True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अक़वाले मासूमीन (अ0स0)

1. दुनिया ख़त्म होने वाली है और आख़िरत हमेशा बाक़ी रहने वाली है।

2. (दूसरों के) आदर व सत्कार की भावना, (इंसान को) उच्चता प्रदान करती है और घमंड मिट्टी में मिला देता है।

3. सफलता दूर दर्शिता से और दूर दर्शिता तजुर्बे से प्राप्त होती है।
4. दूर दर्शी जागा हुआ है और ग़ाफिल नींद के प्रथम चरण में है।
5. ज्ञान आपको बचाता है और ज्ञानता आपका विनाश करती है।
6.क्षमा, सब से अच्छी नेकी व भलाई है।
7. इन्सान एहसान का गुलाम है।
8. व्यर्थ कार्य मूर्खता का परिणाम होते हैं।
9. सख़ावत (दान) मोहब्बत के बीज बोती है।
10. उपहार मोहब्बत को अपनी तरफ़ खींचता है।
11. नसीहत (सद उपदेश) दिलों की ज़िन्दगी है।
12. घमंड, मूर्खता की जड़ है।
13. तुम्हारा भाई वह है जो मुशकिल के समय जान व माल से तुम्हारी सहायता करे।
14. जल्दी, गल्तियों का कारण बनती है।
15. आदमी अपने समय की संतान है।
16. दूर दर्शी वह है जो अपने समय से प्यार करे।
17. लालच मर्दों को ज़लील करा देता है।
18. एहसान जताना, नेकियों को बर्बाद कर देता है।
19. "मूर्खता, जीवन को कठिन बना देती है।
20. (विभिन्न घटनाओं से) शिक्षा लेना, (गुनाहों से) सुरक्षित रहने का परिणाम है।
21. (अपनी) ग़लती पर लज्जित होना, गलतियों को ख़त्म कर देता है।
22. चुग़ली, मुनाफ़िक़ की पहचान है।
23. क़िनाअत (कम पर खुश रहना), सब से अच्छी ज़िन्दगी है।
24. आँखें, शैतान का जाल हैं।
25. आदमी अपनी ज़बान के पीछे छिपा होता है।
26. आदमी का उसके कार्यों के अलावा कोई साथी नहीं होता।
27. ईर्ष्यालू को कोई फायदा नहीं होता।
28. मशवरा करना, मार्गदर्शन का स्रोत है।
29. प्रफुलता, मोहब्बत का जाल है।
30. फ़ुर्सत को खो देना, दुख का कारण बनता है।
31. संयमी वह है जो अपने भाईयों की (गलतियों को) बर्दाश्त करले।
32. घमंड, शैतान का सब से बड़ा जाल है।
33. नेक वह है, जिसके काम, उसकी बात को सत्यापित करें।
34. परेशानियों को ज़ाहिर करना, फ़क़ीरी लाता है।
35. सब से अच्छे साथी वह हैं जो (अल्लाह की) आज्ञा पालन में मदद करें।
36. समृद्धता और निर्धनता, दोनों ही मर्दों के जौहरों और विशेषताओं को प्रकट कर देती हैं।
37. जाहिल के सामने चुप हो जाना उसका सब से अच्छा जवाब है।
38. चुग़ली सुनने वाला, चुग़ली करने वाले के समान है।
39. बाह्य ख़ूबसूरती अच्छी शक्ल में और आन्तरिक ख़ूब सूरती अच्छे व्यक्तित्व में निहित है।
40. सत्ता का यन्त्र, सीने का बड़ा होना है, अर्थात जो सबको अपने सीने से लगाता है, वही सत्ता पाता है।
41. सब्र के साथ आराम मिलने का इन्तेज़ार करना, सब से अच्छी इबादत है।
42. मौजूद चीज़ के बारे में कंजूसी करना, माबूद पर बद गुमानी करना है।
43. धोखेबाज़ी, नीच लोगों का व्यवहार है।
44. समय, छुपे हुए भेदों को खोल देता है।
45. (किसी काम को करने के लिए उसके) साधनों (की छान बीन करने) से पहले (उसमें) जल्दी करना, दुख का कारण बनता है।
46. लोगों से मोहब्बत करना, अक्लमंदी की जड़ है।
47. मुजाहिदों (धर्मयोधाओं) के लिये आसमान के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं।
48. तौबा, दिलों को पाक करती है और गुनाहों को धो डालती है।
49. ग़ुस्सा, अक्ल को खराब और (इंसान को) सही रास्ते से दूर करता है।
50. हर वक्त पेट का भरा रहना, तरह तरह के दुखों को जन्म देता है।
51. नेकी के बारे में सोचना, (आदमी को) नेकी करने का निमन्त्रण देता है।
52. काम से पहले सोच विचार करना, लज्जा से बचाता है।
53. निंदा झेलना, मार पीट के दर्द से भी बुरा है।
54. मोमिन, सरल स्वभावी, विनम्र, आसानी से काम लेने वाला और भरोसेमंद होता है।
55. मोमिन की जीवन शैली, समस्त कामों में बीच का रास्ता अपनाना और उसकी सुन्नत विकास करना है।
56. प्रफुलता, बगैर खर्च की नेकी है।
57. परीक्षा किये बिना, किसी पर भरोसा करना दूर दर्शिता के ख़िलाफ है।
58 बुरे के साथ भलाई करना, दुश्मन का सुधार करना है।
59. अल्लाह से शर्माना, बहुत से गुनाहों को मिटा देता है।
60. सच बोलना, उस बात के अनुसार है जो अल्लाह ने (प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व में) रखी है।
61. पाखंड़ी (दिखावा करने वाले) का बाह्य रूप अच्छा और आन्तरिक रूप बुरा होता है।
62. एहसान जताना, नेकी की महत्ता को कम कर देता है।
63. ज़रुरतमंद के लिये दुआ करना, दो सदकों में से एक है।
64. इंसाफ लड़ाई झगड़ों को खत्म कर देता है और मोहब्बत बढ़ाता है।
65. अल्लाह की आज्ञा पालन पर सब्र करना, उसकी सज़ा पर सब्र करने से आसान है।
66. ज्ञानी कभी ज्ञान से तृप्त नही होता और न ही अपनी तृप्तता को प्रकट करता।
67. (इन्सान का) कमाल तीन चीज़ों में है, परेशानियों पर सब्र करना, इच्छाओं के होते हुए पारसा बने रहना, और माँगने वाले की आवश्यक्ता को पूरा करना।
68. आरिफ (ब्रह्मज्ञानी) वह है जो स्वयं को पहचाने और स्वयं को हर उस चीज़ से बचाये रखे जो उसे सही रास्ते से दूर करे और विनाश की ओर ले जाए।
69. जो किसी को अल्लाह के लिए भाई बनाता है उसकी मोहब्बत स्थाई हो जाती है, क्यों कि दोस्ती व भाई चारे का कारण अमर है।
70. चतुर वह है, जिस का आज, बीते हुए कल से अच्छा हो और जो स्वयं को बुराइयों से रोक ले।
71. अल्लाह का समीपयः उस से कुछ माँगने पर प्राप्त होता है और इंसानों का समीपयः उनसे कुछ न माँगने पर।
72. सच्चा भाई खुशी में शोभा होता है और दुख दर्द में (सहायता के लिए हर तरह से) तैयार रहता है।
73. मर्दानंगी इसमें है कि मर्द उन चीज़ों से दूर रहे जो उसे बुरा बनायें और उन चीज़ों को अपनाये जो उसे शौभनीय बनायें।
74. ईर्ष्यालु जिस से ईर्ष्या करता है, उसकी नेमतों के विनाश को अपने लिये नेमत (धन दौलत) समझता है।
75. अज्ञानता के साथ किसी काम को करने वाला, ग़लत रास्ते पर चलने वाले की तरह है, उसकी आगे बढ़ने की कोशिश से गंतव्य से दूर होने के अलावा उसे कोई फायदा नहीं होता।
76. गुनाह, दर्द है और उसकी दवा इस्तगफार (अल्लाह से क्षमा याचना करना) है और उसका इलाज उसे न दोहराना है।
77. सब्र दो तरह के हैं : एक वह सब्र जो उन चीज़ों पर करते हों जिन्हें अच्छा नहीं समझते हो और दूसरा वह सब्र जो उन चीज़ों पर करते हों जो तुम्हें अच्छी लगती हो।
78. नेकियों को पूरा करना, उनको शुरु करने से भी अच्छा है।
79. तुम्हारा सच्चा दोस्त वह है जो तुम्हें तुम्हारी बुराइयों के बारे में नसीहत करे, तुम्हारे पीछे तुम्हारी रक्षा करे और तुम्हें अपने ऊपर वरीयता दे।
80. दूर दर्शिता, (किसी काम के) परिणामों पर ग़ौर करना और बुद्धिमान लोगों से परामर्श करने का नाम है।
81. दुनिया दो दिन की है, एक दिन तुम्हारे पक्ष में और दूसरा तुम्हारे विरुद्ध है, जब तुम्हारे पक्ष में हो तो उपद्रव न करो और जब तुम्हारे विरुद्ध हो तो सब्र से काम लो।
82. ज्ञान, माल से अच्छा है, क्यों कि ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है और माल की तुम रक्षा करते हो।
83. सुअवसर के अतिरिक्त (कार्यों में) देर करना, जल्दी करने से अच्छा है,
84. फौज, दीन के लिए इज़्ज़त और शासकों के लिए किला है।
85. अम्र बिल मअरुफ (इंसानों को अच्छे काम करने की सलाह देना), लोगों का सब से अच्छा काम है।
86. परीक्षा करने से पहले, हर एक पर भरोसा करना कम बुद्धी की निशानी है।
87. अल्लाह से डर कर रोना, दिल को प्रकाशित करता है और गुनाह की पुनरावर्त्ति से रोकता है।
88. क्रूरता, एक तरह का पागलपन है, क्योंकि ऐसा करने वाला लज्जित होता है और अगर वह लज्जित न हो तो उसका पागल पन पक्का है।
89. हर दिन तुम्हारी उम्र का रजिस्टर है अतः उन्हें अपने अच्छे कामों से अमर बनाओ।
90. धार्मिक जागरूकता, एक ऐसी नेमत है जो नसीब से मिलती है।
91. ज्ञान के बिना इबादत करने वाला, उस चक्की चलाने वाले गधे के समान है जो घूमता रहता है लेकिन अपनी जगह से बाहर नहीं निकलता।
92. करीम (महान) वह है जो अपनी इज़्ज़त को माल से बचाता है और नीच वह है जो इज़्ज़त खो कर माल बचाता है।
93. नमाज़ शैतान के हमलों (से बचने के लिए) किला है।
94. दी हुई चीज़ों को भूल जाओं और अपने वादों को याद करो।
95. (नेकी के) मार्गदर्शन में अपने भाई की मदद करो।
96. जिसने तुम्हारे साथ बुराई की उसके साथ भलाई करो और जिसने तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया उसे क्षमा कर दो।
97. बुरे इन्सान को अपने अच्छे व्यवहार से सुधारो और अपनी अच्छी बातों के द्वारा उसका नेकी की ओर मार्गदर्शन करो।
98. अपने कार्यों को छुपाओ और अपने राज़ों को हर चाहने वाले की दुल्हन न बनाओ। अर्थात हर किसी से अपने रहस्यों का वर्णन न करो।
99. जो अपने लिये पसन्द करते हो, वही दूसरों के लिये भी पसंद करो, ताकि मुसलमान रहो।
100. जो धन तुम्हारे हिस्से में आया है उस पर खुश रहो (और) मालदारी में जीवन व्यतीत करो।
101. अपने मेहमान की इज़्ज़त करो चाहे वह नीच ही हो और अपने बाप व उस्ताद के आदर में अपनी जगह से खड़े हो जाओ चाहे तुम शासक ही क्यों न हो।
102. (अगर) कोई तुम्हारे मालदार होने की स्थिति में तुम से कर्ज़ माँगे तो उसे अच्छा समझो, वह तुम्हारी आवश्यक्ता के समय तुम्हें उसका बदला देगा।
103. तुम्हें जिन लोगों पर श्रेष्ठता दी गई है उनकी ओर अधिक देखो, (अर्थात उनका अधिक ध्यान रखो) क्योंकि यह, शुक्र करने का एक तरीका है।
104. समस्त लोगों के साथ मोहब्बत और भलाई करने को अपने दिल का नारा बना लो और न उन्हें नुक्सान पहुंचाओ और न ही उन पर तलवार खींचो।
105. अपनी पूरी मेहनत व कोशिश को आख़ेरत के लिये खर्च करो ताकि तुम्हारा ठिकाना अच्छा बने और अपनी आख़ेरत को दुनिया के बदले न बेचो।
106. अपने तमाम मातहतों को काम पर लगाओ और उनसे, उनके कार्यों के बारे में पूछ ताछ करो, (ताकि वह अपनी ज़िम्मेदारियों का जवाब दें) यह काम (इस लिए) अच्छा है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी को एक दूसरे के कांधे पर न डाल सकें।
107. अपनी पूरी मोहब्बत को अपने दोस्त पर निछावर कर दो, लेकिन उस पर आँख बन्द कर के भरोसा न करो, दिल से उसके साथ रहो लेकिन अपने सारे राज़ उसे न बताओ।
108. हक़ (सच्चाई) की कडवाहट पर सब्र करो और खबरदार बातिल (झूठ) की मिठास से धोखा न खाना।
109. अपने बड़ों का कहना मानों ताकि तुम्हारे छोटे तुम्हारा कहना मानें।
110. ज्ञान प्राप्त करो ताकि वह तुम्हें ज़िन्दगी दें।
111. सब के साथ मिल कर रहो और अलग रहने से बचो।
112. सुअवसर से फ़ायदा उठाओ क्यों कि वह बादलों की तरह गुज़र जाती है।
113. तन्हाई के गुनाहों से बचो, क्योंकि उन्हें देखने वाला हाकिम है।
114. ज्ञान प्राप्त करो ताकि उसके द्वारा पहचाने जाओ और उस पर क्रियान्वित रहो ताकि उसके योग्य बने रहो।
115. अपनी राय को एक दूसरे के सामने रखो ताकि उस से एक अच्छा नतीजा निकले।
116. अपनी बात चीत को सुन्दर बनाओ ताकि अच्छा जवाब सुनो।
117. अपनी बुद्धी को ग़लती करने वाली मान कर चलो, क्योंकि उस पर अधिक भरोसा करना ग़लती हो सकती है।
118. हर उस काम से बचो जिस का करने वाला उसे अपने लिये तो पसंद करता हो लेकिन आम मुसलमानों के लिये पसंद न करता हो।
119. हर उस बात व काम से बचो, जो आख़ेरत व दीन को बर्बादी की ओर ले जायें।
120. बुरे दोस्त के पास बैठने से बचो, क्योंकि वह अपने दोस्त को बर्बाद और अपने साथी को ज़लील करता है।
121. जो चीज़ें तुम्हारे पास बाक़ी रहने वाली नहीं हैं, उनमें अपनी उम्र बर्बाद करने से बचो, क्योंकि जो उम्र बीत जाती है, वह वापस नहीं आती।
122. अधिक बोलने से बचो क्योंकि अधिक बोलने वाले के गुनाह भी अधिक होते हैं।
123. चुग़ल खोरी से बचो, क्योंकि यह दुश्मनी का बीज बोती है और अल्लाह व इन्सानों से दूर करती है।
124. भलाई करने के बाद उसका एहसान जताने से बचो, क्योंकि एहसान जताना नेकी को बर्बाद कर देता है।
125. निफ़ाक से बचो, क्योंकि अल्लाह (की नज़र में) मुनाफिक की कोई इज़्ज़त नहीं है।
126. अपनी ज़बान को अपने भाई की चुग़ली की सवारी बनाने से बचओ और ऐसी बात कहने से भी दूर रहो जो तुम्हारे लिये दलील और तुम्हारे साथ बुराई करने का कारण व बहाना बने।
127. पेट भर कर भोजन करने से बचो, क्योंकि इस से दिल सख़्त होता है, नमाज़ में सुस्ती पैदा होती है और यह शरीर के लिये भी हानिकारक है।
128. अलग होने से बचो, क्योंकि हक़ से अलग होने वाला शैतान का (शिकार बन जाता है) जिस तरह रेवड़ से अलग होने वाली भेड़, भेड़िये का शिकार बन जाती है।
129. क्या कोई नहीं है, जो उम्र पूरी होने से पहले ग़फ़लत से जाग जाए।
130. जान लो कि भुखमरी एक विपत्ति है और शारीरिक बीमारी भुखमरी से भयंकर है और दिल की बीमारी (अर्थात कुफ़्र, निफ़ाक़ व शिर्क) शारीरिक बीमारी से भी भंयकर है।
131. समझ लो कि तुम जिस चीज़ के बारे में नहीं जानते हो उसे सीखने में शर्म न करो, क्योंकि हर इन्सान का महत्व उस चीज़ में है जिसे वह जानता है।
132. जान लो कि जब किसी से कोई सवाल पूछा जाये और वह उसका जवाब न जानता हो तो यह कहने में कोई बुराई नही है कि मैं नहीं जानता हूँ।
133. सब से अच्छी इबादत आदतों पर क़ाबू पाना है।
134. सब से अच्छा ईमान आमानतदारी है।
135. इंसानों में सब से बुरा जीवन ईर्ष्यालु का होता है।
136. दिलों में सब से बुरा दिल, कीनः (ईर्ष्या) रखने वाले का होता है।
137. सब से अच्छा काम वह है जिस के द्वारा अल्लाह की ख़ुशी को प्राप्त करने की इच्छा की जाये।
138. सब से श्रेष्ठ भलाई, पीड़ित की फ़रियाद सुनना है।
139. सब से बड़ी मूर्खता, (किसी की) बुराई या प्रशंसा में अधिक्ता से काम लेना है।
140. सब से अच्छा इन्सान वह है, जिस से इन्सानों को सबसे अधिक फ़ायदा पहुंचता है।
141. सब से बड़ी गद्दारी (किसी के) रहस्यों को खोलना है।
142. सब से अच्छी पारसाई, खुश गुमान रहना है।
143. जिस चीज़ की सज़ा बहुत जल्दी मिलती है, वह झूठी क़सम है।
144. सब से अधिक इच्छायें उन लोगों की होती है, जो मौत को बहुत कम याद करते हैं।
145. सब से अधिक दृष्टिवान इन्सान वह है जो अपनी बुराइयों को देखे और गुनाहों से रुक जाये।
146. सब से अधिक शक्तिशाली इन्सान वह है जो अपनी हवस पर काबू पा ले।
147. मर्दांगी की जड़ शर्म है, और उसका फल पारसाई है।
148. सब से अच्छा इन्सान वह है जो अपने गुस्से को पी जाए और ताक़त के होते हुए संयम से काम ले।
149. सब से खुश हाल इन्सान वह है जो नेकियों की तरफ़ दौड़े।
150. अल्लाह के नज़दीक सब से बड़ा गुनाह वह है, जिसे गुनहगार बार बार करे।

4. 151. बुद्धिमान होने की सब से बड़ी दलील, अच्छी तदबीर व उपाय है।
152. सब से अच्छी राय उस इन्सान की है जो स्वयं को मशवरा देने वाले की राय से मुक्त न समझता हो।
153. सब से बड़ा दान व सखावत, हकदारों तक उनके हक पहुंचाना है।
154. सब से बड़ा दुख व तकलीफ़, उस चीज़ में मेहनत करना है जिस से तुम्हें कोई फ़ायदा न हो।
155. सब से बड़ी बुराई, दूसरों की उस बुराई को पकड़ना है जो स्वयं में भी पाई जाती है।
156. सब से अधिक नुक़्सान में वह लोग हैं जो हक़ बात कहने की ताक़त रखते हुए, हक़ बात न कहें।
157. सब से अधिक कंजूस वह लोग हैं जो सलाम करने में कंजूसी करें।
158. नीच से कोई चीज़ माँगना, मौत से भी अधिक कठिन है।
159. सब से अधिक बुद्धिमान इन्सान वह है जो अपनी बुराइयों को देखे और दूसरों की बुराइयों को न देखे।
160. सब से अच्छा सदाचार यह है कि इन्सान अपनी हद में रहे और उस से बाहर न निकले।
161. सब से अच्छा जीवन उसका है जो उस पर प्रसन्न रहे, जो उसे अल्लाह ने दिया है।
162. नर्मी के साथ बात करना और ऊँची आवाज़ में सलाम करना इबादतों में से है।
163. यह दिल बर्तन (के समान) हैं और इन में सब से अच्छा बर्तन वह है जिस में नेकियां अधिक आयें।
164. मोमिन की खुशी उसके चेहरे पर, उसकी ताक़त उसके दीन में और उसका ग़म उसके दिल में होता है।
165. दिल, बदन की तरह थक जाते हैं, उन्हें खुश करने के लिये नया ज्ञान व बुद्धिमत्ता तलाश करो।
166. सब से अच्छी नेकी छिपा कर सदका देना, माँ बाप के साथ भलाई करना और सिला –ए- रहम (रिश्तेदारों के साथ मेल जोल से रहना) करना है।
167. लोगों को सदाचार की ज़रुरत, सोने चांदी से अधिक है।
168. तुम से लोगों की ज़रुरतों का जुडा होना, तुम्हारे लिए अल्लाह की नेमत है, उसे अच्छा समझो और उस से दुखी न हो वर्ना वह निक़मत में बदल जायेगी। (निक़मत शब्द हर प्रकार की बुराई को सम्मिलित है)
169. अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो अपने दिल से दुनिया की मोहब्बत निकाल दो।
170. अगर तुम गुनाहों से पाक हो जाओ तो अल्लाह तुम से मोहब्बत करेगा।
171. अगर तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हें निजात (मुक्ति) देगा और तुम्हारे ठिकाने को अच्छा बना देगा।
172. मरने के बाद, तुम्हें तुम्हारे उन कार्यों के अलावा कोई चीज़ फायदा नहीं पहुंचायेगी जो तुम ने आगे भेज दिये हैं अतः नेक कामों को तुम अपना तोशा बना लो। (यात्रा के दौरान काम आने वाली हर चीज़ को तोशा कहते हैं, यहाँ पर इस बात की ओर इशारा किया गया है कि परेलोक की यात्रा के लिए अच्छे कार्यों को इकठ्ठा करो ताकि वह इस यात्रा में तुम्हारे काम आयें।)
173. बुद्धिमान वह है जो अपने तजुर्बों से शिक्षा ले।