True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

अक़वाले मासूमीन (अ0स0)

571. لا جِهادَ كَجِهادِ النَّفسِ;
कोई जिहाद, नफ़्स से जिहाद करने के समान नही है, अर्थात अपनी इच्छाओं से लड़ी जाने वाली जंग जैसी कोई जंग नही है।
572.
لا يَجِتَمِعُ الباطِلُ وَالحَقُّ;
हक़ व बातिल, झूठ व सच एक साथ इकठ्ठा नही होते है।
573.
لا لِباسَ أجمَلُ مِنَ السَّلامَةِ;
स्वास्थ से सुन्दर कोई वेश नही है।
574.
لا دِينَ لِمُسَوِّف بِتَوبَتِهِ;
जो तौबा करने में आज कल करता है, वह दीनदार नही है।
575.
لا عَيشَ لِمَن فارَقَ أحِبَّتَهُ;
जो अपने दोस्तों से अलग हो जाये उसके लिए आराम नही है।
576.
لا يُدرَكُ العِلمُ بِراحَةِ الجِسمِ;
शारीरिक आराम के साथ ज्ञान प्राप्त नही होता।
577.
لا يَشبَعُ المُؤمِنُ وَأخُوهُ جائِعٌ;
मोमिन खाना नही खाता, (अगर) उसका भाई भूखा हो।
578.
لا يَستَغنِي العاقِلُ عَنِ المُشاوَرَةِ;
बुद्धिमान यह नही सोचता कि उसे परामर्श व मशवरे की ज़रूरत नही है।
579.
لا خَيرَ في لَذَّة لا تَبقى;
जो मज़ा बाक़ी रहने वाला न हो, उसमें भलाई नही है।
580.
لا عَيشَ أهنَأُ مِنَ العافِيَةِ;
सेहत व स्वस्थता से अच्छा कोई आनंद नही है।
581.
لا خَيرَ فيمَن يَهجُرُ أخاهُ مِن غَيرِ جُرمِ;
उसके लिए भलाई नही है जो अपने दोस्तों से उनकी किसी ग़लती के बिना ही अलग हो जाये।
582.
لا تَكمُلُ المَكارِمُ إلاّ بِالعَفافِ وَالإيثارِ;
पारसाई व त्याग के बिना अख़लाक़ पूरा नही होता।
583.
لا عَدُوَّ أعدى عَلَى المَرءِ مِن نَفسِهِ;
आदमी का उसके नफ़्स से बड़ा कोई दुश्मन नही है।
584.
لا يُغتَبَطُ بِمَوَدَّةِ مَن لا دينَ لَهُ;
बेदीन से दोस्ती पर ख़ुश नही होते।
585.
لا يَرضَى الحَسُودُ عَمَّن يَحسُدُهُ إلاّ بِالمَوتِ أو بِزَوالِ النِّعمَةِ;
ईर्ष्यालु उस समय तक खुश नही होता जब तक जिससे वह ईर्ष्या करता है वह मर न जाये या उसका धन दौलत न छिन जाये।
586.
لا يَكُونُ الصَّديقُ صَديقاً حَتَّى يَحفَظَ أخاهُ في غَيبَتِهِ وَنَكبَتِهِ وَوَفاتِهِ;
दोस्त उस समय तक दोस्त (कहलाने के योग्य) नही है, जब तक अपने दोस्त की उनुपस्थिति में, उसकी परेशानी में और उसकी मौत पर दोस्ती का हक़ अदा न करे।
587.
لا طاعَةَ لِمَخلوق في مَعصِيَةِ الخالِقِ;
पैदा करने वाले की अवज्ञा करने के लिए किसी की भी आज्ञा का पालन आवश्यक नही है।
588.
لا يَفوزُ بِالجَنَّةِ اِلاّ مَن حَسُنَت سَريرَتُهُ وَخَلُصَت نِيَّتُهُ;
जिनकी आत्मा अन्दर से पाक व नीयत साफ़ है उनके अतिरिक्त कोई जन्नत में नही जा सकता।
589.
لا خَيرَ في قَوم لَيسُوا بِناصِحينَ وَلا يُحِبُّونَ النّاصِحينَ;
जो क़ौम नसीहत करने वाली न हो और जो नसीहत करने वालों से मोहब्बत न करती हो, उसके लिए भलाई नही है।
590.
لا خَيرَ في أخ لا يُوجِبُ لَكَ مِثلَ الَّذي يُوجِبُ لِنَفسِهِ;
उस भाई व दोस्त से कोई फ़ायदा नही है, जो जिस चीज़ को अपने लिए ज़रूरी समझता है, उसे तुम्हारे लिए ज़रूरी न समझे।
591.
لا نِعمَةَ أهنَأُ مِنَ الأمنِ;
शांति से बढ़कर कोई भी नेमत सुख देने वाली नही है।
592.
لا خَيرَ في قَلب لا يَخشَعُ، وَعَين لا تَدمَعُ، وَعِلم لا يَنفَعُ;
जो दिल अल्लाह से न डरता हो, जो आँख न रोती हो और जो ज्ञान फ़ायदा न पहुँचाता हो, उसमें कोई भलाई नही है।
593.
يُستَدَلُّ عَلى عَقلِ كُلِّ امرِء بِما يَجرِي عَلى لِسانِهِ;
164.
जो बात इंसान की ज़बान पर आती है, वह उसकी बुद्धी पर तर्क बनती है।
594.
يُستَدَلُّ عَلى كَرَمِ الرَّجُلِ بِحُسنِ بِشرِهِ، وَبَذلِ بِرِّهِ;
मर्द का सदव्यवहार और उसकी भलाई व नेकी, उसकी श्रेष्ठता का तर्क है।
595.
يَسيرُ الرِّياءُ شِركٌ;
लोगों को दिखाने के लिए किया जाने वाला थोड़ा काम भी शिर्क है।
596.
يَسيرُ العَطاءِ خَيرٌ مِنَ التَّعَلُّلِ بِالاِعتِذارِ;
थोड़ा दान दे देना, बहाना बनाने व माफ़ी माँगने से अच्छा है।
597.
يَبلُغُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ مالا يَبلُغُهُ الكاذِبُ بِاحتِيالِهِ;
सच बोलने वाला, अपनी सच्चाई से उस चीज़ तक पहुँच जाता है, जिस तक झूठ बोलने वाला धोखे बाज़ी के द्वारा नही पहुँच पाता।
598.
يُمتَحَنُ الرَّجُلُ بِفِعلِهِ لا بِقَولِهِ;
मर्दों को उनके कामों से परखो, उनकी बातों से नही।
599.
يَومُ المَظلومِ عَلَى الظّالِمِ أشَدُّ مِن يَومِ الظّالِمِ عَلَى المَظلومِ;
ज़ालिम पर मज़लूम का दिन, मज़लूम पर ज़ालिम के दिन से कठिन है। अर्थात अत्याचारी के लिए अत्याचार की सज़ा पाने का दिन, अत्याचार करने के दिन से कठिन है।
600.
يَكتَسِبُ الصّادِقُ بِصِدقِهِ ثَلاثاً: حُسنَ الثِّقَةِ بِهِ، وَالمَحَبَّةَ لَهُ، وَالمَهابَةَ عَنهُ;
सच बोलने वाले को अपने सच से तीन फ़ायदे होते हैं : (लोग) उस पर भरोसा करते हैं, उसके लिए दिलों में मोहब्बत पैदा होती है और उसको बड़ा मानते हुए उससे डरते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स0) की चालीस हदीसें

1. ऐ ख़ुदा के बन्दों!
तुम सब बीमार की तरह हो और ख़ुदावन्दे आलम तबीब की तरह है पस मरीज़ों की सलाह (यानी) तुम्हारी सलाह इसी में है के जिसको तबीब जानता है और उसके लिये दस्तूर देता है (उसकी सलाह) इसमें नहीं है जो मरीज़ जानता है और जो करता है (लेहाज़ा) ख़ुदा के एहकाम की पाबन्दी करो ताके कामयाब रहो।
(मजमु-ए-वद्दाम, जिल्द-3, सफ़ा 117)
Hazrat Muhammad (s.a.w.w.) ne farmaya kae:- Aae Khuda kae bando! "Tum sabb beemaar kee tarha hoe orr Khudawant Tala Tabeeb kee tarha hai. Lehaza Mareez kee sala (Ilaaj) yanee tumharee sala (Ilaaj) issee main hai jiss koe tabeeb janta hai orr uss kae liyae dastoor daita hai. Uss kee sala (Ilaaj) uss main nahin hai joe mareez chahta hai orr karta hai lehaza khuda kae ahkaam kee pabandee karo taqae kamyaab raho."

[REFERENCE: Majmooa e Waraam volume No. 2 Page 117]

2. जो इस आलम में सुबह करे के मुसलमानों के उमूर की (फ़िक्र और उसका) एहतेमाम न करे वह मुसलमान नहीं है (इसी तरह) जो मुसलमानों की मदद को पुकार रहा हो तो जो भी उसकी आवाज़ पर लब्बैक न कहे वह (भी) मुसलमान नहीं है। (बिहार, जिल्द 74, सफ़ा 339)
Jo iss aalam main subha karae kae musalmanoon ke amoor kee fiqr or us ka ehtamaam na karae woe musalmaan nahin hai. Issee tarha joe Musalmaan ki madad ko pukaar raha ho to jo bhee uss ki awaz per labbaik na kahe wo bhee Musalmaan nahin hai  [REFERENCE: Bihar ul Anwaar Volume 74 Page 339]

3. रसूले ख़ुदा (स0) ने एक छोटे से लश्कर को (दुश्मनों से जंग के लिये) भेजा जब वह वापस आए तो रसूल (स0) ने फ़रमाया! इन लोगों के लिये मरहबा है जो छोटे जेहाद से आ गए और अब इनके ऊपर बड़ा जेहाद बाक़ी है, तो पूछा गया ः ऐ रसूले (स0) जेहादे अकबर क्या है? फ़रमाया नफ़्स से जेहाद करना।
(वसाएल शीया, जिल्द 11, सफ़ा 122)
Rasoole khuda (s.) ne ek chote se lashkar ko dushmano se jang ke liye bhejha jab wo log wapis aye to Rasool ne farmaya "Unn logon ke liye marhaba hai jo chhote jehad se aa gaye or ab un ke ooper bada jehad baqi hai". Poochha gaya "Ae Khuda ke Rasool Jehad e Akbar kya hai?" Aap ne farmaya "Nafs se jehad karna"  [REFERENCE: Wasail ul Shia Volume 11 Page 122]

4. जब मेरी उम्मत में बिदअतें फूट पड़ें तो आलिम की ज़िम्मेदारी है अपने इल्म को ज़ाहिर करे और जो ऐसा न करे उस पर ख़ुदा की लानत है। (उसूले काफ़ी, जि0 1, स0 54)
Jab meri ummat main bidatain phoot parain to Aalim kee zimadaree hai kae apnae ilm ko zahir kare or jo aisa na kare us per lanat hai.
[REFERENCE: Usool e Kafi Volume 1 Page 54]

5.फोक़हा रसूलों और पैग़म्बरों के उस वक़्त तक अमीन हैं- यानी पैग़म्बरों के अमीन नुमाइन्दे और मौरिदे इत्मीनान हैं जब तक उमूरे दुनिया दाखि़ल न हों- पूछा गया ऐ ख़ुदा के रसूल (स0) उमूरे दुनिया में दाखि़ल होने का क्या मतलब है? रसूले ख़ुदा (स0) ने जवाब दिया ः दुनिया में दाखि़ल होने का मतलब बादशाह (हाकिमे ताग़ूत) की पैरवी करने लगें, जब यह ओलमा सुलतान की पैरवी करने लगें तो अपनी दीन (की हिफ़ाज़त) में उनसे परहेज़ करो।  (कन्ज़ुल अमाल हदीस 28952)
Fuqaha Rasulon or Paighambaron ke us waqt taq ameen hain jab taq umoor-e-dunya main dakhil na hoon". Poocha gaya ke ae Khuda ke Rasool "Dunya main dakhil hone ka matlab kya hai"? Rasool ne farmaya "Dunya me dakhil hone ka matlab hai badshah (taghoot) ki pairvi karne lagain. Jab Ye Ulima Sultan ki pairvi karne lagain to apne deen ki hifazat main unse parhaiz karo".  [REFERENCE: Usool e Kafi Volume 1 Page 86, Kanz ul Amaal Hadith No. 28952]

6. मैं अपनी उम्मत के सिलसिले में न किसी मोमिन से ख़ौफ़ खाता हूँ न किसी मुशरिक से, इसलिये के मोमिन का ईमान उम्मत को गज़न्द पहुंचाने से रोकेगा और मुशरिक का कुफ्ऱ ख़ुद उसकी ज़िल्लत व रूसवाई का सबब होगा। हाँ उस मुनाफ़िक़ के गज़न्द पहुंचाने से डरता हूँ जो चर्बे ज़बान हो और ज़बान दराज़ हो (क्योंके वह) जिन चीज़ों की ख़ूबी को तुम जानते हो उसको ज़बान से कहेगा और जिनसे तुम को नफ़रत है अमलन उसी को अन्जाम देगा।  (बिहारूल अनवार जि0 2 स0 110)
Main apnee Ummat ke silsile me na kisi momin se khof khata hoon na kisi mushriq se. Iss liye ke momin ka Eemaan ummat ko gazand pahuchane se rokega or mushriq ka kufar khud uski zillat o ruswayi ka sabab hoga. Haan us munafiq ke gazand pahuchane se darta hoon jo charb zubaan ho or zubaan daraaz ho kyonke wo jin cheezo ki khubi ko tum jante ho us ko zubaan se kahega or jin se tum ko nafrat hai us ko anjaam dega"  [REFERENCE: Bihar ul Anwaar Volume 2 Page 110 ]

7. क़यामत के दिन ख़ुदा की तरफ़ से एक मुनादी निदा करेगाः सितमगार कहाँ हैं? सितमगारों के मददगार कहाँ हैं? जो लोग सितमगारों की दवात में कपड़ा डालते थे वह कहाँ हैं? जो उनकी हथेली को बान्धते थे, वह कहां हैं? जो उनका क़लम बनाते थे, वह कहां हैं? इन तमाम सितमगारों को एक जगह महशूर करो! (बिहारूल अनवार, जि0 75, स0 372)
Qayamat ke din ek nida karne wala nida karega ke Sitamgaar kahan hain? Sitamgaroon ke madadgaar kahan hain? jo loag Sitamgaron ki dwaat me kapra dalte the wo kahan hain? jo unki hatheli koe bandhte the woe kahan hain? joe unn ka qalam bandhte the wo kahan hain? Inn tamam Sitamgaroon ko ek jagah mehshoor karo.  [REFERENCE: Bihar Ul Anwaar Volume 75 Page 372]

8. हर नेकी के ऊपर एक नेकी है यहाँ तक के कोई राहे ख़ुदा में शहीद हो जाए जब वह राहे ख़ुदा में क़त्ल कर दिया जाए तो (यह ऐसी नेकी है के) उसके ऊपर कोई नेकी नहीं है।  (बिहारूल अनवार जि0 100 स0 10)
Hazrat Muhammad (s.a.) Ne farmaya: "Har neki ke ooper ek neki hai yahan taq ke koi Rah-e-Khuda me shaheed ho jaye jab wo Rah-e-Khuda me qatl kar diya jaye to ye aisee neki hai ke us ke ooper koi neki nahin hai.  [REFERENCE: Bihar ul Anwaar Volume 100 Page 10]

9. सबसे बदतर वह शख़्स है जो अपनी आख़ेरत अपनी दुनिया के लिये बेच दे और उससे भी बदतर वह शख़्स है जो अपनी आख़ेरत दूसरे की दुनिया के बदले बेच दे।  (बिहारूल अनवार जि0 77 स0 46)
Sabse badtar wo shakhs hai jo apni aakherat apni dunya ke liye bech de or usse bhi badtar wo shakhs hai jo apnee aakhirat doosre ki dunya ke badle bech de.  [REFERENCE: Bihar ul Anwaar Volume 77 Page 46]

10. जो शख़्स किसी चीज़ में अपने ख़ुदा को नाराज़ करके बादशाह को राज़ी करे वह दीने ख़ुदा से ख़ारिज है।  (तोहफ़ुलअक़ूल पेज 75)
Jo Shakhs kisi cheez me apne Khuda ko Naraaz karke Badshah ko Razi kare wo Dean-e-Khuda se Kharij hai."  [TOHFUL AQOOL PAGE 75]

11. जो किसी दौलतमन्द के पास आकर (उसकी दौलत की वजह से) इसका एहतेराम करे उसका दो तिहाई दीन चला जाता है।
(तोहफ़ुलअक़ूल पेज 8)
Jo Kisee Daulat Mand Ke Paas aakar usskee Dolat kee wajah se uss ka Ehteraam kare Uss ka 2/3 Deen chala jata hai"
[REFERENCE: TOHFUL AQOOL PAGE NO: 8]

12. नेकोकार की अलामतें दस हैंः-

1. ख़ुदा के लिये दोस्ती करता है।
2. ख़ुदा के लिये दुश्मनी करता है।
3- ख़ुदा के लिये रफ़ाक़त करता है।
4- ख़ुदा के लिये जुदा होता है
5- ख़ुदा के लिये ग़ुस्सा करता है।
6- ख़ुदा के लिये ख़ुश होता है।
7- ख़ुदा के लिये अमल करता है
8- ख़ुदा के सामने दस्ते सवाल दराज़ करता है।
9- ख़ुदा के लिये ख़ुज़ू व ख़ुशू करता है यहाँ तक के ख़ुदा से ख़ौफ़ व तरस की ख़सलत रखता है।
10. ख़ुदा के लिये नेकी करता है। (तोहफ़ुलअक़ूल पेज 21)

Nekokaar ki Alamate 10 hain"- 1. Khuda ke liye doastee karta hai. 2. Khuda ke Liye Dushmani karta hai. 3. Khuda ke liye Rafaqat karta hai. 4. Khuda ke liye Juda hota hai. 5. Khuda ke liye Ghussa karta hai. 6. Khuda ke liye Khush hota hai. 7. Khuda ke liye amal karta hai. 8. Khuda ke samne Dast e Sawaal daraaz karta hai. 9. Khuda ke liye Khusho o Khazo karta hai yahan taq ke Khuda se Khof o Tarss kee Khaslat rakhta hai. 10. Khuda ke liye Neki karta hai.
[REFERENCE: TOHFUL AQOOL PAGE 21]

‘‘रावी ने सरकारे सादिक़ से पूछा के एक शख़्स आपकी अहादीस रिवायत करता और मशहूर करता और शियों के क़ुलूब की इस्लाह करता है और दूसरा शख़्स आबिद है मगर वह रिवायत नहीं करता आपकी अहादीस को, उनमें कौन अफ़ज़ल है? फ़रमाया हमारी अहादीस की रिवायत करने वाला हज़ार आबिदों से बेहतर है। (इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम)(उसूले काफ़ी जि0 1)

- वह बदबख़्त शक़ीउलक़ल्ब हलाक होगा, जो बावजूद यह जानने के के यह हदीसे मासूम (अ0) है, उससे इनकार करे और उससे इनकार करने वाला काफ़िर होगा। (इमाम मोहम्मदे बाक़र अलैहिस्सलातो वस्सलाम) (उसूले काफ़ी, किताबे हुज्जत, बाब 109, हदीस 1)

आइम्मा, अरकाने ज़मीन- इरशादे पैग़म्बरे अकरम (स0अ0व0व0) है के मेरे अहलेबैत (अ0) में से इमाम (अ0) वह दरवाज़ाए रहमत हैं जिसके बग़ैर जन्नत में दाखि़ला मुमकिन नहीं है, वह राहे हिदायत हैं के जो उस पर चला वह ख़ुदा तक पहुंच गया यही कैफ़ियत अमीरूल मोमेनीन (अ0) और उनके बाद के जुमला आइम्मा की है, परवरदिगार ने उन्हें ज़मीने कारकुन बनायाा है ताके अपनी जगह से हटने न पाए और इस्लाम का सुतून क़रार दिया है और राहे हिदायत का मुहाफ़िज़ बनाया है, कोई राहनुमा इनके बग़ैर हिदायत नहीं पा सकता है और कोई शख़्स उस वक़्त तक गुमराह नहीं होताा है जब तक इनके हक़ में कोताही न करे, यह ख़ुदा की तरफ़ से नाज़िल होने वाले जुमला उलूम, बशारतें, अन्जार सब के अमानतदार हैं और अहले ज़मीन पर उसकी हुज्जत हैं उनके आखि़र के लिये ख़ुदा की तरफ़ से वही है जो अव्वल के लिये है और इस मरहले तक कोई शख़्स इमदादे इलाही के बग़ैर नहीं पहुंच सकता है।  (इमाम मोहम्मदे बाक़र अलैहिस्सलातो वस्सलाम)- (काफ़ी 1 स0 198-3 इख़्तेसास स0 21, बसाएरूल दरजात 199-1)

आइम्मा (अ0) रसूल (स0) वारिसे अम्बिया (स0)-- हमारे पास मूसा की तख़्ितयां और उनका असा मौजूद है और हमीं तमाम अम्बिया के वारिस हैं।  (इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम)(काफ़ी 1 स0 231-2)

आइम्मा (अ0) अल्लाह के नूर हैं- आइम्मा (अ0) अल्लाह के नूर हैं, नूरे इमाम क़ुलूबे मोमेनीन में है, वह निस्फ़ुलनहार सूरज से ज़्यादा रोशन होता है, आइम्मा, मोमेनीन के क़ुलूब को मुनव्वर कर देते हैं, अल्लाह उनके नूर से जिसको चाहता है छिपाता है तो लोगों के कु़लूब तारीक हो जाते हैं, जब तक अल्लाह किसी के क़ल्ब को पाक न करे वह इन्सान हमसे मोहब्बत व दोस्ती नहीं रखता, हमसे सुलह रखने वाला क़ल्ब अल्लाह से सख़्त अज़ाब से और रोज़े क़यामत के अज़ीम ख़ौफ़ से महफ़ूज़ रहता है।  (इमाम मोहम्मदे बाक़र अलैहिस्सलातो वस्सलाम) (उसूले काफ़ी किताबुल हुज्जत)

आइम्मा (अ0) हुज्जतुल्लाह- हम अल्लाह की तरफ़ से निशानी, रहनुमा, हुज्जत, जानशीन, अमीन और पेशवा हैं। हम अल्लाह का ख़ूबसूरत चेहरा, देखती हुई आंख सुनने वाले कान हैं हमारे सबब अल्लाह अपने बन्दों को अज़ाब व जज़ा देता है।  (इमाम अली इब्ने अबूतालिब़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम)

आइम्मा (अ0) अपने फ़िरक़े पर गवाह- रोज़े क़यामत हम हर गिरोह को उसके गवाह के साथ बुलाएंगे, और ऐ रसूल (स0) तुमको बनाएंगे उन सब पर गवाह, यह आायत उम्मते मोहम्मदिया के बारे में ख़ास तौर पर नाज़िल हुई है। इनमें से हर फ़िरक़ा अपने इमाम के साथ होगाा, हम उन पर गवाह होंगे और पैग़म्बरे अकरम (स0) हम पर गवाह होंगे।  (इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम)- (उसूले काफ़ी किताबुल हुज्जत)

आइम्मा (अ0) से मोहब्बत - यूसुफ़ बिन साबित बिन अबी सईद, इमामे सादिक़ (अ0) से नक़्ल करते हैं के जब लोगों ने आपके पास हाज़िर होकर अर्ज़ की के हम आपसे क़राबते रसूल और हुक्मे ख़ुदा की बिना पर मोहब्बत करते हैं और हमारा मक़सद हरगिज़ किसी दुनिया का हुसूल नहीं है, सिर्फ़ रिज़ाए इलाही और आखि़रत मतलूब है और हम अपने दीन की इस्लाह चाहते हैं तो आपने फ़रमाया के तुम लोगों ने यक़ीनन सच कहा है, अब जो हमसे मोहब्बत करेगा वह रोज़े क़यामत दो उंगलियों की तरह हमारे साथ होगा। (इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम)- ( काफ़ी 8 स0 80106, तफ़्सीरे अयाशी 2स0 69-61)

आइम्मा (अ0) से मोहब्बत - हमारी मोहब्बत ईमान है और हमारी अदावत कुफ्ऱ है।
(इमाम मोहम्मदे बाक़र अलैहिस्सलातो वस्सलाम) (काफ़ी 1 स0 188 -12)

आइम्मा (अ0) से मोहब्बत - जो हमसे मोहब्बत करेगा वह क़यामत में हमारे साथ होगा और अगर कोई इन्सान किसी पत्थर से भी मोहब्बत करेगा तो उसी के साथ महशूर होगा।  (पैग़म्बरे अकरम स0) (इमाली सुद्दूक़ स0 174-9)