True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अक़वाले मासूमीन (अ0स0)

471. مَن كَشَفَ ضُرَّهُ لِلنّاسِ عَذَّبَ نَفسَهُ;
जिसने अपनी कठिनाई को लोगों पर प्रकट कर दिया, उसने स्वयं को अज़ाब में डाल लिया।
472.
مَن أظهَرَ فَقرَهُ أذَلَّ قَدرَهُ;
जिसने अपनी निर्धनता को दूसरों के सामने प्रकट कर दिया, उसने अपना महत्व घटा लिया।
473.
مَن كَثُرَ فِكرُهُ فِي المَعاصِيَ دَعَتهُ إلَيها;
जो गुनाहों के बारे में अधिक विचार करता है, उसे गुनाह अपनी तरफ़ खीँच लेते हैं।
474.
مَنِ استَنكَفَ مِن أبَوَيهِ فَقَد خالَفَ الرُّشدَ;
जिसने घमंड के कारण अपने माँ बाप की अवज्ञा की, उसने अपने विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
475.
مَن بَخِلَ عَلى نَفسِهِ كانَ عَلى غَيرِهِ أبخَلَ;
जो स्वयं अपने बारे में कंजूसी करता है, वह दूसरों के बारे में अधिक कंजूसी करता है।
476.
مَن ظَلَمَ العِبادَ كانَ اللهُ خَصمَهُ;
जो अल्लाह के बंदों पर अत्याचार करता है, अल्लाह उसका दुश्मन है।
477.
مَن أسرَعَ فِي الجَوابِ لَم يُدرِكِ الصَّوابَ;
जो जवाब देने में जल्दी करता है, वह सही जवाब नही दे पाता।
478.
مَن عَمِلَ بِالحَقِّ مالَ إلَيهِ الخَلقُ;
जो हक़ (सच्चाई) के साथ काम करता है, लोग उसकी तरफ़ झुकते हैं।
479.
مَن مَدَحَكَ بِما لَيسَ فيكَ فَهُوَ خَليقٌ أن يَذُمَّكَ بِما لَيسَ فِيكَ;
जो तुम्हारी उस बारे में प्रशंसा करे जो बात तुम्हारे अन्दर नहीं पाई जाती है, उसे अधिकार है कि वह तुम्हारी उस बारे में बुराई भी करे जो तुम्हारे अन्दर नही पाई जाती है।
480.
مَن كافَأَ الإحسانَ بِالإساءَةِ فَقَد بَرِيءَ مِنَ المُرُوَّةِ;
जो भलाई का बदला बुराई से देता है, उसमें मर्दानगी नही पाई जाती।
481.
مَن كَرُمَت عَلَيهِ نَفسُهُ لَم يُهِنها بِالمَعصِيَةِ;
जो इज़्ज़तदार होता है, वह स्वयं को गुनाहों के द्वारा अपमानित नही करता।
482.
مَن ضَعُفَ عَن سِرِّهِ فَهُوَ عَن سِرِّ غَيرِهِ أضعَفُ;
जो अपने राज़ छिपाने में कमज़ोर होता है, वह दूसरों के राज़ को छिपाने में अधिक कमज़ोर होता है।
483.
مَن أسهَرَ عَينَ فِكرَتِهِ بَلَغَ كُنهَ هِمَّتِهِ;
जो अपने विचार की आँखों को खुला रखता है, वह अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है।
484.
مَن تَطَلَّعَ عَلى أسرارِ جارِهِ انهَتَكَت أستارُهُ;
जो अपने पड़ोसी के रहस्यों को जानने की कोशिश करता है, उसका पर्दा फट जाता है, अर्थात उसके स्वयं के राज़ खुल जाते हैं।
485.
مَن كَثُرَ في لَيلِهِ نَومُهُ فاتَهُ مِنَ العَمَلِ مالا يَستَدرِكُهُ في يَومِهِ;
जो रात में अधिक सोता है, उसके कुछ ऐसे काम छुट जाते हैं, जिन्हें वह दिन में पूरा नही कर सकता।
486.
مَن كانَت هِمَّتُهُ ما يَدخُلُ بَطنَهُ كانَت قيمَتُهُ ما يَخرُجُ مِنهُ;
जिस इंसान की पूरी ताक़त उस चीज़ में ख़र्च होती है, जो उसके पेट में जाती है, उसका महत्व उस चीज़ के बराबर है जो पेट से बाहर निकलती है।
487.
مَن أصلَحَ أمرَ آخِرَتِهِ أصلَحَ اللهُ لَهُ أمرَ دُنياهُ;
जो अपने आख़ेरत के कामों को सुधारता है, अल्लाह उसके दुनिया के कामों को सुधार देता है।
488.
مَن يَكتَسِب مالاً مِن غَيرِ حِلِّهِ يَصرِفهُ في غَيرِ حَقَّهِ;
जो हराम तरीक़े से माल कमाता है, वह उसे ग़लत कामों में ख़र्च करता है।
489.
مَنِ استَعانَ بِذَوِي الألبابِ سَلَكَ سَبيلَ الرَّشادِ;
जो बुद्धिमान लोगों से सहायता माँगता है, वह उन्नती के मार्ग पर चलता है।
490.
مَن لَم يَتَعَلَّم فِي الصِّغَرِ لَم يَتَقَدَّم فِي الكِبَرِ;
जो बचपन में नही पढ़ता, वह बड़ा होने पर आगे नही बढ़ता।
491.
مَن لَم تَسكُنِ الرَّحمَةُ قَلبَهُ قَلَّ لِقاؤُها لَهُ عِندَ حاجَتِهِ;
जिसके दिल में मुहब्बत नही होती, उसके पास ज़रूरत के वक़्त कम लोग आते हैं।
492.
مَن طَلَبَ رِضَى اللهِ بِسَخَطِ النّاسِ رَدَّ اللهُ ذامَّهُ مِنَ النّاسِ حامِداً;
जो लोगों की नाराज़गी के साथ भी अल्लाह की खुशी चाहता है, अल्लाह बुराई करने वाले लोगों को भी उसका प्रशंसक बना देता है।
493.
مَنِ اقتَصَدَ فِي الغِنى وَالفَقرِ فَقَدِ استَعَدَّ لِنَوائِبِ الدَّهرِ;
जो मालदारी व ग़रीबी दोनों में मध्य मार्ग को अपनाता है, वह सांसारिक कठिनाईयों का सामना करने के लिए तैयार रहता है।
494.
مَنِ افتَخَرَ بِالتَّبذيرِ احتُقِرَ بِالإفلاسِ;
जो व्यर्थ ख़र्च पर गर्व करता है, वह निर्धनता के हाथों अपमानित होता है।
495.
مَن دَنَت هِمَّتُهُ فَلا تَصحَبهُ;
कम हिम्मत लोगों के साथी न बनों।

501. مَنِ ادَّعى مِنَ العِلمِ غايَتَهُ فَقَد أظهَرَ مِن جَهلِهِ نِهايَتَهُ;
जिसने यह दावा किया कि मैं ज्ञान की अंतिम सीमा तक पहुंच गया हूँ, उसने अपनी मूर्खता की अंतिम सीमा को प्रकट कर दिया।
502.
مِن شَرائِطِ الإيمانِ حُسنُ مُصاحَبَةِ الإخوانِ;
ईमान की शर्तों में से एक शर्त भईयों के साथ सद्व्यवहार भी है।
503.
مِن أحسَنِ الفَضلِ قَبُولُ عُذرِ الجانِي; उच्च श्रेष्ठताओं में से एक श्रेष्ठता ग़लती करने वाले की मजबूरी को स्वीकार करना भी है।
504.
مِن أشرَفِ أفعالِ الكَريمِ تَغافُلُهُ عَمّا يَعلَمُ;
करीम इंसान के श्रेष्ठ कार्यों में से एक काम किसी बात को जानते हुए उसे अनदेखा करना है।
505.
مِن أماراتِ الخَيرِ الكَفُّ عَنِ الأذى;
(लोगों को) पीड़ा पहुँचाने से दूर रहना, नेकी व भलाई की एक निशानी है।
506.
مِن أماراتِ الدَّولَةِ اليَقَظَةُ لِحِراسَةِ الأُمُورِ;
हुकूमत की (मज़बूती) की एक निशानी, कामों की देख रेख के लिए जागना है।
507.
مِن كَمالِ السَّعادَةِ السَّعِيُ في إصلاحِ الجُمهُورِ;
साधारण जनता के सुधार की कोशिश करना सबसे बड़ी भाग्यशालिता है।
508.
مِن أعظَمِ الشَّقاوَةِ القَساوَةُ;
हृदय की कठोरता सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
509.
مِنَ الاِقتِصادِ سَخاءٌ بَغَيرِ سَرَفِ، وَمُرُوَّةٌ مِن غَيرِ تَلَف;
व्यर्थ खर्च किये बिना दान देना और तोड़ फोड़ के बिना मर्दानगी दिखाना, मध्यक्रम की निशानी है।
510.
مِن كَمالِ الإنسان وَوُفُورِ فَضلِهِ استِشعارُهُ بِنَفسِهِ النُقصانَ;
अपने नफ़्स के नुक़्सान के बारे में जानकारी लेना, इंसान के कमाल व अत्याधिक श्रेष्ठ होने की निशानी है।
511.
ما عَزَّ مَن ذَلَّ جيرانَهُ;
अपने पड़ोसी को ज़लील करने वाला, इज़्ज़त नही पा सकता।
512.
ما تَزَيَّنَ مُتَزَيِّنٌ بِمِثلِ طاعَةِ اللهِ;
कोई भी श्रृंगार करने वाला, अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाले के समान सुशौभित नही है।
513.
ما أكثَرَ العِبَرَ وَأقَلَّ الاِعتِبارَ;
नसीहतें कितनी अधिक हैं और नसीहत लेना कितना कम !।
514.
مَا اتَّقى أحَدٌ إلاّ سَهَّلَ اللهُ مَخرَجَهُ;
कोई मुत्तक़ी ऐसा नही है, जिसके कठिनाईयों से बाहर निकलने के रास्ते को अल्लाह ने आसान न बनाया हो।
515.
ما حُفِظَتِ الأُخُوَّةُ بِمِثلِ المُواساةِ;
जिस प्रकार जान व माल के द्वारा सहायता, दोस्ती व भाईचारे को रक्षा करती है, उस तरह कोई भी चीज़ दोस्ती को बाक़ी नही रखती।
516.
مَا اختَلَفَت دَعوَتانِ إلاّ كانَت إحداهُما ضَلالَةً;
दो निमन्त्रण परसपर विरोधी नही हो सकते, जब तक उनमें से एक भ्रमित करने वाला न हो।
517.
لا يَنبَغي أن تَفعَلَهُ فِي الجَهرِ فَلا تَفعَلهُ فِي السِّرِّ;
जिस काम को तुम खुले आम नही कर सकते हो, उसे छुपकर करना भी उचित नही है।
518.
ما أكثَرَ الإخوانَ عِندَ الجِفانِ، وَأقَلَّهُم عِندَ حادِثاتِ الزَّمانِ; जब इंसान के पास प्याला (भरा) होता है अर्थात उसके पास दुनिया का माल होता है तो उसके दोस्त अत्याधिक होते हैं और जब वह कठिनाईयों में घिरता हैं तो दोस्त बहुत कम दिखाई देते हैं !!।
519.
ما تَزَيَّنَ الإنسانُ بِزينَةِ أجمَلَ مِنَ الفُتُوَّةِ;
इंसान बहादुरी से ज़्यादा किसी भी आभूषण से सुसज्जित नही हुआ है।
520.
ما لُمتُ أحَداً عَلى إذاعَةِ سِرِّي اِذ كُنتُ بِهِ أضيَقَ مِنهُ;
जिसने मेरा राज़ खोला, मैंने उसे बुरा भला नही कहा, क्योंकि उसे छिपा कर रखने में मैं उससे भी अधिक तंग था।
521.
مِلاكُ الأُمُورِ حُسنُ الخَواتِمِ;
कार्यों की अच्छाई का आधार, उनके अच्छे समापन पर है।
522.
مُذيعُ الفاحِشَةِ كَفاعِلِها;
बुरी बातों को फैलाने वाला, बुरे काम करने वाले के समान है।
523.
مَرارَةُ اليَأسِ خَيرٌ مِنَ التَّضَرُّعِ إلَى النّاسِ;
नाउम्मीदी की कड़वाहट को (बर्दाश्त करना) लोगों के सामने रोने से अच्छा है।
524.
مَجالِسُ اللَّهوِ تُفسِدُ الإيمانَ; व्यर्थ सभायें ईमान को ख़राब करती हैं।
525.
مَثَلُ الدُّنيا كَظِلِّكَ إن وَقَفتَ وَقَفَ وَإن طَلَبتَهُ بَعُدَ;
दुनिया की मिसाल तुम्हारी स्वयं की परछाई जैसी है, जब तुम खड़े होते हो तो वह रुक जाती है और जब तुम उसके पीछे चलते हो तो वह तुम से दूर हो जाती है।
526.
نِعمَ زادُ المَعادِ الإحسانُ إلَى العِبادِ;
लोगों के साथ भलाई करना, क़ियामत के लिए कितना अच्छा तौशा है।( इंसान किसी यात्रा पर जाते समय जो आवश्यक चीज़े अपने साथ ले जाता है उन्हें तौशा कहते हैं।)
527.
نِعمَ عَونُ الدُّعاءِ الخُشُوعُ;
ख़ुशू-उ, (स्वयं को बहुत छोटा समझना व रोना) दुआ के लिए कितना अच्छा मददगार है। !
528.
نَفَسُ المَرءِ خُطاهُ إلى أجَلِهِ;
इंसान की साँस, उसके मौत की तरफ़ बढ़ते हुए क़दम हैं।
529.
نِعمَةٌ لا تُشكَرُ كَسَيِّئَةِ لا تُغفَرُ;
नेमत पर शुक्र न करना, माफ़ न होने वाले गुनाह जैसा है।
530.
نُصحُكَ بَينَ المَلاَِ تَقريعٌ;
लोगों के बीच (किसी को) नसीहत करना, उसकी निंदा है।
531.
نِظامُ الدِّينِ خَصلَتانِ: إنصافُكَ مِن نَفسِكَ، وَمُواساةُ إخوانِكَ;
धार्मिक व्यवस्था की दो विशेषताएं हैं, स्वयं अपने साथ इंसाफ़ करना और अपने भाईयों की जान व माल से सहायता करना।
532.
نَزِّل نَفسَكَ دُونَ مَنزِلَتِها تُنَزِّلكَ النّاسُ فَوقَ مَنزِلَتِكَ;
अपने मान सम्मान से नीची जगह पर बैठो ताकि लोग तुम्हें तुम्हारे मान सम्मान से भी ऊँची जगह पर बैठायें।
533.
نِفاقُ المَرءِ مِن ذُلٍّ يَجِدُهُ في نَفسِهِ;
इंसान का निफ़ाक़ (द्विवादिता) एक ऐसी नीचता है, जिसे वह अपने अन्दर पाता है।
534.
هُدِيَى مَن تَجَلبَبَ جِلبابَ الدّينِ;
जिसने दीन की पोशाक पहन ली, वह हिदायत पा गया। अर्थात जिसने दीन को अपना लिया वह सफल हो गया।
535.
هَلَكَ مَن لَم يَعرِف قَدرَهُ; जिसने अपने महत्व को न समझा, वह बर्बाद हो गया।
536.
وَلَدُ السُّوءِ يَهدِمُ الشَّرَفَ، وَيَشينُ السَّلَفَ;
बुरी संतान, प्रतिष्ठा को मिटा देती है और बुज़ुर्गों के अपमान का कारण बनती है।
537.
وَقِّروا كِبارَكُم يُوَقِّركُم صِغارُكُم;
तुम अपने से बड़ों का आदर करो ताकि तुम से छोटे तुम्हारा आदर करें।
538.
وَيلٌ لِمَن غَلَبَت عَلَيهِ الغَفلَةُ فَنَسِيَ الرِّحلَةَ وَلَم يَستَعِدَّ;
धिक्कार है उस पर जो इतना लापरवाह हो जाये कि अपने कूच (प्रस्थान) को भूल जाये और तैयार न हो।
539.
وَحدَةُ المَرءِ خَيرٌ لَهُ مِن قَرينِ السُّوءِ;
बुरे इंसान के पास बैठने से, आदमी का तन्हा रहना अच्छा है।
540.
لا تَأسَ عَلى ما فاتَ;
जो खो दिया, उस पर अफ़सोस न करो।
541.
لا تَطمَع فِيما لا تَستَحِقُّ;
जिसके तुम हक़दार नही हो, उसका लालच न करो।
542.
لا تَثِقَنَّ بِعَهدِ مَن لا دينَ لَهُ;
किसी बेदीन के साथ किये हुए समझौते पर भरोसा न करो।
543.
لا تُحَدِّث بِما تَخافُ تَكذيبَهُ;
जिस बात के झुठलाये जाने का डर हो, उसे न कहो।
544.
لا تَعِد بِما تَعجِزُ عَنِ الوَفاءِ بِهِ;
तुम में जिस बात को पूरा करने की ताक़त न हो, उसके बारे में वादा न करो।
545.
لا تَعزِم عَلى ما لَم تَستبِنِ الرَّشدَ فيهِ;
उस काम को करने का संकल्प न करो, जिसकी उन्नति व विकास के बारे में तुम्हें जानकारी न हो।
546.
لا تُمسِك عَن إظهارِ الحَقِّ اِذا وَجَدتَ لَهُ أهلاً;
हक़ बात कहने से न रुको, जब तुम्हें कोई हक़ बात सुनने योग्य मिल जाये।
547.
لا تُمارِيَنَّ اللَّجُوجَ في مَحفِل;
झगड़ालु स्वभव वाले आदमी से भरी सभा में न उलझो।
548.
لا تُعاتِبِ الجاهِلَ فَيَمقُتَكَ، وَعاتِبِ العاقِلَ يُحبِبِكَ;
मूर्ख की निंदा न करो क्योंकि वह तुम्हारा दुश्मन बन जायेगा और बुद्धिमान की निंदा करो वह तुम से मोहब्बत करेगा।
549.
لا تَستَصغِرَنَّ عَدُوّاً وَاِن ضَعُفَ;
किसी भी दुश्मन को छोटा न समझो चाहे वह कमज़ोर ही क्यों न हो।
550.
لا تُلاحِ الدَّنِيَّ فَيَجتَرِىءَ عَلَيكَ;
नीच इंसान से मत झगड़ो, वह तुम्हारे साथ दुष्टता करेगा।
551.
لا تُؤيِسِ الضُّعَفاءَ مِن عَدلِكَ;
कमज़ोर लोगों को अपने न्याय से नाउम्मीद न करो।
552.
لا تَعمَل شَيئاً مِنَ الخَيرِ رِياءُ وَلا تَترُكهُ حَياءً;
किसी भी नेक काम को दिखावे के लिए न करो और न शर्म की वजह से उसे छोड़ो।
553.
لا تَثِقِ بِالصَّديقِ قَبلَ الخُبرَةِ;
परखे बिना दोस्त पर भरोसा न करो।
554.
لا تَستَحيِ مِن إعطاءِ القَليلِ; فَإنَّ الحِرمانَ أقَلُّ مِنهُ;
कम (दान) देने में शर्म न करो, क्योंकि उससे वंचित रखना तो उससे भी कम है।
555.
لا تَظلِمَنَّ مَن لا يَجِدُ ناصِراً إلاَّ اللهَ;
जिसका अल्लाह के अलावा कोई सहायक न हो उस पर अत्याचार न करो।
556.
لا يَشغَلَنَّكَ عَنِ العَمَلِ لِلآخِرَةِ شُغلٌ; فَإنَّ المُدَّةَ قَصيرَةٌ;
(याद रखो) आख़ेरत के कामों से (रोकने के लिए) कोई काम तुम्हें स्वयं में व्यस्त न कर ले, क्योंकि समय बहुत कम है।
557.
لا تَفرِحَنَّ بِسَقطَةِ غَيرِكَ لا تَدري ما يُحدِثُ بِكَ الزَّمانُ;
किसी के हारने या गिरने से खुश न हो, क्योंकि तुम्हें नही पता कि आने वाले समय में तुम्हारे साथ क्या घटित होने वाला है।
558.
لا تَجعَل عِرضَكَ غَرَضاً لِقَولِ كُلِّ قائِلِ;
अपनी इज़्ज़त को हर बोलने वाले के तीर का निशाना न बनने दो।
559.
لا تَستَبِدَّ بِرَأيِكَ، فَمَنِ استَبَدَّ بِرَأيِهِ هَلَكَ;
स्वेच्छाचारी न बनों, क्योंकि स्वेच्छाचारी मौत के घाट उतर जाता है।
560.
لا تُسِيءِ الخِطابَ فَيَسُوءَكَ نَكيرُ الجَوابِ;
किसी को बुरी बात न कहो कि बुरा जवाब सुनने को मिले।
561.
لا تَستَبطِيء اِجابَةَ دُعائِكَ وَقد سَدَدتَ طَريقَهُ بِالذُّنُوبِ;
अपनी दुआ के देर से क़बूल होने की (उम्मीद में न रहो) जब गुनाहों के द्वारा उसके क़बूल होने के रास्ते को बंद कर दिया हो।
562.
لا تُدخِلَنَّ في مَشوَرَتِكَ بِخيلاً فَيَعدِلَ بِكَ عَنِ القصدِ، وَيَعِدَكَ الفَقرَ;
कभी भी कंजूस से मशवरा न करो, क्योंकि वह तुम्हें मध्य मार्ग से दूर कर देगा और निर्धनता से डरायेगा।
563.
لا تُشرِكَنَّ في رَأيِكَ جَباناً يُضَعِّفُكَ عَنِ الأمرِ وَيُعَظِّمُ عَلَيكَ ما لَيسَ بِعَظيمِ;
किसी भी डरपोक से मशवरा न करना, क्योंकि वह तुम्हारी काम करने की शक्ति को कमज़ोर बना देगा और जो काम बड़ा नही है उसे तुम्हारे सामने बड़ा बनाकर पेश करेगा।
564.
لا تَستَشِرِ الكَذّابَ; فَإنَّهُ كَالسَّرابِ يُقَرِّبُ عَلَيكَ البَعيدَ; وَيُبَعِّدُ عَلَيكَ القَريبَ;
झूठे से मशवरा न करना, वह सराब (मरीचिका) के समान होता है, वह दूर को तुम्हारे लिए समीप व समीप को दूर कर देगा।
565.
لا تُشرِكَنَّ في مَشوَرَتِكَ حَريصاً يُهَوِّنُ عَلَيكَ الشَّرَّ وَيُزَيِّنُ لَكَ الشَّرَهَ;
किसी भी लालची से मशवरा न करना, वह तुम्हारे सामने बुराई को आसान और लालच को सुसज्जित कर के पेश करेगा।
566.
لا تُؤَخِّر إنالَةَ المُحتاجِ إلى غَد; فَإنَّكَ لا تَدري ما يَعرِضُ لَكَ وَلَهُ في غَد;
निर्धन की आवश्क्ताओं की पूर्ति को कल पर मत टालो, क्योंकि तुम्हें नही पता कि आने वाले कल में तुम्हारे या उसके साथ क्या होने वाला है।
567.
لا تَنقُضَنَّ سُنَّةً صالِحَةٌ عُمِلَ بِها وَاجتَمَعَتِ الأُلفَةُ لَها وَصَلَحَتِ الرَّعِيَّةُ عَلَيها;
उस अच्छी सुन्नत को न मिटाओ जिसे लोग अपनाये हुए हों और जिसके द्वारा आपस में एक दूसरे से मिलते हों और जिसमें उनके लिए भलाई हो।
568.
لا تَصحَب مَن يَحفَظُ مَساوِيَكَ، وَيَنسى فَضائِلَكَ وَمَعالِيَكَ;
जो तुम्हारी बुराईयों को याद रखे और तुम्हारी विशेषताओं व उच्चताओं को भुला दे, उसे दोस्त न बनाओ।
569.
لا تَقُل مالا تَعلَمُ فَتُتَّهَمَ بِإِخبِارِكَ بِما تَعلَمُ;
तुम जिस चीज़ के बारे में नही जानते हो, उसके बारे में कुछ न कहो, ताकि तुम्हारी उन बातों के बारे में शक न हो जिनके बारे में तुम अच्छी तरह जानते हो।
570.
لا فِطنَةَ مَعَ بِطنَةِ;
भरा हुआ पेट व बुद्धिमत्ता एक साथ इकठ्ठा नही होते है।
571.
لا جِهادَ كَجِهادِ النَّفسِ;
कोई जिहाद, नफ़्स से जिहाद करने के समान नही है, अर्थात अपनी इच्छाओं से लड़ी जाने वाली जंग जैसी कोई जंग नही है।
572.
لا يَجِتَمِعُ الباطِلُ وَالحَقُّ;
हक़ व बातिल, झूठ व सच एक साथ इकठ्ठा नही होते है।
573.
لا لِباسَ أجمَلُ مِنَ السَّلامَةِ;
स्वास्थ से सुन्दर कोई वेश नही है।
574.
لا دِينَ لِمُسَوِّف بِتَوبَتِهِ;
जो तौबा करने में आज कल करता है, वह दीनदार नही है।
575.
لا عَيشَ لِمَن فارَقَ أحِبَّتَهُ;
जो अपने दोस्तों से अलग हो जाये उसके लिए आराम नही है।
576.
لا يُدرَكُ العِلمُ بِراحَةِ الجِسمِ;
शारीरिक आराम के साथ ज्ञान प्राप्त नही होता।
577.
لا يَشبَعُ المُؤمِنُ وَأخُوهُ جائِعٌ;
मोमिन खाना नही खाता, (अगर) उसका भाई भूखा हो।
578.
لا يَستَغنِي العاقِلُ عَنِ المُشاوَرَةِ;
बुद्धिमान यह नही सोचता कि उसे परामर्श व मशवरे की ज़रूरत नही है।
579.
لا خَيرَ في لَذَّة لا تَبقى;
जो मज़ा बाक़ी रहने वाला न हो, उसमें भलाई नही है।
580.
لا عَيشَ أهنَأُ مِنَ العافِيَةِ;
सेहत व स्वस्थता से अच्छा कोई आनंद नही है।
581.
لا خَيرَ فيمَن يَهجُرُ أخاهُ مِن غَيرِ جُرمِ;
उसके लिए भलाई नही है जो अपने दोस्तों से उनकी किसी ग़लती के बिना ही अलग हो जाये।
582.
لا تَكمُلُ المَكارِمُ إلاّ بِالعَفافِ وَالإيثارِ;
पारसाई व त्याग के बिना अख़लाक़ पूरा नही होता।
583.
لا عَدُوَّ أعدى عَلَى المَرءِ مِن نَفسِهِ;
आदमी का उसके नफ़्स से बड़ा कोई दुश्मन नही है।
584.
لا يُغتَبَطُ بِمَوَدَّةِ مَن لا دينَ لَهُ;
बेदीन से दोस्ती पर ख़ुश नही होते।
585.
لا يَرضَى الحَسُودُ عَمَّن يَحسُدُهُ إلاّ بِالمَوتِ أو بِزَوالِ النِّعمَةِ;
ईर्ष्यालु उस समय तक खुश नही होता जब तक जिससे वह ईर्ष्या करता है वह मर न जाये या उसका धन दौलत न छिन जाये।
586.
لا يَكُونُ الصَّديقُ صَديقاً حَتَّى يَحفَظَ أخاهُ في غَيبَتِهِ وَنَكبَتِهِ وَوَفاتِهِ;
दोस्त उस समय तक दोस्त (कहलाने के योग्य) नही है, जब तक अपने दोस्त की उनुपस्थिति में, उसकी परेशानी में और उसकी मौत पर दोस्ती का हक़ अदा न करे।
587.
لا طاعَةَ لِمَخلوق في مَعصِيَةِ الخالِقِ;
पैदा करने वाले की अवज्ञा करने के लिए किसी की भी आज्ञा का पालन आवश्यक नही है।
588.
لا يَفوزُ بِالجَنَّةِ اِلاّ مَن حَسُنَت سَريرَتُهُ وَخَلُصَت نِيَّتُهُ;
जिनकी आत्मा अन्दर से पाक व नीयत साफ़ है उनके अतिरिक्त कोई जन्नत में नही जा सकता।
589.
لا خَيرَ في قَوم لَيسُوا بِناصِحينَ وَلا يُحِبُّونَ النّاصِحينَ;
जो क़ौम नसीहत करने वाली न हो और जो नसीहत करने वालों से मोहब्बत न करती हो, उसके लिए भलाई नही है।
590.
لا خَيرَ في أخ لا يُوجِبُ لَكَ مِثلَ الَّذي يُوجِبُ لِنَفسِهِ;
उस भाई व दोस्त से कोई फ़ायदा नही है, जो जिस चीज़ को अपने लिए ज़रूरी समझता है, उसे तुम्हारे लिए ज़रूरी न समझे।
591.
لا نِعمَةَ أهنَأُ مِنَ الأمنِ;
शांति से बढ़कर कोई भी नेमत सुख देने वाली नही है।
592.
لا خَيرَ في قَلب لا يَخشَعُ، وَعَين لا تَدمَعُ، وَعِلم لا يَنفَعُ;
जो दिल अल्लाह से न डरता हो, जो आँख न रोती हो और जो ज्ञान फ़ायदा न पहुँचाता हो, उसमें कोई भलाई नही है।
593.
يُستَدَلُّ عَلى عَقلِ كُلِّ امرِء بِما يَجرِي عَلى لِسانِهِ;
164.
जो बात इंसान की ज़बान पर आती है, वह उसकी बुद्धी पर तर्क बनती है।
594.
يُستَدَلُّ عَلى كَرَمِ الرَّجُلِ بِحُسنِ بِشرِهِ، وَبَذلِ بِرِّهِ;
मर्द का सदव्यवहार और उसकी भलाई व नेकी, उसकी श्रेष्ठता का तर्क है।
595.
يَسيرُ الرِّياءُ شِركٌ;
लोगों को दिखाने के लिए किया जाने वाला थोड़ा काम भी शिर्क है।
596.
يَسيرُ العَطاءِ خَيرٌ مِنَ التَّعَلُّلِ بِالاِعتِذارِ;
थोड़ा दान दे देना, बहाना बनाने व माफ़ी माँगने से अच्छा है।
597.
يَبلُغُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ مالا يَبلُغُهُ الكاذِبُ بِاحتِيالِهِ;
सच बोलने वाला, अपनी सच्चाई से उस चीज़ तक पहुँच जाता है, जिस तक झूठ बोलने वाला धोखे बाज़ी के द्वारा नही पहुँच पाता।
598.
يُمتَحَنُ الرَّجُلُ بِفِعلِهِ لا بِقَولِهِ;
मर्दों को उनके कामों से परखो, उनकी बातों से नही।
599.
يَومُ المَظلومِ عَلَى الظّالِمِ أشَدُّ مِن يَومِ الظّالِمِ عَلَى المَظلومِ;
ज़ालिम पर मज़लूम का दिन, मज़लूम पर ज़ालिम के दिन से कठिन है। अर्थात अत्याचारी के लिए अत्याचार की सज़ा पाने का दिन, अत्याचार करने के दिन से कठिन है।
600.
يَكتَسِبُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ ثَلاثاً: حُسنَ الثِّقَةِ بِهِ، وَالمَحَبَّةَ لَهُ، وَالمَهابَةَ عَنهُ;
सच बोलने वाले को अपने सच से तीन फ़ायदे होते हैं : (लोग) उस पर भरोसा करते हैं, उसके लिए दिलों में मोहब्बत पैदा होती है और उसको बड़ा मानते हुए उससे डरते हैं।