालते हयात में उसके ज़िम्मे बाक़ी हो तो उसने मुझ पर जो ज़ुल्म किया है उसे बख़्श दे और मेरा जो हक़ लेकर चला गया है, उसे माफ़ कर दे और मेरी निस्बत जिस अम्र का मुरतकिब हुआ है उस पर उसे सरज़न्श न कर और मुझे अर्ज़दह करने के बाएस उसे रूसवा न फ़रमा और जिस अफ़ो व दरगुज़र की मैंने उनके लिये कश की है और जिस करम व बख़्शिश को मैंने उनके लिये रवा रखा है उसे सदक़ा करने वालों के सदक़े से पाकीज़ातर और तक़र्रूब चाहने वालों के अतियों से बलन्दतर क़रार दे और इस अफ़ो व दरगुज़र के एवज़ तू मुझसे दरगुज़र कर और उनके लिये दुआ करने के सिले में मुझे अपनी रहमत से सरफ़राज़ फ़रमा ताके हम में से हर एक तेरे फ़ज़्ल व करम की बदौलत ख़ुश नसीब हो सके और तेरे लुत्फ़ व एहसान की वजह से नजात पा जाए।

ऐ अल्लाह! तेरे बन्दों में से जिस किसी को मुझसे कोई ज़रर पहुंचा हो या मेरी जानिब से कोई अज़ीयत पहुंची हो या मुझसे या मेरी वजह से उस पर ज़ुल्म हुआ हो इस तरह के मैंने उसके किसी हक़ को ज़ाया किया हो या उसके किसी मज़ालिमे की दादख़्वाही न की हो। तू  मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी ग़िना व तवंगरी के ज़रिये उसे मुझसे राज़ी कर दे और अपने पास से उसका हक़ बे कम व कास्त अदा कर दे। फिर यह के उस चीज़ से जिसका तेरे हुक्म के तहत सज़ावार हूं, बचा ले और जो तेरे अद्ल का तक़ाज़ा है उससे निजात दे, इसलिये के मुझे तेरे अज़ाब के बरदाश्त करने की ताब नहीं और तेरी नाराज़गी के झेल ले जाने की हिम्मत नहीं। लेहाज़ा अगर तू मुझे हक़ व इन्साफ़ की रू से बदला देगा तो मुझे हलाक कर देगा। और अगर दामने रहमत में नहीं ढांपेगा तो मुझे तबाह कर देगा।

ऐ अल्लाह! ऐ मेरे माबूद! मैं तुझसे उस चीज़ का तालिब हूं जिसके अता करने से तेरे हाँ कुछ कमी नहीं होती और वह बार तुझ पर रखना चाहता हूँ जो तुझे गरांबार नहीं बनाता और तुझसे इस जान की भीक मांगता हूं जिसे तूने इसलिये पैदा नहीं किया के उसके ज़रिये ज़रर व ज़ेयां से तहफ़्फ़ुज़ करे या मुनफ़अत की राह निकाले बल्कि इसलिये पैदा किया ताके इस अम्र का सुबूत बहम पहुंचाए और इस बात पर दलील लाए के तू इस जैसी और इस तरह की मख़लूक़ पैदा करने पर क़ादिर व तवाना है और तुझसे इस अम्र का ख़्वास्तगार हूं के मुझे उन गुनाहों से सुबकबार कर दे जिनका बार मुझे हलकान किये हुए है और तुझसे मदद मांगता हूं उस चीज़ की निस्बत जिसकी गरांबारी ने मुझे आजिज़ कर दिया है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे नफ़्स को बावजूद यह के उसने ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया है, बख़्श दे और अपनी रहमत को मेरे गुनाहों का बारे गराँ उठाने पर मामूर कर इसलिये के कितनी ही मरतबा तेरी रहमत गुनहगारों के हमकिनार और तेरा अफ़ो व करम ज़ालिमों के शामिले हाल रहा है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन लोगों के लिये नमूना बना जिन्हें तूने अपने अफ़ो के ज़रिये ख़ताकारों के गिरने के मक़ामात से ऊपर उठा लिया। और जिन्हें तूने अपनी तौफ़ीक़ से गुनहगारों के मोहलकों से बचा लिया तो वह तेरे अफ़ो व बख़्शिश के वसीले से तेरी नाराज़गी के बन्धनों से छूट गए और तेरे एहसान की बदौलत अद्ल की लग़्िज़शों से आज़ाद हो गए। 

ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू मुझे माफ़ कर दे तो तेरा यह सुलूक उसके साथ होगा जो सज़ावारे उक़ूबत होने से इन्कारी नहीं है और न मुस्तहेक़े सज़ा होने से अपने को बरी समझता है। यह तेरा बरताव उसके साथ होगा ऐ मेरे माबूद। जिसका ख़ौफ़ उम्मीदे अफ़ो से बढ़ा हुआ है और जिसकी निजात से नाउम्मीदी, रेहाई की तवक़्क़ो से क़वीतर है। यह इसलिये नही ंके उसकी ना उम्मीदी रहमत से मायूसी हो या यह के उसकी उम्मीद फ़रेबख़ोरदगी का नतीजा हो बल्कि इसलिये के उसकी बुराइयां नेकियों के मुक़ाबले में कम और गुनाहों के तमाम मवारिद में उज़्र ख़्वाही के वजूह कमज़ोर हैं। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तू इसका सज़ावार है के रास्तबाज़ लोग भी तेरी रहमत पर मग़रूर होकर फ़रेब न खाएं और गुनहगार भी तुझसे नाउम्मीद न हों। इसलिये के तू वह रब्बे अज़ीम है के किसी पर फ़ज़्ल व एहसान से दरीख़ नहीं करता और किसी से अपना हक़ पूरा पूरा वसूल करने के दरपै नहीं होता। तेरा ज़िक्र तमाम नाम आवरों (के ज़िक्र) से बलन्दतर है और तेरे असमाअ इससे के दूसरे हसब व नसब वाले उनसे मौसूम हों मुनज़्जह हैं। तेरी नेमतें तमाम कायनात में फैली हुई हैं। लेहाज़ा इस सिलसिले में तेरे ही लिये हम्द व सताइश है। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

चालीसवीं दुआ जब किसी की ख़बरे मर्ग सुनते या मौत को याद करते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें तूल तवील उम्मीदों से बचाए रख और पुरख़ुलूस आमाल के बजा लाने से दामने उम्मीद को कोताह कर दे ताके हम एक घड़ी के बाद दूसरी घड़ी के तमाम करने, एक दिन के बाद दूसरे दिन के गुज़ारने, एक सांस के बाद दूसरी सांस के आने और एक क़दम के बाद दूसरे क़दम के उठने की आस न रखें। हमें फ़रेब आरज़ू और फ़ित्नाए उम्मीद से महफ़ूज़ व मामून रख। और मौत को हमारा नसबलऐन क़रार दे और किसी दिन भी हमें उसकी याद से ख़ाली न रहने दे और नेक आमाल में से हमें ऐसे अमले ख़ैर की तौफ़ीक़ दे जिसके होते हुए हम तेरी जानिब बाज़गश्त में देरी महसूस करें और जल्द से जल्द तेरी बारगाह में हाज़िर होने के आरज़ू मन्द हों। इस हद तक के मौत हमारे उन्स की मन्ज़िल हो जाए जिससे हम जी लगाएं और उलफ़त की जगह बन जाए जिसके हम मुश्ताक़ हों और ऐसी अज़ीज़ हो जिसके क़रीब को हम पसन्द करें। जब तू उसे हम पर वारिद करे और हम पर ला उतारे तो उसकी मुलाक़ात के ज़रिये हमें सआदतमन्द बनाना और जब वह आए तो हमें उससे मानूस करना और उसकी मेहरबानी से हमें बदबख़्त न क़रार देना और न उसकी मुलाक़ात से हमको रूसवा करना और उसे अपनी मग़फ़ेरत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़े और रहमत की कुन्जियों में से एक कलीद क़रार देना और हमें इस हालत में मौत आए के हम हिदायतयाफ़्ता हों गुमराह न हों। फ़रमाबरदार हों और (मौत से) नफ़रत करने वाले न हों, तौबागुज़ार हों ख़ताकार और गुनाह पर इसरार करने वाले न हों। ऐ नेकोकारों के अज्र व सवाब का ज़िम्मा लेने वाले और बदकिरदारों के अमल व किरदार की इस्लाह करने वाले।

इकतालीसवीं दुआ पर्दापोशी और हिफ़्ज़ व निगेहदाश्त के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरे लिये एज़ाज़ व इकराम की मसनद बिछा दे, मुझे रहमत के सरचश्मों पर उतार दे, वुसते बेहिश्त में जगह दे और अपने हाँ से नाकाम पलटाकर रन्जीदा न कर और अपनी रहमत से नाउम्मीद करके हरमाँ नसीब न बना दे। मेरे गुनाहों का क़सास न ले और मेरे कामों का सख़्ती से मुहासेबा न कर। मेरे छुपे हुए राज़ों को ज़ाहिर न फ़रमा और मेरे मख़फ़ी हालात पर से पर्दा न उठा और मेरे आमाल को अद्ल व इन्साफ़ के तराज़ू पर न तौल और अशराफ़ की नज़रों के सामने मेरी बातेनी हालत को आशकार न कर। जिसका ज़ाहिर होना मेरे लिये बाएसे नंग व आर हो वह उनसे छिपाए रख और तेरे हुज़ूर जो चीज़ ज़िल्लत व रूसवाई का बाएस हो वह उनसे पोशीदा रहने दे। अपनी रज़ामन्दी के ज़रिेये मेरे दर्जे को बलन्द और अपनी बख़्शिश के वसीले से मेरी बन्दगी व करामत की तकमील फ़रमा और उन लोगों के गिरोह में मुझे दाखि़ल कर जो दाएँ हाथ से नामाए आमाल लेने वाले हैं और उन लोगों की राह पर ले चल जो (दुनिया व आख़ेरत में) अम्न व आफ़ियत से हमकिनार हैं और मुझे कामयाब लोगों के ज़मरह में क़रार दे और नेकोकारों की महफ़िलों को मेरी वजह से आबाद व पुर रौनक़ बना। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

बयालीसवीं दुआ दुआए ख़त्मुल क़ुरान

बारे इलाहा! तूने अपनी किताब के ख़त्म करने पर मेरी मदद फ़रमाई। वह किताब जिसे तूने नूर बनाकर उतारा और तमाम किताबे समाविया पर उसे गवाह बनाया और हर उस कलाम पर जिसे तूने बयान फ़रमाया उसे फ़ौक़ीयत बख़्शी और (हक़ व बातिल में) हद्दे फ़ासिल क़रार दिया जिसके ज़रिये हलाल व हराम अलग-अलग कर दिया। वह क़ुरान जिसके ज़रिये शरीयत के एहकाम वाज़ेह किये वह किताब जिसे तूने अपने बन्दों के लिये शरह व तफ़सील से बयान किया और वह वही (आसमानी) जिसे अपने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे वालेहीवसल्लम पर नाज़िल फ़रमाया जिसे वह नूर बनाया जिसकी पैरवी से हम गुमराही व जेहालत की तारीकियों हिदायत हासिल करते हैं और उस शख़्स के लिये शिफ़ा क़रार दिया जो उस पर एतबार रखते हुए उसे समझना चाहते हैं और ख़ामोशी के साथ उसे सुने और वह अद्ल व इन्साफ़ का तराज़ू बनाया जिसका कांटा हक़ से इधर-उधर नहीं होता और वह नूरे हिदायत क़रार दिया जिसकी दलील व बुरहान की रोषनी (तौहीद व नबूवत की) गवाही देने वालों के लिये बुझती नहीं और वह निजात का निशान बनाया के जो उसके सीधे तरीक़े पर चलने का इरादा करे वह गुमराह नहीं होता और जो उसकी दीसमान के बन्धन से वाबस्ता हो वह (ख़ौफ़ व फ़क्र व अज़ाब की) हलाकतों की दस्तरसी से बाहर हो जाता है। बारे इलाहा! जबके तूने उसकी तिलावत के सिलसिले में हमें मदद पहुंचाई और उसके हुस्ने अदायगी के लिये हमारी ज़बान की गिरहें खोल दीं तो फिर हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी पूरी तरह हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त करते हों और उसकी मोहकम आयतों के एतराफ़ व तस्लीम की पुख़्तगी के साथ तेरी इताअत करते हों और मुतशाबेह आयतों और रोशन व वाज़ेह दलीलों के इक़रार के साये में पनाह लेते हों।

ऐ अल्लाह! तूने उसे अपने पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम पर इजमाल के तौर पर उतारा और उसके अजाएब व इसरार का पूरा-पूरा आलम उन्हें अलक़ा किया और उसके इल्मे तफ़सीली का हमें वारिस क़रार दिया, और जो इसका इल्म नहीं रखते उन पर हमें फ़ज़ीलत दी। और उसके मुक़तज़ीयात पर अमल करने की क़ूवत बख़्शी ताके जो उसके हक़ाएक़ के मुतहम्मिल नहीं हो सकते उन पर हमारी फ़ौक़ीयत व बरतरी साबित कर दे।

ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने हमारे दिलों को क़ुरान का हामिल बनाया और अपनी रहमत से उसके फ़ज़्ल व शरफ़ से आगाह किया यूँ ही मोहम्मद (स0) पर जो क़ुरान के ख़ुत्बा ख़्वाँ, और उनकी आल (अ0) पर जो क़ुरान के ख़ज़ीनेदार हैं रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो यह इक़रार करते हैं के यह तेरी जानिब से है ताके इसकी तस्दीक़ में हमें शक व शुबह लाहक़ न हो और उसके सीधे रास्ते से रूगर्दानी का ख़याल भी न आने पाए। 

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी रीसमान से वाबस्ता उमूर में उसकी मोहकम पनाहगाह का सहारा लेते और उसके परों के ज़ेरे साया मन्ज़िल करते, इसकी सुबह दरख़्शां की रोशनी से हिदायत पाते और उसके नूर की दरख़्शन्दगी पैरवी करते और उसके चिराग़ से चिराग़ जलाते हैं और उसके अलावा किसी से हिदायत के तालिब नहीं होते।

बारे इलाहा! जिस तरह तूने इस क़ुरान के ज़रिये मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम को अपनी रहनुमाई का निशान बनाया है और उनकी आल (अ0) के ज़रिये अपनी रज़ा व ख़ुशनूदी की राहें आशकार की हैं यूंही मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे लिये क़ुरान को इज़्ज़त व बुज़ुर्गी की बलन्दपाया मन्ज़िलों तक पहुंचने का वसीला और सलामती के मक़ाम तक बलन्द होने का ज़ीना और मैदाने हश्र में निजात को जज़ा में पाने का सबब और महल्ले क़याम (जन्नत) की नेमतों तक पहुंचने का ज़रिया क़रार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये गुनाहों का भारी बोझ हमारे सर से उतार दे और नेकोकारों के अच्छे ख़साएल व आदात हमें मरहमत फ़रमा और उन लोगों के नक़्शे क़दम पर चला जो तेरे लिये रात के लम्हों और सुबह व शाम (की साअतों) में उसे अपना दस्तूरूल अमल बनाते हैं ताके उसकी ततहीर के वसीले से तू हमें हर आलूदगी से पाक कर दे और इन लोगों के नक़्शे क़दम पर चलाए, जिन्होंने उसके नूर से रोशनी हासिल की है। और उम्मीदों ने उन्हें अमल से ग़ाफ़िल नहीं होने दिया के उन्हें अपने क़रीब की नैरंगियों से तबाह कर दें।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान को रात की तारीकियों में हमारा मोनिस और शैतान के मफ़सनदों और दिल में गुज़रने वाले वसवसों से निगेहबानी करने और हमारे क़दमों को नाफ़रमानियों की तरफ़ बढ़ने से रोक देने वाला और हमारी ज़बानों को बातिल पैमाइयों से बग़ैर किसी मर्ज़ के गंग कर देने वाला और हमारे आज़ा को इरतेकाब गुनाह से बाज़ रखने वाला और हमारी ग़फ़लत व मदहोशी ने जिस दफ़्तरे इबरत व पन्द अन्दोज़ी को तह कर रखा है, उसे फैलाने वाला क़रार दे ताके उसके अजाएब व रमूज़ की हक़ीक़तों और उसकी मुतनब्बेह करने वाली मिसालों को के जिन्हें उठाने से पहाड़ अपने इस्तेहकाम के बावजूद आजिज़ आ चुके हैं हमारे दिलों में उतार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये हमारे ज़ाहिर को हमेशा सलाह व रशद से आरास्ता रख और हमारे ज़मीर की फ़ितरी सलामती से ग़लत तसव्वुरात की दख़ल दरान्दाज़ी को रोक दे और हमारे दिलों की कसाफ़तों और गुनाहों की आलूदगियों को धो दे और उसके ज़रिये हमारे परागन्दा उमूर की शीराज़ा बन्दी कर और मैदाने हश्र में हमारी झुलसती हुई दोपहरों की तपिश व तशनगी बुझा दे और सख़्त ख़ौफ़ व हेरास के दिन जब क़ब्रों से उठें तो हमें अम्न व आफ़ियत के जामे पहना दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये फ़क्ऱो एहतियाज की वजह से हमारी ख़स्तगी व बदहाली का तदारूक फ़रमा और ज़िन्दगी की कशाइश और फ़राख़ रोज़ी की आसूदगी का रूख़ हमारे जानिब फेर दे और बुरी आदात और पस्त इख़लाक़ से हमें दूर कर दे और कुफ्ऱ के गढ़े (में गिरने) और निफ़ाक़ अंगेज़ चीज़ों से बचा ले ताके वह हमें क़यामत में तेरी ख़ुशनूदी व जन्नत की तरफ़ बढ़ाने वाला और दुनिया में तेरी नाराज़गी और हुदूद शिकनी से रोकने वाला हो और इस अम्र पर गवाह हो के जो चीज़ तेरे नज़दीक हलाल थी उसे हलाल जाना और जो हराम थी उसे हराम समझा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के वसीले से मौत के हंगामे नज़अ की अज़ीयतों, कराहने की सख़्तियों और जाँकनी की लगातार हिचकियों को हम पर आसान फ़रमा जबके जान गले तक पहुंच जाए और कहा जाए के कोई झाड़ फूंक करने वाला है (जो कुछ तदारूक करे) और मलकुल मौत ग़ैब के पर्दे चीर कर क़ब्ज़े रूह के लिये सामने आए और मौत की कमान में फ़िराक़ की दहशत के तीर जोड़कर अपने निशाने की ज़द पर रख ले और मौत के ज़हरीले जाम में ज़हरे हलाहल घोल दे और आख़ेरत की तरफ़ हमारा चल-चलाव और कूच क़रीब हो और हमारे आमाल हमारी गर्दन का तौक़ बन जाएं और क़ब्रें रोज़े हष्र की साअत तक आरामगाह क़रार पाएं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और कहन्गी व बोसीदगी के घर में उतरने और मिट्टी की तहों में मुद्दत तक पड़े रहने को हमारे लिये मुबारक करना और दुनिया से मुंह मोड़ने के बाद क़ब्रों को हमारा अच्छा घर बनाना और अपनी रहमत से हमारे लिये गौर की तंगी को कुशादा कर देना और हश्र के आम इज्तेमाअ के सामने हमारे मोहलक गुनाहों की वजह से हमें रूसवा न करना और आमाल के पेश होने के मक़ाम पर हमारी ज़िल्लत व ख़्वारी की वज़ा पर रहम फ़रमाना और जिस दिन जहन्नम के पुल पर से गुज़रना होगा, तो उसके लड़खड़ाने के वक़्त हमारे डगमगाते हुए क़दमों को जमा देना और क़यामत के दिन हमें उसके ज़रिये हर अन्दोह और रोज़े हश्र की सख़्त हौलनाकियों से निजात देना और जब के हसरत व निदामत के दिन ज़ालिमों के चेहरे सियाह होंगे हमारे चेहरों को नूरानी करना और मोमेनीन के दिलों में हमारी मोहब्बत पैदा कर दे और ज़िन्दगी को हमारे लिये दुश्वारगुज़ार न बना।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) जो तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स0) हैं उन पर रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह उन्होंने तेरा पैग़ाम पहुंचाया, तेरी शरीयत को वाज़ेह तौर से पेश किया और तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की। ऐ अल्लाह! हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम को क़यामत के दिन तमाम नबियों से मन्ज़िलत के लेहाज़ से मुक़र्रबतर शिफ़ाअत के लेहाज़ से बरतर, क़द्र व मन्ज़िलत के लेहाज़ से बुज़ुर्गतर और जाह व मरतबत के एतबार से मुमताज़तर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनके ऐवान (अज़्ज़ व शरफ़) को बलन्द, उनकी दलील व बुरहान को अज़ीम और उनके मीज़ान (अमल के पल्ले) को भारी कर दे। उनकी शिफ़ाअत को क़ुबूल फ़रमा और उनकी मन्ज़िलत को अपने से क़रीब कर, उनके चेहरे को रौशन, उनके नूर को कामिल और उनके दरजे को बलन्द फ़रमा। और हमें उन्हीं के आईन पर ज़िन्दा रख और उन्हीं के दीन पर मौत दे और उन्हीं की षाहेराह पर गामज़न कर और उन्हीं के रास्ते पर चला और हमें उनके फ़रमाबरदारों में से क़रार दे और उनकी जमाअत में महशूर कर और उनके हौज़ पर उतार और उनके साग़र से सेराब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जिसके ज़रिये उन्हें बेहतरीन नेकी, फ़ज़्ल और इज़्ज़त तक पहुंचा दे जिसके वह उम्मीदवार हैं। इसलिये के तू वसीअ रहमत और अज़ीम फ़ज़्ल व एहसान का मालिक है। ऐ अल्लाह! उन्होंने जो तेरे पैग़ामात की तबलीग़ की, तेरी आयतों को पहुचाया, तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की और तेरी राह में जेहाद किया। इन सबकी उन्हें जज़ा दे जो हर उस जज़ा से बेहतर हो जो तूने मुक़र्रब फ़रिश्तों और बरगुज़ीदा मुरसल नबीयों को अता की हो। उन पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर सलाम हो और अल्लाह तआला की रहमतें और बरकतें उनके शामिले हाल हों।