True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अक़वाले मासूमीन (अ0स0)

351. ज्ञान के अनुरूप कार्यों का न होना, बिना फल के पेड़ के समान है। अर्थात अगर ज्ञान के अनुरूप कार्य न हों तो ज्ञान का कोई लाभ नही है।
352. अपने बच्चों को नमाज़ सिखाओ और जब वह बालिग हो जायें तो उनसे नमाज़ के बारे में पूछ ताछ करो।
353. आशिक की आँखें, माशूक की बुराईयों को नहीं देखतीं और उसके कान उसकी बुराई को नहीं सुनते।
354. अपने गुनाहों को स्वीकार करने वाला गुनहगार, उस आज्ञाकारी से अच्छा है जो अपने कार्यों पर गर्व करता है।
355. समस्त लोगों के साथ न्याय पूर्वक व्यवहार करो और मोमिनों से त्याग के साथ।
356. ग़द्दारी की अन्तिम सीमा, अपने पक्के दोस्त को धोखा देना और प्रतिज्ञा को तोड़ना है।
357. सब से बड़ी पारसाई, स्वयं को बुरी नज़र से रोकना है।
358. अपनी आदतों को बदलो ताकि आज्ञा पालन तुम्हारे लिये सरल हो जाये।
359. हँसी मज़ाक़ की अधिकता, गंभीरता को खत्म कर देती है।
360. दुनिया में होने वाले परिवर्तनों में शिक्षाएं (निहित) हैं।
361. स्थितियों के बदलने पर मर्दों के जौहर पहचाने जाते हैं।
362. तंगी के समय, दोस्त की ओर से होने वाली सहायता का पता लगता है।
363. हक़ की पाबन्दी से खुशी नसीब होती है।
364. नसीहत से दिल चमकते हैं।
365. जिसने अपने आज के कार्यों को सुधार कर, कल की ग़लतियों का बदला चुकाया, वह सफल हो गया।
366. जिसने वफ़ादारी का वेश धारण किया और अमानत का कवच पहना, वह सफल हो गया। अर्थात जिसने वफादारी और अमानतदारी को अपनाया वह सफल हो गया।
367. बादशाह की श्रेष्ठता शहरों को आबाद करने में है।
368. जिसने अपने दुशमनों से नसीहत चाही उसने मूर्खता की।
369. कभी कभी इंसान को ज़िद के नतीजे में वह मिलता है, जिसकी उसे ज़रूरत नही होती।
370. बुराईयाँ इतनी फैल गईं हैं कि अब बुराईयों से शर्म कम हो गई है।
371. निरन्तर चलते रहने वाला कम कार्य, उस अधिक कार्य से अच्छा है, जिससे तुम उकता जाओ।
372. आदमी का महत्व उसकी हिम्मत के अनुरूप होता है और उसके कार्यों का महत्व उसकी नीयत के अनुसार होता है।
373. यह कहना कि "मैं नही जानता हूँ।" स्वयं आधा ज्ञान है।
374. अच्छे लोगों से मिलो ताकि तुम भी उन्हीं जैसे बन जाओ और बुरे लोगों से दूर रहो ताकि उनसे अलग रह सको।
375. जीवन अच्छी योजना से आरामदायक बनता है और उसे अच्छे प्रबंधन से प्राप्त किया जा सकता है।
376. हर ऊँचे पद (मान सम्मान) वाले से ईर्ष्या की जाती है।
377. हर इंसान अपने जैसे इंसान की तरफ़ झुकता है।
378. बद अख़लाक़ी (दुष्टता) के अतिरिक्त हर बीमारी का इलाज है।
379. ज्ञान के अलावा हर चीज़ ख़र्च करने से कम होती है।
380. जिस चीज़ का प्रचार करना सही न हो, वह अमानत है, चाहे उसके छिपाने का आग्रह भी न किया गया हो।
381. बहुत सी कठिनाईयाँ प्यार मोहब्बत से हल हो जाती हैं।
382. ऐसे बहुत से लोग हैं जो काम करने में आज कल करते रहते हैं, यहाँ तक कि उन पर मौत हमला कर देती है।
383. उसके विचार किस तरह साफ़ हो सकते हैं, जिसका पेट हमेशा भरा रहता हो?!
384. उस उम्र से किस तरह खुशी मिल सकती है, जिसमें हर पल कमी होती रहती है ?
385. वह इबादत का मज़ा कैसे चख सकता है जो स्वयं को हवस से न रोक सकता हो ?!
386. वह दूसरों को कैसे सुधार सकता है, जिसने स्वयं को न सुधारा हो ?!
387. वह अल्लाह से मोहब्बत का दावा कैसे कर सकता है, जिसके दिल में दुनिया की मोहब्बत बस गई हो?!
388. डरने के लिए, बालों का सफ़ेद होना काफ़ी है।
389. आदमी की श्रेषठता के लिए यही काफ़ी है कि स्वयं को अपूर्ण माने।
390. आदमी की होशिआरी के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी बुराइयों को जानता हो।
391. आदमी की मूर्खता के लिए बेमौक़े हँसना काफ़ी है।
392. जो (लोग) दुनिया में बच गये हैं, उनकी जानकारी के लिए वह काफ़ी हैं जो दुनियाँ से चले गये हैं।
393. आदमी की लापरवाही के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी ताक़त को काम में न आने वाली चीज़ों में व्यय कर दे।
394. अधिक मज़ाक़, रौब को ख़त्म कर देता है।
396. अधिक क्रोध, क्रोधी को अपमानित करा देता है और उसकी बुराइयों को प्रकट कर देता है।
397. दानी बनो, लेकिन व्यर्थ ख़र्च करने वाले न बनो।
398. तुम उस काम में व्यस्त रहो जिसके बारे में तुम से पूछ ताछ की जायेगी।
399. पीड़ित के सहायक और अत्याचारी के दुश्मन बनो।
400. जब किसी चीज़ को प्राप्त करना चाहो तो उच्च हिम्मत से काम करो और जब किसी चीज़ पर अधिपत्य जमा लो तो अपनी सफला में महानता का परिचय दो।

401. كُن بِأسرارِكَ بَخيلاً، وَلا تُذِع سِرّاً اُودِعتَهُ فَإنَّ الإذاعَةَ خِيانَةٌ;
अपने रहस्यों के बारे में कँजूस बन जाओ (अर्थात किसी को न बताओ) और अगर कोई तुम्हें अपना राज़ बता दे तो उसके राज़ को न खोलो, क्योंकि किसी के राज़ को खोलना, ग़द्दारी है।
402.
كُلَّما كَثُرَ خُزّانُ الأسرارِ كَثُرَ ضِياعُها;
जितने राज़दार बढ़ते जायेंगे, उतने ही राज़ खुलते जायेंगे।
404.
كَما تَزرَعُ تَحصُدُ;
जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।
405.
كُفرانُ النِّعَمِ يُزِلُّ القَدَمَ وَيَسلُبُ النِّعَمَ;
नेमत की नाशुक्री पैरों को लड़ खड़ा देती है और नेमत को रोक देती है।
406.
لِكُلِّ ضَيق مَخرَجٌ;
हर तंग जगह से बाहर निकलने का रास्ता है।
407.
لِكُلِّ مَقامِ مَقالٌ;
हर जगह के लिए एक बात है।
408.
لِكُلِّ شَيء زَكاةٌ وَزَكاةُ العَقلِ احتِمالُ الجُهّالِ;
हर चीज़ के लिए एक ज़कात है और बुद्धी की ज़कात मूर्ख लोगों को बर्दाश्त करना है।
409.
لِطالِبِ العِلمِ عِزُّ الدُّنيا وَفَوزُ الآخِرَةِ;
तालिबे इल्म (शिक्षार्थी) के लिए दुनिया में सम्मान और आख़ेरत में सफलता है।
410.
لِلمُؤمِنِ ثَلاثُ ساعات: ساعَةٌ يُناجي فيها رَبَّهُ وَساعَةٌ يُحاسِبُ فِيها نَفسَهُ، وَساعَةٌ يُخَلِّي بَينَ نَفسِهِ وَلَذَّتِها فِيما يَحِلُّ وَيَجمُلُ;
मोमिन के लिए तीन वक़्त हैं : एक वक़्त वह जिसमें अल्लाह की इबादत करता है, दूसरा वक़्त वह जिसमें (अपने कार्यों का) हिसाब करता है, तीसरा वक़्त वह जिसमें वह हलाल व अच्छी लज़्ज़तो का आनंनद लेता है।
411.
لِيَكُن أبغَضُ النّاسِ إلَيكَ وَأبعَدُهُم مِنكَ أطلَبَهُم لِمَعايِبِ النّاسِ;
तुम्हें सबसे ज़्यादा क्रोध उस इंसान पर करना चाहिए, और सबसे ज़्यादा दूर उस इंसान से रहना चाहिए, जो लोगों की बुराईयों की तलाश में अधिक रहता हो।
412.
لَن يَفُوزَ بِالجَنَّةِ إلاَّ السّاعِي لَها;
जन्नत में उन लोगों के अलावा कोई नही जायेगा जो उसमें जाने के लिए कोशिश करते हैं।
413.
لَن يُجدِيَ القَولُ حَتّى يَتَّصِلَ بِالفِعلِ;
किसी भी बात का उस समय तक फ़ायदा नही है, जब तक उसके अनुसार कार्य न किया जाये।
414.
لَن تُدرِكَ الكَمالَ حَتّى تَرقى عَنِ النَّقصِ;
तुम उस समय तक कमाल पर नही पहुँच सकते, जब तक (अपनी) कमियों को दूर न कर लो।
415.
لَيسَ مَعَ قَطيعَةِ الرَّحِمِ نَماءٌ;
क़त- ए- रहम (संबंधियों से नाता तोड़ना) के साथ विकास नही है।
416.
لَيسَ لاِنفُسِكُم ثَمَنٌ إلاَّ الجَنَّةُ فَلا تَبيعُوها إلاّ بِها;
तुम्हारी जान की क़ीमत जन्नत के अलावा कुछ नही है, इस लिए तुम उसे जन्नत के अलावा किसी चीज़ के बदले में न बेंचो।
417.
لَيسَ مِنَ العَدلِ القَضاءُ عَلَى الثِّقَةِ بِالظَّنِّ;
अमानतदार, इंसान के बारे में किसी आशंका के आधार पर कोई फैसला करना न्यायपूर्वक नही है।
418.
لَيسَ لَكَ بِأخ مَنِ احتَجتَ إلى مُداراتِهِ;
वह तुम्हारा भाई नही है, जिसके प्रेम पूर्वक व्यवहार की तुम्हें ज़रूरत हो।
419.
لَيسَ لَكَ بِأخ مَن أحوَجَكَ إلى حاكِم بَينَكَ وَبَينَهُ;
वह तुम्हारा भाई नही है जो तुम्हें अपने व तुम्हारे बीच फ़ैसले के लिए (किसी तीसरे फ़ैसला करने वाले का) मोहताज बना दे।
420.
لَيسَ لِلعاقِلِ أن يَكُونَ شاخِصاً إلاّ فِي ثَلاث: خُطوَة في مَعاد، أو مَرَمَّةِ لِمَعاش أو لَذَّة في غَيرِ مُحَرَّم;
बुद्धिमान के लिए शौभनीय नही है कि वह निम्न- लिखित तीन कामों के अतिरिक्त कोई अन्य काम करे : क़ियामत के लिए काम करना, जीविका कमाना और हलाल तरीक़े से मज़ा लेना।
421.
لَم يَعقِل مَواعِظَ الزَّمانِ مَن سَكَنَ إلى حُسنِ الظَّنِّ بِالأيّامِ;
जो समय के बारे में ख़ुश गुमान रहता है उस आदमी को ज़माने की शक्षाएं व नसीहतें बुद्धिमान नही बना सकती हैं।
422.
لَم يَعقِل مَن وَلِهَ بِاللَّعِبِ وَاستُهتِرَ بِاللَّهوِ وَالطَّرَبِ;
जो खेल कूद, नाच गाने और व्यर्थ बातों का आशिक़ बन जाये, वह बुद्धिमान नही है
423.
لَوِ اعتَبَرتَ بِما أضَعتَ مِن ماضِي عُمرِكَ لَحَفِظتَ ما بَقِيَ;
अगर तुम अपनी व्यर्थ बीती हुई उम्र से शिक्षा लो तो शेष उम्र की रक्षा करो।
424.
لَو يَعلَمُ المُصَلّي ما يَغشاهُ مِنَ الرَّحمَةِ لَما رَفَعَ رَأسَهُ مِنَ السُّجُودِ;
अगर नमाज़ पढ़ने वाला यह जान जाये कि उसे कौनसी रहमत (अनुकम्पा) घेरे हुए है तो वह सजदे से सर न उठाये।
425.
لَو بَقِيَتِ الدُّنيا عَلى أحَدِكُم لَم تَصِل إلى مَن هِيَ فِي يَدَيهِ;
अगर दुनिया तुम में से किसी एक के पास बाक़ी रहती तो जिसके पास आज है, उसके पास कभी न पहुँचती।
426.
لِيَكُن مَركَبُكَ القَصدَ وَمَطلَبُكَ الرُّشدَ;
मध्य चाल के घोड़े पर सवार होकर अपने विकास की ओर बढ़ो। अर्थात अपने ख़र्च को सीमित करो न अधिक ख़र्च करो और न बहुत कम।
427.
لِن لِمَن غالَظَكَ فَإنَّهُ يُوشِكُ اَن يَلينَ لَكَ;
जो तुम्हारे साथ सख़्ती करे, तुम उसके साथ नर्मी करो, वह भी तुम्हारे लिए नर्म हो जायेगा।
428.
لِقاءُ أهلِ المَعرِفَةِ عِمارَةُ القُلُوبِ وَمُستَفادُ الحِكمَةِ;
अहले मारेफ़त (आध्यात्मिक लोग) से मिलने जुलने पर दिल खुश होता है और हिकमत (बुद्धी) बढ़ती है।
429.
لَذَّةُ الكِرامِ فِي الإطعامِ، وَلَذَّةُ اللِّئامِ فِي الطَّعامِ;
करीम (श्रेष्ठ) लोगों को खिलाने में मज़ा आता है और नीच लोगों को खाने में मज़ा आता है।
430.
مَن أنصَفَ أُنصِفَ;
जो इंसाफ़ करता है, उसके साथ इंसाफ़ होता है।
431.
مَن أحسَنَ المَسأَلَةَ أُسعِفَ;
जो अच्छे ढंग से माँगता है, उसे मिलता है।
432.
مَن مَدَحَكَ فَقَد ذَبَحَكَ;
जिसने तुम्हारी प्रशंसा की, उसने तुम्हें क़त्ल कर दिया।
433.
مَن دَخَلَ مَداخِلَ السُّوءِ اتُّهِمَ;
जो बुरी जगह जाता है, उस पर आरोप लगते हैं।
434.
مَن نَسِيَ اللهَ أنساهُ نَفسَهُ;
जो अल्लाह को भूल जाता है, अल्लाह उसे ख़ुद उससे भुला देता है।
435.
مَن أساءَ خُلقَهُ عَذَّبَ نَفسَهُ;
जो स्वयं को दुष्ट बना लेता है, वह कठिनाईयाँ झेलता है।
436.
مَن عَجِلَ كَثُرَ عِثارُهُ;
जो जल्दी करता है, उसकी ग़लतियाँ अधिक होती हैं।
437.
مَن أحَبَّ شَيئاً لِهِجَ بِذِكرِهِ;
जो जिस चीज़ से मोहब्बत करता, उसकी ज़बान पर उसका नाम रहता है।
438.
مَن قَبَضَ يَدَهُ مَخافَةَ الفَقرِ فَقَد تَعَجَّلَ الفَقرَ;
जो निर्धनता के डर से अपने हाथ को (दान देने से) रोक ले, समझो वह तेज़ी के साथ निर्धनता की ओर बढ़ रहा है।
439.
مَن نَظَرَ فِي العَواقِبِ سَلِمَ;
जो (किसी काम के) परिणाम पर विचार करता है, वह सुरक्षित रहता है।
440.
مَن جَهِلَ مَوضِعَ قَدَمِهِ زَلَّ;
जो अपने रास्ते को न जानता हो, वह भटक जाता है।
441.
مَن وَعَظَكَ أحسَنَ إلَيكَ;
जिसने तुम्हें नसीहत की, उसने तुम्हारे साथ भलाई की।
442.
مَن وافَقَ هَواهُ خالَفَ رُشدَهُ;
जिसने अपनी इच्छाओं का समर्थन किया, उसने अपने विकास को अवरुद्ध किया।
443.
مَن أحسَنَ إلى جِيرانِهِ كَثُرَ خَدَمُهُ;
जो अपने पड़ौसियों के साथ भलाई करता है, उसके सेवक ज़्यादा हो जाते हैं।
444.
مَن أظهَرَ عَزمَهُ بَطَلَ حَزمُهُ;
जो अपने इरादे को प्रकट कर देता है, उसकी दूरदर्शिता समाप्त हो जाती है।
445.
مَن غَشَّ نَفسَهُ لَم يَنصَح غَيرَهُ;
जो स्वयं को धोखा देता है, वह दूसरों को नसीहत नही कर सकता।
446.
مَن عُرِفَ بِالكِذبِ لَم يُقبَل صِدقُهُ;
जो झूठा मशहूर हो जाता है, उसकी सच्ची बात भी स्वीकार नही की जाती।
447.
مَن أعمَلَ اجتِهادَهُ بَلَغَ مُرادَهُ;
जो कोशिश व मेहनत करता है, वह अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है।
448.
مَن ظَنَّ بِكَ خَيراً فَصَدِّق ظَنَّهُ;
जो तुम्हारे बारे में अच्छा विचार रखता है, (तुम अपने व्यवहार से) उसके विचार को सत्य कर दिखाओ।
449.
مَن رَجاكَ فَلا تُخَيِّب أمَلَهُ;
जो तुम से कोई उम्मीद रखता हो, उसे ना उम्मीद न करो।
450.
مَن عَلِمَ أنَّهُ مُؤاخَذٌ بِقَولِهِ فَليُقَصِّر فِي المَقالِ;
जिसे यह पता हो कि उससे उसकी बात चीत के बारे में पूछ ताछ की जायेगी, उसे कम बोलना चाहिए।
451.
مَن خَلا بِالعِلمِ لَم تُوحِشهُ خَلوَةٌ;
जो ज्ञान के साथ रहता है, उसे कोई तन्हाई नही डरा सकती।
452.
مَن تَسَلَّى بِالكُتُبِ لَم تَفُتهُ سَلَوةٌ;
जिसे किताबों से आराम मिलता है, समझो उसने आराम का कोई साधन नही खोया है
453.
مَن أُعطِىَ الدُّعاءَ لَم يُحرَمِ الإجِابَةَ;
जिसे दुआ की तौफ़ीक़ दी जाती है, उसे दुआ के क़बूल होने से महरूम (वंचित) नही रखा जाता।
454.
مَن جانَبَ الإخوانَ عَلى كُلِّ ذَنبِ قَلَّ أصدِقاؤُهُ;
जो अपने दोस्तों से, उनकी ग़लतियों की वजह से अलग हो जाता है, उसके दोस्त कम हो जाते हैं।
455.
مَن أبانَ لَكَ عَيبَكَ فَهُوَ وَدُودُكَ;
जो तुम्हें, तुम्हारी बुराइयों के बारे में बताये, वह तुम्हारा दोस्त है।
456.
مَن عَرَفَ النّاسَ لَم يَعتَمِد عَلَيهِم;
जो लोगों को जान जाता है, उन पर भरोसा नहीं करता।
457.
مَن سَألَ فِي صِغَرِهِ أجابَ فِي كِبَرِهِ;
जो बचपन में पूछता है, वह बड़े होकर जवाब देता है। अर्थात जो बचपन में ज्ञान प्राप्त करता है, वह बड़ा होने पर लोगों के प्रश्नों के उत्तर देता है।
458.
مَن قَرَعَ بابَ اللهِ فُتِحَ لَهُ;
जो अल्लाह के दरवाज़े को खटखटाता है, उसके लिए दरवाज़ा खुल जाता है।
459.
مَن شَرُفَت هِمَّتُهُ عَظُمَت قِيمَتُهُ;
जिसमें जितनी अधिक हिम्मत होती है, उसका उतना ही अधिक महत्व होता है।
460.
مَن أطاعَ هَواهُ باعَ آخِرَتَهُ بِدُنياهُ;
जिसने अपनी हवस व इच्छाओं का अनुसरण किया, उसने अपनी आख़ेरत को दुनिया के बदले बेंच दिया।
461.
مَن حُسُنَت عِشرَتُهُ كَثُرَ إخوانُهُ;
जिसका व्यवहार अच्छा होता है, उसके भाई (दोस्त) अधिक होते हैं।
462.
مَنِ اتَّجَرَ بِغَيرِ عِلم فَقَدِ ارتَطَمَ فِي الرِّبا;
जो ज्ञान (फ़िक़्ह) को जाने बिना व्यापार करता है, वह सूद में डूब जाता है।
463.
مَن قالَ مالا يَنبَغي سَمِعَ مالا يَشتَهِي;
जो अनुचित बात कहता है, वह बुरी भली सुनता है।
464.
مَن كَظَّتهُ البِطنَةُ حَجَبَتهُ عَنِ الفِطنَةِ;
जो अधिक खाने के दुख में घिर जाता है, वह बुद्धिमत्ता से दूर रह जाता है।
465.
مَن دارَى النّاسَ أمِنَ مَكرَهُم;
जो लोगों का मान सम्मान करता है, वह उनकी धोखे धड़ी से सुरक्षित रहता है।
466.
مَن أحَبَّنا فَليَعمَل بِعَمَلِنا وَليَتَجَلبَبِ الوَرَعَ;
जो हम (अहलेबैत) से मोहब्बत करता है, उसे चाहिए कि वह हमारी तरह व्यवहार करे और मुत्तक़ी बन जाये।
467.
مَن طَلَبَ شَيئاً نالَهُ أو بَعضَهُ;
जो किसी चीज़ को चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से या उसके कुछ हिस्से को प्राप्त कर लेता है।
468.
مَن يَطلُبِ الهِدايَةَ مِن غَيرِ أهلِها يَضِلُّ;
जो किसी अयोग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन चाहता है, वह भटक जाता है।
469.
مَن جالَسَ الجُهّالَ فَليَستَعِدَّ لِلقيلِ وَالقالِ;
मूर्खों के साथ उठने बैठने लाले को, व्यर्थ की बातें सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।
470.
مَن رَقى دَرَجاتِ الهِمَمِ عَظَّمَتهُ الأُمَمُ;
जो हिम्मत के द्वारा उन्नति करता है, लोग उसे बड़ा मानते हैं।