True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

तेंतालीसवीं दुआ दुआए रोयते हेलाल

ऐ फ़रमाबरदार, सरगर्मे अमल और तेज़ रौ मख़लूक़ और मुक़रर्रा मन्ज़िलों में यके बाद दीगरे वारिद होने और फ़लक नज़्म व तदबीरें तसरूफ़ करने वाले मैं उस ज़ात पर ईमान लाया जिसने तेरे ज़रिये तारीकियों को रौषन और ढकी छिपी चीज़ों को आशकार किया और तुझे अपनी शाही व फ़रमानरवाई की निशानियों में से एक निशानी और अपने ग़लबे व इक़्तेदार की अलामतों में से एक अलामत क़रार दिया और तुझे बढ़ने, घटने, निकलने, छिपने और चमकने गहनाने से तसख़ीर किया। इन तमाम हालात में तू उसके ज़ेरे फ़रमान और उसके इरादे की जानिब रवां दवां है। तेरे बारे में उसकी तदबीर व कारसाज़ी कितनी अजीब और तेरी निस्बत उसकी सनाई कितनी लतीफ़ है, तुझे पेश आईन्द हालात के लिये नये महीने की कलीद क़रार दिया। तो अब मैं अल्लाह तआला से जो मेरा परवरदिगार, मेरा ख़ालिक़ और तेरा ख़ालिक़ मेरा नक़्श आरा और तेरा नक़्श आरा और मेरा सूरतगर और तेरा सूरत गर है सवाल करता हूं के वह रहमत नाज़िल करे मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और तुझे ऐसी बरकत वाला चान्द क़रार दे, जिसे दिनों की गर्दिशें ज़ाएल न कर सकें और ऐसी पाकीज़गी वाला जिसे गुनाह की कशाफ़तें आलूदा न कर सकें। ऐसा चान्द जो आफ़तों से बरी और बुराइयों से महफ़ूज़ हो। सरासर यमन व सआदत का चान्द जिस में ज़रा नहूसत न हो और सरापा ख़ैर व बरकत का चान्द जिसे तंगी व उसरत से कोई लगाव न हो और ऐसी आसानी व कशाइश का जिस में दुश्वारी की आमेज़िश न हो और ऐसी भलाई का जिसमें बुराई का शाएबा न हो। ग़रज़ सर ता पा अम्न, ईमान, नेमत, हुस्ने अमल, सलामती और इताअत व फ़रमा बरदारी का चान्द हो, ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जिन जिन पर यह अपना परतो डालें उनसे बढ़कर हमें ख़ुशनूद और जो जो उसे देखे उन सबसे ज़्यादा दुरूस्तकार और जो जो जो इस महीने में तेरी इबादत करे उन सबसे ज़्यादा ख़ुशनसीब क़रार दे। और हमें इसमें तौबा की तौफ़ीक़ दे और गुनाहों से दूर और मासियत के इरतेकाब से महफ़ूज़ रखे और हमारे दिल में अपनी नेमतों पर अदाए शुक्र का वलवला पैदा कर और हमें अम्न व आफ़ियत की सिपर में ढांप ले और इस तरह हम पर अपनी नेमत को तमाम करके तेरी फ़राएज़े इताअत को पूरे तौर से अन्जाम दें। बेशक तू नेमतों का बख़्शने वाला और क़ाबिले सताइश है। रहमते फ़रावां नाज़िल करे अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर।

चौवालीसवीं दुआ दुआए इस्तेक़बाले माहे रमज़ान

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने अपनी हम्द व सेपास की तरफ़ हमारी रहनुमाई की और हमें हम्दगुज़ारों में से क़रार दिया ताके हम उसके एहसानात पर शुक्र करने वालों में महसूब हों और हमें इस शुक्र के बदले में नेकोकारों का अज्र दे। उस अल्लाह तआला के लिये हम्द व सताइश है जिसने हमें अपना दीन अता किया और अपनी मिल्लत में से क़रार देकर इम्तियाज़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान की राहों पर चलाया। ताके हम उसके फ़ज़्ल व करम से उन रास्तों पर चल कर उसकी ख़ुशनूदी तक पहुंचें। ऐसी हम्द जिसे वह क़ुबूल फ़रमाए और जिसकी वजह से हम से वह राज़ी हो जाएं। तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये है जिसने अपने लुत्फ़ व एहसान के रास्तों में से एक रास्ता अपने महीने को क़रार दिया। यानी रमज़ान का महीना, सेयाम का महीना, इस्लाम का महीना, पाकीज़गी का महीना, तसफ़ीह और ततहीर का महीना, इबादत व क़याम का महीना, वह महीना जिसमें क़ुरान नाज़िल हुआ। जो लोगों के लिये रहनुमा है। हिदायत और हक़ व बातिल के इम्तियाज़ की रौशन सदाक़तें रखता है। चुनांचे तमाम महीनों पर इसकी फ़ज़ीलत व बरतरी को आशकारा किया। इन फ़रावां इज़्ज़तों और नुमायां फ़ज़ीलतों की वजह से जो इसके लिये क़रार दीं। और इसकी अज़मत के इज़हार के लिये जो चीज़ें दूसरे महीनों में जाएज़ की थें इसमें हराम कर दीें और इसके एहतेराम के पेशे नज़र खाने-पीने की चीज़ों से मना कर दिया और एक वाज़ेअ ज़माना इसके लिये मुअय्यन कर दिया। ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर यह इजाज़त नहीं देता के इसे उसके मुअय्यना वक़्त से आगे बढ़ाया जाए और न क़ुबूल करता है के इससे मोहर कर दिया जाए। फिर यह के इसकी रातों में से एक रात को हज़ार महीनों की रातों नी फज़ीलत दी और इसका नाम शबे क़द्र रखा। इस रात में फ़रिश्ते और रूह अलक़ुद्स हर उस अम्र के साथ जो उसका क़तई फ़ैसला होता है। इसके बन्दों में से जिसपर वह चाहता है नाज़िल होते हैं। वोह रात सरासर सलामती की रात है जिसकी बरकते तुलूए फ़ज्र तक दाएम व बरक़रार है। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें हिदायत फ़रमा के हम इस महीने के फ़ज़्ल व शरफ़ को पहचानें, इसकी इज़्ज़त व हुरमत को बलन्द जानें और इसमें इन चीज़ों से जिनसे तूने मना किया है इज्तेनाब करें और इसके रोज़े रखने में हमारे आज़ा को नाफ़रमानियों से रोकने और कामों में मसरूफ रखने से जो तेरी ख़ुशनूदी का बाएस हों हमारी एआनत फ़रमा, ताके हम न बेहूदा बातों की तरफ़ कान लगाएं न फ़िज़ूल ख़र्ची की तरफ़ बे महाबा निगाहें उठाएं, न हराम की तरफ़ हाथ बढ़ाएं न अम्रे ममनूअ की तरफ़ पेश क़दमी करें न तेरी हलाल की हुई चीज़ों के अलावा किसी चीज़ को हमारे शिकम क़ुबूल करें और न तेरी बयान की हुई बातों के सिवा हमारी ज़बानें गोया हों। सिर्फ़ उन चीज़ों के बजा लाने का बार उठाएं जो तेरे सवाब से क़रीब करें और सिर्फ़ उन कामों को अन्जाम दें जो तेरे अज़ाब से बचा ले जाएं फिर उन तमाम आमाल को रियाकारों की रियाकारी और शोहरत पसन्दों की शोहरत पसन्दी से पाक कर दे इस तरह के तेरे अलावा किसी को इनमें शरीक न करें और तेरे सिवा किसी से कोई मतलब न रखें। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इसमें नमाज़हाए पन्जगाना के औक़ात से इन हुदूद के साथ जो तूने मुअय्यन किये हैं और उन वाजेबात के साथ जो तूने क़रार दिये हैं और उन लम्हात के साथ जो तूने मुक़र्रर किये हैं आगाह फ़रमा और हमें उन नमाज़ों में उन लोगों के मरतबे पर फ़ाएज़ कर जो इन नमाज़ों के दरजाते आलिया हासिल करने वाले, इनके वाजेबात की निगेहदाश्त करने वाले और उन्हें इनके औक़ात में इसी तरीक़े पर जो तेरे अब्दे ख़ास और रसूल सल्लल्लाहो अलैह वालेही वसल्लम ने रूकूअ व सुजूद और उनके तमाम फ़ज़ीलत व बरतरी के पहलुओं में जारी किया था, कामिल और पूरी पाकीज़गी और नुमायां व मुकम्मल ख़ुशू व फ़रवतनी के साथ अदा करने वाले हैं। और हमें इस महीने में तौफ़ीक़ दे के नेकी व एहसान के ज़रिये अज़ीज़ों के साथ सिलाए रहमी और इनआम व बख़्शिश से हमसायों की ख़बरगीरी करें और अपने अमवाल को मज़लूमों से पाक व साफ़ करें और ज़कात देकर उन्हें पाकीज़ा तय्यब बना लें और यह के जो हमसे अलाहेदगी इख़्तियार करे उसकी तरफ़ दस्ते मसालेहत बढ़ाएं, जो हम पर ज़ुल्म करे उस से इन्साफ़ बरतें जो हमसे दुश्मनी करे उससे सुलह व सफ़ाई करें सिवाए उसके जिससे तेरे लिये और तेरी ख़ातिर दुश्मनी की गयी हो। क्योंके वह ऐसा दुश्मन है जिसे हम दोस्त नहीं रख सकते और ऐसे गिरोह का (फ़र्द) है जिससे हम साफ़ नहीं हो सकते। और हमें इस महीने में ऐसे पाक व पाकीज़ा आमाल के वसीले से तक़र्रूब हासिल करने की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये तू हमें गुनाहों से पाक कर दे और अज़ सरे नौ बुराइयों के इरतेकाब से बचा ले जाए। यहां तक के फ़रिश्ते तेरे तेरी बारगाह में जो आमाल नामे पेश करें वह हमारी हर क़िस्म की इताअतों और हर नौअ की इबादत के मुक़ाबले में सुबुक हों। ऐ अल्लाह मैं तुझसे इस महीने के हक़ व हुरमत और नीज़ उन लोगों का वास्ता देकर सवाल करता हूं जिन्होंने इस महीने में शुरू से लेकर इसके ख़त्म होने तक तेरी इबादत की हो वह मुक़र्रब बारगाह फ़रिश्ता हो या नबी मुरसल  या कोई मर्द सालेह व बरगुज़ीदा के तू  मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाए और जिस इज़्ज़त व करामत का तूने अपने दोस्तों से वादा किया है उसका हमें अहल बना और जो इन्तेहाई इताअत करने वालों के लिये तूने अज्र मुक़र्रर किया है वह हमारे लिये मुक़र्रर फ़रमा और हमें अपनी रहमत से उन लोगों में शामिल कर जिन्होंने बलन्दतरीन मर्तबे का इस्तेहक़ाक़ पैदा किया। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इस चीज़ से बचाए रख के हम तौहीद में कज अन्देशी तेरी तमजीद व बुज़ुर्गी में कोताही, तेरे दीन में शक, तेरे रास्ते से बे राहरवी और तेरी हुरमत से लापरवाही करें और तेरे दुश्मन शैतान मरदूद से फ़रेबख़ोर्दगी का शिकार हों। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब के इस महीने की रातों में हर रात में तेरे कुछ ऐसे बन्दे होते हैं जिन्हें तेरा अफ़ो व करम आज़ाद करता है या तेरी बख़्शिश व दरगुज़र उन्हें बख़्श देती है। तू हमें भी उन्हीं बन्दों में दाखि़ल कर और इस महीने के बेहतरीन एहल व असहाब में क़रार दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस चान्द के घटने के साथ हमारे गुनाहों को भी महो कर दे और जब इसके दिन ख़त्म होने पर आएं तो हमारे गुनाहों का वबाल हमसे दूर कर दे ताके यह महीना इस तरह तमाम हो के तू हमें ख़ताओं से पाक और गुनाहों से बरी कर चुका हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने में अगर हम हक़ से मुंह मोड़े ंतो हमें सीधा रास्ते पर लगा दे और कजरवी इख़्तियार करें तो हमारी इस्लाह व दुरूस्तगी फ़रमा और अगर तेरा दुश्मन शैतान हमारे गिर्द एहाता करे तो उसके पन्जे से छुड़ा ले। बारे इलाहा! इस महीने का दामन हमारी इबादतों से जो तेरे लिये बजा लाई गई हों, भर दे और इसके लम्हात को हमारी इताअतों से सजा दे और इसके दिनों में रोज़े रखने और इसकी रातों में नमाज़ें पढ़ने, तेरे हुज़ूर गिड़गिड़ाने तेरे सामने अज्ज़ व इलहाह करने और तेरे रू बरू ज़िल्लत व ख़्वारी का मुज़ाहेरा करने, इन सबमें हमारी मदद फ़रमा। ताके इसके दिन हमारे खि़लाफ़ ग़फ़लत की और इसकी रातें कोताही व तक़स्बर की गवाही न दें। ऐ अल्लाह! तमाम महीनों और दिनों में जब तक तू हमें ज़िन्दा रखे, ऐसा ही क़रार दे। और हमें उन बन्दों में शामिल फ़रमा जो फ़िरदौसे बरीं की ज़िन्दगी के हमेशा हमेशा के लिये वारिस होंगे। और व हके जो कुछ वह ख़ुदा की राह में दे सकते हैं, देते हैं। फिर भी उनके दिलों को यह खटका लगा रहता है के उन्हें अपने परवरदिगार की तरफ़ पलट कर जाना है। और उन लोगों में से जो नेकियों में जल्दी करते हैं और वोही तो वह लोग हैं जो भलाइयों में आगे निकल जाने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर हर वक़्त और हर घड़ी और हर हाल में इस क़द्र रहमत नाज़िल फ़रमा जितनी तूने किसी पर नाज़िल की हो और उन सब रहमतों से दोगुनी चौगनी के जिसे तेरे अलावा कोई शुमार न कर सके। बेशक तू जो चाहता है वही करने वाला है।

पैंतालीसवीं दुआ  दुआए विदाए माहे रमज़ान

ऐ अल्लाह! ऐ वह जो (अपने एहसानात) का बदला नहीं चाहता। ऐ वह जो अता व बख़्शिश पर पशेमान नहीं होता। ऐ वह जो अपने बन्दों को (उनके अमल के मुक़ाबले में) नपा तुला अज्र नहीं देता। तेरी नेमतें बग़ैर किसी साबेक़ा इस्तेहक़ाक़ के हैं और तेरा अफ़ो व दरगुज़र तफ़ज़्ज़ुल व एहसान है। तेरा सज़ा देना ऐने अद्ल और तेरा फ़ैसला ख़ैर व बहबूदी का हामिल है। तू अगर देता है तो अपनी अता को मन्नत गुज़ारी से आलूदा नहीं करता और अगर मना कर देता है तो यह ज़ुल्म व ज़्यादती की बिना पर नहीं होता। जो तेरा षुक्र अदा करता है तू उसके षुक्र की जज़ा देता है। हालांके तू ही ने उसके दिल में शुक्रगुज़ारी का अलक़ा किया है और जो तेरी हम्द करता है उसे बदला देता है। हालांके तू ही ने उसे हम्द की तालीम दी है और ऐसे शख़्स की पर्दापोशी करता है के अगर चाहता तो उसे रूसवा कर देता, और ऐसे शख़्स को देता है के अगर चाहता तो उसे न देता। हालांके वह दोनों तेरी बारगाहे अदालत में रूसवा व महरूम किये जाने ही के क़ाबिल थे मगर तूने अपने अफ़आल की बुनियाद व तफ़ज़्ज़ुल व एहसान पर रखी है और अपने इक़्तेदार को अफ़ो व दरगुज़र की राह पर लगाया है। और जिस किसी ने तेरी नाफ़रमानी की तूने उससे बुर्दबारी का रवैया इख़्तेयार किया। और जिस किसी ने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म का इरादा किया तूने उसे मोहलत दी, तू उनके रूजूअ होने तक अपने हिल्म की बिना पर मोहलत देता है और तौबा करने तक उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता ताके तेरी मन्शा के खि़लाफ़ तबाह होने वाला तबाह न हो और तेरी नेमत की वजह से बदबख़्त होने वाला बदबख़्त न हो मगर उस वक़्त के जब उस पर पूरी उज़्रदारी और एतमामे हुज्जत हो जाए। ऐ करीम! यह (एतमामे हुज्जत) तेरे अफ़ो व दरगुज़र का करम और ऐ बुर्दबार तेरी शफ़क़्क़त व मेहरबानी का फ़ैज़ है तू ही है वह जिसने अपने बन्दों के लिये अफ़ो व बख़्शिश का दरवाज़ा खोला है और उसका नाम तौबा रखा है और तूने इस दरवाज़े की निशानदेही के लिये अपनी वही को रहबर क़रार दिया है ताके वह उस दरवाज़े से भटक न जाएं। चुनांचे ऐ मुबारक नाम वाले तूने फ़रमाया है के ख़ुदा की बारगाह में सच्चे दिल से तौबा करो। उम्मीद है के तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे गुनाहों को महो कर दे और तुम्हें उस बेहिश्त में दाखि़ल करे जिसके (मोहल्लात व बाग़ात के) नीचे नहरें बहती हैं। उस दिन जब ख़ुदा अपने रसूल स0 और उन लोगों को जो उस पर ईमान लाए हैं रूसवा नहीं करेगा बल्कि उनका नूर उनके आगे आगे और उनकी दाई जानिब चलता होगा और वह लोग यह कहते होंगे के ऐ हमारे परवरदिगार! हमारे लिये हमारे नूर को कामिल फ़रमा और हमें बख़्श दें इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है। तो अब जो इस घर में दाखि़ल होने से ग़फ़लत करे जबके दरवाज़ा खोला और रहबर मुक़र्रर किया जा चुका है तो इसका उज्ऱ व बहाना क्या हो सकता है? तू वह है जिसने अपने बन्दों के लिये लेन देन में ऊंचे नरख़ों का ज़िम्मा ले लिया है और यह चाहा है के वह जो सौदा तुझसे करें उसमें उन्हें नफ़ा हो और तेरी तरफ़ बढ़ने और ज़्यादा हासिल करने में कामयाब हों। चुनांचे तूने के जो मुबारक नाम वाला और बलन्द मक़ाम वाला है। फ़रमाया है- ‘‘जो मेरे पास नेकी लेकर आएगा उसे उसका दस गुना अज्र मिलेगा और जो बुराई का मुरतकिब होगा तो उसको बुराई का बदला बस उतना ही मिलेगा जितनी बुराई है।’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘जो लोग अल्लाह तआला की राह में अपना माल ख़र्च करते हैं उनकी मिसाल उस बीज की सी है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ सौ दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दुगना कर देता है’’ और तेरा इरशाद है के - कौन है जो अल्लाह तआला को क़र्ज़े हसना दे ताके ख़ुदा उसके माल को कई गुना ज़्यादा करके अदा करे’’ और ऐसी ही अफ़ज़ाइश इसनात के वादे पर मुश्तमिल दूसरी आयतें के जो तूने क़ुरान मजीद में नाज़िल की हैं और तू ही वह है जिसने वही व ग़ैब के कलाम और ऐसी तरग़ीब के ज़रिये के जो उनके फ़ायदे पर मुश्तमिल है ऐसे उमूर की तरफ़ उनकी रहनुमाई की के अगर उनसे पोशीदा रखता तो न उनकी आंखें देख सकतीं न उनके कान सुन सकते और न उनके तसव्वुरात वहां तक पहुंच सकते। चुनांचे तेरा इरशाद है के तुम मुझे याद रखो मैं भी तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं होंगा और मेरा शुक्र अदा करते रहो और नाशुक्री न करो। और तेरा इरशाद है के ‘‘अगर नाशुक्री की तो याद रखो के मेरा अज़ाब सख़्त अज़ाब है’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘मुझसे दुआ मांगो तो मैं क़ुबूल करूंगा, वह लोग जो ग़ुरूर की बिना पर मेरी इबादत से मुंह मोड़ लेते हैं वह अनक़रीब ज़लील होकर जहन्नुम में दाखि़ल होंगे।’’ चुनांचे तूने दुआ का नाम इबादत रखा और उसके तर्क को ग़ुरूर से ताबीर किया और उसके तर्क पर जहन्नुम में ज़लील होकर दाखि़ल होने से डराया। इसलिये उन्होंने तेरी नेमतों की वजह से तुझे याद किया। तेरे फ़ज़्ल व करम की बिना पर तेरा शुक्रिया अदा किया और तेरे हुक्म से तुझे पुकारा और (नेमतों में) तलबे अफ़ज़ाइश के लिये तेरी राह में सदक़ा दिया और तेरी यह रहनुमाई ही उनके लिये तेरे ग़ज़ब से बचाव और तेरी ख़ुशनूदी तक रसाई की सूरत थी। और जिन बातों की तूने अपनी जानिब से अपने बन्दों की राहनुमाई की है अगर कोई मख़लूक़ अपनी तरफ़ से दूसरे मख़लूक़ की ऐसी ही चीज़ों की तरफ़ राहनुमाई करता तो वह क़ाबिले वहसील होता। तो फिर तेरे ही लिये हम्द व सताइश  है। जब तक तेरी हम्द के लिये राह पैदा होती रहे और जब तक हम्द के वह अल्फ़ाज़ जिनसे तेरी तहमीद की जा सके और हम्द के वह मानी जो तेरी हम्द की तरफ़ पलट सकें बाक़ी रहें। ऐ वह जो अपने फ़ज़्ल व एहसान से बन्दों की हम्द का सज़ावार हुआ है और उन्हें अपनी नेमत व बख़्शिश से ढांप लिया है। हम पर तेरी नेमतें कितनी आशकारा हैं और तेरा इनआम कितना फ़रावां है और किस क़द्र हम तेरे इनआम व एहसान से मख़सूस हैं। तूने उस दीन की जिसे मुन्तखि़ब फ़रमाया और उस तरीक़े की जिसे पसन्द फ़रमाया और उस रास्ते की जिसे आसान कर दिया हमें हिदायत की और अपने हां क़रीब हासिल करने और इज़्ज़त व बुज़ुर्गी तक पहुंचने के लिये बसीरत दी। बारे इलाहा! तूने इन मुन्तख़ब फ़राएज़ और मख़सूस वाजेबात में से माहे रमज़ान को क़रार दिया है। जिसे तूने तमाम महीनों में इम्तियाज़ बख़्श और तमाम वक़्तों और ज़बानों में उसे मुन्तख़ब फ़रमाया है। और इसमें क़ुरान और नूर को नाज़िल फ़रमाकर और ईमान को फ़रोग़ व तरक़्क़ी बख़्श कर उसे साल के तमाम औक़ात पर फ़ज़ीलत दी और इसमें रोज़े वाजिब किये और नमाज़ों की तरग़ीब दी और उसमें शबे क़द्र को बुज़ुर्गी बख़्शी जो ख़ुद हज़ार महीनों से बेहतर है। फिर इस महीने की वजह से तूने हमें तमाम उम्मतों पर तरजीह दी, और दूसरी उम्मतों के बजाए हमें इसकी फ़ज़ीलत के बाएस मुन्तख़ब किया। चुनान्चे हमने तेरे हुक्म से इसके दिनों में रोज़े रखे और तेरी मदद से इसकी रातें इबादत में बसर कीं। इस हालत में के हम इस रोज़ा नमाज़ के ज़रिये तेरी उस रहमत के ख़्वास्तगार थे जिसका दामन तूने हमारे लिये फैलाया है और उसे तेरे अज्र व सवाब का वसीला क़रार दिया और तू हर उस चीज़ के अता करने पर क़ादिर है जिसकी तुझसे ख़्वाहिश की जाए और हर उस चीज़ का बख़्शने वाला है जिसका तेरे फ़ज़्ल से सवाल किया जाए तू हर उस शख़्स से क़रीब है जो तुझसे क़ुर्ब हासिल करना चाहे। इस महीने ने हमारे दरम्यान क़ाबिले सताइश दिन गुज़ारे और अच्छी तरह हक़्क़े रफ़ाक़त अदा किया और दुनिया जहान के बेहतरीन फ़ायदों से हमें मालामाल किया फिर जब उसका ज़माना ख़त्म हो गया मुद्दत बीत गई और गिनती तमाम हो गई तो वह हमसे जुदा हो गया। अब हम उसे रूख़सत करते हैं उस शख़्स के रूख़सत करने की तरह जिसकी जुदाई हम पर शाक़ हो और जिसका जाना हमारे लिये ग़मअफ़ज़ा और वहशतअंगेज़ हुआ और जिसके अहद व पैमान की निगेहदाश्त इज़्ज़त व हुरमत का पास और उसके वाजिबुल अदा हक़ से सुबुकदोशी अज़ बस ज़रूरी हो। इसलिये हम कहते हैं ऐ अल्लाह के बुज़ुर्गतरीन महीने, तुझ पर सलाम। ऐ दोस्ताने ख़ुदा की ईद तुझ पर सलाम। ऐ औक़ात में बेहतरीन रफ़ीक़ और दिनों और साअतों में बेहतरीन महीने तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिसमें उम्मीद बर आती हैं और आमाल की फ़रावानी होती है, तुझ पर सलाम, ऐ वह हम नशीन के जो मौजूद हो तो उसकी बड़ी क़द्र व मन्ज़िलत होती है और न होने पर बड़ा दुख होता है और ऐ वह सरश्माए उम्मीद दरजा जिसकी जुदाई  अलम अंगेज़ है, तुझ पर सलाम। ऐ वह हमदम जो उन्स व दिलबस्तगी का सामान लिये हुए आया तो शादमानी का सबब हुआ और वापस गया तो वहशत बढ़ाकर ग़मगीन बना गया। तुझ पर सलाम। ऐ वह हमसाये जिसकी हमसायगी में दिल नर्म और गुनाह कम हो गए, तुझ पर सलाम। ऐ वह मददगार जिसने शैतान के मुक़ाबले में मदद व एआनत की, ऐ वह साथी जिसने हुस्ने अमल की राहें हमवार कीं तुझ पर सलाम। (ऐ माहे रमज़ान) तुझमें अल्लाह तआला के आज़ाद किये हुए बन्दे किस क़द्र ज़्यादा हैं और जिन्होंने तेरी हुरमत व इज़्ज़त का पास व लेहाज़ रखा वह कितने ख़ुश नसीब हैं, तुझ पर सलाम, तू किस क़द्र गुनाहों को महो करने वाला और क़िस्म क़िस्म के ऐबों को छिपाने वाला है। तुझ पर सलाम। तू गुनहगारों के लिये कितना तवील और मोमिनों के दिलों में कितना पुर हैबत है। तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिससे दूसरे अय्याम हमसरी का दावा नहीं कर सकते, तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जो हर अम्र से सलामती का बाएस है तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसकी हम नशीनी बारे ख़ातिर और मआशेरत नागवार नहीं, तुझ पर सलाम जबके तू बरकतों के साथ हमारे पास आया और गुनाहों की आलूदगियों को धो दिया, तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसे दिल तंगी की वजह से रूख़सत नहीं किया गया और न ख़स्तगी की वजह से उसके रोज़े छोड़े गये तुझ पर सलाम। ऐ व हके जिसके आने की पहले से ख़्वाहिश थी और जिसके ख़त्म होने से क़ब्ल ही दिल रंजीदा हैं तुझ पर सलाम। तेरी वजह से कितनी बुराईयां हमसे दूर हो गईं और कितनी भलाइयों के सरचश्मे हमारे लिये जारी हो गये। तुझ पर सलाम (ऐ माहे रमज़ान)  तुझ पर और उस शबे क़द्र पर जो हज़ार महीनों से बेहतर है। सलाम हो, अभी कल हम कितने तुझ पर वारफ़ता थे और आने वाले कल में हमारे शौक़ की कितनी फ़रावानी होगी। तुझ पर सलाम। (ऐ माहे मुबारक तुझ पर) और तेरी उन फ़ज़ीलतों पर जिनसे हम महरूम हो गए और तेरी गुज़िश्ता बरकतों पर जो हमारे हाथ से जाती रहीं। सलाम हो ऐ अल्लाह हम उस महीने से मख़सूस हैं जिसकी वजह से तूने हमें शरफ़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान से इसकी हक़शिनासी की तौफ़ीक़ दी जबके बदनसीब लोग इसके वक़्त की (क़द्र व क़ीमत) से बेख़बर थे और अपनी बदबख़्ती की वजह से इसके फ़ज़्ल से महरूम रह गए। और तू ही वली व साहेबे इख़्तेयार है। के हमें इसकी हक़शिनासी के लिये मुन्तख़ब किया और इसके एहकाम की हिदायत फ़रमाई। बेशक तेरी तौफ़ीक़ से हमने इस माह में रोज़े रखे, इबादत के लिये क़याम किया मगर कमी व कोताही के साथ और मुश्ते अज़ ख़रवार से ज़्यादा न बजा ला सके। ऐ अल्लाह! हम अपनी बदआमाली का इक़रार और सहलअंगारी का एतराफ़ करते हुए तेरी हम्द करते हैं और अब तेरे लिये कुछ है तो वह हमारे दिलों की वाक़ेई शर्मसारी और हमारी ज़बानों की सच्ची माज़ेरत है, लेहाज़ा इस कमी व कोताही के बावजूद जो हमसे हमसे हुई है हमें ऐसा अज्र अता कर के हम उसके ज़रिये दिलख़्वाह फ़ज़ीलत व सआदत को पा सकें और तरह तरह के अज्र व सवाब के ज़ख़ीरे जिसके हम आरज़ूमन्द थे उसके एवज़ हासिल कर सकें। और हम ने तेरे हक़ में जो कमी व कोताही की है उसमें हमारे उज्ऱ को क़ुबूल फ़रमा और हमारी उम्रे आईन्दा का रिश्ता आने वाले माहे रमज़ान से जोड़ दे। और जब उस तक पहुंचा दे तो जो इबादत तेरे शायाने शान हो उसके बजा लाने पर हमारी एआनत फ़रमाना और इस इताअत पर जिसका वह महीना सज़ावार है अमल पैरा होने तौफ़ीक़ देना और हमारे लिये ऐसे नेक आमाल का सिलसिला जारी रखना के जो ज़मानाए ज़ीस्त के महीनों में एक के बाद दूसरे माह माहे रमज़ान में तेरे हक़ अदायगी का बाएस हों।

ऐ अल्लाह! हमने इस महीने में जो सग़ीरा या कबीरा मासीयत की हो, या किसी गुनाह से आलूदा और किसी ख़ता के मुरतकिब हुए हों जान बूझकर या भूले चौके, ख़ुद अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया हो या दूसरे का दामने हुरमत चाक किया हो। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने पर्दे में ढांप ले, और अपने अफ़ो व दरगुज़र से काम लेते हुए मुआफ़ कर दे। और ऐसा न हो के इस गुनाह की वजह से तन्ज़ करने वालों की आंखें हमें घूरें और तानाज़नी करने वालों की ज़बानें हम पर खुलें। और अपनी शफ़क़्क़ते बेपायां और मरहमत रोज़अफ़ज़ों से हमें इन आमाल पर कारबन्द कर के जो उन चीज़ों को बरतरफ़ करें और उन बातों की तलाफ़ी करें जिन्हें तु इस माह में हमारे लिये नापसन्द करता है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने के रूख़सत होने से जो क़लक़ हमें हुआ है उसका चारा कर और ईद और रोज़ा छोड़ने के दिल हमारे लिये मुबारक क़रार दे और उसे हमारे गुज़रे हुए दिनों में बेहतरीन दिन क़रार दे जो अफ़ो व दरगुज़र को समेटने वाला और गुनाहों को महो करने वाला हो और तू हमारे ज़ाहिर व पोशीदा गुनाहों को बख़्श दे। बारे इलाहा! इस महीने के अलग होने के साथ तू हमें गुनाहों से अलग कर दे और इसके निकलने के साथ तू हमें बुराइयों से निकाल ले। और इस महीने की बदौलत उसको आबाद करने वालों में हमें सबसे बढ़कर ख़ुश बख़्त बानसीब और बहरामन्द क़रार दे। ऐ अल्लाह! जिस किसी ने जैसा चाहिये इस महीने का पास व लेहाज़ किया हो और कमा हक़्क़हू इसका एहतेराम मलहूज़ रखा हो और इसके एहकाम पर पूरी तरह अमलपैरा रहा हो। और गुनाहों से जिस तरह बचना चाहिये उस तरह बचा हो या ब नीयते तक़रूब ऐसा अमले ख़ैर बजा लाया हो जिसने तेरी ख़ुशनूदी उसके लिये ज़रूरी क़रार दी हो और तेरी रहमत को उसकी तरफ़ मुतवज्जेह कर दिया हो तो जो उसे बख़्शे वैसा ही हमें भी अपनी दौलते बेपायां में से बख़्श और अपने फ़ज़्ल व करम से इससे भी कई गुना ज़ाएद अता कर। इस लिये के तेरे फ़ज़्ल के सोते ख़ुश्क नहीं होते और तेरे ख़ज़ाने कम होने में नहीं आते बल्कि बढ़ते ही जाते हैं। और न तेरे एहसानात की कानें फ़ना होती है और तेरी बख़्शिश व अता तो हर लेहाज़ से ख़ुशगवारबख़्शिश व अता है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जो लोग रोज़े क़यामत तक इस माह के रोज़े रखें या तेरी इबादत करें उनके अज्र व सवाब के मानिन्द हमारे लिये अज्र व सवाब सब्त फ़रमा। ऐ अल्लाह! हम उस रोज़े फ़ित्र में जिसे तूने अहले ईमान के लिये ईद व मसर्रत का रोज़ और अहले इस्लाम के लिये इज्तेमाअ व तआवुन का दिन क़रार दिया है हर उस गुनाह से जिसके हम मुरतकिब हुए हों और हर उस बुराई से जिसे पहले कर चुके हों और हर बुरी नीयत से जिसे दिल में लिये हुए हों उस शख़्स की तरह तौबा करते हैं जो गुनाहों की तरफ़ दोबारा पलटने का इरादा न रखता हो और न तौबा के बाद ख़ता का मुरतकिब होता हो। ऐसी सच्ची तौबा जो हर शक व शुबह से पाक हो। तो अब हमारी तौबा को क़ुबूल फ़रमा हमसे राज़ी व ख़ुशनूद हो जा और हमें इस पर साबित क़दम रख। ऐ अल्लाह! गुनाहों की सज़ा का ख़ौफ़ और जिस सवाब का तूने वादा किया है उसका शौक़ हमें नसीब फ़रमा ताके जिस सवाब के तुझसे ख़्वाहिशमन्द हैं उसकी लज़्ज़त और जिस अज़ाब से पनाह मांग रहे हैं उसकी तकलीफ़ व अज़ीयत पूरी तरह जान सकें। और हमें अपने नज़दीक उन तौबा गुज़ारों में से क़रार दे जिनके लिये तूने अपनी मोहब्बत को लाज़िम कर दिया है और जिनसे फ़रमाबरदारी व इताअत की तरफ़ रूजू होने को तूने क़ुबूल फ़रमाया है। ऐ अद्ल करने वालों में सबसे ज़्यादा अद्ल करने वाले।

ऐ अल्लाह! हमारे मां बाप और हमारे तमाम अहले मज़हब व मिल्लत ख़्वाह वह गुज़र चुके हों या क़यामत के दिन तक आईन्दा आने वाले हों सबसे दरगुज़र फ़रमा। ऐ अल्लाह! हमारे नबी मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी रहमत तूने अपने मुक़र्रब फ़रिश्तों पर की है। और उन पर उनकी आल पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने फ़रस्तादा नबीयों पर नाज़िल फ़रमाई है। और उन पर और उनकी आल(अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने नेकोकार बन्दों पर नाज़िल की है। (बल्कि) इससे बेहतर व बरतर। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार ऐसी रहमत जिसकी बरकत हम तक पहुंचे, जिसकी मनफ़अत हमें हासिल हो और जिसकी वजह से हमारी दुआएं क़ुबूल हों। इसलिये के तू उन लोगों से जिनकी तरफ़ रूजू हुआ जाता है, ज़्यादा करीम और उन लोगों से जिन पर भरोसा किया जाता है, ज़्यादा बेनियाज़ करने वाला है और उन लोगों से जिनके फ़ज़्ल की बिना पर सवाल किया जाता है, ज़्यादा अता करने वाला है और तू हर चीज़ पर क़ादिर व तवाना है।

छेयालीसवीं दुआ जब नमाज़े ईदुल फ़ित्र से फ़ारिग़ होकर पलटते तो यह दुआ पढ़ते और जुमे के दिन भी यह दुआ पढ़ते

ऐ वह जो ऐसे शख़्स पर रहम करता है जिस पर बन्दे रहम नहीं करते। ऐ वह जो ऐसे (गुनहगार) को क़ुबूल करता है जिसे कोई क़ितअए ज़मीन (उसके गुनाहों के बाएस) क़ुबूल नहीं करता। ऐ वह जो अपने हाजतमन्द को हक़ीर नहीं समझता। ऐ वह जो गिड़गिड़ाने वालों को नाकाम नहीं फेरता। ऐ वह जो नाज़िश बेजा करने वालों को ठुकराता नहीं। ऐ वह जो छोटे से छोटे तोहफ़े को भी पसन्दीदगी की नज़रों से देखता है और जो मामूली से मामूली अमल उसके लिये बजा लाया गया हो उसकी जज़ा देता है। ऐ वह जो इससे क़रीब हो वह उससे क़रीब होता है। ऐ वह के जो इससे रूगर्दानी करे उसे अपनी तरफ़ बुलाता है। और वह जो नेमत को बदलता नहीं और न सज़ा देने में जल्दी करता है। ऐ वह जो नेकी के नेहाल को बारआवर करता है ताके उसे बढ़ा दे और गुनाहों से दरगुज़र करता है ताके उन्हें नापैद कर दे। उम्मीदें तेरी सरहदे करम को छूने से पहले कामरान होकर पलट आएं और तलब व आरज़ू के मसाग़ेर तेरे फ़ैज़ाने जूद से छलक उठे और सिफ़तें तेरे कमाले ज़ात की मन्ज़िल तक पहुंचने से दरमान्दा होकर मुन्तशिर हो गईं इसलिये के बलन्दतरीन रफ़अत जो हर कंगरह बलन्द से बालातर है, और बुज़ुर्गतरीन अज़मत जो हर अज़मत से बलन्दतर है, तेरे लिये मख़सूस है। हर बुज़ुर्ग तेरी बुज़ुर्गी के सामने छोटा और हर ज़ीशरफ़ तेरे शरफ़ के मुक़ाबले में हक़ीर है। जिन्होंने तेरे ग़ैर का रूख़ किया वह नाकाम हुए। जिन्होंने तेरे सिवा दूसरों से तलब किया वह नुक़सान में रहे, जिन्होंने तेरे सिवा दूसरों के हाँ मन्ज़िल की वह तबाह हुए। जो तेरे फ़ज़्ल के बजाए दूसरों से रिज़्क़ व नेमत के तलबगार हुए वह क़हत व मुसीबत से दो-चार हुए तेरा दरवाज़ा तलबगारों के लिये वा है और तेरा जूद व करम साएलों के लिये आम है। तेरी फ़रयादरसी दादख़्वाहों से नज़दीक है। उम्मीदवार तुझसे महरूम नहीं रहते और तलबगार तेरी अता व बख़्शिश से मायूस नहीं होते, और मग़फ़ेरत चाहने वाले पर तेरे अज़ाब की बदबख़्ती नहीं आती। तेरा ख़्वाने नेमत उनके लिये भी बिछा हुआ है जो तेरी नाफ़रमानी करते हैं। और तेरी बुर्दबारी उनके भी आड़े आती है जो तुझसे दुश्मनी रखते हैं। बुरों से नेकी करना तेरी रोश और सरकशों पर मेहरबानी करना तेरा तरीक़ा है। यहां तक के नर्मी व हिल्म ने उन्हें (हक़ की तरफ़) रूजू होने से ग़ाफ़िल कर दिया और तेरी दी हुई मोहलत ने उन्हें इज्तेनाब मआसी से रोक दिया। हालांके तूने उनसे नर्मी इसलिये की थी के वह तेरे फ़रमान की तरफ़ पलट आएं और मोहलत इसलिये दी थी के तुझे अपने तसल्लुत व इक़्तेदार के दवाम पर एतमाद था (के जब चाहे उन्हें अपनी गिरफ़्त में ले सकता है) अब जो ख़ुश नसीब था उसका ख़ात्मा भी ख़ुश नसीबी पर किया और जो बदनसीब था, उसे नाकाम रखा। (वह ख़ुशनसीब हूँ या बदनसीब) सबके सब तेरे हुक्म की तरफ़ पलटने वाले हैं और उनका माल तेरे अम्र से वाबस्ता है। उनकी तवील मुद्दते मोहलत से तेरी दलील हुज्जत में कमज़ोरी रूनुमा नहीं होती (जैसे उस शख़्स की दलील कमज़ोर हो जाती है जो अपने हक़ के हासिल करने में ताख़ीर करे) और फ़ौरी गिरफ़्त को नज़रअन्दाज़ करने से तेरी हुज्जत व बुरहान बातिल नहीं क़रार पाई (के यह कहा जाए के अगर उसके पास उनके खि़लाफ़ दलील व बुरहान होती तो वह मोहलत क्यों देता) तेरी हुज्जत बरक़रार है जो बातिल नहीं हो सकती, और तेरी दलील मोहकम है जो ज़ाएल नहीं हो सकती। लेहाज़ा दाएमी हसरत व अन्दोह उसी शख़्स के लिये है जो तुझसे रूगर्दां हुआ और रूसवाकुन नामुरादी उसके लिये है जो तेरे हां से महरूम रहा और बदतरीन बदबख़्ती उसी के लिये है जिसने तेरी (चश्मपोशी से) फ़रेब खाया। ऐसा शख़्स किस क़द्र तेरे अज़ाब में उलटे-पलटे खाता और कितना तवील ज़माना तेरे एक़ाब में गर्दिश करता रहेगा और उसकी रेहाई का मरहला कितनी दूर और बा-आसानी निजात हासिल करने से कितना मायूस होगा। यह तेरा फ़ैसला अज़रूए अद्ल है जिसमें ज़रा भी ज़ुल्म नहीं करता। और तेरा यह हुक्म मबनी बर इन्साफ़ है जिसमें इस पर ज़्यादती नहीं करता। इसलिये के तूने पै दरपै दलीलें क़ायम और क़ाबिले क़ुबूल हुज्जतें आश्कारा कर दी हैं और पहले से डराने वाली चीज़ों के ज़रिये आगाह कर दिया है और लुत्फ़ व मेहरबानी से (आख़ेरत की) तरग़ीब दिलाई है और तरह-तरह की मिसालें बयान की हैं। मोहलत की मुद्दत बढ़ा दी है और (अज़ाब में) ताख़ीर से काम लिया है। हालांके तू फ़ौरी गिरफ़्त पर इख़्तियार रखता था और नर्मी व मुदारात से काम लिया है। बावजूद यके तू ताजील करने पर क़ादिर था, यह नर्मरवी, आजिज़ी की बिना पर और मोहलत देही कमज़ोरी की वजह से न थी और न अज़ाब में तौक़फ़ करना ग़फ़लत व बेख़बरी के बाएस और न ताख़ीर करना नर्मी व मुलातेफ़त की बिना पर था। बल्कि यह इसलिये था के तेरी हुज्जत हर तरह से पूरी हो। तेरा करम कामिलतर, तेरा एहसान फ़रावां और तेरी नेमत तमामतर हो। यह तमाम चीज़ें थीं और रहेंगी दरआँ हालिया के तू हमेशा से है और हमेशा रहेगा। तेरी हुज्जत इससे बालातर है के इसके तमाम गोशों को पूरी तरह बयान किया जा सके और तेरी इज़्ज़त व बुज़ुर्गी इससे बलन्दतर है के इसकी कुन्ह व हक़ीक़त की हदें क़ायम की जाएं और तेरी नेमतें इससे फ़ज़ोंतर है के इन सबका शुमार हो सके और तेरे एहसानात इससे कहीं ज़्यादातर हैं के उनमें अदना एहसान पर भी तेरा शुक्रिया अदा किया जा सके। (मैं तेरी हम्द व सिपास से आजिज़ और दरमान्दा हूँ, गोया) ख़ामोशी ने तेरी पै दर पै हम्द व सिपास से मुझे नातवां कर दिया है और क़ौक़फ़ ने तेरी तमजीद व सताइश से मुझे गंग कर दिया है और इस सिलसिले में मेरी तवानाई की हद यह है के अपनी दरमान्दगी का एतराफ़ करूं यह बे रग़बती की वजह से नहीं है। ऐ मेरे माबूद! बल्कि अज्ज़ व नातवानी की बिना पर है। अच्छा तो मैं अब तेरी बारगाह में हाज़िर होने का क़स्द करता हूं और तुझसे हुस्ने एआनत का ख़्वास्तगार हूं। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी राज़ व नियाज़ की बातों को सुन और मेरी दुआ को शरफ़े क़ुबूलियत बख़्श और मेरे दिन को नाकामी के साथ ख़त्म न कर और मेरे सवाल में मुझे ठुकरा न दे, और अपनी बारगाह से पलटने और फिर पलटकर आने को इज़्ज़त व एहतेराम से हमकिनार फ़रमा। इसलिये के तुझे तेरे इरादे में कोई दुश्वारी हाएल नहीं होती और जो चीज़ तुझ से तलब की जाए उसके देने से आजिज़ नहीं होता, और तू हर चीज़ पर क़ादिर है और क़ूवत व ताक़त नहीं सिवा अल्लाह के सहारे के जो बलन्द मरतबा व अज़ीम है।