True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के मुन्तख़ब हुक्म व मवाएज़ का बाब (अक़वाल)

386- वह भलाई भलाई नहीं है जिसका अन्जाम जहन्नम हो और वह बुराई बुराई नहीं है जिसकी आक़ेबत जन्नत हो। जन्नत के अलावा हर नेमत हक़ीर है और जहन्नुम से बच जाने के बाद हर मुसीबत आफ़ियत है।

387- याद रखो के फ़क्ऱ व फ़ाक़ा भी एक बला है और इससे ज़्यादा सख़्त मुसीबत बदन की बीमारी है और इससे ज़्यादा दुश्वारगुज़ार दिल की बीमारी है। मालदारी यक़ीनन एक नेमत है लेकिन इससे बड़ी नेमत सेहते बदन है और इससे बड़ी नेमत दिल की परहेज़गारी है। (((यह नुक्ता उन ग़ोरबा और फ़ोक़रा के समझने के लिये है जो हमेशा ग़ुरबत का मरसिया पढ़ते रहते हैं और कभी सेहत का शुक्रिया नहीं अदा करते हैं जबके तजुर्बात की दुनिया में यह बात साबित हो चुकी है के अमराज़ का औसत दौलतमन्दों में ग़रीबों से कहीं ज़्यादा है और हार्ट अटैक के बेशतर मरीज़ इसी ऊंचे तबक़े से ताल्लुक़ रखते हैं। बल्कि बाज़ औक़ात तो अमीरों की ज़िन्दगी में ग़िज़ाओं से ज़्यादा हिस्सा दवाओं का होताा है और वह बेशुमार ग़िज़ाओं से यकसर महरूम हो जाते हैं।
सेहते बदन  परवरदिगार का एक मख़सूस करम है जो वह अपने बन्दों के शामिलेहाल कर देता है लेकिन ग़रीबों को भी इस नुक्ते का ख़याल रखना चाहिये के अगर उन्होंने इस सेहत का शुक्रिया न अदा किया और सिर्फ़ ग़ुरबत की शिकायत करते रहे तो इसका मतलब यह है के यह लोग जिस्मानी एतबार से सेहतमन्द हैं लेकिन रूहानी एतबार से बहरहाल मरीज़ हैं और यह मर्ज़ नाक़ाबिले इलाज हो चुका है। रब्बे करीम हर मोमिन व मोमेना को इस मर्ज़ से निजात अता फ़रमाए।)))

388- जिसको अमल पीछे हटा दे उसे नसब आगे नहीं बढ़ा सकता है। या (दूसरी रिवायत में) जिसके हाथ से अपना किरदार निकल जाए उसे आबा व अजदाद के कारनामे फ़ायदा नहीं पहुंचा सकते हैं।

389- मोमिन की ज़िन्दगी के तीन औक़ात होते हैं- एक साअत में वह अपने रब से राज़ व नियाज़ करता है और दूसरे वक़्त में अपने मआश की इस्लाह करता है और तीसरे वक़्त में अपने नफ़्स को उन लज़्ज़तों के लिये आज़ाद छोड़ देता है जो हलाल और पाकीज़ा हैं। किसी अक़्लमन्द को यह ज़ेब नहीं देता है के अपने घर से दूर हो जाए मगर यह के तीन में से कोई एक काम हो - अपने मआश की इस्लाह करे, आख़ेरत की तरफ़ क़दम आगे बढ़ाए, हलाल और पाकीज़ा लज़्ज़त हासिल करे।

390- दुनिया में ज़ोहद इख़्तेयार करो ताके अल्लाह तुम्हें इसकी बुराइयों से आगाह कर दे और ख़बरदार ग़ाफ़िल न हो जाओ के तुम्हारी तरफ़ से ग़फ़लत नहीं बरती जाएगी।

391- बोलो ताके पहचाने जाओ इसलिये के इन्सान की शख़्िसयत इसकी ज़बान के नीचे छुपी रहती है।

392- जो दुनिया में हासिल हो जाए उसे ले लो और जो चीज़ तुमसे मुंह मोड़ ले तुम भी उससे मुंह फेर लो और अगर ऐसा नहीं कर सकते हाो तो तलब में मयानारवी से काम लो।

393- बहुत से अलफ़ाज़ हमलों से ज़्यादा असर रखने वाले होते हैं। (((इसी बुनियाद पर कहा गया है के तलवार का ज़ख़्म भर जाता है लेकिन ज़बान का ज़ख़्म नहीं भरता है। और इसके अलावा दोनों का बुनियादी फ़र्क़ यह है के हमलों का असर महदूद इलाक़ों पर होता है और जुमलों का असर सारी दुनिया में फैल जाता है जिसका मुशाहेदा इस दौर में बख़ूबी किया जा सकता है के हमले तमाम दुनिया में बन्द पड़े हैं लेकिन जुमले अपना काम कर रहे हैं और मीडिया सारी दुनिया में ज़हर फैला रहा है और सारे आलमे इन्सानियत को हर जहत और एतबार से तबाही और बरबादी के घाट उतार रहा है।)))

394- जिस पर इक्तिफ़ा कर ली जाए वही काफ़ी हो जाता है। (((हिरस व हव सवह बीमारी है जिसका इलाज क़नाअत और किफ़ायत शआरी के अलावा कुछ नहीं है। यह दुनिया ऐसी है के अगर इन्सान इसकी लालच में पड़ जाए तो मुल्के फ़िरऔन और इक़्तेदारे यज़ीद व हज्जाज भी कम पड़ जाता है और किफ़ायत शआरी पर आ जाए तो जौ की रोटियाँ भी उसके किरदार कर एक हिस्सा बन जाती हैं और वह निहायत दरजए बेनियाज़ी के साथ दुनिया को तलाक़ देने पर आमादा हो जाता है और फ़िर रूजू करने का भी इरादा नहीं करता है।)))

395- मौत हो लेकिन ख़बरदार ज़िल्लत न हो। कम हो लेकिन दूसरों को वसीला न बनाना पड़े। जिसे बैठकर नहीं मिल सकता है उसे खड़े होकर भी नहीं मिल सकता है। ज़माना दोनों का नाम है- एक दिन तुम्हारे हक़ में होता है तो दूसरा तुम्हारे खि़लाफ़ होता है लेहाज़ा अगर तुम्हारे हक़ में हो तो मग़रूर न हो जाना और तुम्हारे खि़लाफ़ हो जाए तो सब्र से काम लेना। (((यहाँ बैठने से मुराद बैठ जाना नहीं है वरना इस नसीहत को सुनकर हर इन्सान बैठ जाएगा और मेहनत व मशक़्क़त का सिलसिला ही मौक़ूफ़ हो जाएगा बल्कि इस बैठने से मुराद बक़द्रे ज़रूरत मेहनत करना है जो इन्सानी ज़िन्दगी के लिये काफ़ी हो और इन्सान उससे ज़्यादा जान देने पर आमादा न हो जाए के इसका कोई फ़ायदा नहीं है और फ़िज़ूल मेहनत से कुछ ज़्यादा हासिल होने वाला नहीं है।)))
396- बेहतरीन ख़ुशबू का नाम मुश्क है जिसका वज़्न इन्तेहाई हलका होता है और ख़ुशबू निहायत दरजा महकदार होती है।

397- फ़ख़्र व सरबलन्दी को छोड़ दो और तकब्बुर व ग़ुरूर को फ़ना कर दो और फिर अपनी क़ब्र को याद करो।

398- फ़रज़न्द का बाप पर एक हक़ होता है और बाप का फ़रज़न्द पर एक हक़ होता है। बाप का हक़ यह है के बेटा हर मसले में इसकी इताअत करे मासियते परवरदिगार के अलावा और फ़रज़न्द का हक़ बाप पर यह है के उसका अच्छा सा नाम तजवीज़ करे और उसे बेहतरीन अदब सिखाए और क़ुराने मजीद की तालीम दे।

399- चश्मे बद- फ़सोंकारी, जादूगरी और फ़ाल नेक यह सब वाक़ईयत रखते हैं लेकिन बदशगूनी की कोई हक़ीक़त नहीं है और यह बीमारी की छूत छात भी बेबुनियाद अम्र है। ख़ुशबू, सवारी, शहद और सब्ज़ा देखने से फ़रहत हासिल होती है। (((काश कोई शख़्स हमारे मुआशरे को इस हक़ीक़त से आगाह कर देता और इसे बावर करा देता के बद शगूनी एक वहमी अम्र है और इसकी कोई हक़ीक़त व वाक़ईयत नहीं है और मर्दे मोमिन को सिर्फ़ हक़ाएक़ और वाक़ेयात पर एतमाद करना चाहिये। मगर अफ़सोस के मुआशरे का सारा कारोबार सिर्फ़ औहाम व ख़यालात पर चल रहा है और शगूने नेक की तरफ़ कोई शख़्स मुतवज्जेह नहीं होता है और बदशगूनी का एतबार हर शख़्स कर लेता है और इसी पर बेशुमार समाजी असरात भी मुरत्तब  हो जाते हैं और मुआशेरती फ़साद का एक सिलसिला शुरू हो जाता है।)))

400- लोगों के साथ एख़लाक़ियात में क़ुरबत रखना उनके शर से बचाने का बेहतरीन ज़रिया है।

((( चूंके हर इन्सान की ख़्वाहिश होती है के लोग उसके साथ बुरा बरताव न करें और वह हर एक के शर से महफ़ूज़ रहे लेहाज़ा इसका बेहतरीन तरीक़ा यह है के लोगों से ताल्लुक़ात क़ायम करे और उनसे रस्म-राह बढ़ाए ताके वह शर फैलाने का इरादा  ही न करें। के मुआशरे में ज़्यादा हिस्सए शर इख़तेलााफ़ और दूरी से पैदा होता है वरना क़ुरबत के बाद किसी न किसी मिक़दार में तकल्लुफ़ ज़रूर पैदा हो जाता है।)))

401- एक शख़्स ने आपके सामने अपनी औक़ात से ऊंची बात कह दी, तो फ़रमाया तुम तो पर निकलने से पहले ही उड़ने लगे और जवानी आने से पहले ही बिलबिलाने लगे।

सय्यद रज़ी- शकीर परिन्दा के इब्तिदाई परों को कहा जाता है और सक़ब छोटे ऊंट का नाम है जबके बिलबिलाने का सिलसिला जवाने के बाद शुरू होता है। 

(((बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके पास इल्म व फ़ज़्ल और कमाल व हुनर कुछ नहीं होता है लेकिन ऊंची महफ़िलों में बोलने का शौक़ ज़रूर रखते हैं जिस तरह के बाज़ ख़ोतबा कमाले जेहालत के बावजूद हर बड़ी से बड़ी मजलिस से खि़ताब करने के उम्मीदवार रहते हैं और उनका ख़याल यह होता है के इस तरह अपनी शख़्सियत का रोब क़ायम कर लेंगे और यह एहसास भी नहीं होता है के रही सही इज़्ज़त भी चली जाएगी और मजमए आम में रूसवा हो जाएंगे। 
अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने ऐसे ही अफ़राद को तम्बीह की है जो क़ब्ल अज़ वक़्त बालिग़ हो जाते हैं और बलूगे़ फ़िक्री से पहले ही बिलबिलाने लगते हैंं।))) 

402- जो मुख़तलिफ़ चीज़ों पर नज़र रखता है उसकी तदबीरें उसका साथ छोड़ देती हैं।

403- आपसे दरयाफ़्त किया गया के ‘‘लाहौला वला क़ूवता इल्ला बिल्लाह’’ के मानी क्या हैं? तो फ़रमाया के हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ का इख़्तेयार नहीं रखते हैं और जो कुछ मिल्कियत है सब उसी की दी हुई है तो जब वह किसी ऐसी चीज़ का इख़्तेयार देता है जिसका इख़्तेयार उसके पास हमसे ज़्यादा है तो हमें ज़िम्मेदारियां भी देता है और जब वापस ले लेता है तो ज़िम्मेदारियों को उठा लेता है।

404- आपने देखा के अम्मार यासिर मग़ीरा बिन शैबा से बहस कर रहे हैं तो फ़रमाया अम्मार! उसे उसके हाल पर छोड़ दो। उसने दीन में से इतना ही हिस्सा लिया है जो उसे दुनिया से क़रीबतर बना सके और जानबूझ कर अपने लिये उमूर को मुश्तबा बना लिया है ताके उन्हीं शुबहात को अपनी लग्ज़िशों का बहाना क़रार दे सके। (((इब्ने अबी अल हदीद ने मख़ीरा के इस्लामम की यह तारीख़ नक़्ल की है के यह शख़्स एक क़ाफ़िले के साथ सफ़र में जा रहा था एक मक़ाम पर सब को शराब पिलाकर बेहोश कर दिया और फिर क़त्ल करके सारा सामान लूट लिया। इसके बाद जब यह ख़तरा पैदा हुआ के वोरसा इन्तेक़ाम लेंगे और जान का बचाना मुश्किल हो जाएगा तो भागकर मदीने आ गया और फ़ौरन इस्लाम क़ुबूल कर लिया के इस तरह जान बचाने का एक रास्ता निकल आएगा। यह शख़्स इस्लाम व ईमान दोनों से बेबहरा था। इस्लाम जान बचाने के लिये इख़्तेयार किया था और ईमान का यह आलम था के बरसरे मिम्बर ‘‘कुल्ले ईमान’’ को गालियाँ दिया करता था और इसी बदतरीन किरदार के साथ दुनिया से रूख़सत हो गया जो हर दुश्मने अली (अ0) का आखि़री अन्जाम होता है।)))

405- किस क़द्र अच्छी बात है के मालदार लोग अज्रे इलाही की ख़ातिर फ़क़ीरों के साथ तवाज़ो से पेश आएं लेकिन इससे अच्छी बात यह है के फ़ोक़रा ख़ुदा पर भरोसा करके दौलतमन्दों के साथ तमकनत से पेश आएं। (((तकब्बुर और तमकनत कोई अच्छी चीज़ नहीं है लेकिन जहाँ तवाज़ोअ और ख़ाकसारी में फ़ितना व फ़साद पाया जाता हो वरना तकब्बुर और तमकनत का इज़हार बेहद ज़रूरी हो जाता है। फ़ोक़रा के तकब्बुर का मक़सद यह नहीं है के ख़्वाह म ख़्वाह अपनी बड़ाई का इज़हार करें और बेबुनियाद तमकनत का सहारा लें, बल्कि इसका मक़सद यह है के अग़नेया के बजाए परवरदिगार पर भरोसा करें और उसकी के भरोसे पर अपनी बेनियाज़ी का इज़हार करें ताके ईमान व अक़ीदे में इस्तेहकाम पैदा हो और अग़नेया भी तवाज़ो और इन्कार पर मजबूर हो जाएं और इस तवाज़ो से उन्हें भी कुछ अज्र व सवाब हासिल हो जाए)))

406- परवरदिगार किसी शख़्स को अक़्ल इनायत नहीं करता है मगर यह के एक दिन उसी के ज़रिये से हलाकत से निकाल लेता है।

407- जो हक़ से टकराएगा हक़ बहरहाल उसे पछाड़ देगा।

408- दिल आँखों का सहीफ़ा है।

409- तक़वा तमाम एख़लाक़ियात का रास व रईस है।

410- अपनी ज़बान की तेज़ी उसके खि़लाफ़ इस्तेमाल न करो जिसने तुम्हें बोलना सिखाया है और अपने कलाम की फ़साहत का मुज़ाहेरा उस पर न करो जिसने रास्ता दिखाया है।

411- अपने नफ़्स की तरबीयत के लिये यही काफ़ी है के उन चीज़ों से इज्तेनाब करो जिन्हें दूसरों के लिये बुरा समझते हो।

412- इन्सान जवाँमर्दों की तरह सब्र करेगा वरना सादा लौहों की तरह चुप हो जाएगा।

413- दूसरी रिवायत में है के आपने अश्अस बिन क़ैस को उसके बेटे की ताज़ियत पेश करते हुए फ़रमाया के बुज़ुर्गों की तरह सब्र करो वरना जानवरों की तरह एक दिन ज़रूर भूल जाओगे।

414- आपने दुनिया की तौसीफ़ करते हुए फ़रमाया के यह धोका देती है, नुक़सान पहुंचाती है और गुज़र जाती है, अल्लाह ने इसे न अपने औलिया के सवाब के लिये पसन्द किया है और न दुश्मनों के अज़ाब के लिये, अहले दुनिया उन सवारों के मानिन्द हैं जिन्होंने जैसे ही क़याम किया हंकाने वाले ने ललकार दिया के कूच का वक़्त आ गया है और फिर रवाना हो गए।

415- अपने फ़रज़न्द हसन (अ0) से बयान फ़रमाया - ख़बरदार दुनिया की कोई चीज़ अपने बाद के लिये छोड़कर मत जाना के इसके वारिस दो ही तरह के लोग होंगे। या वह होंगे जो नेक अमल करेंगे तो जो माल तुम्हारी बदबख़्ती का सबब बना है वही उनकी नेकबख़्ती का सबब होगा और अगर उन्होंने मासियत में लगा दिया तो वह तुम्हारे माल की वजह सी बदबख़्त होंगे और तुम उनकी मासियत के मददगार शुमार होगे और इन दोनों में से कोई ऐसा नहीं है जिसे तुम अपने नफ़्स पर तरजीह दे सकते हो। 

सय्यद रज़ी- इस कलाम को एक दूसरी तरह भी नक़्ल किया गया है के ‘‘यह दुनिया जो आज तुम्हारे हाथ में है कल दूसरे इसके अहल रह चुके हैं और कल दूसरे इसके अहल होंगे और तुम इसे दो में से एक के लिये जमा कर रहे हो या वह शख़्स जो तुम्हारे जमा किये हुए को इताअते ख़ुदा में सर्फ़ करेगा तो जमा करने की ज़हमत तुम्हारी होगी और नेकबख़्ती उसके लिये होगी। या वह शख़्स होगा जो मासियत में सर्फ़़ करेगा तो उसके लिये जमा करके तुम बदबख़्ती का शिकार होगे और इनमें से कोई इस बात का अहल नहीं है के उसे अपने नफ़्स पर मुक़द्दम कर सको और उसके लिये अपनी पुश्त को गराँबार बना सको लेहाज़ा जो गुज़र गए उनके लिये रहमते ख़ुदा की उम्मीद करो और जो बाक़ी रह गए हैं उनके लिये रिज़्क़े ख़ुदा की उम्मीद करो।’’

(((इमाम हसन (अ0) से खि़ताब कसले की अहमियत की तरफ़ इशारा है के इतनी अज़ीम बात का समझना और उससे फ़ायदा उठाना हर इन्सान के बस का काम नहीं है वरना इमामे हसन (अ0) जैसी शख़्िसयत का इन्सान इन नुकात की तरफ़ तवज्जो दिलाने का मोहताज नहीं है और इनका काम ख़ुद ही आलमे इन्सानियत को उन हक़ाएक़ से बाख़बर करना और उन नुकात की तरफ़ मुतवज्जोह करना है। बहरहाल मसल इन्तेहाई अहम है के इन्सान को अपनी आक़बत के लिये जो कुछ करना है वह अपनी ज़िन्दगी में करना है, मरने के बाद दूसरों से उम्मीद लगाना एक वसवसए शैतानी है और कुछ नहीं है, फिर माल भी परवरदिगार ने दिया है तो उसका फ़ैसला भी ख़ुद ही करना है, चाहे ज़िन्दगी में सर्फ़ कर दे या उसके मसरफ़ का तअय्युन कर दे वरना फ़ायदा दूसरे अफ़राद उठाएंगे और वबाल उसे बरदाश्त करना पड़ेगा।)))

416- एक शख़्स ने आपके सामने अस्तग़फ़ार किया ‘‘अस्तग़फ़ेरूल्लाह’’ तो आपने फ़रमाया के तेरी माँ तेरे मातम में बैठे। यह असतग़फ़ार बलन्दतरीन लोगों का मक़ाम है और इसके मफ़हूम में छः चीज़ें शामिल हैं- 1. माज़ी पर शर्मिन्दगी 2. आइन्दा के लिये न करने का अज़्मे मोहकम 3. मख़लूक़ात के हुक़ूक़ का अदा कर देना के इसके बाद यूँ पाकदामन हो जाए के कोई मवाख़ेज़ा न रह जाए। 4. जिस फ़रीज़े को ज़ाया कर दिया है उसे पूरे तौर पर अदा कर देना। 5- गोश्त (अकल) हराम से नशो नुमा पाता रहा है इसको ग़म व अन्दोह से पिघलाओ यहाँ तक के खाल  को हड्डियों से मिला दो के फिर से इन दोनों के दरम्यान नया गोश्त पैदा हो। 6- अपने जिस्म को इताअत के  रन्ज से आश्ना करो जिस तरह उसे गुनाह की शीरीनी से लज़्ज़त अन्दोज़ किया है तो अब कहो ‘‘अस्तग़फ़ेरूल्लाह’’।
417- हिल्म व तहम्मुल एक पूरा क़बीला है। 

418- बेचारा आदमी कितना बेबस है मौत उससे नेहाँ, बीमारियाँ उससे  पोशीदा और उसके आमाल महफ़ूज़ हैं मच्छर के काटने से चीख़ उठता है, उच्छू  लगने से मर जाता है और पसीना इसमें बदबू पैदा कर देता है।

419- वारिद हुआ है के हज़रत अपने असहाब के दरम्यान बैठे हुए थे, के उनके सामने से एक हसीन औरत का गुज़र हुआ जिसे उन लोगों ने देखना शुरू किया जिस पर हज़रत ने फ़रमाया- इन मर्दों की आंखें ताकने वाली हैं और यह नज़र बाज़ी इनकी ख़्वाहिशात को बराँगीख़्ता करने का सबब है। लेहाज़ा अगर तुममें से किसी की नज़र ऐसी औरत पर पड़े जो उसे अच्छी मालूम हो तो उसे अपनी ज़ौजा की तरफ़ मुतवज्जो होना चाहिये क्यूंके यह औरत भी औरत के मानिन्द है यह सुनकर एक ख़ारेजी ने कहा के ख़ुदा इस काफ़िर को क़त्ल करे यह कितना बड़ा फ़क़ीह है, यह सुनकर लोग उसे क़त्ल करने उठे, हज़रत ने फ़रमाया के ठहरो!  ज़्यादा से ज़्यादा गाली का बदला गाली से हो सकता है, या इसके गुनाही ही से दरगुज़र करो।

420- इतनी अक़्ल तुम्हारे लिये काफ़ी है के जो गुमराही की राहों को हिदायत के रास्तों से अलग करके तुम्हें दिखा दे।

421- अच्छे काम करो और थोड़ी सी भलाई को भी हक़ीर न समझो, क्योंके छोटी सी नेकी भी बड़ी और थोड़ी सी भलाई भी बहुत है। तुममें से कोई शख़्स यह न कहे के अच्छे काम के करने में कोई दूसरा मुझसे ज़्यादा सज़ावार है, वरना ख़ुदा की क़सम ऐसा ही होकर रहेगा। कुछ नेकी वाले होते हैं और कुछ बुराई वाले, जब तुम नेकी या बदी किसी एक को छोड़ दोगे तो तुम्हारे बजाय इसके अहल इसे अन्जाम देकर रहेंगे।

422-जो अपने अन्दरूनी हालात को दुरूस्त रखता है ख़ुदा उसके ज़ाहिर को भी दुरूस्त कर देता है और जो दीन के लिये सरगर्मे अमल  होता है अल्लाह उसके दुनिया के कामों को पूरा कर देता है और जो अपने और अल्लाह के दरम्यान ख़ुश मआमलेगी रखता है ख़ुदा उसके और बन्दों के दरम्यान के मामलात ठीक कर देता है।

423- हिल्म व तहम्मुल ढांकने वाला परदा और अक़्ल  काटने वाली तलवार है। लेहाज़ा अपने एख़लाक़ के कमज़ोर पहलू को हिल्म व बुर्दबारी से छुपाओ और अपनी अक़्ल स ख़्वाहिशे नफ़सानी का मुक़ाबेला करो।

424- बन्दों की मनफ़अत  रसानी के लिये अल्लाह कुछ बन्दगाने ख़ुदा को नेमतों से मख़सूस कर लेता है लेहाज़ा जब तक वह देते दिलाते रहते हैं, अल्लाह उन नेमतों को उनके हाथों में बरक़रार रखता है और जब इन नेमतों को रोक लेते हैं तो अल्लाह उनसे छीनकर दूसरों की तरफ़ मुन्तक़िल कर देता है।

425- किसी बन्दे के लिये मुनासिब नहीं है के वह दो चीज़ों पर भरोसा करे। एक सेहत और दूसरे दौलत। क्योंके अभी तुम किसी को तन्दरूस्त देख रहे थे, के वह देखते ही देखते बीमार पड़ जाता है और अभी तुम उसे दौलतमन्द देख रहे थे के फ़क़ीर व नादार हो जाता है।

426- जो शख़्स अपनी हाजत का गिला किसी मर्दे मोमिन से करता है, गोया उसने अल्लाह के सामने अपनी शिकायत पेश की। और जो काफ़िर के सामने गिला करता है गोया उसने अपने अल्लाह की शिकायत की।

427- एक ईद के मौक़े पर फ़रमाया ईद सिर्फ़ उसके लिये है जिसके रोज़ों को अल्लाह ने क़ुबूल किया हो, और उसके क़याम (नमाज़) को क़द्र की निगाह से देखता हो, और ह रवह दिन के जिसमें अल्लाह की मासियत न की जाए, ईद का दिन है।

428- क़यामत के दिन सबसे बड़ी हसरत उस शख़्स की होगी जिसने अल्लाह की नाफ़रमानी करके माल हासिल किया हो, और उसका वारिस वह शख़्स हुआ हो जिसने उसे अल्लाह की इताअत में सर्फ़ किया हो के यह तो इस माल की वजह से जन्नत में दाखि़ल हुआ और पहला उसकी वजह से जहन्नुम में गया।

429- लेन देन में सबसे ज़्यादा घाटा उठाने वाला और दौड़ धूप में सबसे ज़्यादा नाकाम होने वाला वह शख़्स है जिसने माल की तलब में अपने बदन को बोसीदा कर डाला हो। मगर तक़दीर ने उसके इरादों में उसका साथ न दिया हो। लेहाज़ा वह दुनिया से भी हसरत लिये हुए गया, और आख़ेरत में भी उसकी पादाश का सामना किया।

430- रिज़्क़ दो तरह का होता है- एक वह जो ढूंढता है और एक वह जिसे ढूंढा जाता है। चुनांचे जो दुनिया का तलबगार होता है, मौत उसको ढूंढती है यहां तक के दुनिया से उसे निकाल बाहर करती है और जो शख़्स आख़ेरत का ख़्वास्तगार होता है दुनिया ख़ुद उसे तलाश करती है यहां तक के वह उसके तमाम व कमाल अपनी रोज़ी हासिल कर लेता है।

431-दोस्ताने ख़ुदा वह हैं के जब लोग दुनिया के ज़ाहिर को देखते हैं तो वह उसके बातिन पर नज़र करते हैं और जब लोग उसकी जल्द मयस्सर आ जाने वाली नेमतों में खो जाते हैं तो वह आख़ेरत में हासिल होने वाली चीज़ों में मुनहमिक रहते हैं और जिन चीज़ों के मुताल्लिक़ उन्हें यह खुटका था के वह उन्हें तबाह करेंगी, उन्हें तबाह करके रख दिया और जिन चीज़ों के मुताल्लिक़ उन्होंने जान लिया के वह उन्हें छोड़ देने वाली हैं उन्हें उन्होंने ख़ुद छोड़ दिया और दूसरों के दुनिया ज़्यादा समेटने को कम ख़याल किया, और उसे हासिल करने को खोने के बराबर जाना। वह उन चीज़ों के दुश्मन हैं जिनसे दूसरों की दोस्ती है और उन चीज़ों के दोस्त हैं जिन चीज़ों से औरों को दुश्मनी है। उनके ज़रिये से क़ुरान का इल्म हासिल हुआ और क़ुरान के ज़रिये से उनका इल्म हासिल हुआ और इनके ज़रिये से किताबे ख़ुदा महफ़ूज़ और वह उसके ज़रिये से बरक़रार हैं। वह जिस चीज़ की उम्मीद रखते हैं, उससे किसी चीज़ को बलन्द नहीं समझते और जिस चीज़ से ख़ाएफ़ हैं उससे ज़्यादा किसी शै को ख़ौफ़नाक नहीं जानते।

432-लज़्ज़तों के ख़त्म होने अैर पादाशों के बाक़ी रहने को याद रखो।

433- आज़माओ के उससे नफ़रत करो। 

सय्यद रज़ी- फ़रमाते हैं के कुछ लोगों ने इस फ़िक़रे की जनाब रिसालत मआब (स0) से रिवायत की है मगर इसके कलामे अमीरूल मोमेनीन (अ0) होने के मवीदात में से है वह जिसे सालब ने बयान किया है। वह कहते हैं के मुझसे इब्ने आराबी ने बयान किया के मामूं ने कहा के अगर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने यह न कहा होता के ‘‘आज़माओ के इससे नफ़रत करो’’ तो मैं यूँ कहता के दुश्मनी करो उससे ताके आज़माओ।

434- ऐसा नहीं के अल्लाह किसी बन्दे के लिये शुक्र का दरवाज़ा खोले और (नेमतों की) अफ़ज़ाइश का दरवाज़ा बन्द कर दे और किसी बन्दे के लिये दुआ का दरवाज़ा खोले और दरे क़ुबूलियत को उसके लिये बन्द रखे, और किसी बन्दे के लिये तौबा का दरवाज़ा खोले और मग़फ़ेरत का दरवाज़ा उसके लिये बन्द कर दे।
435- लोगों में सबसे ज़्यादा वह करम व बख़्िशश का वह अहल है जिसका रिश्ता अशराफ़ से मिलता हो। 

436- आपसे दरयाफ़्त किया गया के अद्ल बेहतर है या सख़ावत! फ़रमाया के अद्ल तमाम उमूर को उनके मौक़े व महल पर रखता है और सख़ावत उनको उनकी हदों से बाहर कर देती है। अद्ल सबकी निगेहदाश्त करने वाला है, और सख़ावत उसी से मख़सूस होगी जिसे दिया जाए, लेहाज़ा अद्ल सख़ावत से बेहतर व बरतर है।

437- लोग जिस चीज़ को नहीं जानते उसके दुश्मन हो जाते हैं।

438- ज़ोहद की मुकम्मल तारीफ़ क़ुरान के दो जुमलों में है। इरशादे इलाही है ‘‘जो चीज़ तुम्हारे हाथ से जाती रहे, उस पर रन्ज न करो और जो चीज़ ख़ुदा तुम्हें दे उस पर इतराओ नहीं’’ लेहाज़ा जो शख़्स जाने वाली चीज़ पर अफ़सोस नहीं करता और आने वाली चीज़ पर इतराता नहीं है, उसने ज़ोहद को दोनों सिम्तों से समेट लिया।

439- नीन्द दिन की महम्मों में बड़ी कमज़ोरी पैदा करने वाली है। 

440- हुकूमत लोगों के लिये आज़माइश का मैदान है।

441- तुम्हारे लिये एक शहर दूसरे शहर से ज़्यादा हक़दार नहीं (बल्कि) बेहतरीन शहर वह है जो तुम्हारा बोझ उठाए।

442- जब मालिके अश्तर रहमल्लाह की ख़बरे शहादत आई तो फ़रमाया  मालिक! और मालिक क्या शख़्स था, ख़ुदा की क़सम अगर वह पहाड़ होता तो एक कोहे बलन्द होता, और अगर वह पत्थर होता तो एक संगे गराँ होता, के  न तो उसकी बलन्दियों तक कोई सुम पहुंच सकता और न कोई परिन्दा वहाँ तक पर मार सकता। 

सय्यद रज़ी- फ़न्दा उस पहाड़ को कहते हैं जो दूसरे पहाड़ों से अलग हो।

443- वह थोड़ा सा अमल जिसमें हमेशगी हो उस ज़्यादा से बेहतर है जो दिल तन्गी का बाएस हो।

444- अगर किसी इन्सान में कोई अच्छी ख़सलत पाई जाती है तो उससे दूसरी ख़सलतों की भी तवक़्क़ो की जा सकती है। (((चूंके अच्छी ख़सलत शराफ़ते नफ़्स से पैदा होती है लेहाज़ा एक ख़सलत को भी देखकर यह अन्दाज़ा किया जा सकता है के इस शख़्स में शराफ़ते नफ़्स पाई जाती है और यह शराफ़ते नफ़्स जिस तरह इस एक ख़सलत पर आमादा कर सकती है उसी तरह दूसरी ख़सलतें भी पैदा कर सकती है के एक दरख़्त में एक ही मेवा नहीं पैदा होता है।)))
445- ग़ालिब बिन सासा (पिदरे फ़रज़दक़) से गुफ़्तगू के दौरान फ़रमाया - तुम्हारे बेशुमार ऊंटों का क्या हुआ? उन्होंने कहा के हुकू़क़ की अदायगी ने मुन्तशिर कर दिया। फ़रमाया के यह बेहतरीन और क़ाबिले तारीफ़ रास्ता है। (((इब्ने अबी अल हदीद का बयान है के ग़ालिब फ़रज़दक़ को लेकर हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो आपने ऊँटों के बारे में भी सवाल किया और फ़रज़दक़ के बारे में भी सवाल किया तो ग़ालिब ने कहा के यह मेरा फ़रज़न्द है और इसे मैंने ‘ोर व अदब की तालीम दी है। आपने फ़रमाया के ऐ काश तुमने क़ुराने मजीद की तालीम दी होती, जिसका नतीजा यह हुआ के यह बात दिल को लग गई और उन्होंने अपने पैरों में ज़न्जीरें डाल लीं और उन्हें उस वक़्त तक नहीं खोला जब तक सारा क़ुरान हिफ़्ज़ नहीं कर लिया।)))

446-जो एहकाम को दरयाफ़्त किये बग़ैर तिजारत करेगा वह कभी न कभी सूद में ज़रूर मुब्तिला  हो जाएगा। (((यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के फ़िक़ की ज़रूरत सिर्फ़ सलवात व सयाम के लिये नहीं है बल्कि इसकी ज़रूरत ज़िन्दगी के हर शोबे में है ताके इन्सान बुराइयों से महफ़ूज़ रह सके और लुक़्मए हलाल पर ज़िन्दगी गुज़ार सके वरना फ़िक़ के बग़ैर तिजारत करने में भी सूद का अन्देशा है और सूद से बदतर इस्लाम में कोई माल नहीं है जिसका एक पैसा भी हलाल नहीं कहा गया है।)))

447-जो छोटे मसाएब को भी बड़ा ख़याल करेगा उसे ख़ुदा बड़े मसाएब में भी मुब्तिला कर देगा। (((इन्सान का हुनर यह है के हमेशा मसाएब का मुक़ाबला करने के  लिये तैयार रहे और बड़ी से बड़ी मुसीबत भी आ जाए तो उसे हक़ीर व मामूली ही समझे ताके दीगर मसाएब को हमला करने का मौक़ा न मिले वरना एक मरतबा अपनी कमज़ोरी का इज़हार कर दिया तो मसाएब का हुजूम आम हो जाएगा और इन्सान एक लम्हे के लिये भी निजात हासिल न कर सकेगा)))
448- जिसे उसका नफ़्स अज़ीज़ होगा  उसकी नज़र में ख़्वाहिशात बेक़ीमत होंगी (के उन्हीं से इज़्ज़ते नफ़्स की तबाही पैदा होती है) (((ख़्वाहिश उस क़ैद का नाम  है जिसका क़ैदी ता हयात आज़ाद नहीं हो सकताा है के हर क़ैद का  ताल्लुक़ इन्सान की बैरूनी ज़िन्दगी से होता है और ख़्वाहिश इन्सान को अन्दर से जकड़ लेती है जिसके बाद कोई आज़ाद कराने वाला भी नहीं पैदा होता  है और यही वजह है के  जब एक मर्द हकीम से पूछा गया के दुनिया में तुम्हारी ख़्वाहिश क्या है? तो उसने बरजस्ता यही जवाब  दिया के बस यही के किसी चीज़ की ख़्वाहिश न पैदा हो।)))

449- इन्सान जिस क़द्र भी मिज़ाह करता है उसी क़द्र अपनी अक़्ल का एक हिस्सा अलग कर देता है। (((मिज़ाह एक बेहतरीन चीज़ है जिससे इन्सान ख़ुद भी ख़ुश होता है और दूसरों को भी ख़ुशहाल बनाता है लेकिन इसकी शर्त यही है के मिज़ाह बहद्दे मिज़ाह हो और इसमें ग़लत बयानी, फ़रेबकारी, ईज़ाए मोमिन, तौहीने मुसलमान का पहलू न पैदा होने पाए और हद से ज़्यादा भी न हो वरना हराम और बाएसे हलाकत व बरबादी हो जाएगा।)))

450- जो तुम्हारी तरफ़ रग़बत करे उससे किनाराकशी ख़सारा है और जो तुमसे किनाराकश हो जाए उसकी तरफ़ रग़बत ज़िल्लते नफ़्स है। 

451- मालदारी और ग़ुरबत का फ़ैसला परवरदिगार की बारगाह में पेशी के बाद होगा।

452-ज़ुबैर हमेशा हम अहलेबैत (अ0) की एक फ़र्द शुमार होता था यहाँ तक के उसका मख़सूस फ़रज़न्द अब्दुल्लाह नमूदार हो गया।

453- आखि़र फ़रज़न्दे आदम का फ़ख़र व मुबाहात से क्या ताल्लुक़ है जबके इसकी इब्तिदा नुत्फ़ा है और इन्तेहा मुरदार। वह न अपनी रोज़ी का इख़्तेयार रखता है और न अपनी मौत को टाल सकता है। (((इन्सानी ज़िन्दगी के तीन दौर होते हैंः इब्तेदा, इन्तेहा, वसत और इन्सान का हाल यह है के वह इब्तिदा में एक क़तरए नजिस होता है और इन्तेहा में मुरदार हो जाता है, दरम्यानी हालात यक़ीनन ताक़त व क़ूवत और तहारत व पाकीज़गी के होते हैं लेकिन इसका भी यह हाल होता है के अपना रिज़्क़ अपने हाथ में होता है और न अपनी मौत अपने इख़्ितयार में होती है ऐसे हालात में इन्सान के लिये तकब्बुर व ग़ुरूर का जवाज़ कहाँ से पैदा होता है। तक़ाज़ाए शराफ़त व दयानत यही है के जिसने पैदा किया है उसी का शुक्रिया अदा करे और उसकी इताअत में ज़िन्दगी गुज़ार दे ताके मरने के बाद ख़ुद भी पाकीज़ा रहे और वह ज़मीन भी पाकीज़ा हो जाए जिसमें दफ़्न हो गया है।)))

454-आपसे दरयाफ़्त किया गया के सबसे बड़ा शाएर कौन था? तो फ़रमाया के सारे शोअरा ने एक मैदान में क़दम नहीं रखा के सबक़ते अमल से उनकी इन्तिहाए कमाल का फ़ैसला किया जा सके लेकिन अगर फ़ैसला ही करना है तो बादशाहे गुमराह (यानी अम्र अल क़ैस)।

455- क्या कोई ऐसा आज़ाद नहीं है जो दुनिया के इस चबाए हुए लुक़्मे को दूसरों के लिये छोड़ दे? याद रखो के तुम्हारे नफ़्स की कोई क़ीमत जन्नत के अलावा नहीं है लेहाज़ा इसे किसी और क़ीमत पर बेचने का इरादा मत करना। (((दुनिया वह ज़ईफ़ा है जो लाखों के तसरूफ़ में रह चुकी है और वह लुक़्मा है जिसे करोड़ों आदमी चबा चुके हैं, क्या ऐसी दुनिया भी इस लाएक़ होती है के इन्सान इससे दिल लगाए और इसकी ख़ातिर जान देने के लिये तैयार हो जाए। इसका तो सबसे बेहतरीन मसरफ़ यह होता है के दूसरों के हवाले करके अपनी जन्नत का इन्तेज़ाम कर ले जहां हर चीज़ नई है और कोई नेमत इस्तेमाल शुदा नहीं है।)))