True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

तिब्बे इमामे रिज़ा अलैहिस्सलाम

इमामे रिज़ा अलैहिस्सलाम ने तूस में क़याम (सन 201 हि0 से सन 203 हि0) के दौरान मामून रशीद की फ़रमाइश पर इंसानी जिस्म और उसमें होने वाले अमराज़ के सिलसिले में तफ़सील से एक रिसाला तहरीर फ़रमाया जिसमें आप अ0 ने खाना खाने के आदाब, पूरे साल के हर माह की आब व हवा के असरात और उस माह में किन चीज़ों का इस्तेमाल मुफ़ीद है, जिस्म को सेहतमन्द रहने के लिये किन बातों रियायत ज़रूरी है और सफ़र में क्या करना चाहिये तहरीर फ़रमाया जिसमें से कुछ ज़रूरी बातें यह हैं। 

दस्तूरे इमामे रिज़ा अलैहिस्सलाम उन ग़िज़ाओं के बारे में जिनको एक साथ नहीं खाना चाहिये

1. अण्डा और मछली कि अगर एक साथ मेदे में जमा हों तो मुम्किन है कि बीमारी नुक़रस, कौलन्ज, बवासीर पैदा करें और दांतों में दर्द हो।

2. दूध और दही कि बीमारी नुक़रस और बरस पैदा करते हैं।

3. मुसल्सल प्याज़ खाना कि चेहरे पर धब्बों का सबब है।

4. ज़्यादा कलेजी, दिल, जिगर खाना कि गुर्दे की बीमारी का सबब होता है।

5. मछली खाने के बाद ठण्डे पानी से (जिस्म) धोना कि फ़ालिज या सकता का सबब हो सकता है।

6. ज़्यादा अण्डा खाने से साँस लेने में तकलीफ़ और मेदा में गैस का सबब होता है।

7. आधा पका गोश्त खाना कि पेट में कीड़े का सबब होता है।

8. गरम और मीठी ग़िज़ा खाने के बाद पानी पीना दाँत ख़राब होने का सबब होता है।

9. ज़्यादा शिकार का गोश्त और गाय का गोश्त खाने से अक़्ल ख़राब और हाफ़िज़ा कमज़ोर होता है।

दस्तूराते उमूमी इमामे रिज़ा अलैहिस्सलाम बराये सेहत

· इमामे रिज़ा अलैहिस्सलाम ने बलग़म के इलाज के लिये फ़रमाया 10 ग्राम हलीला ज़र्द, 20 ग्राम ख़रदिल और 10 ग्राम आक़िर करहा को पीस कर मन्जन करो, इन्शाअल्लाह बलग़म को निकालता है मुँह को ख़ुशबूदार और दाँतों को मज़बूत करता है।

· हर जुमे को बेरी के पत्तों से सर धोना बर्स और पागलपन से महफ़ूज़ रखता है।

· रौग़ने ज़ैतून और आबे कासनी नफ़्स को पाक करती है, बलग़म को दूर करती है और शब-बेदारी की तौफ़ीक़ होती है।

· ज़ैतून का तेल बड़ी अच्छी ग़िज़ा है मुंह को ख़ुशबूदार बनाता है बलग़म को दूर करता है चेहरे को सफ़ाई और ताज़गी बख़्श्ता है, आसाब को तक़वीयत देता है, बीमारी और ददै को दूर करता है और ग़ुस्से की आग को बुझाता है।

· खाने के बाद सीधे लेट जाओ और दाहिना पाँव बायें पाँव पर रख लो।

· जो चाहता है कि दर्द मसाना (गुर्दा) न हो उसे चाहिये कि कभी पेशाब न रोके अगर चे सवारी पर हो।

· जो चाहता है कि मेदा सही रहे वह खाने के दरमियान पानी न पिये बल्कि खाने के बाद पानी पिये। खाने के दरमियान पानी पीने से मेदा कमज़ोर हो जाता है।

· जो चाहता है कि हाफ़िज़ा ज़्यादा हो उसे चाहिये कि सात दाना किशमिश सुबह के वक़्त खाये।

· जो चाहता है कि कानों में दर्द न हो चाहिये कि सोते वक़्त कानों में रूई रख ले।

· जो चाहताा है कि उसे जाड़ों में ज़ुकाम न हो उसे चाहिये कि हर रोज़ तीन लुक़मा शहद जिसमें मोम मिला हो खाये।

· जो चाहता है कि गर्मियों में जु़काम से महफ़ूज़ रहे उसे चाहिये कि हर रोज़ एक खीरा खाये और धूप में बैठने से परहेज़ करे।

· जो चाहता है कि तन्दरूस्त रहे और बदन हल्का और गोश्त (मोटापा) कम हो उसे चाहिये कि रात की ग़िज़ा कम खाये।

· जो चाहता है कि नाफ़ दर्द न करे उसे चाहिये कि जब सर पर तेल लगाये तो नाफ़ पर भी तेल लगाये।

· जो चाहता है कि गले में कव्वा न बढ़े उसे चाहिये कि मीठी चीज़ खाने के बाद सिरके से ग़रारा करे।

· जो चाहता है कि जिगर की तकलीफ़ से महफ़ूज़ रहे वह शहद का मुस्तक़िल इस्तेमाल करे।

· जो तूले (लंबी) उम्र चाहता है उसको लाज़िम है कि सुब्ह के वक़्त कुछ खाया करे।

· जो चाहता है कि क़ब्ज़ न हो वह नहार मुँह एक प्याली गरम पानी में एक चम्चा शहद घोल कर पिये।

· जो चाहता है कि उसके बदन में गैस न बरे उसे चाहिये कि हफ़्ते में एक बार लहसुन खाये।

· जो चाहता है कि उसके दाँत ख़राब न हों उसे चाहिये कि कोई मीठी चीज न खाये। मगर यह कि उसके बाद एक लुक़्मा रोटी खा ले।

· जो चाहता है कि ग़िज़ा ख़ूब हज़म हो उसे चाहिये कि सोने से पहले दाहनी करवट लेटे फिर बायीं करवट लेटे।

· जो चाहता है कि बीमार न हो वह खाने और पीने में एतेदाल से काम ले।

· दाँतों की हिफ़ाज़त के लिये ठण्डी और गर्म चीज़ें खाने से परहेज़ करना चाहिये और बहुत ज़्यादा गर्म और सख़्त चीज़ों को दाँतों से नहीं तोड़ना चाहिये।

· मसूर की दाल दिल को नर्म करती है।

· गेहूँ की रोटी पर जौ की रोटी को ऐसी फ़ज़ीलत है जैसी हम अहलेबैत को तमाम आदमियों पर और हर पैग़म्बर ने दुआ की जौ की रोटी खाने वालों के लिये।

· अपने बीमारों को चुक़न्दर के पत्ते खिलाओ कि उनमें शिफ़ा ही शिफ़ा है।

· हद सत्तर क़िस्म की बीमारियों को दूर करता है। सफ़रा को घटाता है, प्यास की ज़्यादती को दूर करताा है और मेदे को साफ़ करताा है।

· अगर लोग कम खायें तो बदन सेहतमन्द रहेंगे।

· गाजर कोलिज (आतों के दर्द) और बवासीर से महफ़ूज़ रखती है और मरदाना क़ुव्वत में इज़ाफ़़ा करती है।

इरशादाते पैग़म्बरे इस्लाम अलैहिस्सलाम

बीमारी तीन तरह की है और दवा भी तीन तरह की है, बीमारी ख़ून, सफ़रा और बलग़म से है, दवाये ख़ून हजामत, दवाये बलग़म नहाना और दवाये सफ़रा चलना है। परवरदिगार ने कोई मर्ज़ नहीं पैदा किया मगर यह कि उसकी दवा भी पैदा की, सिवाये मौत के। ग़िज़ा उस वक्त खाओ जब ख्वाहिश हो और उस वक्त ग़िज़ा से हाथ रोक लो जब खाने की ख्वाहिश बाक़ी हो। ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन और महबूब खाना वह है जिसकी तरफ़ ज़्यादा हाथ बढ़ें। (खाना साथ में खायें) एक उँगली से खाना खाना शैतान का तरीक़ा है, दो उँगलियों से खाना खाना मुताकब्बेरीन (घमण्डियों) का तरीक़ा है और तीन उँगलियों से खाना खाना पैग़म्बरों का तरीक़ा है।

खाने को ठण्डा करके खाओ कि गरम खाने में बरकत नहीं है। ग़िज़ा खाने के वक़्त जूतों को उतार दो कि तुम्हारे पैरों को राहत होगी और यह तरीक़ा पसन्दीदा है।  नौकरों के साथ खाना खाओ के यह तरीक़ा तवाज़ों और इन्केसारी का है, जो नौकरों के साथ खाना खाता है बहिश्त उसकी मुश्ताक़ होती है।
बाज़ार में खाना खाना पस्त और नापसन्दीदा तरीक़ा है।  मोमिन वह खाना खाता है जो घर के अफ़राद को पसन्द होता है और मुनाफ़िक़ घर के अफ़राद को वह खाना किखलाता है, जो ख़ुद पसन्द करता है। दस्तरख्वान पर मुख्तलिफ़ ग़िज़ाओं को एक साथ न खाओ। पाँच चीज़ें ज़िन्दगी भर मेरी सीरत में रहेंगी। ख़ाक पर बैठकर खाना खाना, खच्चर की सवारी करना, बकरी दुहना, अदना कपड़े पहनना, बच्चों को सलाम करना ताकि क़ौम की सीरत बन जाये।
जब खाना दस्तरख्वान पर खाओ तो खाना अपने सामने के हिस्से से लो, खाने के दरमियान और ऊपरी हिस्से में बरकत होती है और तुममें से कोई भी खाना खाने से हाथ न रोके और दस्तरख्वान से न उठे यहाँ तक कि सभी अफ़राद सेर होकर उठ जायें क्योंकि दूसरों से पहले खाने से हाथ रोकना और खड़े हो जाना उनकी शरमिन्दगी का सबब होगा।

बरकत तीन चीज़ों में हैः एक साथ खाने में, (वक्ते) सहर खाने में और जिस खाने में तरी हो। जो बरतन में बची हुई ग़िज़ा को खाता है तो बरतन उसके लिये अस्तग़फ़ार करता है। जो भी दस्तरख्वान पर गिरे हुए टुकड़ों को खाता है, जब तक ज़िन्दा रहता है रोज़ी में इज़ाफ़ा होता है और बच्चे हराम से महफ़ूज़ रहते हैं।

शिकम पुर होकर खाना खाने के नुक़सान

ज़्यादा ग़िज़ा न खाओ कि क़ल्ब सख़्त करता है, आज़ा व जवारेह में सुस्ती पैदा करता है और वाज़ व अहकामे इलाही को सुनने से दिल को बेबहरा करता है।
जो शख़्स ग़िज़ा कम खाये जिस्म उसका सही और क़ल्ब उसका नूरानी होगा और जो शख़्स ग़िज़ा बहुत खाये जिस्म उसका बीमार और दिल में उसके सख्ती पैदा होती है। एक बार दिन में और एक बार रात में ग़िज़ा खाओ। ग़िज़ा खाने के बाद अपने दाँतों में खि़लाल करो और मुँह में पानी हिलाकर कुल्ली करो, क्योंकि यह अमल सामने के दाँतों और अक्ल की सेहत और सलामती का सबब है।  अपने दाँतों में खि़लाल करो कि पाकीज़गी और सफ़ाई का सबब है और सफ़ाई ईमान से है और ईमान अपने साहब की बहिश्त तक हमराही करता है।

पानीः  पानी खड़े होकर रात में नहीं पीना चाहिये। पानी को घूँट घूँट करके पियो एक साथ न पियो। जो पानी पीने में तीन बार साँस लेता है ईमान में रहेगा। बेहतरीन सदक़ा और एहसान पानी देना है। बेहतरीन पीने की शय दुनिया और आखि़रत में पानी है। रोटी तुम्हारी बेहतरीन ग़िज़ा रोटी और बेहतरीन फल अंगूर है।  रोटी को चाक़ू से न काटो और रोटी की क़द्र व क़ीमत समझो कि ख़ुदा ने उसका एहतेराम किया है।

नमकः ग़िज़ा खाने से पहले अगर कोई तीन लुक़मा नमक से खाये तो सत्तर तरह की बीमारियां उससे दूर होंगी जिनमें से बाज़ यह हैं ः जुनून, जुज़ाम और बरस!  जो हर खाना खाने से पहले और बाद में नमक खाता है तो ख़ुदावन्दा 73 तरह की बलाओं और अमराज़ को उससे दूर करता है। ग़िज़ा को नमक से शुरू करो कि यह सत्तर अमराज़ की दवा है। अगर लोग नमक की ख़ूबियों से वाक़िफ़ होते तो किसी दवा के मोहताज न होते।

गोश्त गोश्त खाना बदन के गोश्त में इज़ाफ़ा करता है। जो चालीस दिन गोश्त न खाये उसका क़ल्ब ख़राब हो जाता है। चालीस दिन (लगातार) गोश्त का खाना क़ल्ब में सख़्ती और तारीकी पैदा करता है। (गोश्त खाना सुन्नते पैग़म्बर स0 है इसलिये तर्क न करे लेकिन ज़ियादती नुक्सानदेह है एक दिन में दो बार गोश्त न खाओ।)

चावलः खाने में चावल की मिसाल ऐसी है जैसे क़ौम और क़बीले में सय्यद व आक़ा की।

दूधः अपनी हामिला औरतों को दूध पिलाओ ताकि तुम्हारे बच्चों की अक़्ल ज़्यादा हो। दूध पीने के बाद कुल्ली करो कि दूध में चर्बी होती है जो मुँह में बाक़ी रह जाती है। दूध पीना ईमान को ख़ालिस करता है।

मिसवाकः या अली अ0 तुमको चाहिये कि मिसवाक हर वुज़ू के लिये करो। मिसवाक आँखों को रोशन करती है, बालों को उगाती है और दूर करती है आँखों से पानी निकलने को। मिसवाक का ज़्यादा करना इन्सान के लिये उसकी फसाहत को ज़्यादा करता है।

फलः फलों को फस्ल के आग़ाज़ (शुरू) में और पकने पर खाओ कि बदन को सालिम और ग़म को दूर करते हैं। फ़सल ख़त्म होने पर न खाओ, कि बदन में बीमारी का सबब होते हैं। जो फलों को अलग-अलग खाता है उसे नुक़सान नहीं पहुँचता। फल के छिलके पर ज़हर होता है जब खाओ तो धो लिया करो।

ख़ुरमाः बच्चे की विलादत के बाद माँ को सबसे पहले जो चीज़ खानी चाहिये वह मीठा ख़ुरमा है क्योंकि अगर इससे बेहतर कोई चीज़ होती तो परवरदिगार जनाबे मरियम को उसी से तआम कराता। नाशते में ख़ुरमा खाओ कि बदन के कीड़ों को ख़त्म करता है।  जो  ख़ुरमा हासिल कर सकता है उसे चाहिये कि ख़ुरमे से अफ़तार करे। ख़ुरमा अल्लाह से क़ुरबत का और शैतान से दूरी का बाएस है।

ख़रबूज़ा ख़रबूज़े को फल की जगह खाओ और दाँतों से खाओ (छील कर नहीं) कि उसका पानी रहमत है, उसकी मिठास ईमान की मिठास है जो उसका एक टुकड़ा खाता है परवरदिगार उसे सत्तर हज़ार नेकी देता है और सत्तर हज़ार बुराईयों को दूर करता है। ख़रबूज़ा बेहिश्ती फल है उसमें हज़ार बरकत, हज़ार रहमत और हर दर्द की शिफ़ा है। ख़रबूज़ा मुबारक और पाकीज़ा फल है जो मुँह को पाक करता है क़ल्ब को नूरानी करता है, दाँतों को सफ़ेद और ख़ुदा को ख़ुश करता है। उसकी ख़ुशबू अम्बर, उसका पानी कौसर से, उसका गूदा फ़िरदौस से, उसकी लज़्ज़त बेहिश्ती और उसका खाना इबादत है। ख़रबूज़ा का खाना मुबारक हो कि उसमें दस ख़ुसूसियात हैं। ग़िज़ा और पीने की चीज़ है, दाँतों को पाक करता है, मसाना (गुर्दों) को साफ करता है, शिकम को धोता है, चेहरे की ताज़गी को बढ़ाता है, जिन्सी क़ुव्वत में इज़ाफ़ा करता है और चेहरे की खाल को पाक और नर्म करता है। अगर हामिला औरत ख़रबूज़ा और पनीर खाये तो बच्चे का अख़लाक़ नेक होगा।

अनारः अनार को दाना-दाना खाओ कि इस तरह बेहतर है।  अनार खाओ कि क़ल्ब को रौशन करता है और इन्सान को चालीस दिन तक शैतान के वसवसों से दूर करता है। जो एक पूरा अनार खाता है परवरदिगार चालीस दिन उसके क़ल्ब को नूरानी करता है। तुमको अनार चाहिये कि वह भूखे को सेर करता है पेट भरे के लिये हाज़िम है।

कद्दूः जो शख्स कद्दू मसूर की दाल के साथ खाये उसका दिल ज़िक्रे ख़ुदा के वक्त रक़ीक़ (नर्म) हो जायेगा। कद्दू खाओ कि ख़ुदा ने उससे नर्म कोई दरख्त पैदा किया होता तो जनाबे यूनुस अ0 के लिये वही उगाता। कद्दू खाओ कि दिमाग़ और अक्ल को ज़्यादा करता है और क़ल्बे ग़मगीन को ख़ुशहाल करता है।
किशमिश: दो चीज़ों को दोस्त रखों और एहतेराम करोः किशमिश और खुरमा। बेहतरीन चीज़ जिससे रोज़ादार अफ़तार कर सकता है किशमिश व ख़ुरमा या कोई मीठी चीज़ है। जितना मुमकिन हो किशमिश इसतेमाल करो कि सफ़रा को निकालती है, बलग़म को ख़त्म करती है, आसाब को क़ुव्वत देती है, बदन की कमज़ोरी को दूर करती है और क़ल्ब को हयात बख़्शती है।  किशमिश से आसाब में मज़बूती और नफ़्स में पाकीज़गी पैदा होती है।

अंगूरः अंगूर खाओ कि ग़म व अन्दोह को दूर करता है। मेरी उम्मत की बहार अंगूर और ख़रबूज़ा है।

अंजीरः अंजीर की मुँह की बदबू को दूर करती है, हड्डियों को मज़बूत करती है, दर्द में फाएदेमन्द है।  जो चाहता है कि दिल नर्म हो तो अंजीर बराबर खाये।
रौग़ने बनफ़शाः रौग़ने बनफ़शा को दूसरे तेलों के मुक़ाबले में वैसी ही बरतरी हासिल है जैसे इस्लाम को दूसरे दीनों (मज़हबों) के मुक़ाबले में।

इतरे बनफ़शाः अपने को इतरे बनफ़शा से मोअत्तर करो कि यह गर्मियों में खुनकी और सरदियों में गर्मी का सबब होता है।

हिना (मेंहदी) ः हिना इस्लाम का खि़ज़ाब है, मोमिन के अमल में इज़ाफ़ा करता है, सर दर्द दूर करता है, और आँखों की रौनक़ में इज़ाफ़ा करता है।
परवरदिगार ने कोई दरख्त नहीं पैदा किया जिसे हिना से ज़्यादा दोस्त रखता हो।

लहसुनः लहसुन खाओ कि सत्तर दर्दों की दवा है।

प्याज़ः जब तुम किसी शहर में पहुँचो तो सबसे पहले वहाँ की प्याज़ खा लिया करो ताकि उस शहर की बीमारियाँ तुमसे दूर रहेंे।

शहदः जो शख्स महीने में कम से कम एक बार शरबते शहद पिये और ख़ुदा से उस शिफ़ा का सवाल करे जिसका ज़िक्र क़ुरआन में है तो (ख़ुदा) उसको सत्तर बीमारियों से शिफ़ा देगा। अगर कोई तुम्हें शरबते शहद पेश करे तो इन्कार न करो। अगर कोई शहद खाता है तो हज़ार दवायें उसके पेट में दाखि़ल होती हैं और हज़ार तकलीफ़ें दूर होती है।। जो चाहता है कि याद्दाश्त ज़्यादा हो उसे शहद खाना चाहिये। शहद बेहतरीन पीने की शय है कि क़ल्ब को हयात देता है और सीने की सर्दी को निकालता है। पाँच चीज़ें निसयान (भूल) को दूर करती हैं, हाफ़िज़े को ज़्यादा और बलग़म को दफ़ा करती हैं, मिसवाक करना, रोज़ा रखना, क़ुरआन पढ़ना, शहद खाना और कुन्दुर खाना। शहद खाओ कि पाकीज़गी और शादाबी का सबब है। इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से मनक़ूल है कि किसी शख्स ने हज़रत रसूले ख़ुदा स0 से अज़ की कि मेरे भाई के पेट में दर्द है हुज़ूर ने फ़रमाया ‘‘थोड़ा शहद गरम पानी में मिला कर पिला दो’’।

रौग़ने ज़ैतून ः रौग़ने ज़ैतून ग़ुस्से को कम करता है।  रौग़ने ज़ैतून चालीस दिन तक शैतान को क़रीब नहीं आने देता।

——- क्यों हैं? ——

मन्सूर दवानक़़ी के दरबार में सादिक़़े आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम तशरीफ़ फ़रमा थे, एक हिन्दी तबीब ने अपने इल्म पर नाज़ किया, मालूमात का इज़हार किया, इमाम ख़ामोशी से सुनते रहे, हिन्दी ने जराअत की और कहा के आप इस इल्म से ज़रूर इस्तेफ़ादा करें। इरशाद हुआ के मुझे तेरे इल्म की कोई ज़रूरत नहीं, तेरे मालूमात से मेरे इल्म कहीं ज़्यादा हैं उसने अज़ की कुछ इरशाद हो। फ़रमाया ख़ुदा पर भरोसा रख कर हर मर्ज़ का इलाज उसकी ज़िद से किया जाए, यानी गर्मी का इलाज ठण्डक से और ख़नकी का इलाज हरारत से, ख़ुश्की का तरी से और तरी का ख़ुश्की से। ऐ तबीब! जान ले के मेदा बीमारियों का घर है और बहुत बेहतरीन इलाज परहेज़ है और इन्सान जिस चीज़ का आदी हो वही उसके मिज़ाज के मवाफ़िक़ और सबबे सेहत होगी। तबीब ने अर्ज़ किया, यही उसूले तिब है, इरशाद फ़रमाया के यह इल्म मिनजानिब इलाही है। क्या तू बता सकता है के आंसू व रुतूबत के जारी होने की जगह सर में क्यों क़रार पाई? सर पर बाल क्यों पैदा किये गये? पेशानी बालों से क्यों ख़ाली हुई? माथे पर ख़ुतूत व शिकन क्यों होते हैं? दोनों पलकें आंखों के ऊपर क्यों हैं? दोनों आंखें बादाम की शक्ल जैसी क्यों हैं? नाक दोनों आंखों के दरम्यान में क्यों है? नाक का सूराख़ नीचे की जानिब क्यों हुआ? मुंह के ऊपर दोनों होंठ क्यों बनाए गए? सामने के दाँत तेज़ क्यों हुए? दाढ़ चैड़ी क्यों हुई और दोनों के दरम्यान लम्बे दांव क्यों हैं? दोनों हथेलियाँ बालों से ख़ाली क्यों हैं? मर्दों को दाढ़ी किस लिये होती है? नाख़ून और बाल में जान क्यों नहीं दी गई? दिल सनोबर का हमशक्ल क्यों हुआ? फेफड़ों को दो टुकड़ों में क्यों तक़सीम किया गया और वह मुतहर्रिक क्यों है? जिगर की शक्ल महदब (कुबड़ी) क्यों है? गुर्दा लूबिये की तरह पर क्यों बनाया गया? दोनों घुटने आगे की तरफ़ झुकते हैं, पीछे की तरफ़ क्यों नहीं झुकते? दोनों पांव के तलवे बीच से ख़ाली क्यों हैं? और आखि़र में जब उसने महवे हैरत होकर इन सवालात के जवाबात में अपनी लाइल्मी का इज़हार किया तो ख़ुद ही इरशाद फ़रमाया के- अगर सर में रूतूबत व फ़ज़ालत की जगह न होती तो ख़ुश्की के बाएस फट जाता इसलिये ख़ुदा ने आँसुओं की रवानी का बन्दोबस्त वहाँ किया ताके इस रूतूबत से दिमाग़ तर रहे और फटने न पाए। बाल सर के ऊपर इसलिये उगते हैं के इनकी जड़ों से रौग़न वग़ैरा दिमाग़ तक पहुंच जाए, इन मसामों से दिमाग़ी बुख़ारात भी निकलते हैं। दिमाग़ ज़्यादा गर्मी और ज़्यादा सर्दी से महफ़ूज़ रहता है, पेशानी बालों से इसलिये ख़ाली हुई के इस जगह से आँखों में नूर पहुंचता है और माथे में ख़ुतूते शिकन इसलिये हुए के सर से जो पसीना गिरे वह आँखों में न पड़ जाए। जब शिकनों में पसीना जमा हो तो इन्सान पोंछ कर फेंक दे जिस तरह ज़मीन पर पानी फैल कर गड्ढों में जमा हो जाता है और दोनों पलकें इसलिये आंखों पर क़रार दी गईं के आफ़ताब की रौशनी उसी क़द्र आँखों पर पड़े जिस क़द्र के ज़रूरत हो, तूने देखा होगा जब इन्सान ज़्यादा रोशनी में बलन्दी की जानिब किसी चीज़ को देखना चाहता है तो हाथ को आंखों पर रखकर साया कर लेता है और नाक को दोनों आंखों के बीच में इसलिये क़रार दिया के मुनब्बेअ नूर से रोशनी तक़सीम होकर दोनों आँखों में बराबर पहुँचे, आँखों की बादामी शक्ल इसलिये है के इसमें सुर्मा और दवाई वग़ैरा आसानी से डाली जा सके, अगर मुरब्बेअ शक्ल या गोल होती तो इसमें सलाई का लगाना या दवाई डालना मुश्किल होता और आँखों की बीमारी आसानी से रफ़़ा न होती। नाक का सूराख़ नीचे की तरफ़ इसलिये बनाया गया के दिमाग़ के फ़ाज़िल व ग़ैर ज़रूरी माद्दे ब-आसानी दफ़ा होँ और हर शै की बू बसहूलत दिमाग़ तक पहुँच जाए, अगर नाक का सूराख़ ऊपर की जानिब होता तो न ही फ़ुज़ूलात ख़ारिज होते और न ही दिमाग़ तक बू व ख़ुशबू पहुंच पाती। दोनों होंठ इसलिये मुंह के ऊपर बनाए गए के जो रुतूबतें दिमाग़ से मुंह में आ जाएं वह रूकी रहें और खाना-पीना भी इन्सान के इख़्तेयार में रहे, खाए चाहे फेंक दे। मर्दों की दाढ़ी इसलिये है के औरत और मर्द में तमीज़ हो सके और आगे के दाँत इसलिये तेज़ हुए के किसी शै का काटना सहल हो और दाढ़ें चैड़ी इस वास्ते बनाईं के ग़िज़ा का चबाना और पीसना आसान हो और उनके दरम्यान वाले दाँत लम्बे इसलिये बनाए के दोनों के इस्तेहकाम और क़याम का बाएसे सुतून होँ। हथेलियों पर बाल इसलिये नहीं हुए के किसी चीज़ को छू लेने से उसकी मुलाएमी, गर्मी, सर्दी वग़ैरा का एहसास हो सके अगर हथेलियों पर बाल उगे होते तो इन बातों का महसूस करना मुश्किल हो जाता। बाल व नाख़ून बेजान इसलिये हैं के इसका ज़्यादा बढ़ जाना ख़राबी पैदा करता है और इसकी कमी हुस्न पैदा करती है, अगर इनमें जान व हिस होती तो इनको काटते वक़्त इन्सान को तकलीफ़ शदीद होती। दिल की शक सनोबर के मानिन्द इसलिये (यानी इसका सर पतला और जड़ चैड़ी है) के आसानी से फेफड़ों में टिका रहे और फेफड़ों की हवा उसे मिलती रहे और ठण्डक पहुंचती रहे ताके दिमाग़ की तरफ़ बुख़ारात चढ़ कर बीमारियां पैदा न करें और फेफड़़े के दो हिस्से इसलिये हुए के दिल उनके दरम्यान में महफ़ूज़ रहे और फेफड़े बतौर पंखे उसको हवा मुहय्या करते रहें। जिगर को झुका हुआ और ख़मीदा इसलिये बनाया गया के पूरे तौर पर मेदा क़रार ले और अपने बोझ व गर्मी से ग़िज़ा हज़म करे और बुख़ारात को दफ़ा करे, गुर्दे को लोबिया के दाने की तरह इसलिये बनाया के पुश्त की जानिब से इसमें माद्दहे तौलीद आता है और ब-सबब कुशादगी व तंगी के इसमें से बतदरीज थोड़ा थोड़ा निकलता है जिसके बाएस लज़्ज़त महसूस होती है अगर वह गोल या चैकोर होता तो उससे यह बात हासिल न होती और घुटने पीछे की तरफ़ इसलिये नहीं झुकते हैं के चलने में आसानी हो ताके इन्सान आगे को सहूलत के साथ चल सके अगर ऐसा न होता तो चलने में इन्सान गिर पड़ता और दोनों क़दम बीच से ख़ाली इसलिये हुए के अगर ख़ाली न होते तो पूरा बोझ ज़मीन पर पड़ता और सारे बदन का बोझ उठाना मुश्किल होता और क़दम के किनारे पर बोझ पड़ने से ब-आसानी पाँव उठा सकते हैं जब कोई बच्चा मुंह के बल गिरने लगे तो बच्चों पन्जों के ज़ोर पर सम्हल सकता है यह फ़रमाकर तबीबे हिन्दी से इरशाद हुआ के यह इल्म रसूल (स0) रब्बुल आलमीन से हासिल किया है और यह इल्मे लदन्नी है’’

तिब्बे मासूमीन क़ुराने हकीम के आलिम का क्या कहना- वह तबीबे रूहानी होता है और इल्मे तशरीह से पूरी तरह वाक़िफ़। सादिक़े आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम ने नोमान से फ़रमाया के बता आँखों में शूरियत कानों में तल्ख़ी, नाक में रुतूबत और लबों में शीरीं उस हकीमे मुतलक़ ने क्यों पैदा की? फ़िर ख़ुद ही आपने इरशाद फ़रमाया- ‘‘दोनों आंखें चर्बी की हैं, अगर शूरियत न हो तो दोनों पिघल जाएं, कानों की तल्ख़ी रात को सोते वक़्त हशरातुल अर्ज़ को कानों में घुसने नहीं देती, नाक की रूतूबत कसांस की आमद व रफ़्त में इन्तेहाई सहूलत पैदा करती है और ख़ुशबू व बदबू का एहसास करवाती है, लब और ज़बान की मिठास से इन्सान को खाने में लज़्ज़त महसूस होती है।’’ अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं के चार बातों से दवा व इलाज के मोहताज न होगे- 1. जब तक भूक न लगे खाना न खाओ। 2. कुछ खाने की ख़्वाहिश बाक़ी रहने पर खाना तर्क कर दो। 3. खाना ख़ूब चबाकर खाओ। 4. सोते वक़्त रफ़ए हाजत करके सोओ। नुस्ख़हाए जामअ -इमाम अलीउन्नक़ी अलैहिस्सलाम ने जो दवाए जामा इरशाद फ़रमाई वह यह है - सम्बल (सन्बलुत्तबीब) एक तोला, ज़ाफ़रान एक तोला, क़ाक़्ला (इलाएची) एक तोला, ख़रबक़ सफ़ेद एक तोला, अजवाएन ख़ुरासानी एक तोला, फ़लफ़ल सफ़ेद एक तोला यानी हर चीज़ का वज़्न बराबर। और यह सब एक हिस्सा इसके बराबर एक हिस्सा यानी छः तोले फ़रफ़्यों को मिलाकर ख़ूब कूट छान कर दो हिस्सा यानी बारा तोले शहद (कफ़ गिरफ़ता यानी झाग उतारा हुआ) के साथ मिलाकर (चने के दाने के बराबर) गोलियां बना लें और 1- सांप, बिच्छू वग़ैरा के काटे हुए मरीज़ को एक गोली हींग के पानी के साथ खिलाएं। 2- संगे मसाना (पथरी) के लिये एक गोली मूली के अर्क़ के साथ खिलाएं। 3- लक़वा और फ़ालिज के लिये एक गोली आबे मर्ज़़न्जोश (तकसी बूटी के अर्क़) के साथ नाक में टपकाएं। 4- दफ़ाए हेफ़क़ान (दिल की बेचैनी और घबराहट वग़ैरा) के लिये एक गोली ज़ीरा के ख़ुशान्द़ह के साथ खिलाएं। 5- सर्दी मेदा के लिये एक गोली ख़ु़शान्दहे ज़ीरा के साथ खिलाएं। 6- दाएं पहलू के दर्द के लिये तरकीब बाला पर अमल कराएं। 7- अगर बाएं पहलू में दर्द हो तो यही गोली रेशए कर्फ़स (एक दवा का नाम है) को जोश कर्दा पानी से इस्तेमाल कराएं। 8- मर्ज़े सिल के लिये एक गोली गर्म पानी के साथ खिलाएं।

तिब्बे इमामे सादिक़ अलैहिस्सलाम

· अपनी सेहत की हिफ़ाज़त के लिये जो कुछ भी ख़र्च किया जाये वह इसराफ़ में नहीं आता क्योंकि इसराफ़ उस सूरत में होता कि जब पैसा इन्सानी नफ़्स को तकलीफ़ देने के लिये ख़र्च किया जाये।

· क़ल्बे मोमिन के लिये ज़्यादा ग़िज़ा से कोई चीज़ ज़्यादा ज़रर पहुंचाने वाली नहीं है। इस सबब से कि ज़्यादा ग़िज़ा से दो नुक़सान होते हैं एक क़सावते क़ल्ब दूसरे बेजा शहवत।

· मिसवाक में बारह ख़सलतें हैं, मुँह को पाक करती है, आँखों को जिला देती है, ख़ुदा की ख़ुशनूदी का सबब है, दाँतों को सफ़ेद करती है, दाँतों के मैल को दूर करती है, दाढ़ों को मज़बूत करती है, भख बढ़ाती है, बलग़म दूर करती है, नेकियों को दो बराबर करती है, मलाएका ख़ुश होते हैं और मुसतहिब है।

· आप अ0 ने फ़रमाया कि जनाबे नूह ने ख़ुदा से ग़मो अन्दोह की शिकायत की, वही आईः सियाह अंगूर खाओ कि ग़म को दूर करता है।

बीमारियों के सिलसिले में जनाबे जाबिर ने इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से सवाल कियाः

· जनाबे जाबिरः बीमारी के बारे में आपका नज़रिया क्या है? आया बीमारी को ख़ुदा इन्सान पर नाज़िल करता है या वह इत्तेफ़ाक़िया तौर पर बीमार होता है?

· इमामे सादिक़ अलैहिस्सलाम ः बीमारी की तीन क़िस्में हैंः-

 ख़ुदा की मशीयत से पैदा होती हैं जिनमें से एक बुढ़ापा है कि किसी शख़्स को उससे छुटकारा नहीं, उसमें हर शख़्स मुब्तिला होता है।

 जिन में जिहालत या हिर्स व हवस की वजह से इन्सान खुद अपने को मुब्तिला कर लेता है। अगर इन्सान खाने पीने में इसराफ़ न करे और चन्द लुक़्मे कम खाये और चन्द घूट कम पिये तो बीमारी से दो चार न होगा।

 जो बदन के दुश्मनों से पैदा होती हैं, वह इन्सान के जिस्म पर हमला करते है और जिस्म अपने अन्दर मौजूद वसाएल   ( )के ज़रिये उनका मुक़ाबला करता है।

· जनाबे जाबिरः बदन के दुश्मन कौन हैं?

· इमामे सादिक़ अलैहिस्सलामः बदन के दुश्मन कुछ ऐसे बारीक और छोटे-छोटे मौजूदात (जरासीम) होते हैं जो आँख से नज़र नहीं आते हैं और वही बदन पर हमलावर होते हैं और बदन के अन्दर भी बारीक मख़लूक़ात होते हैं जो नज़र नहीं आते वह दुश्मनों से जिस्म की हिफ़ाज़त करते हैं।